भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
ऋतं पिबन्तौ ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २८१
पाययन्नपि पिबतीत्युच्यते, पाचयितर्यपि पक्तृत्वप्रसिद्धिदर्शनात् । बुद्धिक्षेत्रज्ञपरिग्रहोऽपि संभवति, करणे कर्तृत्वोपचारात् । एधांसि पचन्तीति प्रयोगदर्शनात् । न चाध्यात्मोऽधिकारोऽन्यो कौचिद् द्वावृतं पिबन्तौ संभवतः । तस्माद् बुद्धिजीवौ स्यातां, जीवपरमात्मानौ वेति संशयः । किं तावत्प्राप्तं ? बुद्धिक्षेत्रज्ञाविति । कुतः ? 'गुहां
भामती
तदिह बुद्धेरचेतनत्वेन परमात्मनश्च भोक्तृत्वानषेधेन जीवात्मैवकः पाता परिशिष्यत इति सृष्टीरुपदधातीतिवद् द्विवचनानुरोधादपिवत्संस्पृष्टां स्वार्थस्य विवच्छुञ्छब्दो लक्षयन् स्वार्थमजहल्लितरेतरयुक्तपिबदपिबत्परो भवतीत्यर्थः । अस्तु वा मुख्य एव, तथापि न दोष इत्याह ॐ यद्वा इति ॐ । स्वातन्त्र्यलक्षणं हि कर्तृत्वं तच्च पातुरिव पाययितुरप्यस्तीति सोऽपि कर्त्ता । अत एव चाहुः "यः कारयति स करोत्येव इति ।" एवं करणस्यापि स्वातन्त्र्यविवक्षया कथञ्चित्कर्तृत्वं, यथा काष्ठानि पचन्तीति । तस्मान्मुख्यत्वेऽप्यविरोध इति । तदेवं संशयं समाधाय पूर्वपक्षं गृह्णाति ॐ बुद्धिक्षेत्रज्ञौ इति ॐ । नियताधारता बुद्धिजीवसम्भविनी न हि । क्लेशात् कल्पयितुं युक्ता सर्वगे परमात्मनि ॥
भामती-व्याख्या
पिबन्तौ' । 'छत्रिणो यान्ति'—इस लौकिक न्याय के लिए याज्ञिक-पद्धति में "सृष्टीरुपदधाति" ( तै. सं. ५।३।४।७ ) यह उदाहरण प्रस्तुत किया जाता है [ भूमाधिकरण (जै. सू. १।४।१७) में कहा गया है कि अग्निचयन कर्म करने के लिए जिन ईंटों के द्वारा स्थण्डिल ( चबूतरा ) बनाया जाता है, उनका यज्ञ-मण्डप में ही निर्माण किया जाता है और स्थण्डिल चुनते समय मन्त्रों का उच्चारण करते रहते हैं । सृजतिपद-घटित “ब्रह्मासृज्यत, भूतान्यसृज्यत" ( तै. सं. ४।३।१०।१ ) इन मन्त्रों के द्वारा चुनी जानेवाली ईंटों को 'सृष्टि' पद से अभिहित किया जाता है । सृष्टिसंज्ञक ईंटों में वे ईंटें भी सम्मिलित कर ली जाती हैं, जिनकी सृष्टि संज्ञा नहीं, सृष्टि और असृष्टि इष्टिकाओं में 'सृष्टीरुपदधाति'—ऐसा व्यवहार वैसे ही हो जाता है, जैसे छत्री और अच्छत्री पुरुषों में छत्रिणों यान्ति—ऐसा व्यवहार लोक-प्रसिद्ध है ] । उसी प्रकार कर्म-जनित फलों के रस का पान करनेवाले व्यक्तियों के समूह में पान न करनेवाले बुद्धितत्त्व और ब्रह्म का भी समावेश हो जाता है । अथवा बुद्धिरूप करण में वैसे ही कर्तृत्व का व्यवहार हो जाता है, जैसे लोक में 'एधांसि पचन्ति'—ऐसा व्यवहार । इस अध्यात्म ( शरीर-सम्बन्धी पदार्थों पर विस्तृत प्रकाश डालनेवाले उपनिषत् ] शास्त्र में कर्म-रस पान करनेवाला अन्य कोई जोड़ा तो हो नहीं सकता, होगा तो बुद्धि और जीव या जीव और ब्रह्म का जोड़ा हो सकता है । 'पिबत्' पद अजहत्स्वार्थ लक्षणा के द्वारा दोनों का बोधक हो जाता है । अथवा लाक्षणिक पातृत्व को छोड़ कर मुख्य पातृत्व का ग्रहण किया जा सकता है—इसका प्रकार बताते हुए भाष्यकार कहते हैं—"यद्वा जीवः पिबति, ईश्वरस्तु पाययति" । पान क्रिया का स्वातन्त्र्यरूप कर्तृत्व जैसे पान करनेवाले व्यक्ति में रहता है, वैसे ही पान करानेवाले व्यक्ति में भी रहता है, अत एव 'यः करोति, स कारयति"—ऐसा लौकिक न्याय प्रसिद्ध है । बुद्धिरूप करण में पान की कर्तृता का व्यवहार कहा जा चुका है, अतः यदि मुख्य पातृत्व विवक्षित है, तब भी कोई अनुपपत्ति नहीं ।
पूर्व पक्ष—संशय की उपपत्ति करने के अनन्तर पूर्वपक्ष प्रस्तुत किया जाता है—"किं तावत् प्राप्तम् ? बुद्धिक्षेत्रज्ञाविति ।
नियताधारता बुद्धिजीवसम्भविनी न हि । क्लेशात् कल्पयितुं युक्ता सर्वगे परमात्मनि ॥
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२८२ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. २ सू. ११
प्रविष्टौ' इति विशेषात् । यदि शरीरं गुहा, यदि वा हृदयं, उभयथापि बुद्धिक्षेत्रज्ञौ गुहां प्रविष्टावुपपद्येते । न च सति संभवे सर्वगतस्य ब्रह्मणो विशिष्टदेशत्वं युक्तं कल्पयितुम् । 'सुकृतस्य लोके' इति च कर्मगोचरानतिक्रमं दर्शयति । परमात्मा तु न सुकृतस्य वा दुष्कृतस्य वा गोचरे वर्तते; 'न कर्मणा वर्धते नो कनीयान्' इति श्रुतेः । 'छायातपौ' इति च चेतनाचेतनयोर्निर्देश उपपद्यते; छायातपवत्परस्परविलक्षणत्वात् । तस्माद् बुद्धिक्षेत्रज्ञाविहोच्येयातामित्येवं प्राप्ते ब्रूमः—विज्ञानात्मपरमात्मानाविहोच्ये-
भामती
न च पिबन्तावितिवत्प्रविष्टपदमपि लाक्षणिकं युक्तं, सति मुख्यार्थत्वे लाक्षणिकार्थत्वायोगात् । बुद्धिजीवयोश्च गुहाप्रवेशोपपत्तेः । अपि च सुकृतस्य लोक इति सुकृतलोकव्यवस्थाननेन कर्मगोचरानतिक्रम उक्तः । बुद्धिजीवौ च कर्मगोचरमनतिक्रान्तौ । जीवो हि भोक्तृतया बुद्धिश्च भोगसाधनतया धर्मस्य गोचरे स्थितौ, न तु ब्रह्म; तस्यातदायत्तत्वात् । किञ्च छायातपाविति तमःप्रकाशावुक्तौ । न च जीवः परमात्मनोऽभिन्नस्तमः, प्रकाशरूपत्वात् । बुद्धिस्तु जडतया तम इति शक्योपदेष्टुम् । तस्माद् बुद्धिजीवा- वत्र कथ्येते । तत्रापि प्रेते विचिकित्सापनुत्तये बुद्धेर्भेदेन परलोकी जीवो दर्शनीय इति बुद्धिरुच्यते ।
भामती-व्याख्या
कर्म-फल-भोक्ता व्यक्तियों का जो विशेषण दिया गया है—"गुहां प्रविष्टौ" (कठो. १।३।१) । वहाँ 'गुहा' पद से चाहे स्थूल शरीर का ग्रहण किया जाय, चाहे हृदय का, उभयथा गुहारूप नियत (परिच्छिन्न) देश की आधारता बुद्धि और जीव में ही सम्भव है, परमात्मा में उसकी कल्पना करनी युक्ति-युक्त नहीं, क्योंकि वह सर्वत्रग (व्यापक) है किसी एकदेश में रहनेवाला (परिच्छिन्न) नहीं । 'पिबन्तौ' पद लाक्षणिक (जीव और ब्रह्म—इन दोनों का लक्षक) है, वैसे ही "गुहां प्रविष्टौ"—यह भी उभय का लक्षक है'—ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि मुख्यार्थकत्व का असम्भव हो जाने पर ही किसी पद को लाक्षणिक माना जाता है, बुद्धि और जीव को लेकर जब 'प्रविष्टौ' पद मुख्यार्थक हो जाता है, तब उसे ब्रह्म का लक्षक मानने की आवश्यकता नहीं। दूसरी बात यह भी है कि "ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके" (कठो. १।३।१) इस मन्त्र के 'सुकृत' पद का यद्यपि उपनिषद्भाष्य में भाष्यकार ने 'ऋत' पद के साथ अन्वय करते हुए कहा है—"सुकृतस्य स्वयंकृतस्य कर्मण ऋतमिति पूर्वेण सम्बन्धः" (काठक-भाष्य पृ. ५९), किन्तु यहां 'सुकृतस्य लोके' ऐसी लेख-भङ्गी से 'सुकृत' पद का 'लोक' पद के साथ अन्वय प्रतीत हो रहा है। तथापि 'सुकृत' पद का उभयत्र अन्वय माना जा सकता है । 'सुकृतस्य लोके' का अर्थ है—'स्वयंकृतस्य पूर्वकर्मणः फलभूतेऽस्मिन् शरीरलक्षणे लोके' । इससे ऋत-पान करनेवालों के साथ कर्म का अटूट सम्बन्ध प्रतिपादित होता है, अतः ऐसे पान-कर्ता बुद्धि और जीव ही हो सकते हैं; क्योंकि जीव कर्ता और भोक्ता है एवं बुद्धि तत्त्व भोग का साधन । ब्रह्म वैसा नहीं हो सकता, क्योंकि वह कर्म के अधीन नहीं, जैसा कि श्रुति कहती है—"न कर्मणा वर्धते नो कनीयान्" (कौ. ब्रा. उ. ३।९) । इसी प्रकार 'छायातपौ' शब्द के द्वारा अन्धकार और प्रकाश अभिहित हैं । जीव और ब्रह्म में से जीव को अन्धकाररूप नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वह प्रकाशस्वरूप ब्रह्म से अभिन्न माना जाता है, बुद्धि जड़ होने के कारण अन्धकाररूप कही जा सकती है, अतः उक्त श्रुति में 'पिबन्तौ' पद के द्वारा बुद्धि और जीव का प्रतिपादन किया जाता है। बुद्धि का प्रतिपादन किस लिए ? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि मरने के पश्चात् जो आत्मा की सत्ता और असत्ता का सन्देह होता है, उसकी निवृत्ति करने के लिए बुद्धितत्त्व से भिन्न परलोकगामी जीव का स्वरूप दिखाना आवश्यक है, अतः बुद्धि का ग्रहण किया गया है।
ऋतं पिबन्तौ ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २८३
याताम्। कस्मात् ? आत्मानौ हि तावुभावपि चेतनौ समानस्वभावौ। संख्याश्रवणे च समानस्वभावेष्वेव लोके प्रतीतिर्दृश्यते । अस्य गोर्द्वितीयोऽन्वेष्टव्य इत्युक्ते गौरित्येव द्वितीयोऽन्विष्यते, नाश्वः पुरुषो वा । तदिह ऋतपानेन लिङ्गेन निश्चिते विज्ञानात्मनि द्वितीयान्वेषणाय समानस्वभावश्चेतनः परमात्मैव प्रतीयते । ननूक्तं गुहाहितत्वदर्शनाच्च परमात्मा प्रत्येतव्य इति गुहाहितत्वदर्शनादेव परमात्मा प्रत्येतव्य इति वदामः । गुहाहितत्वं तु श्रुतिस्मृतिष्वसकृत्परमात्मन एव दृश्यते—'गुहाहितं गह्वरेष्ठं पुराणम्' (काठ० १।२।१२) 'यो वेद निहितं गुहायां परमे व्योमन्' (तै० २।१) 'आत्मान- मन्विच्छ गुहां प्रविष्टम्' इत्याद्यासु । सर्वगतस्यापि ब्रह्मण उपलब्ध्वर्थो देशविशेषो- पदेशो न विरुध्यत इत्येतदप्युक्तमेव । सुकृतलोकवर्तित्वं तु छत्रिवत्त्वदेकस्मिन्नपि
भामती
एवं प्राप्तेऽभिधीयते—
