भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंऋतं पिबन्तौ ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २८१
पाययन्नपि पिबतीत्युच्यते, पाचयितर्यपि पक्तृत्वप्रसिद्धिदर्शनात् । बुद्धिक्षेत्रज्ञपरिग्रहोऽपि संभवति, करणे कर्तृत्वोपचारात् । एधांसि पचन्तीति प्रयोगदर्शनात् । न चाध्यात्मोऽधिकारोऽन्यो कौचिद् द्वावृतं पिबन्तौ संभवतः । तस्माद् बुद्धिजीवौ स्यातां, जीवपरमात्मानौ वेति संशयः । किं तावत्प्राप्तं ? बुद्धिक्षेत्रज्ञाविति । कुतः ? 'गुहां
भामती
तदिह बुद्धेरचेतनत्वेन परमात्मनश्च भोक्तृत्वानषेधेन जीवात्मैवकः पाता परिशिष्यत इति सृष्टीरुपदधातीतिवद् द्विवचनानुरोधादपिवत्संस्पृष्टां स्वार्थस्य विवच्छुञ्छब्दो लक्षयन् स्वार्थमजहल्लितरेतरयुक्तपिबदपिबत्परो भवतीत्यर्थः । अस्तु वा मुख्य एव, तथापि न दोष इत्याह ॐ यद्वा इति ॐ । स्वातन्त्र्यलक्षणं हि कर्तृत्वं तच्च पातुरिव पाययितुरप्यस्तीति सोऽपि कर्त्ता । अत एव चाहुः "यः कारयति स करोत्येव इति ।" एवं करणस्यापि स्वातन्त्र्यविवक्षया कथञ्चित्कर्तृत्वं, यथा काष्ठानि पचन्तीति । तस्मान्मुख्यत्वेऽप्यविरोध इति । तदेवं संशयं समाधाय पूर्वपक्षं गृह्णाति ॐ बुद्धिक्षेत्रज्ञौ इति ॐ । नियताधारता बुद्धिजीवसम्भविनी न हि । क्लेशात् कल्पयितुं युक्ता सर्वगे परमात्मनि ॥
भामती-व्याख्या
पिबन्तौ' । 'छत्रिणो यान्ति'—इस लौकिक न्याय के लिए याज्ञिक-पद्धति में "सृष्टीरुपदधाति" ( तै. सं. ५।३।४।७ ) यह उदाहरण प्रस्तुत किया जाता है [ भूमाधिकरण (जै. सू. १।४।१७) में कहा गया है कि अग्निचयन कर्म करने के लिए जिन ईंटों के द्वारा स्थण्डिल ( चबूतरा ) बनाया जाता है, उनका यज्ञ-मण्डप में ही निर्माण किया जाता है और स्थण्डिल चुनते समय मन्त्रों का उच्चारण करते रहते हैं । सृजतिपद-घटित “ब्रह्मासृज्यत, भूतान्यसृज्यत" ( तै. सं. ४।३।१०।१ ) इन मन्त्रों के द्वारा चुनी जानेवाली ईंटों को 'सृष्टि' पद से अभिहित किया जाता है । सृष्टिसंज्ञक ईंटों में वे ईंटें भी सम्मिलित कर ली जाती हैं, जिनकी सृष्टि संज्ञा नहीं, सृष्टि और असृष्टि इष्टिकाओं में 'सृष्टीरुपदधाति'—ऐसा व्यवहार वैसे ही हो जाता है, जैसे छत्री और अच्छत्री पुरुषों में छत्रिणों यान्ति—ऐसा व्यवहार लोक-प्रसिद्ध है ] । उसी प्रकार कर्म-जनित फलों के रस का पान करनेवाले व्यक्तियों के समूह में पान न करनेवाले बुद्धितत्त्व और ब्रह्म का भी समावेश हो जाता है । अथवा बुद्धिरूप करण में वैसे ही कर्तृत्व का व्यवहार हो जाता है, जैसे लोक में 'एधांसि पचन्ति'—ऐसा व्यवहार । इस अध्यात्म ( शरीर-सम्बन्धी पदार्थों पर विस्तृत प्रकाश डालनेवाले उपनिषत् ] शास्त्र में कर्म-रस पान करनेवाला अन्य कोई जोड़ा तो हो नहीं सकता, होगा तो बुद्धि और जीव या जीव और ब्रह्म का जोड़ा हो सकता है । 'पिबत्' पद अजहत्स्वार्थ लक्षणा के द्वारा दोनों का बोधक हो जाता है । अथवा लाक्षणिक पातृत्व को छोड़ कर मुख्य पातृत्व का ग्रहण किया जा सकता है—इसका प्रकार बताते हुए भाष्यकार कहते हैं—"यद्वा जीवः पिबति, ईश्वरस्तु पाययति" । पान क्रिया का स्वातन्त्र्यरूप कर्तृत्व जैसे पान करनेवाले व्यक्ति में रहता है, वैसे ही पान करानेवाले व्यक्ति में भी रहता है, अत एव 'यः करोति, स कारयति"—ऐसा लौकिक न्याय प्रसिद्ध है । बुद्धिरूप करण में पान की कर्तृता का व्यवहार कहा जा चुका है, अतः यदि मुख्य पातृत्व विवक्षित है, तब भी कोई अनुपपत्ति नहीं ।
पूर्व पक्ष—संशय की उपपत्ति करने के अनन्तर पूर्वपक्ष प्रस्तुत किया जाता है—"किं तावत् प्राप्तम् ? बुद्धिक्षेत्रज्ञाविति ।
नियताधारता बुद्धिजीवसम्भविनी न हि । क्लेशात् कल्पयितुं युक्ता सर्वगे परमात्मनि ॥
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