भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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२८२ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. २ सू. ११

प्रविष्टौ' इति विशेषात् । यदि शरीरं गुहा, यदि वा हृदयं, उभयथापि बुद्धिक्षेत्रज्ञौ गुहां प्रविष्टावुपपद्येते । न च सति संभवे सर्वगतस्य ब्रह्मणो विशिष्टदेशत्वं युक्तं कल्पयितुम् । 'सुकृतस्य लोके' इति च कर्मगोचरानतिक्रमं दर्शयति । परमात्मा तु न सुकृतस्य वा दुष्कृतस्य वा गोचरे वर्तते; 'न कर्मणा वर्धते नो कनीयान्' इति श्रुतेः । 'छायातपौ' इति च चेतनाचेतनयोर्निर्देश उपपद्यते; छायातपवत्परस्परविलक्षणत्वात् । तस्माद् बुद्धिक्षेत्रज्ञाविहोच्येयातामित्येवं प्राप्ते ब्रूमः—विज्ञानात्मपरमात्मानाविहोच्ये-

भामती

न च पिबन्तावितिवत्प्रविष्टपदमपि लाक्षणिकं युक्तं, सति मुख्यार्थत्वे लाक्षणिकार्थत्वायोगात् । बुद्धिजीवयोश्च गुहाप्रवेशोपपत्तेः । अपि च सुकृतस्य लोक इति सुकृतलोकव्यवस्थाननेन कर्मगोचरानतिक्रम उक्तः । बुद्धिजीवौ च कर्मगोचरमनतिक्रान्तौ । जीवो हि भोक्तृतया बुद्धिश्च भोगसाधनतया धर्मस्य गोचरे स्थितौ, न तु ब्रह्म; तस्यातदायत्तत्वात् । किञ्च छायातपाविति तमःप्रकाशावुक्तौ । न च जीवः परमात्मनोऽभिन्नस्तमः, प्रकाशरूपत्वात् । बुद्धिस्तु जडतया तम इति शक्योपदेष्टुम् । तस्माद् बुद्धिजीवा- वत्र कथ्येते । तत्रापि प्रेते विचिकित्सापनुत्तये बुद्धेर्भेदेन परलोकी जीवो दर्शनीय इति बुद्धिरुच्यते ।

भामती-व्याख्या

कर्म-फल-भोक्ता व्यक्तियों का जो विशेषण दिया गया है—"गुहां प्रविष्टौ" (कठो. १।३।१) । वहाँ 'गुहा' पद से चाहे स्थूल शरीर का ग्रहण किया जाय, चाहे हृदय का, उभयथा गुहारूप नियत (परिच्छिन्न) देश की आधारता बुद्धि और जीव में ही सम्भव है, परमात्मा में उसकी कल्पना करनी युक्ति-युक्त नहीं, क्योंकि वह सर्वत्रग (व्यापक) है किसी एकदेश में रहनेवाला (परिच्छिन्न) नहीं । 'पिबन्तौ' पद लाक्षणिक (जीव और ब्रह्म—इन दोनों का लक्षक) है, वैसे ही "गुहां प्रविष्टौ"—यह भी उभय का लक्षक है'—ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि मुख्यार्थकत्व का असम्भव हो जाने पर ही किसी पद को लाक्षणिक माना जाता है, बुद्धि और जीव को लेकर जब 'प्रविष्टौ' पद मुख्यार्थक हो जाता है, तब उसे ब्रह्म का लक्षक मानने की आवश्यकता नहीं। दूसरी बात यह भी है कि "ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके" (कठो. १।३।१) इस मन्त्र के 'सुकृत' पद का यद्यपि उपनिषद्भाष्य में भाष्यकार ने 'ऋत' पद के साथ अन्वय करते हुए कहा है—"सुकृतस्य स्वयंकृतस्य कर्मण ऋतमिति पूर्वेण सम्बन्धः" (काठक-भाष्य पृ. ५९), किन्तु यहां 'सुकृतस्य लोके' ऐसी लेख-भङ्गी से 'सुकृत' पद का 'लोक' पद के साथ अन्वय प्रतीत हो रहा है। तथापि 'सुकृत' पद का उभयत्र अन्वय माना जा सकता है । 'सुकृतस्य लोके' का अर्थ है—'स्वयंकृतस्य पूर्वकर्मणः फलभूतेऽस्मिन् शरीरलक्षणे लोके' । इससे ऋत-पान करनेवालों के साथ कर्म का अटूट सम्बन्ध प्रतिपादित होता है, अतः ऐसे पान-कर्ता बुद्धि और जीव ही हो सकते हैं; क्योंकि जीव कर्ता और भोक्ता है एवं बुद्धि तत्त्व भोग का साधन । ब्रह्म वैसा नहीं हो सकता, क्योंकि वह कर्म के अधीन नहीं, जैसा कि श्रुति कहती है—"न कर्मणा वर्धते नो कनीयान्" (कौ. ब्रा. उ. ३।९) । इसी प्रकार 'छायातपौ' शब्द के द्वारा अन्धकार और प्रकाश अभिहित हैं । जीव और ब्रह्म में से जीव को अन्धकाररूप नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वह प्रकाशस्वरूप ब्रह्म से अभिन्न माना जाता है, बुद्धि जड़ होने के कारण अन्धकाररूप कही जा सकती है, अतः उक्त श्रुति में 'पिबन्तौ' पद के द्वारा बुद्धि और जीव का प्रतिपादन किया जाता है। बुद्धि का प्रतिपादन किस लिए ? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि मरने के पश्चात् जो आत्मा की सत्ता और असत्ता का सन्देह होता है, उसकी निवृत्ति करने के लिए बुद्धितत्त्व से भिन्न परलोकगामी जीव का स्वरूप दिखाना आवश्यक है, अतः बुद्धि का ग्रहण किया गया है।