ऋतपानेन जीवात्मा निश्चितोऽस्य द्वितीयता ।
ब्रह्मणेव सरूपेण न तु बुद्ध्या विरूपया ॥
प्रथमं सद्वितीयत्वे ब्रह्मणोऽवगते सति ।
गुहाश्रयत्वं चरमं व्याख्येयमविरोधतः ॥
गौः सद्वितीयेत्युक्ते सजातीयेनैव गवान्तरेणावगम्यते, न तु विजातीयेनाश्वादिना । तदिह चेतनो जीवः सरूपेण चेतनान्तरेणैव ब्रह्मणा सद्वितीयः प्रतीयते, न त्वचेतनया विरूपया बुद्ध्या । तदेवममृतं पिबन्तावित्यत्र प्रथममवगते ब्रह्मणि तदनुरोधेन चरमं गुहाश्रयत्वं शालग्रामे हरिरितिवद्व्याख्येयम् । बहुलं हि गुहाश्रयत्वं ब्रह्मणः श्रुतय आहुः । तदिदमुक्तं ॐ तद्दर्शनादिति ॐ। तस्य ब्रह्मणो गुहाश्रयत्वस्य
भामती-व्याख्या
सिद्धान्त—
ऋतपानेन जीवात्मा निश्चितोऽस्य द्वितीयता ।
ब्रह्मणेव सरूपेण न तु बुद्ध्या विरूपया ॥ १ ॥
प्रथमं सद्वितीयत्वे ब्रह्मणोऽवगते सति ।
गुहाश्रयत्वं चरमं व्याख्येयमविरोधतः ॥ २ ॥
ऋत पान करनेवाला (कर्म-फल-भोक्ता) जीव है—यह तथ्य तो निश्चित है, उसमें “ऋतं पिबन्तौ”—यहाँ द्विवचन के द्वारा प्रतिपादित जो द्वितीयता है, उसकी निष्पत्ति ब्रह्म को लेकर ही होती है, बुद्धि का लेकर नहीं, क्योंकि ब्रह्म जीव के समानरूप का (चेतन) और बुद्धि विरुद्धरूप की (जड़) है। लोक में भी 'इयं गौः सद्वितीया'—ऐसा कहने पर इस गौ में सद्वितीयता दूसरी गौ को लेकर ही मानी जाती है, गर्दभादि को लेकर नहीं, क्योंकि दूसरी गौ इस गौ को सजातीय और गर्दभादि विजातीय हैं। फलतः “ऋतं पिबन्तौ”—यहाँ द्विवचन की उपपत्ति के लिए जीव के साथ ब्रह्म को जोड़ा जा सकता है, क्योंकि “न जायते म्रियते वा विपश्चित्” (कठो. १।२।१८) इत्यादि पूर्व वाक्यों के द्वारा प्रतिपादित ब्रह्म में ही गुहाश्रयत्व का वैसे ही अन्वय किया जा सकता है, जैसे शालग्राम में हरि का । ‘गुहाहितं गह्वरेष्ठं पुराणम्' (कठो. १।२।१२), “यो वेद निहितं गुहायाम्” (तै. उ. २।१), “आत्मानमन्विच्छ गुहां प्रविष्टम्” इत्यादि अनेक श्रौत-वाक्यों में गुहाश्रित ब्रह्म का प्रतिपादन किया गया है—इस तथ्य को सूचित करने के लिए सूत्रकार ने कहा है—“तद्दर्शनात्” (ब्र. सू. १।२।११) । 'तद्दर्शनात्' का अर्थ है—'तस्य (ब्रह्मणः) श्रुतिषु गुहाश्रयत्व दर्शनात्' । जब कि पूर्व वाक्यों में ब्रह्म का दर्शन प्रस्तुत किया गया है, तब “सुकृतस्य लोके”—इत्यादि परवर्ती
| २८४ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. २ सू. १२ |
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वर्तमानमुभयोरविरुद्धम्। छायातपावित्यप्यविरुद्धम्। छायातपवत्परस्परविलक्षण- त्वात्संसारित्वासंसारित्वयोः। अविद्याकृतत्वात्संसारित्वस्य, पारमार्थिकत्वाच्चा- संसारित्वस्य। तस्माद्विज्ञानात्मपरमात्मानौ गुहां प्रविष्टौ गृह्येते ॥ ११ ॥
कुतश्च विज्ञानात्मपरमात्मानौ गृह्येते—
विशेषणाच्च ॥ १२ ॥
विशेषणं च विज्ञानात्मपरमात्मनोरेव भवति। 'आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु' (का० १।३।३) इत्यादिना परेण ग्रन्थेन रथिरथादिरूपककल्पनया विज्ञाना- त्मानं रथिनं संसारमोक्षयोर्गन्तारं कल्पयति। 'सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम्' (का० १।३।९) इति च परमात्मानं गन्तव्यम्। तथा 'तं दुर्दर्शं गूढमनु- प्रविष्टं गुहाहितं गह्वरेष्ठं पुराणम्। अध्यात्मयोगाधिगमेन देवं मत्वा धीरो हर्षशोकौ जहाति' (का० १।२।१२) इति पूर्वस्मिन्नपि ग्रन्थे मन्तृमन्तव्यत्वेनैतावेव विशेषितौ। प्रकरणं चेदं परमात्मनः। 'ब्रह्मविदो वदन्ति' इति च वक्तृविशेषोपादानं परमात्मप- रिग्रहे घटते। तस्मादिह जीवपरमात्मानावुच्येयाताम्। एष एव न्यायः 'द्वा सुपर्णा
भामती
श्रुतिषु दर्शनादिति। एवं च प्रथमावगतब्रह्मानुरोधेन सुकृतलोकवर्तित्वमपि तस्य लक्षणया श्वच्छिन्न्यायेन गमयितव्यम्। छायातपत्वमपि जीवस्याविद्याश्रयतया ब्रह्मणश्च शुद्धप्रकाशस्वभावस्य तदनाश्रयतया मन्तव्यम्। इममेव न्यायं द्वा सुपर्णेत्यत्राप्युदाहरणे कृत्वाचिन्तया योजयति ॐ एष एव न्याय इति ॐ। अत्रापि किं बुद्धिजीवौ उत जीवपरमात्मानाविति संशय्य करणरूपाया अपि बुद्धेरेधांसि पचन्तीतिवत् कर्तृत्वोपचाराद् बुद्धिजीवाविह पूर्वपक्षयित्वा सिद्धान्तयितव्यम्। सिद्धान्तश्च
भामती-व्याख्या
वाक्यों में अभिहित सुकृतलोक की लाक्षणिक वृत्तित्ता भी ब्रह्म में छत्रिन्याय यां सृष्ट्युपधान- न्याय से समञ्जस हो जाती है। जीव और ब्रह्म का स्वरूपतः वैलक्षण्य दिखाने के लिए कहा है—"छायातपौ"। वहाँ अविद्यारूप अन्धकार का आश्रय होने के कारण जीव को छाया और शुद्ध स्वप्रकाशस्वरूप ब्रह्म को आतप (प्रकाश) कह दिया गया है ॥ ११ ॥
[ "आत्मानं रथिनं विद्धि" (कठ० १।३।३) इत्यादि वाक्यों के द्वारा रथ-रथी-रूपक के माध्यम से अभिव्यञ्जित जीवगत गन्तृत्व एवं "सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम्" (कठो. १।३।९) इत्यादि वाक्यों से प्रतिपादित ब्रह्म में गन्तव्यत्व (प्राप्यत्व), इसी प्रकार 'तं दुर्दर्शं गूढमनुप्रविष्टं गुहाहितं गह्वरेष्ठं पुराणम्। अध्यात्मयोगाधिगमेन देवं मत्वा धीरो हर्षशोकौ जहाति ॥" (कठो. १।२।१२) इत्यादि वाक्यों से कथित जीवगत मन्तृत्व (साक्षात्कर्तृत्व) एवं ब्रह्मनिष्ठ मन्तव्यत्वरूप (साक्षात्क्रियमाणत्व) आदि विशेषणों के द्वारा भी जीव और ब्रह्म ही 'गुहां प्रविष्टौ" सिद्ध होते हैं]।
इसी न्याय (गुहाधिकरण) की योजना 'द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया" (मुण्ड० ३।१।१) इस उदाहरण में भी करने के लिए भाष्यकार कहते हैं—'एष न्यायः 'द्वा सुपर्णा' इत्येवमादिष्वपि"। [यह योजना सैद्धान्तिक नहीं, अपितु अभ्युपगममात्र है। कृत्वा (वैसा मानकर) जो चिन्ता (विचार) की जाती है, उसे कृत्वाचिन्ता-(विचार या अभ्युपगममात्र) कहा जाता है, जैसा कि श्री कुमारिल भट्ट कहते हैं—"यत्पुनः परावृत्य भाष्यकारेणोक्तम्- "अथवा पुनरस्तु ज्ञाने धर्म इत्यभ्युपेत्यवादमात्रम्' तत् पूर्वोक्त दोषपरिहारसामर्थ्यप्रदर्शनार्थं कृत्वाचिन्तान्यायेनोक्तम्' (तं० वा० पृ० २८७) । "द्वा सुपर्णा"—इस मन्त्र में भी यद्यपि सिद्धान्ततः जीव और ब्रह्म विवक्षित नहीं, तथापि यदि उनकी विवक्षा मान ली जाय, तब
ऋतं पिबतो ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २८५
सयुजा सखाया' (मुण्ड ३।१।१) इत्येवमादिष्वपि। तत्रापि ह्यध्यात्मधिकारान्न प्राकृतौ सुपर्णावुच्येते। 'तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्ति' इत्यदनलिङ्गाद्विज्ञानात्मा भवति। 'अनश्नन्नन्योऽभिचाकशीति' इत्यनशनचेतनत्वाभ्यां परमात्मा। अनन्तरे च मन्त्रे तावेव द्रष्टृद्रष्टव्यभावेन विशिनष्टि—'समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नोऽनीशया शोचति मुह्यमानः। जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः' (मुण्ड० ३।१।२) इति। अपर आह—'द्वा सुपर्णा' इति नेयमृगस्याधिकरणस्य सिद्धान्तं भजते; पैङ्गिरहस्यब्राह्मणेनान्यथा व्याख्यातत्त्वात्। 'तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्तीति सत्त्वमनश्नन्नन्योऽभिचाकशीतीत्यनश्नन्नन्योऽभिपश्यति ज्ञस्तावैतौ सत्त्वक्षेत्रज्ञौ' इति। सत्त्वशब्दो जीवः, क्षेत्रज्ञशब्दः परमात्मेति यदुच्येत—तन्न; सत्त्वक्षेत्रज्ञशब्दयोरन्तःकरणशारीरपरतया प्रसिद्धत्वात्। तत्रैव च व्याख्यातत्त्वात्—'तदेतत् सत्त्वं येन स्वप्नं पश्यति, अथ योऽयं शारीर उपद्रष्टा स क्षेत्रज्ञस्तावैतौ सत्त्वक्षेत्रज्ञौ' इति। नाप्यस्याधिकरणस्य पूर्वपक्षं भजते। नह्यत्र शारीरः क्षेत्रज्ञः कर्तृत्व-
भामती
भाष्यकृता स्फोरितः। तद्दर्शनादिति च 'समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नः' इत्यत्र मन्त्रे। न खलु मुख्ये कर्तृत्वे सम्भवति करणे कर्तृत्वोपचारो युक्त इति कृत्वाचिन्तामुद्घाटयति ॐ अपर आह ॐ। ॐ सत्त्वं ॐ बुद्धिः। शङ्कते ॐ सत्त्वशब्दः इति ॐ। सिद्धान्तार्थं ब्राह्मणं व्याचष्टे इत्यर्थः। निराकरोति ॐ तन्न इति ॐ। ॐ येन स्वप्नं पश्यति इति ॐ। येनेति करणमुपदिशति, ततश्च भिन्नं कर्तारं क्षेत्रज्ञम् ॐ यो यं शारीर उपद्रष्टा इति ॐ। अस्तु तर्ह्यस्याधिकरणस्य पूर्वपक्ष एव ब्राह्मणार्थः, वचनविरोवे न्यायस्याभासत्वादित्यत आह। ॐ नाप्यस्याधिकरणस्य पूर्वपक्षं भजते इति ॐ। एवं हि पूर्वपक्ष-
भामती-व्याख्या
उसके उपपादन में गुहाधिकरण की क्षमता है, क्योंकि] “द्वा सुपर्णा”—इस वाक्य में भी सन्देह किया जाता है कि क्या यहाँ सुपर्णों (दो पक्षियों) के रूप में बुद्धि और जीव विवक्षित हैं? अथवा जीव और ब्रह्म? जैसे 'एधांसि पचन्ति' (लकड़ियां भोजन पकाती हैं) यहाँ पाक के करण (साधनीभूत) काष्ठों में पाक-कर्तृत्व का गौण प्रयोग होता है, वैसे ही बुद्धिरूप करण में कर्म फल-भोग-कर्तृत्व का गौण प्रयोग मान कर बुद्धि और जीव को भोक्ता के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है—ऐसे पूर्वपक्ष का जो सिद्धान्त हो सकता है, वह भाष्यकार ने “समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नः”—इस मन्त्र में द्रष्टृत्व-द्रष्टव्यत्वरूप विशेषणों के माध्यम से स्पष्ट कर दिया है—अध्यात्मधिकारान्न प्राकृतौ सुपर्णावुच्येते।”
