भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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२८०ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. २ सू. ११

बुद्धिजीवौ, ततो बुद्धिप्रधानात्कार्यकरणसंघाताद्विलक्षणो जीवः प्रतिपादितो भवति । तदपीह प्रतिपादयितव्यं, 'येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्येऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके । एतद्विद्यामनुशिष्टस्त्वयाहं वराणामेष वरस्तृतीयः ॥' (काठ० १।१।२०) इति पृष्टत्वात् । अथ जीवपरमात्मानौ ततो जीवाद्विलक्षणः परमात्मा प्रतिपादितो भवति । तदपीह प्रतिपादयितव्यम्, 'अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात्कृताकृतात् । अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च यत्तत्पश्यसि तद्वद ॥' (काठ० १।२।१४) इति पृष्टत्वात् । अत्राहाक्षेप्ता—उभावप्येतौ पक्षौ न संभवतः । कस्मात् ? ऋतपानं कर्मफलोपभोगः, 'सुकृतस्य लोके' इति लिङ्गात् । तच्चेतनस्य क्षेत्रज्ञस्य संभवति, नाचेतनाया बुद्धेः । 'पिबन्तौ' इति च द्विवचनेन द्वयोः पानं दर्शयति श्रुतिः । अतो बुद्धिक्षेत्रज्ञपक्षस्तावन्न संभवति । अत एव क्षेत्रज्ञपरमात्मपक्षोऽपि न संभवति, चेतनेऽपि परमात्मनि ऋतपानासंभवात् । 'अनश्नन्नन्योऽभिचाकशीति' (मु० ३।१।१) इति मन्त्रवर्णादिति । अत्रोच्यते—नैष दोषः, छत्रिणो गच्छन्तीत्येकेनापि छत्रिणा बहूनां छत्रित्वोपचारदर्शनात् । एवमेकेनापि पिबता द्वौ पिबन्तावुच्येते । यद्वा—जीवस्तावत् पिबति, ईश्वरस्तु पाययति ।

भामती

प्रयोजनमाह ॐ अथ जीवपरमात्मानौ इति ॐ । औत्सर्गिकस्य मुख्यताबलात् पूर्वसिद्धान्तपक्षासम्भवेन पक्षान्तरं कल्पयिष्यत इति मन्वानः संशयमाक्षिपति ॐ अत्राह आक्षेप्तेति ॐ । ऋतं सत्यमवश्यम्भावीति यावत् । समाधत्ते ॐ अत्रोच्यते इति ॐ । आध्यात्मिकाधिकार्यादन्यो तावत्पातारावशक्यो कल्पयितुम् ।

भामती-व्याख्या

एतद् विद्यामनुशिष्टस्त्वयाहं वराणामेष वरस्तृतीयः" (कठो. १।१।२०) इस प्रकार जीव की ही जिज्ञासा प्रस्तुत की गई है। सिद्धान्त-पक्ष के अनुसार जीव और ब्रह्म का निर्देश मानने पर जीव से भिन्न ब्रह्म प्रतिपादित होता है। वह भी यहाँ प्रतिपादनीय है, क्योंकि "अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यत्रास्मात् कृताकृतात् । अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च यत् तत्पश्यसि तद् वद" (कठो. १।२।१४) इस प्रकार ब्रह्म भी जिज्ञासित है।

आक्षेप—पदार्थों के औत्सर्गिक (स्वाभाविक) सामर्थ्य को देखते हुए पूर्वपक्ष और सिद्धान्त पक्ष दोनों सम्भव नहीं, अतः तृतीय पक्ष की कल्पना करनी होगी—ऐसा समझ कर आक्षेपवादी उक्त संशय पर आक्षेप करता है—"अत्राहाक्षेप्ता उभावप्येतौ पक्षौ न सम्भवतः" । पूर्वपक्ष (बुद्धि और जीव में कर्मफलभोक्तृत्व) असम्भव इस लिए है कि ऋत रूप (सत्य या अवश्यंभावी) कर्म-फल का पान-कर्तृत्व (भोक्तृत्व) केवल जीवरूप चेतन में निसर्ग-सिद्ध है, जड़रूप बुद्धि में नहीं, अतः उन दोनों के लिए 'ऋतं पिबन्तौ' ऐसा द्विवचन का निर्देश क्योंकर सम्भव होगा ? इसी प्रकार सिद्धान्त-पक्ष के अनुसार जो ब्रह्म में कर्म-फल-भोक्तृत्व प्रतिपादित है, वह सम्भव नहीं, क्योंकि उसमें वह निषिद्ध है—"अनश्नन्नन्योऽभिचाकशीति" (मुण्ड. ३।१।१)।

आक्षेप का परिहार—कथित आक्षेप संभव नहीं, क्योंकि यद्यपि बुद्धि और जीव—इन दोनों में से केवल जीव ही भोक्ता है, जड़ होने के कारण बुद्धितत्त्व को भोक्ता नहीं कह सकते । इसी प्रकार जीव और ब्रह्म—इन दोनों में से भी एक केवल जीव ही भोक्ता है, ब्रह्म नहीं, क्योंकि असङ्ग होने के कारण उसको भोक्ता नहीं कहा जा सकता—"अनश्नन्नन्योऽभिचाकशीति" । तथापि जैसे छत्री (छाता-धारी) व्यक्ति के साथ अच्छत्री व्यक्तियों में भी छत्रित्व-व्यवहार होता है—"छत्रिणो यान्ति । वैसे ही कर्म-रस-पान-कर्त्ता (जीव) पुरुष के साथ बुद्धि और ब्रह्मरूप अभोक्ता पदार्थों में भोक्तृत्व-व्यवहार हो जाता है—'ऋतं