भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 295, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंमनोमयस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २७७
यते। तत्र किमग्निरत्ता स्यात्, उत जीवः, अथवा परमात्मेति संशयः, विशेषानव- धारणात्, त्रयाणां चाग्निजीवपरमात्मनामस्मिन्ग्रन्थे प्रश्नोपन्यासोपलब्धेः। किं तावत् प्राप्तम्? अग्निरत्तेति। कुतः? 'अग्निरन्नादः' (बृ० १।४।६) इति श्रुतिप्रसिद्धि- भ्याम्। जीवो वाऽत्ता स्यात्, 'तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्ति' इति दर्शनात्। न परमात्मा, 'अनश्नन्नन्योऽभिचाकशीति' (मुण्ड० ३।१।१) इति दर्शनादित्येवं प्राप्ते ब्रूमः--अत्ताऽत्र परमात्मा भवितुमर्हति। कुतः? चराचरग्रहणात्। चराचरं हि
भामती
जीवात्मनश्च भोक्तृताविधानात् ॐ तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्ति इति ॐ । तद्यदि भोक्तृत्वमत्तृत्वं ततो मुक्तसंशयं जीवात्मैव प्रतिपत्तव्यः ब्रह्मक्षत्रादि चास्य कार्यकारणसङ्घातो भोगायतनतया वा साक्षाद्वा सम्भवति भोग्यम्। अथ तु संहर्तृता भोक्तृता ततस्त्रयाणामग्निजीवपरमात्मनां प्रश्नोपन्यासोपलब्धेः संहर्तृत्वस्याविशेषाद्भवति संशयः। किमता अग्निरहो जीव उताहो परमात्मेति? अत्रौदनस्य भोग्यत्वेन लोके प्रसिद्धेर्भोक्तृत्वमेव प्रथमं बुद्धौ विपरिवर्त्तते, चरमं तु संहर्तृत्वमिति भोक्तैवात्ता। तथा च जीव एव। ॐ न जायते म्रियते इति ॐ च तस्यैव स्तुतिः, संहारकालेऽपि संस्कारमात्रेण तस्यावस्थानात्। दुर्ज्ञानत्वं च तस्य सूक्ष्मत्वात्। तस्माज्जीव एवात्तेहोपास्यत इति प्राप्तम्। यदि तु संहर्तृत्वमत्तृत्वं तथाप्यग्निरत्ता ॐ अग्निरन्नादः इति ॐ । श्रुतिप्रसिद्धिभ्याम्। एवं प्राप्तेऽभिधीयते। अत्तात्र परमात्मा, कुतः, चराचरग्रहणात् ॐ उभे यस्योदनः इति ॐ । ॐ मृत्युर्यस्योपसेचनम् इति ॐ। च श्रूयते तत्र यदि
भामती-व्याख्या
भोक्तृत्व का निषेध किया गया है—"अनश्नन्नन्योऽभचाकशीति" (मुण्ड. ३।१।१)। जीव जो भोक्ता माना गया है—"तयोरन्यः पिप्पलं स्वादु अत्ति" (मु. ३।१।१) अतः कथित अत्तृत्व यदि भोक्तृत्व है, तब निःसन्देह जीव की ही अत्तृत्वेन उपासना करनी होगी। ब्राह्मण और क्षत्रियादि से उपलक्षित कार्य-करण-संघातरूप (अपना) शरीर जीव का भोगायतन होने के कारण अथवा (छागादि का शरीर) साक्षात् भोग्य हो सकता है। यदि भोक्तृत्व का अर्थ संहार-कर्तृत्व विवक्षित है, तब अग्नि, जीव और ब्रह्म—इन तीनों में समानरूप से संहर्तृत्व सम्भव है, क्योंकि तीनों के विषय में प्रश्न और प्रतिवचन उपलब्ध हैं ["स त्वमग्निं स्वर्ग्यमध्येषि" (कठो. १।१।१३) यह अग्निविषयक प्रश्न और "लोकादिमग्निं तमुवाच" (कठो. १।१।१५) यह अग्निविषयक उत्तर है। "येयं प्रेते विचिकित्सा" (कठो. १।१।२०) यह जीव के विषय में प्रश्न और "हन्त त इदं प्रवक्ष्यामि" (कठो. २।१।६) यह जीवविषयक उत्तर है। "अन्यत्र धर्मात्" (कठो. १।२।१४) यह ब्रह्मविषयक प्रश्न एवं "हन्त त इदं प्रवक्ष्यामि" (कठो. २।१।६) यह ब्रह्म के विषय में उत्तर है]।
संशय—तीनों की समान चर्चा से संशय हो जाता है कि यहाँ अत्ता (भक्षक) अग्नि है? या जीव? अथवा ब्रह्म? भोक्तृत्व और संहर्तृत्व में से लोक में ओदनादि भोग्य पदार्थ की प्रसिद्धि को लेकर भोक्तृत्व ही पहले बुद्धि में अवस्थित होता है और उसके पश्चात् संहर्तृत्व स्मृति-पथ में आता है।
पूर्वपक्ष—प्रक्रान्त अत्ता भोक्ता सर्वथा जीव ही है, क्योंकि "न जायते म्रियते" (कठो. १।२।१८) इत्यादि से उसी की स्तुति की जाती है, संहार (प्रलय) काल में भी संस्कार मात्रेण उसकी अवस्थिति मानी जाती है। जीव में दुर्ज्ञानता उसकी सूक्ष्मता के कारण है, फलतः जीव ही यहाँ अत्तृत्वेन उपास्य है। यदि संहर्त्ता को अत्ता माना जाता है, तब अग्नि को अत्ता कहना होगा, क्योंकि "अग्निरन्नादः" (बृह. उ. १।४।६) इत्यादि श्रुतियों में वैसा ही अभिहित है।
सिद्धान्त—यहाँ अत्ता (भक्षक) ब्रह्म है, क्योंकि "उभे यस्योदनः" "मृत्युर्यस्योप-