इस सिद्धान्त की 'कृत्वाचिन्ता' का कारण (अनाभिमतता या अस्वरसता) दिखाते हैं—"अपर आह”। 'सत्त्वं' शब्द का अर्थ है—बुद्धि, अर्थात् पैङ्गिरहस्य नाम के ब्राह्मण में उक्त मन्त्र की व्याख्या करते हुए बुद्धि और जीव का कथित पक्षियों के रूप में प्रस्तुत किया है अतः जीव और ब्रह्म का वहाँ ग्रहण नहीं कर सकते। शङ्कावादी उक्त ब्राह्मण ही सिद्धान्त के अनुगुण व्याख्या करते हुए कहता है कि उक्त ब्राह्मण में 'सत्त्व' शब्द से जीव और 'क्षेत्रज्ञ' पद से ब्रह्म का ग्रहण क्यों न किया जाय? उसकी इस शङ्का का निराकरण करते हुए कहा गया है—"तन्न”। लोक एवं वेद में 'सत्त्व' शब्द बुद्धि एवं 'क्षेत्रज्ञ' शब्द शारीर (जीव) के लिए प्रसिद्ध माना जाता है। उसी अर्थ में उसकी व्याख्या भी की जाती है—"येन स्वप्नं पश्यति, अथ योऽयं शारीर उपद्रष्टा स क्षेत्रज्ञः, तावैतौ सत्त्वक्षेत्रज्ञौ”। 'येन' शब्द के द्वारा स्वप्न-दर्शन के करण (साधन) का उपदेश किया गया है। उससे भिन्न स्वप्न-द्रष्टा (क्षेत्रज्ञ) का निर्देश किया गया है—"योऽयं शारीर उपद्रष्टा”। उक्त ब्राह्मण को पूर्वपक्ष का उपस्थापक क्यों न मान लिया जाय? इस प्रश्न का उत्तर है—"नाप्यस्याधिकरणस्य पूर्वपक्षं भजते।”
| २८६ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. २ सू. १२ |
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भोक्तृत्वादिना संसारधर्मेणोपेतो विवक्ष्यते। कथं तर्हि ? सर्वसंसारधर्मातीतो ब्रह्म- स्वभावश्चैतन्यमात्रस्वरूपः; 'अनश्नन्नन्योऽभिचाकशीति,' 'अनश्नन्नन्योऽभिपश्यति ज्ञः' इति वचनात् । 'तत्त्वमसि', 'क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि' गी० १३।२) इत्यादिश्रुतिस्मृ- तिभ्यश्च । तावता च विद्योपसंहारदर्शनमेवमेवावकल्पते, 'तावेतौ सत्त्वक्षेत्रज्ञौ न ह वा एवंविदि किंचन रज आध्वंसते' इत्यादि । कथं पुनरस्मिन्पक्षे 'तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्तीति सत्त्वम्' इत्यचेतने सत्त्वे भोक्तृत्ववचनमिति ? उच्यते-नेयं श्रुतिरचेत- नस्य सत्त्वस्य भोक्तृत्वं वक्ष्यामीति प्रवृत्ता । किं तर्हि ? चेतनस्य क्षेत्रज्ञस्याभोक्तृत्वं ब्रह्मस्वभावतां च वक्ष्यामीति । तदर्थं सुखादिविक्रियावति सत्त्वे भोक्तृत्वमध्यारोपयति । इदं हि कर्तृत्वं भोक्तृत्वं च सत्त्वक्षेत्रज्ञयोरितरेतरस्वभावाविवेककृतं कल्प्यते । परमार्थ- तस्तु नान्यतरस्यापि संभवति; अचेतनत्वात्सत्त्वस्य, अविक्रियत्वाच्च क्षेत्रज्ञस्य । अविद्याप्रत्युपस्थापितस्वभावत्वाच्च सत्त्वस्य सुतरां न संभवति । तथा च श्रुतिः-
भामती
मस्य भजेत, यदि हि क्षेत्रज्ञे संसारिणि पर्यवस्येत् । तस्य तु ब्रह्मरूपतायां पर्यवस्यन्न पूर्वपक्षमपि स्वीकरोतीत्यर्थः । अपि च ॐ तावेतौ सत्त्वक्षेत्रज्ञौ न ह वा एवंविदि किञ्चन रज आध्वंसते इति ॐ । रजोऽविद्या नाध्वंसनं न संश्लेषमेवंविदि करोति । एतावतेव विद्योपसंहाराज्जीवस्य ब्रह्मात्मतापरतास्य लक्ष्यत इत्याह ॐ तावता च इति । चोदयति ॐ कथं पुनः इति ॐ । निराकरोति ॐ उच्यते-नेयं श्रुतिः इति ॐ । अनश्नन् जीवो ब्रह्माभिचाकशीतीत्युक्ते शङ्केत, यदि जीवो ब्रह्मात्मा नाश्नाति, कथं तर्हास्मिन् भोक्तृत्वावगमः, चेतन्यसमानाधिकरणं हि भोक्तृत्वमवभासत इति । तन्निरासायाह श्रुतिः ॐ तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्ति इति ॐ । एतदुक्तं भवसि-नेवं भोक्तृत्वं जीवस्य तत्त्वतः, अपि तु बुद्धिसत्त्वं सुखादि- रूपपरिणतं चितिच्छायापत्त्योपपन्नचेतन्यमिव भुङ्क्ते, न तु तत्त्वतो जीवः परमात्मा भुङ्क्ते । तदेतद-
भामती-व्याख्या
उक्त ब्राह्मण-वाक्य पूर्वपक्षपरक तब हो सकता था, जब कि वह क्षेत्रज्ञ ( संसरणशील जीव ) में पर्यवसित होता किन्तु उक्त ब्राह्मण वाक्य का पर्यवसान ब्रह्म में ही होता है, अतः वह पूर्वपक्ष- परक नहीं हो सकता । 'तावेतौ सत्त्वक्षेत्रज्ञौ न ह वा एवंविदि किंचन रज आध्वंसते ।" यहाँ 'रजः' शब्द का अर्थ अविद्या और 'आध्वंसन' का अर्थ संश्लेष ( सम्बन्ध ) है । फलतः विद्या ( ब्रह्म-साक्षात्कार ) में उपसंहृत ( पर्यवसित ) होने के कारण उक्त ब्राह्मण वाक्य में जीव- ब्रह्माभेदपरता लक्षित होती है—"तावता च विद्योपसंहारदर्शनमेवावकल्पते" । आक्षेपवादी का कहना है कि 'कथं पुनरस्मिन् पक्षे तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्तीति अचेतने सत्त्वे भोक्तृत्ववचन- मिति"। अर्थात् उक्त मन्त्र में यदि बुद्धि और जीव का ग्रहण किया जाता है, तब जड़भूत बुद्धि तत्त्व में कर्म-फल-भोक्तृत्व क्योंकर उपपन्न होगा ? इस आक्षेप का परिहार किया जाता है—'नेयं श्रुतिरचेतनस्य सत्त्वस्य भोक्तृत्वं वक्ष्यामीति प्रवृत्ता" । 'अनश्नन् जीवो ब्रह्माभिचकाशीति' ऐसा अन्वय मानने पर यह शङ्का हो सकती थी कि "यदि जीवो ब्रह्मात्मा नाश्नाति, कथं तर्ह्यस्मिन् भोक्तृत्वावगमः ?" क्योंकि 'चेतनोऽहं भोक्ता'—इस प्रकार चतन्य के अधिकरण में ही भोक्तृत्व अवभासित होता है । उस शङ्का का निरास करने के लिए शङ्का की है—"तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्ति"—इस प्रकार बुद्धिरूप प्रथम पक्षी में प्रतिपादित भोक्तृत्व क्योंकर उपपन्न होगा ? इस शङ्का का उत्तर जो दिया गया—"नेयं श्रुतिरचेतनस्य सत्त्वस्य भोक्तृत्वं वक्ष्यामीति प्रवृत्ता" उसका आशय यह है कि जो जीवगत भोक्तृत्व प्रतीत होता है, वह तात्त्विक नहीं, अपितु बुद्धि का सत्त्वगुण सुखादिरूपेण परिणत होता है और बुद्धि ही चेतन्य पुरुष का प्रतिबिम्ब पाकर चेतन के समान होकर अपने में ( चैतन्यसमानाधिकरण ) भोक्तृत्व का अनुभव करती है, जीव तत्त्वतः ब्रह्म है, भोक्ता नहीं—यह विगत अध्यास-भाष्य
अक्षिपुरुषस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २८७
'यत्र वा अन्यदिव स्यात्तत्रान्योऽन्यत्पश्येद्' इत्यादिना स्वप्नदृग्दृष्टहस्त्यादिव्यवहारवदविद्याविषय एव कर्तृत्वादिव्यवहारं दर्शयति । 'यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं पश्येत्' ( बृ० ४।५।१५ ) इत्यादिना च विवेकिनः कर्तृत्वादिव्यवहाराभावं दर्शयति ॥ १२ ॥
( ४ अन्तरधिकरणम् । सू० १३-१७ )
अन्तर उपपत्तेः ॥ १३ ॥
'य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यत एष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद् ब्रह्मेति । तद्यद्यप्यस्मिन्सर्पिर्वोदकं वा सिञ्चति वर्त्मनी एव गच्छति' ( छा० ४।१५।१ ) इत्यादि
भामती
ध्यासभाष्ये कृतव्याख्यानम् । तदनेन कृत्वाचिन्तोद्घाटिता ॥ १२ ॥
नन्वन्तस्तद्धर्मोपदेशादित्यनेनैवैतद् गतार्थम् । सन्ति खल्वत्राप्यमृतत्वादयो ब्रह्मधर्माः प्रतिबिम्बजीवदेवतास्वसम्भविनः । तस्माद् ब्रह्मधर्मोपदेशाद् ब्रह्मैवात्र विवक्षितम् । साक्षाच्च ब्रह्म शब्दोपादानात् । उच्यते—
एष दृश्यत इत्येतत् प्रत्यक्षेऽर्थे प्रयुज्यते ।
परोक्षं ब्रह्म न तथा प्रतिबिम्बे तु युज्यते ॥
उपक्रमवशात् पूर्वमितरेषां हि वर्णनम् ।
कृतं न्यायेन येनैव स खल्वत्रानुषज्यते ॥
भामती-व्याख्या
की व्याख्या ( विगत पृ० १४-१५ ) में स्पष्ट किया जा चुका है । फलतः “द्वा सुपर्णा सयुजा” इस मन्त्र में बुद्धि और जीव का ही ग्रहण किया गया है, जीव और ब्रह्म का नहीं, फिर भी इसमें गुहाधिकरण की योजना अभ्युपगममात्र या कृत्वा चिन्ता है ॥ १२ ॥
विषय — “य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यते एष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद् ब्रह्मेति । तद् यद्यप्यस्मिन् सर्पिर्वोदकं वा सिञ्चति वर्त्मनी एव गच्छति” ( छां. ४।१५।१ ) इत्यादि श्रुति-वाक्य कहते हैं कि 'जो यह आँख में पुरुष दिखाई देता है, वह आत्मा है—ऐसा कहा गया है, वही अमृत है, अभय पद है, वही ब्रह्म है'। इसमें जो घृत या जल डाला जाता है, वह पलकों में चला जाता है ।
संशय — वह पुरुष क्या अक्षिगत प्रतिबिम्ब है ? या विज्ञानात्मा ( जीव ) ? या इन्द्रिय का अधिष्ठाता देव ? अथवा परमेश्वर ( ब्रह्म ) ?
पूर्व पक्ष की असंभावना— यह उदाहरण “अन्तस्तद्धर्मोपदेशात्” ( ब्र. सू. १।१।२० ) इस अधिकरण से ही गतार्थ हो जाता है, क्योंकि इस वाक्य में भी ब्रह्म के अमृतत्व, अभयत्वादि ऐसे धर्म अभिहित हैं, जो कि प्रतिबिम्ब, जीव और देवता में सम्भावित नहीं, अतः ब्रह्म-धर्मों का उपदेश होने के कारण दृश्यमान पुरुष के रूप में ब्रह्म ही विवक्षित है, इतना ही नहीं, 'ब्रह्म' शब्द साक्षात् निर्दिष्ट है— “एतद् ब्रह्म”। इस प्रकार का निर्णय देने के लिए अधिकरणान्तर की क्या आवश्यकता ?
पूर्वपक्ष की संभावना—
एष दृश्यत इत्येतत् प्रत्यक्षेऽर्थे प्रयुज्यते ।
परोक्षं ब्रह्म न तथा प्रतिबिम्बे तु युज्यते ॥ १ ॥
उपक्रमवशात् पूर्वमितरेषां हि वर्णनम् ।
कृतं न्यायेन येनैव स खल्वत्रानुषज्यते ॥ २ ॥
२८८ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. २ सू. १३
श्रूयते। तत्र संशयः - किमयं प्रतिबिम्बात्माऽक्ष्यधिकरणो निर्दिश्यते, अथवा विज्ञा- नात्मा, उत देवतात्मेन्द्रियस्याधिष्ठाता, अथेश्वर इति। किं तावत्प्राप्तम् ? छायात्मा पुरुषप्रतिरूप इति। कुतः ? तस्य दृश्यमानत्वप्रसिद्धेः। 'य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यते' इति च प्रसिद्धवदुपदेशात्। विज्ञानात्मनो वाऽयं निर्देश इति युक्तम्। स हि चक्षुषा रूपं पश्यंश्चक्षुषि सन्निहितो भवति। आत्मशब्दश्चास्मिन्पक्षेऽनुकूलो भवति। आदित्य- पुरुषो वा चक्षुषोऽनुग्राहकः प्रतीयते; 'रश्मिभिरेषोऽस्मिन्प्रतिष्ठितः' ( बृ० ५।५।२ ) इति श्रुतेः, अमृतत्त्वादीनां च देवतात्मन्यपि कथंचित्संभवात्। 'नेश्वरः; स्थानविशेष- निर्देशादित्येवं प्राप्ते ब्रूमः- परमेश्वर एवाक्षिण्यभ्यन्तरः पुरुष इहोपदिष्ट इति।
भामती
ऋतं पिबन्तावित्यत्र हि जीवपरमात्मानौ प्रथमावगताविति तदनुरोधेन गुहाप्रवेशादयः पश्चादव- गता व्याख्याताः, तद्वदिहापि य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यत इति प्रत्यक्षाभिधानात् प्रथममवगते छायापुरुषे तदनुरोधेनामृतत्वाभयत्वादयः स्तुत्या कथञ्चिद् व्याख्येयाः। तत्र चामृतत्वं कतिपयक्षणावस्थानाद्, अभयत्वमचेतनत्वात्, पुरुषत्वं पुरुषाकारत्वाद्, आत्मत्वं कनीनिकायां व्यापनात्, ब्रह्मरूपत्वमुक्तरूपा- मृतत्वादियोगात्। एवं वामनीत्वादयोऽप्यस्य स्तुत्यैव कथञ्चिन्नेतव्याः। कञ्च खं चेत्यादि तु वाक्यमग्नीनां नाचार्यवाक्यं नियन्तुमर्हति। आचार्यस्तु ते गतिं वक्तेति च गत्यन्तराभिप्रायं, न तूक्तपरिशिष्टाभिप्रायम्। तस्माच्छायापुरुष एवात्रोपास्य इति पूर्वः पक्षः। सम्भवमात्रेण तु जीवदेवते उपन्यस्ते, बाधकान्तरोप- दर्शनाय चैष दृश्यत इत्यस्यात्राभावात्। अन्तस्तद्धर्मोपदेशादित्यनेन निराकृतत्वात्।
भामती-व्याख्या
जैसे "ऋतं पिबन्तौ" ( कठो. १।३।१ ) यहाँ पर जीव और ब्रह्म प्रथमतः अवगत हैं, अतः उसके अनुरोध पर पश्चात् अवगत गुहा-प्रवेशादि भी जीव-ब्रह्मपरक माने जाते हैं। वैसे ही "य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यते"- ऐसा प्रत्यक्षाभिधान होने के कारण प्रथमावगत छाया पुरुष में ही पश्चात्कथित अमृतत्व, अभयत्वादि धर्मों का स्तुत्यर्थक समन्वय करना होगा, ब्रह्म में नहीं, क्योंकि वह परोक्ष है, 'एष' पद के द्वारा उसका निर्देश नहीं किया जा सकता। छाया-पुरुष में कतिपयक्षणावस्थाायित्व होने के कारण अमृतत्व, अचेतन होने के कारण अभयत्व ( भय की अनुभूति का अभाव ), पुरुष की छाया में पुरुषाकारता होने के कारण पुरुषत्व, कनीनिका ( काली पुतली ) पर्यन्त गति होने के कारण आत्मत्व ( 'अत सातत्य गमने' धातु से निष्पन्न आत्मत्व का अर्थभूत सर्वतः व्याप्तत्व ), अमृतत्वादि का योग होने के कारण ब्रह्मत्व घट जाता है। इसी प्रकार वामनीत्व ( वामसंज्ञक कर्म-फलों का ) नेतृत्व, भामनीत्व ( प्रकाशरूपत्व ) आदि की व्याख्या भी प्रस्तुत की जा सकती है। यह जो कहा जाता है कि "प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्म" ( छां. ४।१०।५ ) ऐसे उपक्रम के अनुरोध पर "य एषोऽक्षिणि पुरुषः" (छां. ४।१५।१)। वहाँ भी ब्रह्म का परामर्श किया जाना चाहिए। वह कहना उचित नहीं, क्योंकि 'प्राणो ब्रह्म'-यह अग्नियों का एवं "य एषोऽक्षिणि पुरुषः"-यह आचार्य का वाक्य है। अन्यकर्तृक वाक्य के अनुरोध पर अन्यकर्तृक वाक्य का नियमन नहीं किया जा सकता। "आचार्यस्तु ते गतिं वक्ता" ( छां. ४।१४।१ ) यह वाक्य भी अग्नियों का ही है, अतः वह भी इस आचार्य-वाक्य का नियमन नहीं कर सकता। पूर्व पक्ष की निर्भरता छाया-पुरुष में ही है, जीव और अधिष्ठाता देव का उपन्यास केवल सम्भावना के आधार पर कर दिया गया है, वस्तु-स्थिति को लेकर नहीं, क्योंकि 'एष दृश्यते'-इस वाक्य का सामञ्जस्य भी देवतादि में नहीं होता, 'अन्तस्तद्धर्मोपदेशात्'-इस अधिकरण के द्वारा जीवादि का निरास किया जा चुका है।
अक्षिपुरुषस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २८९
कस्मात् ? उपपत्तेः । उपपद्यते हि परमेश्वरे गुणजातमिहोपदिश्यमानम् । आत्मत्वं तावन्मुख्यया वृत्त्या परमेश्वर उपपद्यते; 'स आत्मा तत्त्वमसि' इति श्रुतेः । अमृतत्वाभयत्वे च तस्मिन्नसकृच्छ्रुतौ श्रूयेते । तथा परमेश्वरानुरूपमेतदक्षिस्थानम् । यथा
भामती
एवं प्राप्त उच्यते – 'यः' 'एषः' इति ।
अनिष्पन्नाभिधाने द्वे सर्वनामपदे सती ।
प्राप्य सन्निहितस्यार्थं भवेतामभिधातृणी ॥
सन्निहिताश्च पुरुषात्मादिशब्दास्ते च न यावत् स्वार्थमभिवदन्ति तावत्सर्वनामभ्यां नार्थतुषोऽप्यभिधीयत इति कुतस्तदर्थस्यापरोक्षता । पुरुषात्मशब्दौ च सर्वनामनिरपेक्षौ स्वरसतो जीवे वा परमात्मनि वा वर्त्तेते इति । न च तयोश्चक्षुषि प्रत्यक्षदर्शनमिति निरपेक्षपुरुषपदप्रत्यायितार्थानुरोधेन य एष इति दृश्यत इति च यथासम्भवं व्याख्येयम् । व्याख्यातञ्च सिद्धवदुपादानं शास्त्राद्यपेक्षं विद्वद्विषयं प्ररोचनार्थम् । विदुषः शास्त्रत उपलब्धिरेव दृढतया प्रत्यक्षवदुपचर्यते प्रशंसार्थमित्यर्थः । अपि च तदेव चरमं प्रथमानुगुणतया नीयते यन्नेतुं शक्यम् , अल्पञ्च । इह त्वमृतत्वादयो बहवश्चाशक्याश्च नेतुम् । न हि स्वसत्ताक्षणावस्थानमात्रममृतत्वं भवति । तथा सति किं नाम नामृतं स्यादिति व्यर्थममृतपदम् । भयाभये
भामती-व्याख्या
सिद्धान्त –
अनिष्पन्नाभिधाने द्वे सर्वनामपदे सती ।
प्राप्य सन्निहितस्यार्थं भवेतामभिधातृणी ॥
'यः' और 'एषः'—ये दोनों सर्वनाम पद प्रथम श्रुत होने पर भी सापेक्ष होने के कारण चाक्षुषत्वरूप अर्थ के अभिधान में परिनिष्पन्न (पर्यवसित) नहीं हो सकते, अतः सन्निहित 'पुरुष' पद के विशेष्यरूप अर्थ को पाकर ही वे अभिधाता (वाचक) होते हैं। 'पुरुष' और 'आत्मा' आदि सन्निहित पद जब तक अपने अर्थ का अभिधान नहीं कर लेते, तब तक सर्वनाम पदों ('यः' और 'एषः') के द्वारा किसी भी अर्थ का अभिधान नहीं किया जा सकता, तब अपरोक्षत्व या चाक्षुषत्वरूप अर्थ का बोध वे क्योंकर करा सकेंगे ? 'पुरुष' और 'आत्मा' ये दोनों पद सर्वनाम पदों से निरपेक्ष होकर निसर्गतः जीव या परमात्मा (ब्रह्म) के बोधक होते हैं। जीव और ब्रह्म का चक्षु में प्रत्यक्षतः दर्शन नहीं होता। फलतः निरपेक्ष 'पुरुष' पद के द्वारा जब अपने अर्थ का अभिधान हो जाता है, तब उसके अनुरोध पर 'यः' और 'एषः'—इन दोनों सर्वनाम पदों की यथासम्भव व्याख्या करनी होगी। भाष्यकार ने इस अधिकरण के अन्त में वैसी ही व्याख्या की है—"अस्मिश्च पक्षे प्रसिद्धवदुपादानं शास्त्राद्यपेक्षं विद्वद्विषयं प्ररोचनार्थम्"। आशय यह है कि महावाक्यादि के द्वारा विद्वान् को जो बोध प्राप्त होता है, वह परोक्ष होने पर भी सुदृढ़ होने के कारण प्रत्यक्ष कह दिया गया है कि उक्त ज्ञान की स्तुति सम्पन्न हो । [ "तत्त्वमसि" आदि शास्त्र के द्वारा प्रत्यक्ष बोध की उत्पत्ति माननेवाले आचार्यों के मत से ब्रह्म के लिए भी 'एष दृश्यते शास्त्रेण'—ऐसा व्यवहार हो सकता है, किन्तु वाचस्पति मिश्र के मत से नहीं]।
दूसरी बात यह भी है कि प्रथमोपस्थिति के अनुसार पश्चादुपस्थित पदार्थ का सामञ्जस्य वहाँ ही किया जाता है, जहाँ वैसा करना सम्भव हो । प्रकृत में अमृतत्वादि ऐसे बहुत धर्म हैं, जिनका अन्यत्र संगमन सम्भव नहीं, क्योंकि किसी पदार्थ का केवल अपनी सत्ता के क्षण में रहना (कतिपयक्षणावस्थायित्व) मुख्यतः अमृतत्व नहीं कहा जा सकता, वैसा मान लेने पर संसार की कौन वस्तु अमृत न बन जायगी ? तब 'अमृत' विशेषण अत्यन्त व्यर्थ
३७
२९० ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. २ सू. १४
हि परमेश्वरः सर्वदोषैरलिप्तः; अपहतपाप्मत्वादिश्रवणात्; तथाऽक्षिस्यानं सर्वलेप- रहितमुपदिष्टं, तद्यद्यप्यस्मिन्सर्पिर्वोदकं वा सिञ्चति वर्त्मनी एव गच्छति' इति श्रुतेः। संयद्वामत्त्वादिगुणोपदेशश्च तस्मिन्नवकल्पते—'एतं संयद्वाम इत्याचक्षते, एतं हि सर्वाणि वामान्यभिसंयन्ति'। एष उ एव वामनीरेष हि सर्वाणि वामानि नयति'। एष उ एव भामनीरेष हि सर्वेषु लोकेषु भाति' (छा० ४।१५।२,३,४) इति च। अत उप- पत्तेरन्तरः परमेश्वरः ॥ १३ ॥
स्थानादिव्यपदेशाच्च ॥ १४ ॥
कथं पुनराकाशवत्सर्वगतस्य ब्रह्मणोऽक्ष्यल्पं स्थानमुपपद्यत इति ? अत्रोच्यते —
भामती
अपि चेतनधर्मो नाचेतने सम्भवतः। एवं वामनीत्वादयोऽप्यन्यत्र ब्रह्मणो नेतुमशक्याः। प्रत्यक्षव्यपदेश- श्चोपपादितः। तदिदमुक्तम् ॐ उपपत्तेः इति ॐ। एतदमृतमभयमेतद् ब्रह्मेत्युक्ते स्यादाशङ्का—ननु सर्वगत- स्येश्वरस्य कस्माद्विशेषेण चक्षुरेव स्थानमुपदिश्यत इति, तत्परिहरति श्रुतिः ॐ तद्यद्यप्यस्मिन् सर्पिर्वो- दकं वा सिञ्चति वर्त्मनी एव गच्छति इति ॐ। वर्त्मनी पक्ष्मस्थाने। एतदुक्तं भवति—निर्लेपस्येश्वरस्य निर्लेपं चक्षुरेव स्थानमनुरूपमिति। तदिदमुक्तं ॐ तथा परमेश्वरानुरूपम इति ॐ। ॐ संयद्वामादिगुणो- पदेशश्च तस्मिन् ॐ ब्रह्मणि ॐ। ॐ कल्पते ॐ घटते, समवेताथंत्वात्। प्रतिबिम्बादिषु त्वसमवेतार्थः। वननीयानि सम्भजनीयानि शोभनीयानि पुण्यफलानि वामानि। संयन्ति संगच्छमानानि वामान्यनेनेति संयद्वामः परमात्मा। तत्कारणत्वात् पुण्यफलोत्पत्तेः। तेन पुण्यफलानि संगच्छन्ते। स एव पुण्यफलानि वामानि नयति लोकमिति वामनीः। एष एव भामनीः। भामानि भानानि तानि नयति लोकमिति भामनीः। तदुक्तं श्रुत्या—'तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति' इति ॥ १३ ॥
आशङ्कोत्तरमिदं सूत्रम्। आशङ्कामाह ॐ कथं पुनरिति ॐ। स्थानिनो हि स्थानं महत् दृष्टम्। यथा
भामती-व्याख्या
हो जाता है। भय और अभय भी चेतन के धर्म हैं, अचेतन बुद्धि में वे सम्भव नहीं होते। इसी प्रकार वामनीत्व, भामनीत्वादि धर्म भी ब्रह्म से अन्यत्र संगमित नहीं किए जा सकते। 'दृश्यते'—इस प्रकार के प्रत्यक्षता-व्यवहार का शास्त्रीय ज्ञान में तात्पर्य बताया जा चुका है। इस प्रकार के उपपादन को सूचित करने के लिए सूत्रकार ने कहा है—"उपपत्तेः"।
एतदमृतमभयमेतद् ब्रह्म"—ऐसा कहने पर आशङ्का की जा सकती है—"कथं पुनराकाशवत् सर्वगतस्य ब्रह्मणोऽक्ष्यल्पं स्थानमुपपद्यते ? अर्थात् आकाश के समान व्यापक ब्रह्म को एक आँख-जैसे स्वल्प स्थान में सीमित क्योंकर किया जा सक ? है ? इस आशङ्का का परिहार श्रुति के द्वारा किया जाता है—"तद्यद्यपि अस्मिन् सर्पिर्वोदकं वा सिञ्चति वर्त्मनी एव गच्छति" (छां. ४।१५।१)। आशय यह है कि निर्लेप ब्रह्म का चक्षुपात्र- जैसा निर्लेप स्थान ही उचिततम है, भाष्यकार यही कह रहे है—"तथा परमेश्वरानुरूपमेत- दक्षिस्यानम्"। "संयद्वामत्त्वादिगुणोपदेशश्च तस्मिन् अवकल्पते"—इस भाष्य में 'तस्मिन्' का अर्थ—ब्रह्मणि और 'अवकल्पते' का अर्थ—घटते हैं, क्योंकि ब्रह्म में ही विशेषण पदों का अर्थ समन्वित होता है, प्रतिबिम्बादि में नहीं। 'वन सम्भक्तौ' धातु से निष्पन्न 'वामन्' शब्दका अर्थ है—शोभन, अतः पुण्यरूप कर्म-फल के लिए 'वननीयानि संभजनीयानि पुण्यफलानि'—इस व्युत्पत्ति के अनुसार प्रयुक्त हुआ है। ब्रह्म को 'संयद्वाम' इस लिए कहा जाता है कि वह संयन्ति संगच्छमानि वामानि अनेन—इस प्रकार पुण्य फल का गमयिता है। ब्रह्म को ही 'भामनी' कहा गया है, क्योंकि वह भामसंज्ञक प्रकाश का नेता (प्रकाशक) है, जैसा कि श्रुति कहती है—"तमेव भान्तमनुभाति सर्वम् (कौ. ब्रा. २।५।१५) ॥ १३ ॥
"स्थानादिव्यपदेशाच्च"—यह सूत्र जिस शङ्का का उत्तर है, वह शङ्का है—'कथं
अक्षिपुरुषस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २९१
भवेदेषाऽनवक्लृप्तिः, यद्येतदेकमेवैकं स्थानमस्य निर्दिष्टं भवेत्। सन्ति ह्यन्यान्यपि पृथिव्यादीनि स्थानान्यस्य निर्दिष्टानि—'यः पृथिव्यां तिष्ठन्' (बृ० ३।७।३) इत्यादिना। तेषु हि चक्षुरपि निर्दिष्टम् —'यश्चक्षुषि तिष्ठन्' इति। 'स्थानादिव्यपदेशात्' इत्यादिग्रहणेनैतद्दर्शयति—न केवलं स्थानमेवैकमनुचितं ब्रह्मणो निर्दिश्यमानं दृश्यते, किं तर्हि ? नामरूपमित्येवंजातीयकमप्यनामरूपस्य ब्रह्मणोऽनुचितं निर्दिश्यमानं दृश्यते—'तस्योदिति नाम', 'हिरण्मयश्मश्रुः' (छा० १।६।७,६) इत्यादि। निर्गुणमपि सद् ब्रह्म नामरूपगतैर्गुणैः सगुणमुपासनार्थं तत्र तत्रोपदिश्यत इत्येतदप्युक्तमेव। सर्वगतस्यापि ब्रह्मण उपलब्ध्यर्थं स्थानविशेषो न विरुध्यते, शालग्राम इव विष्णोरित्येतदप्युक्तमेव ॥ १४ ॥
सुखविशिष्टाभिधानादेव च ॥ १५ ॥
अपि च नैवात्र विवदितव्यं—किं ब्रह्मास्मिन्वाक्येऽभिधीयते न वेति ? सुखविशिष्टाभिधानादेव ब्रह्मत्वं सिद्धम्। सुखविशिष्टं हि ब्रह्म यद्वाक्योपक्रमे प्रक्रान्तं
भामती
यादसामब्धिः। तत्कथमत्यल्पं चक्षुरधिष्ठानं परमात्मनः परममहत इति शङ्कार्थः। परिहरति ॐ अत्रोच्यते इति ॐ। स्थानान्यादयो येषां ते स्थानादयो नामरूपप्रकारास्तेषां व्यपदेशात् सर्वगतस्यैकस्थाननियमो नावकल्पते, न तु नानास्थानत्वं नभस इव नानासूचीपाशादिस्थानत्वम्। विशेषतस्तु ब्रह्मणस्तानि तान्युपासनास्थानानीति तैरस्य युक्तो व्यपदेशः ॥ १४ ॥
अपि च प्रकृतानुसारादपि ब्रह्मैवात्र प्रत्येत्तव्यं, न तु प्रतिबिम्बजीवदेवता इत्याह सूत्रकारः— ॐ सुखविशिष्टाभिधानादेव च ॐ। एवं खलूपाख्यायते — उपकोसलो ह वै कामलायनः सत्यकामे जाबाले ब्रह्मचर्यमुवास, तस्याचार्यस्य द्वादश वर्षाण्यग्नीनुपचचार, स चाचार्योऽन्यान्यं ब्रह्मचारिणः स्वाध्यायं ग्राहयित्वा समावर्त्तयामास, तमेवैकमुपकोसलं न समावर्त्तयति स्म, जायया च तत्समावर्त्तनायार्थितोऽपि तद्वचनमवधीर्याचार्यः प्रोषितवान्।
भामती-व्याख्या
पुनराकाशवत् सर्वगतस्य ब्रह्मणोऽक्ष्यल्पं स्थानमुपपद्यते ?” ब्रह्मरूप स्थानी पदार्थ का स्थान वैसे ही महान् होता है, जैसे जल-जन्तुओं का समुद्र, तब उस महान् ब्रह्म का अक्षि-जैसा स्वल्प स्थान क्योंकर बन सकता है—यह शङ्का का अर्थ है। उस शङ्का का परिहार है—'अत्रोच्यते'। सूत्र-घटक 'स्थानादि' शब्द का समास है—'स्थानानि आदयो येषां ते स्थानादयः'। इस प्रकार नामरूपादि समस्त प्रपञ्च जिसका निवास-स्थान है, ऐसा सर्वगत परमेश्वर किसी एक स्थान पर नियन्त्रित क्योंकर हो सकेगा ? उक्त शङ्का के परिहार सूत्र का भाव यह है कि जैसे व्यापक आकाश का सूची-पाश (सुई के छेद) के समान स्वल्प स्थान निर्दिष्ट होता है, वैसे ही व्यापक ब्रह्म का अक्षि, दहरादि स्वल्प स्थान में निर्देश उपासना के लिए हो जाना अनुचित नहीं ॥ १४ ॥
प्रकरण के अनुसार भी अक्षिपुरुष के रूप में ब्रह्म ही निर्दिष्ट है, प्रतिबिम्ब, जीव और देवता नहीं—ऐसा सूत्रकार कहता है—'सुखविशिष्टाभिधानादेव च।' ऐसी उपाख्या (कथा) प्रसिद्ध है कि कमल के उपकोसलनामक पुत्र ने आचार्य सत्यकाम जाबालि की शरण में बारह वर्ष-पर्यन्त ब्रह्मचर्य व्रत का पालन किया, आचार्य की अग्नियों की सेवा की। आचार्य ने अन्य बहुत-से अन्तेवासियों को वेद-वेदाङ्ग पढ़ाकर उनका समावर्त्तन (गुरु-कुल से अवकाश) संस्कार कर दिया, किन्तु एक उपकोसल का समावर्त्तन नहीं किया। गुरु-पत्नी के अनुरोध करने पर भी आचार्य ने उसका समावर्त्तन नहीं किया। तब अत्यन्त खिन्नमनस्क उपकोसल
२९२ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. २ सू. १५
'प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्म' इति, तदेवेहाभिहितं, प्रकृतपरिग्रहस्य न्याय्यत्वात् । 'आचार्यस्तु ते गतिं वक्ता' (छा० ४।१४।१) इति च गतिमात्राभिधानप्रतिज्ञानात् । कथं पुनर्वाक्योपक्रमे सुखविशिष्टं ब्रह्म विज्ञायत इति ? उच्यते—'प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्म' इत्येतदग्नीनां वचनं श्रुत्वोपकोसल उवाच —'विजानाम्यहं यत्प्राणो ब्रह्म, कं च खं च तु न विजानामि' इति । तत्रेदं प्रतिवचनम् —'यद्वाव कं तदेव खं यदेव खं तदेव कम्' (छा० ४।१०।५) इति । तत्र खंशब्दो भूताकाशे निरूढो लोके । यदि तस्य विशेषणत्वेन कंशब्दः सुखवाची नोपादीयेत, तथा सति केवले भूताकाशे ब्रह्मशब्दो नामादिष्विव प्रतीकाभिप्रायेण प्रयुक्त इति प्रतीतिः स्यात् । तथा कंशब्दस्य विषयेन्द्रि-
भामती
ततोऽतिदूनमानसमग्निपरिचरणकुशलमुपेत्य त्रयोऽग्नयः करुणापराधीनचेतसः श्रद्धानायाऽस्मै दृढभक्तये समेत्य ब्रह्मविद्यामूचिरे—प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्मेति । अथोपकोसल उवाच—विजानाम्यहं प्राणो ब्रह्मेति, स हि सूत्रात्मा विभूतिमत्तया ब्रह्मरूपाविर्भावाद् ब्रह्मेति, किन्तु कं च खं च ब्रह्मेत्येतन्न विजानामि, नहि विषयेन्द्रियसम्पर्कजं सुखमनित्यं लोकसिद्धं खं च भूताकाशमचेतनं ब्रह्म भवितुमर्हति । अथैनमग्नयः प्रत्यूचुः—यद्वाव कं तदेव खं यदेव खं तदेव कमिति । एवं संभूयोक्त्वा प्रत्येकं च स्वविषयां विद्यामूचुः – पृथिव्यग्निरन्नमादित्य इत्यादिना । पुनस्त एनं संभूयोचुः – एषा सोम्य तेऽस्मद्विद्या प्रत्येकममुक्ता स्वविषया विद्या, आत्मविद्या चास्माभिः संभूय पूर्वमुक्ता – प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्मेति, आचार्यस्तु ते गतिं वक्ता । ब्रह्मविद्येयमुक्तास्माभिर्गतिमात्रं त्ववशिष्टं नोक्तम् , तत्तु विद्याफलप्राप्तये जावालस्तवाचार्यो वक्ष्यतीत्युक्तवाऽग्नय उपरेमिरे । एवं व्यवस्थिते यद्वाव कं तदेव खं यदेव खं तदेव कमित्येतद् व्याचष्टे भाष्यकारः ॐ तत्र खंशब्दः इति ॐ । ॐ प्रतीकाभिप्रायेण इति ॐ । आश्रयान्तरप्रत्ययस्याश्रयान्तरे क्षेपः
भामती-व्याख्या
को गार्हपत्य, दक्षिणा और आहवनीय नाम की) तीनों अग्नियों ने मिलकर करुणार्द्र मन से उस अपने परम श्रद्धालु भक्त उपकोसल को ब्रह्मविद्या का उपदेश किया —“प्राणो ब्रह्म, कं ब्रह्म, खं ब्रह्म” । उपकोसल ने कहा- मैं 'प्राणो ब्रह्म'--यह जानता हूं, क्योंकि प्राणरूप सूत्रात्मा हिरण्यगर्भ) बृहद् विभूतियों से सम्पन्न होने के कारण ब्रह्म कहा जाता है, किन्तु “कं च खं च ब्रह्म”—यह समझ में नहीं आता, क्योंकि विषय और इन्द्रियों के सम्बन्ध से जनित लौकिक अनित्य सुख और लोक-प्रसिद्ध अवकाशात्मक आकाश कभी ब्रह्म नहीं हो सकते । तब उस ब्रह्मचारी को अग्नियों ने मिलकर कहा - "यद्वाव कं तदेव खं यदेव खं तदेव कम् ।” इस प्रकार का सामूहिक उपदेश देने के अनन्तर तीनों [ गार्हपत्य, अन्वाहार्यपचन (दक्षिणाग्नि) और आहवनीय ] अग्नियों ने क्रमशः पृथक्-पृथक् शिक्षा दी - "पृथिव्यग्निरन्नमादित्यः”—इत्यादि । पुनः तीनों ने मिलकर उपदेश किया- "एषा सोम्य तेऽस्मद्विद्या” अर्थात् यह हमारी अपनी विद्या है और आत्मविद्या का तो हम तीनों ने मिलकर उपदेश किया था —“प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्म आचार्यस्तु ते गतिं वक्ता ।” अर्थात् हम लोगों ने केवल आत्मविद्या कह दी है, गति (मार्ग) मात्र अवशिष्ट है, वह विद्या-फल की प्राप्ति के लिए आचार्य जाबाल कहेंगे । इतना कहकर अग्नियां उपरत हो गईं । "यदेव कं तदेव खं यदेव खं तदेव कम्” - इसकी व्याख्या भाष्यकार कर रहे हैं— “तत्र खं शब्दो भूताकाशे निरूढः” । भाष्यकार ने जो कहा है— “ब्रह्मशब्दो नामादिष्विव प्रतीकाभिप्रायेण प्रयुक्तः” । वहाँ प्रतीक का अर्थ है— 'अन्यविषयक प्रतीति का अन्यत्र क्षेपण (आरोपण ), जैसे 'ब्रह्म' शब्द, परमात्मा का वाचक है, किन्तु उसका नामादि में प्रयोग (अर्थात् इसको ही ब्रह्म समझना चाहिए जो कि नामादि है) । उसी प्रकार जो भूताकाश है, उसे ही ब्रह्म समझना । यह सिद्धान्ततः
अक्षिपुरुषस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २९३
यत्संपर्कजनिते सामये सुखे प्रसिद्धत्वात्, यदि तस्य खंशब्दो विशेषणत्वेन नोपादीयेत, लौकिकं सुखं ब्रह्मेति प्रतीतिः स्यात्। इतरेतरविशेषितौ तु कंखंशब्दौ सुखात्मकं ब्रह्म गमयतः। तत्र द्वितीये ब्रह्मशब्देऽनुपादीयमाने कं खं ब्रह्मेत्येवोच्यमाने कंशब्दस्य विशेषणत्वैनैवोपयुक्तत्वात्सुखस्य गुणस्याध्येयत्वं स्यात्, तन्मा भूदित्युभयोः कंखंशब्दयोर्ब्रह्मशब्दशिरस्त्वं 'कं ब्रह्म खं ब्रह्म' इति। इष्टं हि सुखस्यापि गुणस्य गुणवद्ध्येयत्वम्। तदेवं वाक्योपक्रमे सुखविशिष्टं ब्रह्मोपदिष्टम्। प्रत्येकं च गार्हपत्यादयोऽग्नयः स्वं स्वं महिमानमुपदिश्य 'एषा सोम्य तेऽस्मद्विद्यात्मविद्या च' इत्युपसंहरन्तः पूर्वत्र ब्रह्म निर्दिष्टमिति ज्ञापयन्ति। 'आचार्यस्तु ते गतिं वक्ता' इति च गतिमात्राभिधानप्रतिज्ञानमर्थान्तरविवक्षां वारयति। 'यथा पुष्करपलाश आपो न
भामती
प्रतीकः, यथा ब्रह्मशब्दः परमात्मविषयो नामादिषु क्षिप्यते—इदमेव तद् ब्रह्म ज्ञेयं यन्नामेति। तथेदमेव तद् ब्रह्म यद् भूताकाशमिति प्रतीतिः स्यात्। न चैतत्प्रतीकत्वमिष्टम्। लौकिकस्य सुखस्य साधनपारतन्त्र्यं क्षयिष्णुता चामयस्तेन सह वर्तत इति सामयं सुखम्। तदेवं व्यतिरेके दोषमुक्त्वोभयान्वये गुणमाह ॐ इतरेतरविशेषितौ तु इति ॐ। तदर्थयोर्विशेषितत्वाच्छब्दावपि विशेषितावुच्येते। सुखशब्दसमानाधिकरणो हि खंशब्दो भूताकाशमर्थं परित्यज्य ब्रह्मणि गुणयोगेन वर्तते। तादृशा च खेन सुखं विशिष्यमाणं सामयाद्व्यावृत्तं निरामयं भवति। तस्मादुपपन्नमुभयोपादानम्। ब्रह्मशब्दाभ्यासस्य प्रयोजनमाह ॐ तत्र-द्वितीये इति ॐ। ब्रह्मपदं कंपदस्योपरि प्रयुज्यमानं शिरः, एवं खंपदस्यापि ब्रह्मपदं शिरो ययोः कंखंपदयोस्ते ब्रह्मशिरसी, तयोर्भावो ब्रह्मशिरस्त्वम्। अस्तु प्रस्तुते किमायातमित्यत आह ॐ तदेवं वाक्योपक्रम इति ॐ। नन्वग्निभिः पूर्वं निर्दिश्यतां ब्रह्म, य एषोऽक्षणीत्याचार्यवाक्येऽपि तदेवानुवर्त्तनीयमिति तु कुत इत्याह ॐ आचार्यस्तु ते गतिं वक्तेति च गतिमात्राभिधानम् इति ॐ। यद्यप्येते भिन्नवक्तृणी
भामती-व्याख्या
अभीष्ट नहीं, क्योंकि लौकिक सुख सामय है, लौकिक सुख की परतन्त्रता और नश्वरता ही यहाँ 'आमय' शब्द का अर्थ है, उससे युक्त होने के कारण वैषयिक सुख को सामय कहा जाता है। कं और ख दोनों के व्यतिरिक्त (भिन्न-भिन्न) अर्थों में दोषाभिधान करने के अनन्तर दोनों के अभिन्नाकार में गुण का कथन किया जाता है—"इतरेतरविशेषितौ तु"। कं और खं इन दोनों शब्दों के अर्थों में विशेष्य-विशेषणभाव होने पर भी शब्दों में उसका व्यवहार किया जाता है। 'सुख' शब्द का सामानाधिकरण ('सुखं खं'—इस प्रकार समाभिव्याहृत होकर) 'खं' शब्द अपने भूताकाशरूप अर्थ को छोड़ कर गौणी वृत्ति के द्वारा ब्रह्म का बोधक होता है। उसी प्रकार 'खं' शब्द से समभिव्याहृत होकर 'सुख' शब्द लोक-प्रसिद्ध सामय सुखरूप अर्थ का परित्याग करके ब्रह्मरूप निरामय सुख का गमक होता है। अतः कं और खं दोनों पदों का ग्रहण सार्थक है। 'ब्रह्म' शब्द के अभ्यास (बार-बार कथन) का प्रयोजन कहते हैं—"तत्र द्वितीये ब्रह्मशब्देऽनुपादीयमाने"। "कंखंशब्दयोर्ब्रह्मशिरस्त्वम्"—यहाँ 'कं' शब्द के उत्तर प्रयुज्यमान 'ब्रह्म' शब्द को शिरस्, एवं खं शब्द के उत्तर प्रयुज्यमान 'ब्रह्म' शब्द शिरस् है। जिन कं और खं—दोनों पदों के उत्तर 'ब्रह्म' पद का प्रयोग होता है, वे दोनों पद ब्रह्मशिरस्क कहे जाते हैं—'कं ब्रह्म, खं ब्रह्म'। प्रकरण का उपसंहार प्रस्तुत किया जाता है—"तदेवं वाक्योपक्रमे सुखविशिष्टं ब्रह्म"।
यह जो कहा गया कि अग्निवक्तृक वाक्य के द्वारा आचार्यवक्तृक वाक्य का नियमन क्योंकर होगा? उसका समाधान है—"आचार्यस्तु ते गतिं वक्तेति च गतिमात्राभिधानम्"। यद्यपि उक्त दोनों वाक्य भिन्नवक्तृक हैं, तथापि पूर्व वक्ता (अग्नियों) ने उन दोनों वाक्यों
२९४ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ १ पा. २ सू. १५
श्लिष्यन्त एवमेवंविदि पापं कर्म न श्लिष्यते' (छा० ४।१४।३) इति चाक्षिस्थानं पुरुषं विजानतः पापेनानुपघातं ब्रुवन्नक्षिस्थानस्य पुरुषस्य ब्रह्मत्वं दर्शयति । तस्मात् प्रकृतस्यैव ब्रह्मणोऽक्षिस्थानतां संयद्वामत्वादिगुणतां चोक्त्वाऽर्चिरादिकां तद्विदो गतिं वक्ष्यामीत्युपक्रमते - 'य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यत एष आत्मेति होवाच' (छा० ४।१५।१) इति ॥ १५ ॥
भामती
वाक्ये, तथापि पूर्वेण वक्त्रा एकवाक्यतां गमिते गतिमात्राभिधानात् । किमुक्तं भवति—तुभ्यं ब्रह्मविद्याऽस्माभिरुपदिष्टा, तद्विदस्तु गतिर्नोक्ता, तां च किञ्चिदधिकमाध्येयं पूरयित्वाऽऽचार्यो वक्ष्यतीति । तदनेन पूर्वसंबद्धार्थान्तरविवक्षा वारितेति । अथैवमग्निभिरुपदिष्टे प्रोषित आचार्यः कालेनाजगाम, आगतश्च वीक्ष्योपकोशलमुवाच, ब्रह्मविद इव ते सोम्य मुखं प्रसन्नं भाति, कोऽनु त्वामनुशशासेति, उपकोशलस्तु ह्रीणो भीतश्च को नु मामनुशिष्याद् भगवन् ! प्रोषिते त्वयीत्यापाततोऽपह्नाय निर्बध्यमानो यथावदग्नीनामनुशासनमवोचत् । तदुनश्रुत्य चाचार्यः सुचिरं क्लिष्ट उपकोशले समुपजातदयार्द्रहृदयः प्रत्युवाच—सोम्य किल तुभ्यमग्नयो न ब्रह्म साकल्येनाबोचन्, तबहं तुभ्यं साकल्येन वक्ष्यामि, यदनुभव-माहात्म्याद्यथा पुष्करपलाश आपो न श्लिष्यन्त एवमेवंविदि पापं कर्म न श्लिष्यत इति। एवमुक्तवत्याचार्य आहोपकोशलः—ब्रवीतु मे भगवानिति। तस्मै होवाचाचार्योऽर्चिरादिकां गतिं वक्तुमनाः, यदुक्तमग्निभिः प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्मेति तत्पूरणाय एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यते इत्यादि। एतदुक्तं भवति—आचार्येण ये यत् सुखं ब्रह्माक्षिस्थानं संयद्वामं वामनी भामनीत्येवंगुणकं प्राणसहितमुपासते, ते सर्वेऽपहतपाप्मानोऽन्यत्कर्म कुर्वन्तु मा वाकार्षुः, अर्चिषमर्चिरभिमानिनीं देवतामभिसम्भवन्ति प्रतिपद्यन्ते, अर्चिषोऽहरहर्देवताम्
भामती-व्याख्या
की एकवाक्यता स्थापित कर दी है। भाव यह है कि अग्नियों का कहना है कि हमने ब्रह्मविद्या का उपदेश कर दिया है, ब्रह्म-विद्या-सम्पन्न पुरुष की गति नहीं कही है, उसको कुछ परिवर्द्धनों के साथ आचार्य कहेंगे। इससे यह नितान्त स्पष्ट हो जाता है कि आचार्य पूर्व-प्रसक्त पदार्थ से भिन्न अर्थ की विवक्षा नहीं कर सकता। इस प्रकार तीनों अग्नियों का उपदेश पूरा हुआ था कि देशान्तर गये आचार्य जाबालि समय पर आ गए। उपकोसल को देख कर बोले—'हे सोम्य ! ब्रह्मवेत्ता के समान तुम्हारा मुख प्रसन्न हो रहा है, किसने तुम्हें ब्रह्मविद्या का पावन उपदेश किया ? उपकोसल कुछ लज्जित कुछ डरा-सा बोला—'कौन मुझे उपदेश देता, भगवन् आपके देशान्तर चले जाने पर ? इस प्रकार आपाततः अपलाप करने पर आचार्य ने पूछा—'क्या इन अग्नियों ने उपदेश किया ? आचार्य के प्रश्नों का बौछार ने उसे सत्य-सत्य कह देने के लिए बाध्य कर दिया। अग्नियों ने जैसे उपदेश दिया, वह सब उपकोसल ने कह सुनाया। वह सब सुन एवं उपकोसल के चिर ब्रह्मचर्य-पालन-जनित क्लेश पर दयार्द्र होकर आचार्य ने उपकोसल को कहा—'सोम्य ! अग्नियों ने तुम्हें ब्रह्म का पूर्णतया उपदेश नहीं दिया, अतः में तुम्हें पूर्ण ब्रह्मविद्या का उपदेश देता हूं, पहले ब्रह्मविद्या का माहात्म्य सुनो—जैसे कमल-पत्र को जल प्रभावित ( गीला ) नहीं कर सकता, वैसे ही ब्रह्मवेत्ता पुरुष को पाप कर्म दूषित नहीं कर सकता। आचार्य के वैसा कहने पर उपकोसल ने कहा—भगवन् ! वह लोकोत्तर उपदेश आप मुझे देने की कृपा करें। आचार्य ने उपकोसल को अर्चिरादि का मार्ग बताने की इच्छा से अग्नियों द्वारा प्रदत्त "प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्म'—इस उपदेश का पूरक उपदेश दिया—"यह एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यते एष आत्मेति" इत्यादि सारांश यह है कि आचार्य ने कहा कि जो लोग अक्षिस्थित्व, वामनीत्व, भामनीत्वादि गुणों से युक्त ब्रह्मरूप सुख की प्राणों के साथ उपासना करते हैं, वे अन्य कर्म करें या न करें
अक्षिपुरुषस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २९५
श्रुतोपनिषत्कगत्यभिधानञ्च ॥ १५ ॥
इतश्चाक्षिस्थानः पुरुषः परमेश्वरः, यस्माच्छ्रुतोपनिषत्कस्य श्रुतरहस्यविज्ञानस्य ब्रह्मविदो या गतिर्देवयानाख्या प्रसिद्धा श्रुतौ—'अथोत्तरेण तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्ययाऽऽत्मानमन्विष्यादित्यमभिजायन्ते । एतद्वै प्राणानामायतनमेतदमृतमभयमेतत्परायणमेतस्मान्न पुनरावर्तन्ते' (प्रश्न० १।१०) इति । स्मृतावपि—'अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् । तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः' (गी०
भामती
