भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| २७८ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. २ सू. ९ ] |
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स्थावरजङ्गमं मृत्यूपसेचनमिहाद्यत्वेन प्रतीयते, तादृशस्य चाद्यस्य न परमात्मनोऽन्यः कात्स्न्र्येनात्ता संभवति । परमात्मा तु विकारजातं संहरन् सर्वमत्तीत्युपपद्यते । नन्विह चराचरग्रहणं नोपलभ्यते, कथं सिद्धवच्चराचरग्रहणं हेतुत्वेनोपादीयते ? नैष दोषः, मृत्यूपसेचनत्वेन सर्वस्य प्राणिनिकायस्य प्रतीयमानत्वाद् , ब्रह्मक्षत्रयोश्च प्राधान्यात्प्रदर्शनार्थत्वोपपत्तेः । यत्तु परमात्मनोऽपि नात्तृत्वं संभवति, 'अनश्नन्नन्योऽभिचाकशीति' इति दर्शनादिति । अत्रोच्यते- कर्मफलभोगस्य प्रतिषेधकमेतद्दर्शनं, तस्य संनिहितत्वात् । न विकारसंहारस्य प्रतिषेधकं, सर्ववेदान्तेषु सृष्टिस्थितिसंहारकारणत्वेन ब्रह्मणः प्रसिद्धत्वात् । तस्मात्परमात्मैवेहात्ता भवितुमर्हतीति ॥ ९ ॥
<div align="center"><b>भामती</b></div>जीवस्य भोगायतनतया तत्साधनतया च कार्य्यकरणसङ्घातः स्थितः, न तर्ह्योदनः । नह्योदनो भोगायतनं, नापि भोगसाधनम्, अपि तु भोग्यः । न च भोगायतनस्य भोगसाधनस्य वा भोग्यत्वं मुख्यम् । न चात्र मृत्युरूपसेचनतया कल्प्यते । न च जीवस्य कार्य्यकरणसङ्घातो ब्रह्मक्षत्रादिरूपो भक्ष्यः, कस्यचित् क्रूरसत्त्वस्य व्याघ्रादेः कश्चिद्भूवेत्, न तु सर्वः सर्वस्य जीवस्य । तेन ब्रह्मक्षत्रविषयमपि जीवस्यात्तृत्वं न व्याप्नोति किमङ्ग पुनर्मृत्यूपसेचनप्राप्तं चराचरम् । न चौदनपदात् प्रथमावगतभोग्यत्वानुरोधेन यथासम्भवमत्तृत्वं योज्यत इति युक्तम् । नह्योदनपदं श्रुत्या भोग्यत्वमाह, किन्तु लक्षणया । न च लाक्षणिकभोग्यत्वानुरोधेन ※ मृत्यैर्यस्योपसेचनम् इति ※ च ※ ब्रह्मक्षत्रं च इति ※ श्रुतो सङ्कोचमर्हति । न च ब्रह्मक्षत्रे एवात्र विवक्षिते । मृत्यूपसेचनेन प्राणभृन्मात्रोपस्थापनात् । प्राणिषु प्रधानत्वेन च ब्रह्मक्षत्रोपन्यासस्योपपत्तेः । अन्यनिवृत्तेरशाब्दत्वात्, अनर्थत्त्वाच्च । तथा च चराचरसंहर्तृत्वं परमात्मन एव,
<div align="center"><b>भामती-व्याख्या</b></div>सेचनः"—इस प्रकार चर और अचरात्मक समस्त प्रपञ्च का भोग्य (भक्ष्य) कोटि में ग्रहण किया गया है। वह यदि जीव का भोगायतन (भोग-साधन) रूप भोग्य है, तब वह ओदन के समान मुख्य भोग्य नहीं होगा, क्योंकि चराचरात्मक जगत् जीव का न तो भोगायतन है और न भोग-साधन। यह जो मुख्य भोग्यत्व का सम्पादन करते हुए कहा गया कि ब्रह्मक्षत्रोपलक्षित सभी छागादि शरीरों का जीव भोक्ता है, वह कहना संगत नहीं, क्योंकि वैसा भोक्ता तो कोई नितान्त क्रूर सिंह, व्याघ्रादि ही हो सकता है, सभी जीवों के भक्षक सभी जीव नहीं हो सकते। जब कि समग्र ब्राह्मण और क्षत्रिय-वर्ग ही सबका भोग्य नहीं हो सकता, तब भला मृत्युरूप उपसेचन से उपलक्षित समस्त चराचर जगत् किस जीव का भोग्य होगा ?
यह जो कहा गया कि यहाँ संहार्यत्व की अपेक्षा भोग्यत्व की प्रथमतः उपस्थिति 'ओदन' पद के प्रभाव से होती है, भोग्यत्व के द्वारा जो भोक्तृत्व प्रतीत होता है, उसके अनुसार 'ब्रह्म' और 'क्षत्र' पद समस्त चराचार के उपलक्षक न होकर उपभोग-योग्य केवल छागादि का उपस्थापक है। वह कहना भी युक्ति-युक्त नहीं, क्योंकि 'ओदन' पद भोग्यत्व का बोधक अभिधा वृत्ति से नहीं किन्तु लक्षणा के द्वारा ही होता है। लाक्षणिक भोग्यत्व के अनुरोध पर "मृत्युर्यस्योपसेचनम्", एवं "ब्रह्म च क्षत्रं च"—इन पदों की शक्ति या शक्यार्थ का संकोच नहीं किया जा सकता। केवल ब्राह्मण और क्षत्रिय ही यहाँ विवक्षित नहीं, अपितु मृत्यूपसेचन के द्वारा समस्त प्राणियों की उपस्थिति विवक्षित है अतः प्राणियों में प्रधान होने के कारण ब्राह्मण और क्षत्रिय का उपन्यास युक्ति-संगत हो जाता है। जैसे "पञ्च पञ्चनखा भक्ष्याः" (वाल्मी. रा. कि. १७।३९) यह वाक्य परिसंख्या विधि होने के कारण शष्क, शल्यकि, गोधा, खड्गी (गेंडा) और कूर्म—इन पाँच नखवाले पाँच प्राणियों से अतिरिक्त पञ्च नखवाले मनुष्य एवं वानरादि प्राणियों की भक्षणीयता का निवर्त्तक है,