भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंऋतं पिबतो ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंचलितम् २७९
प्रकरणाच्च ॥ १० ॥
इतश्च परमात्मैवेहाऽत्ता भवितुमर्हति, यत्कारणं प्रकरणमिदं परमात्मनः, ‘न जायते म्रियते वा विपश्चित्’ ( काठ० १।२।१८ ) इत्यादि । प्रकृतग्रहणं च न्याय्यम् । ‘क इत्था वेद यत्र सः’ इति च दुर्विज्ञानत्वं परमात्मलिङ्गम् ॥ १० ॥
( ३ गुहाधिकरणम् । सू० ११-१२ )
गुहां प्रविष्टावात्मानौ हि तद्दर्शनात् ॥ ११ ॥
कठवल्लीष्वेव पठ्यते — 'ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे । छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति पञ्चाग्नयो ये च त्रिणाचिकेताः' ( काठ० १।३।१ ) इति । तत्र संशयः—किमिह बुद्धिजीवौ निर्दिष्टौ, उत जीवपरमात्मानाविति । यदि
भामती
नाग्नेः, नापि जीवस्य । तथा च ॐ न जायते म्रियते वा विपश्चिद् इति ॐ । ब्रह्मणः प्रकृतस्य न हानं भविष्यति ॐ क इत्था वेद यत्र सः इति ॐ च दुर्ज्ञानत्वमुपपत्स्यते । जीवस्य तु सर्वलोकप्रसिद्धस्य न दुर्ज्ञानता । तस्मादत्ता परमात्मैवेति सिद्धम् ॥ १० ॥
संशयमाह — ॐ तत्र इति ॐ । पूर्वपक्षे प्रयोजनमाह ॐ यदि बुद्धिजीवौ इति ॐ । सिद्धान्ते
भामती-व्याख्या
वैसे ही “ब्रह्म च क्षत्रं चोभे भवत ओदनः”—यह वाक्य भी ब्राह्मण और क्षत्रिय से भिन्न प्राणियों की भोग्यता ( भक्षणीयता ) का निवर्तक क्यों न मान लिया जाय ? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि प्रत्येक पद की स्वार्थ में शक्ति होती है, अन्यार्थ की निवृत्ति उसका शक्यार्थ नहीं । अन्यार्थ की निवृत्ति यहाँ अनर्थक भी है, क्योंकि दृष्टान्त में मनुष्यादि के भक्ष्यत्व की निवृत्ति न होने पर “न हिंस्यात् सर्वा भूतानि” ( म. भारत. वन. २१२।३४ ) इस शास्त्र का बाध प्रसक्त होता है, उसका निवारण जैसे “पञ्च पञ्चनखा भक्ष्याः” इस परिसंख्या का विशेष प्रयोजन है, वैसे “ब्रह्म च क्षत्रं चोभे भवत ओदनः”—यहाँ अन्यनिवृत्तिपरक परिसंख्या विधि मानने पर कोई विशेष प्रयोजन सिद्ध नहीं होता । सिद्धान्त में संहर्तृत्वरूप भोक्तृत्व विवक्षित है, चराचरात्मक सर्व प्रपञ्च का संहर्तृत्व ब्रह्म में ही श्रुति-सिद्ध है—'तत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति च” ( तै. उ ३।१ ) । अग्नि और जीव में सर्वसंहर्तृत्व सम्भव नहीं । प्रकृत में “न जायते म्रियते वा कदाचन” ( कठो. १।२।१८ ) इत्यादिरूप से ब्रह्म प्रक्रान्त है, अतः ब्रह्म में सर्व प्रपञ्च के लयाभिधान से प्रकृत की हानि भी नहीं होती । “क इत्था वेद यत्र सः”—इस प्रकार की दुर्ज्ञानता भी ब्रह्म में समञ्जस होती है, अग्नि और जीव तो लोक-प्रसिद्ध ही है उनमें दुर्ज्ञानता का प्रतिपादन संगत नहीं । फलतः यहाँ ब्रह्म ही अत्ता सिद्ध होता है ॥ ९-१० ॥
संशय—“ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे । छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति, पञ्चाग्नयो ये च त्रिणाचिकेताः” ( कठो. १।३।१ ) । यहाँ सन्देह होता है कि क्या 'ऋतं पिबन्तौ' इत्यादिरूपेण बुद्धि और जीव निर्दिष्ट हैं ? अथवा जीव और ब्रह्म ? पूर्वपक्ष के अनुसार यदि बुद्धि और जीव का निर्देश माना जाता है, तब बुद्धि का प्राधान्य होने के कारण कार्य ( शरीर ) और करण ( इन्द्रियों ) के समूह से भिन्न जीव प्रतिपादित होता है, वह भी प्रतिपादनीय है, क्योंकि 'येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्येऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके ।