भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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पृष्ठ 253

प्राणस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २३५

( ९ प्राणाधिकरणम् । सू० २३ )

अत एव प्राणः ॥ २३ ॥

उद्गीथे—'प्रस्तोतर्या देवता प्रस्तावमन्वायत्ता' ( छां० १।१०।९ ) इत्युपक्रम्य श्रूयते—'कतमा सा देवतेति प्राण इति होवाच, सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि प्राणमेवाभिसंविशन्ति प्राणमभ्युज्जिहते सैषा देवता प्रस्तावमन्वायत्ता' ( छा० १।११।४,५ ) इति । तत्र संशयनिर्णयौ पूर्ववदेव द्रष्टव्यौ । 'प्राणबन्धनं हि सोम्य मनः' ( छां० ६।८।२ ) 'प्राणस्य प्राणम्' ( बृ० ४।४।१८ ) इति चैवमादौ ब्रह्मविषयः प्राणशब्दो दृश्यते, वायुविकारे तु प्रसिद्धतरो लोकवेदयोः, अत इह प्राणशब्देन कतरस्योपादानं युक्तमिति भवति संशयः ।

किं पुनरत्र युक्तम् ? वायुविकारस्य पञ्चवृत्तेः प्राणस्योपादानं युक्तम् । तत्र हि


भामती

'उद्गीथे या देवता प्रस्तावमन्वायत्ता' इत्युपक्रम्य श्रूयते—'कतमा सा देवतेति प्राण इति होवाचोषस्तिश्चाक्रायणः' उद्गीथोपासनप्रसङ्गेन प्रस्तावोपासनमप्युद्गीय इत्युक्तं भाष्यकृता । प्रस्ताव इति साम्नो भक्तिविशेषस्तमन्वायत्ता अनुगता प्राणो देवता । अत्र प्राणशब्दस्य ब्रह्मणि च वायुविकारे च दर्शनात् संशयः—किमयं ब्रह्मवचन उत वायुविकारवचन इति ?

तत्रात एव ब्रह्मलिङ्गादेव प्राणोऽपि ब्रह्मैव न वायुविकार इति युक्तम् । यद्येवं तेनैव गतार्थमेत-


भामती-व्याख्या

परोवरीयो हास्य भवति, परोवरीयसो लोकान् जयति” ( छां. १।९।२ ) इस अर्थवाद वाक्य से नियन्त्रित होकर ब्रह्मपरक ही है, भूताकाशपरक हो ही नहीं सकता, भाष्यकार ने स्पष्ट कहा है—“वाक्योपक्रमेऽपि वर्तमानस्य आकाशशब्दस्य वाक्यशेषवशाद् युक्ता ब्रह्मविषयत्वावधारणा” ॥ २२ ॥

संगति—पूर्वोक्त ‘आकाश' पद के समान ही 'प्राण' पद का प्रसङ्ग उपस्थित कर पूर्ववत् निर्णय दिया जाता है, इस प्रकार आतिदेशिकी संगति को सूत्रकार ने ही “अत एव” शब्द के द्वारा ध्वनित कर दिया है ।

विषय-वाक्य - [ साम एक वैदिक गीत या राग है, एक साम तीन ऋचाओं पर गाया जाता है। साम-गान करनेवाले तीन ऋत्विक् होते हैं—प्रस्तोता, उद्गाता, प्रतिहर्त्ता । एक-एक साम के पाँच भाग किए जाते हैं—( १ ) प्रस्ताव, ( २ ) उद्गीथ, ( ३ ) प्रतिहार, ( ४ ) उपद्रव और ( ५ ) निधन । प्रस्तावनामक प्रथम भाग का गान प्रस्तोता, उद्गीथसंज्ञक द्वितीय भाग का उद्गाता, प्रतिहाराख्य तृतीय भाग का गान प्रतिहर्त्ता, चतुर्थ और पञ्चम भाग का गान तीनों मिल कर करते हैं ] । उद्गीथ के प्रकरण में “या देवता प्रस्तावमन्वायत्ता”—ऐसा प्रस्तावसंज्ञक साम का उपक्रम करके कहा गया है—“कतमा सा देवतेति प्राण इति होवाच उषस्त्यश्चाक्रायणः” ( छां. १।११।४ ) । यद्यपि यहाँ प्रस्ताव की उपासना अभिहित है, तथापि उद्गीथोपासना के प्रकरण में प्रस्ताव की उपासना का विधान उचित नहीं, अतः भाष्यकार ने 'उद्गीथे' कह दिया है । 'प्रस्ताव' साम की विशेष भक्ति ( भाग ) का नाम है, उस प्रस्ताव में प्राण देवता अन्वायत्त ( अनुगत ) है ।

संशय—'प्राण' शब्द ब्रह्म और शरीरगत वायु में प्रसिद्ध होने के कारण संशय हो जाता है कि यह 'प्राण' शब्द ब्रह्म का बोधक है ? अथवा शरीरगत वायु का वाचक है ?

पूर्वपक्ष—सूत्रकार ने जो सिद्धान्त किया है कि 'अत एव' ( ब्रह्म का साधारण