अह्नः आपूर्यमाणपक्षम्, शुक्लपक्षदेवताम्, ततः षण्मासान् येषु मासेषूत्तरां दिशमेति सविता, ते षण्मासा उत्तरायणं, तद्देवतां प्रतिपद्यन्ते, तेभ्यो मासेभ्यः संवत्सरदेवताम्, तत आदित्यम्, आदित्याच्चन्द्रमसं चन्द्रमसो विद्युतं, तत्र स्थितानेतान् पुरुषः कश्चिद् ब्रह्मलोकादवतीर्यामानवोऽमानव्यां सृष्टौ भवो ब्रह्मलोकभव इति यावत्, स तादृशः पुरुष एतान् सत्यलोकस्थं कार्यं ब्रह्म गमयति । स एव देवपथो देवैरर्चिरादिभिर्नैतृभिरुपलक्षित इति देवपथः, स एव ब्रह्मणा गन्तव्येनोपलक्षित इति ब्रह्मपथः, एतेन पथा प्रतिपद्यमानाः सत्यलोकस्थं ब्रह्म इमं मानवं मनोः सर्गं किं भूतमावर्तं जन्मजरामरणपौनःपुन्यमावृत्तिस्तत्कर्त्ताऽऽवर्तो मानवो लोकस्तं नावर्तन्ते । तथा च स्मृतिः—
'ब्रह्मणा सह ते सर्वे सम्प्राप्ते प्रतिसञ्चरे ।
परस्यान्ते कृतात्मानः प्रविशन्ति परं पदम् ॥'
तदेनेनोपाख्यानव्याख्यानेन "श्रुतोपनिषत्कगत्यभिधानाच्च"—
भामती-व्याख्या
अर्चिरादि मार्ग के अभिमानी अहरादि देवता को प्राप्त करते हैं, उसके द्वारा अहर्गणात्मक शुक्ल पक्ष के अभिमानी उसके अनन्तर उत्तरायण के जिन छः मासों में सूर्य उत्तर दिशा में आता है, उनके अभिमानी देवता को, तदनन्तर संवत्सर-देवता, अदनन्तर आदित्य, को प्राप्त कर आदित्य से चन्द्रमा, चन्द्रमा से विद्युल्लोक में अवस्थित होते हैं। वहाँ कोई अमानव (ब्रह्म-लोकोद्भूत) पुरुष ब्रह्मलोक से अवतीर्ण होकर इन उपासकों को सत्यलोक में अवस्थित कार्य ब्रह्म (हिरण्यगर्भ) के पास ले जाता है। यह वह देव-पथ कहलाता है, जो कि अर्चिरादि देवगणों से उपलक्षित है। इसे ही ब्रह्म-पथ भी कहा जाता है, क्योंकि उपासको के द्वारा गन्तव्य ब्रह्म से अभिलक्षित होता है। सत्य लोकस्थ ब्रह्म को प्राप्त जीव पुनः "इमं मानवमावर्तं नावर्तन्ते"। मनु के द्वारा विरचित यह मनुष्य-लोक मानवलोक है, इसको आवर्त इस लिए कहा जाता है कि इस लोक में जीव के जन्म, जरा, मरण की पुनः पुनः आवृत्ति होती रहती है। ब्रह्मलोकस्थ जीव ब्रह्म के साथ-साथ मुक्त हो जाते हैं, जन्म-मरण के प्रवाह में वे कभी नहीं आते, जैसा कहा है—
ब्रह्मणा सह ते सर्वे संप्राप्ते प्रतिसञ्चरे ।
परस्यान्ते कृतात्मानः प्रविशन्ति परं पदम् ॥ (कूर्मपु० १२।२१६)
प्रतिसंचर का अर्थ है—प्रलय अर्थात् उस ब्रह्मा की आयु पूरी हो जाने पर उस लोक के सभी जीव पर ब्रह्म का साक्षात्कार करके उसमें विलीन हो जाते हैं ॥ १५ ॥
कथित उपाख्यान-व्याख्या के द्वारा ही "श्रुतोपनिषत्कगत्यभिधानाच्च"—इस सूत्र की भी व्याख्या हो जाती है, क्योंकि श्रुत्यन्त-विज्ञान-वेत्ता पुरुष के उद्देश्य से जो कहा गया है—"अथोत्तरेण तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्ययाऽऽत्मानमन्विष्यादित्यमभिजायन्ते, एतद्वै प्राणानामायतनमेतदमृतमभयमेतत्परायणमेतस्मान्न पुनरावर्तन्ते" (प्रश्नो० १।१०)'। [अर्थात् वे उत्तरायण मार्ग से तप, ब्रह्मचर्य, श्रद्धा और विद्या (प्रजापति से अपने तादात्म्यानुचिन्तन) के द्वारा आत्मा
| २१६ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. २ सू. १७ |
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८।२४) इति । सैवेहाक्षिपुरुषविदोऽभिधीयमाना दृश्यते – 'अथ यदु चैवास्मिञ्छव्यं कुर्वन्ति यदि च नार्चिषमेवाभिसंभवन्ति' इत्युपक्रम्य, 'आदित्याच्चन्द्रमसं चन्द्रमसो विद्युतं तत्पुरुषोऽमानवः स एनान्ब्रह्म गमयत्येष देवपथो ब्रह्मपथ एतेन प्रतिपद्यमाना इमं मानवमावर्तं नावर्तन्ते (छा० ४।१५।५) इति । तदिह ब्रह्मविद्विषयया प्रसिद्धया गत्याऽक्षिस्थानस्य ब्रह्मत्वं निश्चीयते ॥ १६ ॥
अनवस्थितेरसम्भवाच्च नेतरः ॥ १७ ॥
यत्पुनरुक्तं छायात्मा, विज्ञानात्मा, देवतात्मा वा स्यादक्षिस्थान इति । अत्रोच्यते—न छायात्मादितिरिह ग्रहणमर्हति । कस्मात् ? अनवस्थितेः । न तावच्छायात्मनश्चक्षुषि नित्यमवस्थानं सम्भवति । यदैव हि कश्चित्पुरुषश्चक्षुरासीदति तदा चक्षुषि पुरुषच्छाया दृश्यते, अपगते तस्मिन्न दृश्यते । 'य एषोऽक्षिणि पुरुषः' इति च श्रुतिः सन्निधानात् स्वचक्षुषि दृश्यमानं पुरुषमुपास्यत्वेनोपदिशति । न चोपासनाकाले छायाकारं कश्चित्पुरुषं चक्षुःसमीपे सन्निधाप्योपास्त इति युक्तं कल्पयितुम् । 'अस्यैव शरीरस्य नाशमन्वेष नश्यति' (छा० ८।९।१) इति श्रुतिश्छायात्मनोऽप्यनवस्थितत्वं दर्शयति । असम्भवश्च तस्मिन्नमृतत्वादीनां गुणानां न छायात्मनि प्रतीतिः । तथा विज्ञानात्मनोऽपि साधारणे कृत्स्नशरीरेन्द्रियसम्बन्धे सति चक्षुष्येवावस्थितत्वं वक्तुं न शक्यम् । ब्रह्मणस्तु व्यापिनोऽपि दृष्ट उपलब्धयर्थो हृदयादिविशेषसम्बन्धः । समानश्च विज्ञानात्मन्यप्यमृतत्वादीनां गुणानामसम्बन्धः । यद्यपि विज्ञानात्मा परमात्मनोऽनन्य एव, तथाप्यविद्याकामकर्मकृतं तस्मिन्मर्त्यत्वमध्यारोपितं भयं चेत्यमृतत्वाभयत्वे नोपपद्येते । संयद्वामत्वादयश्चैतस्मिन्नैश्वर्यादनुपपन्ना एव । देवतात्मनस्तु 'रश्मिभिरेषोऽस्मिन्प्रतिष्ठितः' इति श्रुतेर्यद्यपि चक्षुष्यवस्थानं स्यात्तथाप्यात्मत्वं तावन्न सम्भवति, पराग्रूपत्वात् । अमृतत्वादयोऽपि न सम्भवन्ति, उत्पत्तिप्रलयश्रवणात् । अमरत्वमपि देवानां चिरकाला play/अवस्थानापेक्षम् । ऐश्वर्यमपि परमेश्वरायत्तं न स्वाभाविकम्, 'भीषाऽस्माद्वातः पवते भीषोदेति सूर्यः । भीषाऽस्मादग्निश्चेन्द्रश्च
भामती
इत्यपि सूत्रं व्याख्यातम् ॥ १६ ॥
य एषोऽक्षिणीति नित्यवत् श्रुतम नित्ये छायापुरुषे नावकल्पते । कल्पनागौरवं चास्मिन् पक्षे प्रसज्यत इत्याह ॐ न चोपासनाकाल इति ॐ । ॐ तथा विज्ञानात्मनोऽपि इति ॐ । विज्ञानात्मनो हि न प्रदेशे उपासनाऽन्यत्र दृष्टचरी, ब्रह्मणस्तु तत्र श्रुतपूर्वत्यर्थः । ॐ भीषा ॐ भिया । ॐ अस्मात् ॐ ब्रह्मणः । शेषमति-
भामती-व्याख्या
का अन्वेषण कर आदित्य-लोक को जीत लेते ( प्राप्त करते ) हैं । यह ( आदित्यरूप ब्रह्म) हिरण्यगर्भ ही प्राणों का आयतन ( आश्रय ), अमृत, अभय और परागति है, इसको प्राप्त कर जीव पुनः मनुष्यलोक को नहीं लौटते ]। ब्रह्मवेत्ता की जो गति होती है, वही अक्षिपुरुष के उपासक की भी है, अतः अक्षिपुरुष ब्रह्म ही है ॥ १६ ॥
"य एषोऽक्षिणि पुरुषः"—यह श्रवण ऐसे पुरुष का प्रतीत होता है, जो कि नित्य अक्षि-सन्निहित है, छाया-पुरुष में वैसी नित्यावस्थिति सम्भव नहीं, क्योंकि वह अनवस्थित ( अनित्य ) है । छाया-पुरुषादि की कल्पना में महान् गौरव दिखाते हैं—"न चोपासनाकाले छायाकारं कंञ्चित् पुरुषं चक्षुः समीपे सन्निधाप्योपास्ते इति युक्तं कल्पयितुम्, असम्भवात्" । "तथा विज्ञानात्मनोऽपि"—इस भाष्य का आशय यह है कि विज्ञानात्मा (जीव) की किसी प्रदेश-विशेष में उपासना अन्यत्र नहीं देखी जाती किन्तु ब्रह्म की विविध प्रदेशों में उपासना
अन्तर्यामिणो ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २९७
मृत्युर्धावति पञ्चमः' (तै० २।८) इति मन्त्रवर्णात् । तस्मात्परमेश्वर एवायमक्षिस्यावः प्रत्येतव्यः । अस्मिंश्च पक्षे दृश्यत इति प्रसिद्धवदुपादानं शास्त्रापेक्षं विद्वद्विषयं प्ररोचनार्थमिति व्याख्येयम् ॥ १७ ॥
( ५ अन्तर्याम्यधिकरणम् । सू० १८-२० )
अन्तर्याम्यधिदैवादिषु तद्धर्मव्यपदेशात् ॥ १८ ॥
'य इमं च लोकं परं च लोकं सर्वाणि च भूतानि योऽन्तरो यमयति' इत्युपक्रम्य श्रूयते—'यः पृथिव्यां तिष्ठन्पृथिव्या अन्तरो यं पृथिवी न वेद यस्य पृथिवी शरीरं यः पृथिवीमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः' (बृह० ३।७।१, २) इत्यादि । अत्राधि-दैवतमधिलोक मधिवैदमधियज्ञमधिभूतमध्यात्मं च कश्चिदन्तरवस्थितो यमयिताऽन्त-र्यामीति श्रूयते । स किमधिदेवाद्यभिमानी देवतात्मा कश्चित्, किं वा प्राप्ताणिमाद्यै-श्वर्यः कश्चिद्योगी, किंवा परमात्मा, किंवाऽर्थान्तरं किञ्चिदित्यपूर्वसंज्ञादर्शनात्सं-शयः । किं तावन्तः प्रतिभाति ? संज्ञाया अप्रसिद्धत्वात्संज्ञिनाप्यप्रसिद्धेनार्थान्तरेण केनचिद्भवितव्यमिति । अथवा नानिरूपितरूपमर्थान्तरं शक्यमस्तीत्यभ्युपगन्तुम् । अन्तर्यामिशब्दश्चान्तर्यमनयोगेन प्रवृत्तो नात्यन्तमप्रसिद्धः । तस्मात्पृथिव्याद्यभिमानी कश्चिद्देवोऽन्तर्यामी स्यात् । तथा च श्रूयते - 'पृथिव्येव यस्यायतनमग्निर्लोको मनो
भामती
रोहितार्थम् ॥ १७ ॥
स्वकर्मोपार्जितं देहं तेनान्यच्च नियच्छति ।
तक्षादिरशरीरस्तु नात्मान्तर्यामितां भजेत् ॥
भामती-व्याख्या
बहुधा श्रुत है । "भीषास्मात्"—इस श्रुति में 'भीषा' शब्द का अर्थ है—भयेन, 'अस्मात्' पद का अभिप्रेत अर्थ है—ब्रह्मणः । अवशिष्ट भाष्य स्पष्टार्थंक है ॥ १७ ॥
विषय—बृहदारण्यकोपनिषत् में “य इमं च लोकं परं च लोकं सर्वाणि च भूतानि योऽन्तरो यमयति”—ऐसा उपक्रम करके कहा गया है कि “यः पृथिव्यां तिष्ठन् पृथिव्या अन्तरो यं पृथिवी न वेद, यस्य पृथिवी शरीरम्, यः पृथिवीमन्तरो यमयत्येष ते आत्मान्तर्याम्यमृतः” (बृह. उ. ३।७।१, २) । इस श्रुति में ऐसे किसी अन्तर्यामी पुरुष का प्रतिपादन किया गया है, जो देवता, लोक, वेद, यज्ञ, भूत और आत्मा (शरीर) में रह कर उनका नियमन करता है।
संशय—उक्त अन्तर्यामी क्या अधिदेवादि का अभिमानी कोई देवता है ? या अणिमादि [ ( १ ) अणिमा (सूक्ष्म हो जाना), ( २ ) महिमा (महान् हो जाना), ( ३ ) लघिमा (हल्का हो जाना), ( ४ ) गरिमा (गुरु या वजनदार हो जाना), ( ५ ) प्राप्ति (पृथिवी पर बैठे-बैठे चन्द्रादि को छू लेना), ( ६ ) प्राकाम्य (सत्यसङ्कल्पता), ( ७ ) ईशित्व (सर्वभूत-नियमन) और ( ८ ) वशित्व (सर्वभूतों का वशीकरण) ] सिद्धियों से सम्पन्न कोई योगी है ? या परमात्मा ? अथवा कोई अन्य ही पदार्थ है ?
