भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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पृष्ठ 243

[ आदित्यपुरुषस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २२५

रस्य मर्यादावदैश्वर्यं युक्तम्, 'एष सर्वेश्वर एष भूताधिपतिरेष भूतपाल एष सेतुर्विधरण एषां लोकानामसंभेदाय' (बृ० ४।४।२२) इत्यविशेषश्रुतेः। तस्मान्नाक्ष्यादित्ययोरन्तः परमेश्वर इत्येवं प्राप्ते ब्रूमः—'अन्तस्तद्धर्मोपदेशात्' इति, 'य एषोऽन्तरादित्ये', 'य एषोऽन्तरक्षिणि' इति च श्रूयमाणः पुरुषः परमेश्वर एव, न संसारी। कुतः? तद्धर्मोपदेशात्। तस्य हि परमेश्वरस्य धर्मा इहोपदिष्टाः। तद्यथा—'तस्योदिति नाम' इति श्रावयित्वा तस्यादित्यपुरुषस्य नाम 'स एष सर्वेभ्यः पाप्मभ्य


भामती

यत्तावत् ऋगाद्यात्मकतयास्य सर्वात्मकत्वं श्रूयते तत्कथञ्चिदादित्यपुरुषस्यैव स्तुतिरित्यादित्यपुरुष एवोपास्यो न परमात्मेत्येवं प्राप्तम्। अनाधारस्त्वे च नित्यत्वं सर्वगतत्वं च हेतुः। अनित्यं हि कार्यं कारणाधारमिति नानाधारम्। नित्यमप्यसर्वगतं यत्तस्मादधरभावेनावस्थितं तदेव तस्योत्तरस्याधार इति नानाधारं तस्मादुभयमुक्तम्। एवं प्राप्तेऽभिधीयते—'अन्तस्तद्धर्मोपदेशात्'।

सर्वात्म्यसर्वदुरितविरहाभ्यामिहोच्यते ।
ब्रह्मैवाव्यभिचारिभ्यां सर्वहेतुविकारवत् ॥

नामनिरुक्तेन हि सर्वपाप्मापादानतयास्योदय उच्यते। न चादित्यस्य देवतायाः कर्मानधिकारेऽपि


भामती-व्याख्या

जो प्रतिपादन उपलब्ध होता है, वह अर्थवादमात्र है। जब कि श्रुति-प्रतिपादित रूप और आधारादि की अन्यथानुपपत्तिरूप अर्थापत्ति के द्वारा जीव उपास्यत्वेन निर्णीत हो गया, तब उस उपास्य तत्त्व के लिए जो "सैव ऋक्, तत्, साम, तदुक्थम्” (छां० १।७।५) इस प्रकार ऋगादिरूपता दिखाकर सर्वात्मकत्व ध्वनित किया है, वह अर्थवाद है और उसके द्वारा आदित्य-पुरुष की ही स्तुति की जाती है। फलतः यहाँ आदित्य-पुरुष का ही उपास्यत्वेन निर्देश सिद्ध होता है, गेय परमेश्वर का नहीं। भाष्यकार ने यह कहा है कि "न ह्यनाधारस्य स्वमहिमप्रतिष्ठितस्य सर्वव्यापिनः परमेश्वरस्याधार उपदिश्यते। "स भगवः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति स्वे महिम्नि" (छां० ७।२४।१) इति, "आकाशवत्सर्वगतश्च नित्यः" (गौड. का. ३।२) इति च श्रुतौ भवतः।" यहाँ परमेश्वर की अनाधारता सिद्ध करने के लिए 'नित्यत्व' और 'सर्वगतत्व'—इन दो हेतुओं का उल्लेख किया गया है, क्योंकि घटादि अनित्य पदार्थ जन्य होने के कारण अपने मृदादिरूप कारण पदार्थ को अपना आधार बनाता है; अतः अनाधार नहीं, तार्किकादि-सम्मत नित्य पदार्थ भी जो सर्वगत नहीं, ऐसे परमाण्वादि पदार्थ अनाधार नहीं होते, क्योंकि उनके नीचे अवस्थित पृथिव्यादि ही अपने ऊपर अवस्थित परमाण्वादि के आधार हैं, अतः 'नित्यत्व' और 'सर्वगतत्व'-दोनों को अनाधारता का हेतु बनाया गया है।

सिद्धान्त—"अन्तस्तद्धर्मोपदेशात्" ।

सर्वात्म्यसर्वदुरितविरहाभ्यामिहोच्यते ।
ब्रह्मैवाव्यभिचारिभ्यां सर्वहेतुविकारवत् ॥

आदित्यादि के अन्दर अवस्थित पदार्थ ब्रह्म ही है, क्योंकि उसी के ही सर्वात्मत्वादि धर्मों का यहाँ उपदेश किया गया है। सर्वात्मत्व और सर्वपाप्म-निवृत्ति—ये दोनों धर्म ब्रह्म के अव्यभिचारी हैं, ब्रह्म को छोड़ कर अन्यत्र नहीं रहते। हिरण्यश्मश्रुत्वादि रूपविशेष का योग भी ब्रह्म में सम्भव है, किन्तु विकारवान् (सोपाधिक) ब्रह्म में, क्योंकि वह समस्त विश्व का हेतु है, अतः आदित्यादिगत कथित हिरण्यकेशादि-युक्तत्व का व्यवहार उसके हेतुभूत ब्रह्म में सम्भव है।

"तस्योदिति नाम"—इस प्रकार उक्त पुरुषतत्त्व का 'उद्' यह नाम बताकर इस नाम

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