पूर्वपक्ष—
स्वकर्मोपार्जितं देहं तेनान्यच्च नियच्छति ।
तक्षादिरशरीरस्तु नात्मान्तर्यामितां भजेत् ॥
३८
२९८ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. २ सू. १८
ज्योतिः' ( बृ० ३।९।१० ) इत्यादि । स च कार्यकारणवत्त्वात्पृथिव्यादीनन्तस्तिष्ठन्नयम- यतीति युक्तं देवतात्मनो यमयितृत्वम् । योगिनो वा कस्यचित्सिद्धस्य सर्वानुप्रवेशेन
भामती
प्रवृत्तिनियमनलक्षणं हि कार्य्यं चेतनस्य शरीरिणः स्वशरीरेन्द्रियादौ वा शरीरेण वा वाश्यादौ दृष्टं नाशरीरस्य ब्रह्मणो भवितुमर्हति । नहि जातु वटाङ्कुरः कुटजबीजाज्जायते । तदनेन जन्माद्यस्य यत इत्येतदप्याक्षिप्तं वेदितव्यम् । तस्मात्परमात्मनः शरीरेन्द्रियादिरहितस्यान्तर्यामित्वाभावात् प्रधानस्य वा पृथिव्याद्यभिमानवत्या देवताया वाऽणिमाद्यैश्वर्य्ययोगिनो योगिनो वा जीवात्मनो वाऽन्तर्यामिता स्यात् । तत्र यद्यपि प्रधानस्यादृष्टत्वाश्रुतत्वामत्वत्वाविज्ञातत्वानि सन्ति, तथापि तस्याचेतनस्य द्रष्टृत्व- श्रोतृत्वमन्तृत्वविज्ञातृत्वानि श्रुतानामभावाद् अनात्मत्वाच्चैष त आत्मेति श्रुतेरनुपपत्तेर्न प्रधानस्यान्तर्या- मिता । यद्यपि पृथिव्याद्यभिमानिनो देवस्यात्मत्वमस्ति, अदृष्टत्वादयश्च सह द्रष्टृत्वादिभिरुपपद्यन्ते, शरीरे- न्द्रियादियोगश्च, पृथिव्येव यस्यायतनमग्निर्लोको मनोज्योतिरित्यादिश्रुतेः, तथापि तस्य प्रतिनियतनियमनाद् 'यः सर्वान् लोकानन्तरो यमयति यः सर्वाणि भूतान्यन्तरो यमयति' इति श्रुतिविरोधादनुपपत्तेः, योगी तु यद्यपि लोकभूतवशितया सर्वान् लोकान् सर्वाणि च भूतानि नियन्तुमर्हति तत्र तत्रानेकविधदेहेन्द्रियादि- निर्माणेण स एकधा भवति त्रिधा भवतीत्यादिश्रुतिभ्यः, तथापि जगद्व्यापारवर्ज प्रकरणादिति वक्ष्यमाणेण न्यायेन विकारविषये विद्यासिद्धानां व्यापाराभावात्सोऽपि नान्तर्यामी । तस्मात् पारिशेष्याज्जीव एव
भामती-व्याख्या
लोक में देखा जाता है कि तक्षा ( बढ़ई ) आदि चेतनात्मा अपने पूर्व कर्माजित शरीर और उसके द्वारा वास्य ( वसूला ) आदि साधनों का नियमन करता है, क्योंकि प्रवृत्ति और निवृत्ति का नियमन किसी शरीरधारी चेतन का ही कार्य है, शरीर-रहित ब्रह्म का नहीं । असमर्थ या अयोग्य पदार्थ से कोई कार्य नहीं होता, जैसे कि वट वृक्ष का अंकुर कभी कुटज के बीज से नहीं उगता । इस आक्षेप के द्वारा “जन्माद्यस्य यतः”--इत्यादि शास्त्र भी आक्षिप्त ( आहत ) हो जाता है । अतः शरीर, इन्द्रियादि साधनों से रहित परमात्मा ( ब्रह्म ) में नियन्तृत्व सम्भव नहीं । फलतः पृथिव्यादि की अभिमानिनी प्रकृति ( प्रधान ) या अणिमादि ऐश्वर्यशाली योगी अथवा जीवात्मा ही अन्तर्यामी हो सकता है । इनमें से सांख्याभिमत प्रधानतत्त्व में यद्यपि श्रुति-चर्चित अदृष्टत्व, अश्रुतत्व, अमंतत्व और अविज्ञातत्वादि धर्म हैं, तथापि प्रधान तत्त्व जड है, अतः उसमें श्रुति-कथित द्रष्टृत्व, श्रोतृत्व और मन्तृत्वादि धर्मों का अभाव है, एवं प्रधानतत्त्व अनात्मा है, अतः उसमें "एष ते आत्मा" - इस श्रुति का सामञ्जस्य नहीं होता, इस लिए प्रधान तत्त्व में श्रौत अन्तर्यामिता सम्भव नहीं ।
पृथिव्यादि के अभिमानी देवता में यद्यपि आत्मत्व, अदृश्यत्वादि, द्रष्टृत्वादि धर्म हैं और शरीरेन्द्रियादि का सम्बन्ध भी है, क्योंकि श्रुति कहती है - पृथिव्येव यस्यायतनमग्निर्लोको मनो ज्योतिः" ( बृह. उ. ३।९।१० ) । तथापि उसमें केवल कुछ ही पदार्थों का नियन्तृत्व है' सर्वलोक-नियन्तृत्व नहीं, श्रुति अपने अन्तर्यामी में सर्वलोक-नियन्तृत्व प्रतिपादित करती है - "यः सर्वान् लोकानन्तरो यमयति, यः सर्वाणि भूतान्यन्तरो यमयति" ।
सर्व ऐश्वर्य-सम्पन्न योगी यद्यपि सभी लोकों और भूतों का वशी होने के कारण नियामक हो सकता है । वह सर्व जगत् का नियमन करने के लिए अपने योग-बल से अनेक प्रकार के शरीर और इन्द्रियादि का निर्माण कर लेता है - "स एकधा भवति, त्रिधा भवति" ( छां. ७।२६।२ ) । तथापि "जगद्व्यापारवर्जं प्रकरणात्" ( ब्र सू. ४।४।१७ ) यह सूत्र कहता है कि जगत्सर्जनरूप कार्य ( विद्या-सिद्ध ) योगी नहीं कर सकता, अतः वह भी कथित अन्तर्यामी नहीं हो सकता । परिशेषतः जीव ही यहाँ अन्तर्यामी है, क्योंकि वह चेतन है,
अन्तर्यामिणो ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २९९
यमयितृत्वं स्यात् , न तु परमात्मा प्रतीयते, अकार्यकरणत्वादित्येवं प्राप्त इदमुच्यते— योऽन्तर्याम्यधिदेवादिषु श्रूयते, स परमात्मैव स्यान्नान्य इति । कुतः ? तद्धर्मव्यप-
भामती
चेतनो देहेन्द्रियादिमान् द्रष्टृत्वादिसम्पन्नः स्वयमदृश्यादिः स्वात्मनि वृत्तिविरोधादमृतश्च देहनाशेऽप्य- नाशात् । अन्यथाऽऽमुष्मिकफलोपभोगाभावेन कृतविप्रणाशाकृताभ्यागमप्रसङ्गात् । य आत्मनि तिष्ठन्निति चाभेदेऽपि कथञ्चिद्भेदोपचारात् स भगवः कस्मिन् प्रतिष्ठितः स्वे महिन्नोतिवत् । यमात्मा न वेदेति च स्वात्मनि वृत्तिविरोधाभिप्रायम् । यस्यात्मा शरीरमित्यादि च सर्वं स्वे महिम्नीतिवद्योजनीयं, यदि पुन- रात्मनोऽपि नियन्तुरन्यो नियन्ता भवेद् वेदिता वा ततस्तस्याप्यन्य इत्यनवस्था स्यात् । सर्वलोकभूत- नियन्तृत्वञ्च जीवस्यादृष्टद्वारा, तदुपार्जितौ हि धर्माधर्मौ नियच्छत इत्यनया द्वारा जीवो नियच्छति । एकवचनञ्च जात्यभिप्रायम् । तस्माज्जीवात्मैवान्तर्यामी, न परमात्मेति ।
एवं प्राप्तेऽभिधीयते— देहेन्द्रियादिनियमे नास्य देहेन्द्रियान्तरम् । तत्कर्मोपार्जितं तच्चेत्तदविद्याजितं जगत् ॥
भामती-व्याख्या
देहेन्द्रियादि से युक्त है, द्रष्टृत्वादि-सम्पन्न और स्वयं अदृश्य है, क्योंकि दर्शनादि क्रिया द्रष्टा से भिन्न दृश्य जगत् को ही व्याप्त करती है । वह अमृत इसलिए कहा जाता है कि देह और इन्द्रियादि का नाश हो जाने पर भी नष्ट नहीं होता, अन्यथा पारलौकिक कर्म-फलों का उपभोग न ही सकने के कारण कृत-प्रणाश एवं पूर्व जन्म में न होने के कारण अकृत कर्मों के फलभूत इस शरीर का अभ्यागम ( प्राप्ति ) मानना होगा । “य आत्मनि तिष्ठन्”—ऐसा व्यवहार भी जीव में वैसे ही सम्पन्न हो जाता है, जैसे ब्रह्म में “स भगवः कस्मिन् प्रतिष्ठितः ? स्वे महिम्नि” ( छां. ७।२४।१ ) ऐसा व्यवहार [ “स्वे महिम्नि”—यहाँ पर श्रुति ने ही भूमा से भिन्न गो और अश्वादि को ‘महिमा’ पद का अर्थ बताकर ‘प्रतिष्ठ’ शब्द का गौण अर्थ सूचित किया है, भाष्यकार कहते हैं—“तदाश्रितः तत्प्रतिष्ठश्चैत्रो भवति” ( छां. पृ. ४३१ ), किन्तु “स्वे महिम्नि” इस वाक्य से पूर्व ‘यत्र नान्यत् पश्यति” ( छां. ७।२४।१ ) इस वाक्य की व्याख्या में भाष्यकार ने कहा है—“नन्वयमेव दोषः —संसारानिवृत्तिः, क्रियाकारकफलभेदो हि संसारः इति चेत्, न, अविद्याकृतभेदापेक्षत्वात्” अर्थात् जीव और ब्रह्म का अविद्यावस्थ भेद लेकर अभिन्न वस्तु में भी अधिकरणत्व और आधेयत्वादि का व्यवहार किया जा सकता है] । “यमात्मा न वेद”—ऐसा कहना जीवात्मा के लिए उचित है, क्योंकि आत्मगत (अपने में रहनेवाली ) वेदन ( दर्शन ) क्रिया की कर्मता स्वयं अपने में नहीं रह सकती । “यस्यात्मा शरीरम्”—इत्यादि भेद-सापेक्ष व्यवहार अविद्या की छाया में वैसे ही सम्पन्न किए जा सकते हैं, जैसे—“स्वे महिम्नि” । यदि जीवात्मा का भी कोई अन्य नियन्ता ( अन्तर्यामी ) माना जाता है, तब उस नियन्ता का भी कोई अन्य नियन्ता और उसका भी कोई अन्य—इस प्रकार अनवस्था प्रसक्त होती है । सभी प्राणियों और लोकों का नियमन जीव अपने अदृष्टों के द्वारा करता है अर्थात् जीव के द्वारा उपार्जित धर्माधर्म मुख्यतः जगत् का नियमन करते हैं और उसका व्यवहार जीव में वैसे ही हो जाता है, जैसे सैनिकों के द्वारा किए गए जय-पराज- यादि का व्यवहार राजा में होता है । जगत् के नियन्ता धर्माधर्मादि यद्यपि अनेक हैं, तथापि अदृष्टत्वरूप जाति की एकता को ध्यान में रख कर ‘यः’ और यमयति’—इस प्रकार नियन्तृगत एकत्व का व्यवहार संगत हो जाता है । फलतः जीवात्मा ही जगत् का अन्तर्यामी है, परमात्मा नहीं ।
३०० ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. २ सू. १८
देशात्। तस्य हि परमात्मनो धर्मा इह निर्दिश्यमाना दृश्यन्ते। पृथिव्यादि तावदधि- दैवादिभेदभिन्नं समस्तं विकारजातमन्तस्तिष्ठन् यमयतीति परमात्मनो यमयितृत्वं धर्म उपपद्यते, सर्वविकारकारणत्वे सति सर्वशक्त्युपपत्तेः। 'एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः' इति चात्मत्वामृतत्वे मुख्ये परमात्मन उपपद्येते। 'यं पृथिवी न वेद' इति च पृथिवी- देवताया अविज्ञेयमन्तर्यामिणं ब्रुवन्देवतात्मनोऽन्यमन्तर्यामिणं दर्शयति। 'पृथिवी देवता ह्यहमस्मि पृथिवीत्यात्मानं विजानीयात्'। तथा 'अदृष्टोऽश्रुतः' इत्यादिव्यप- देशो रूपादिविहीनत्वात्परमात्मन उपपद्यत इति। यत्त्वकार्यकरणस्य परमात्मनो यमयितृत्वं नोपपद्यत इति। नैष दोषः, यन्नियच्छति तत्कार्यकरणैरेव, तस्य कार्य- करणवत्त्वोपपत्तेः। तस्याप्यन्यो नियन्तेत्यनवस्थादोषश्च न संभवति, भेदाभावात्। भेदे
भामती
श्रुतिस्मृतीतिहासपुराणेषु तावदत्र भवतः सर्वज्ञस्य सर्वशक्तेः परमेश्वरस्य जगद्योनित्वमवगम्यते। न तत् पृथग्जनसाधारण्यनुमानाभासेनागमविरोधिना शक्यमपह्नोतुम्। तथा च सर्वं विकारजातं तदविद्याशक्तिपरिणामस्तस्य शरीरेन्द्रियस्थाने वर्त्तत इति यथायथं पृथिव्यादिदेवताविकार्यकरणस्तानेव पृथिव्यादिदेवतादीन् शक्नोति नियन्तुम्। न चानवस्था, न हि नियन्त्रन्तरं तेन नियम्यते, किन्तु यो जीवो नियन्ता लोकसिद्धः स परमात्मैवोपाध्यवच्छेदकल्पितभेदस्तथा व्याधायत इत्यसकृदावेदितं, तत् कुतो नियन्त्रन्तरं? कुतश्चानवस्था? तथा च नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टेत्याद्या अपि श्रुतय उपपन्नायाः। परमार्थ-
भामती-व्याख्या
सिद्धान्त—
देहेन्द्रियादिनियमने नास्य देहेन्द्रियान्तरम् ।
तत्कर्मोपार्जितं तच्चेत् तदविद्याजितं जगत् ॥
इस जीव में जगत् का नियन्तृत्व (नियमन) देहेन्द्रियादि के द्वारा सम्भव नहीं, क्योंकि नियम्य जगत् के अन्तर्गत देहेन्द्रियादि भी हैं, उनका नियमन अन्य देहेन्द्रियादि के द्वारा सम्भव नहीं। यदि जीवाश्रित अदृष्ट के द्वारा अन्तर्यामित्व का सम्पादन किया जाता है, तब ब्रह्माश्रित या ब्रह्मविषयक अविद्या शक्ति के द्वारा उसमें अन्तर्यामित्व क्यों नहीं बन सकता ? श्रुति, स्मृति, इतिहास और पुराणों में सर्वज्ञ एवं सर्वशक्ति-समन्वित ब्रह्म को जगत् की योनि और अन्तर्यामी माना गया है। जीवों में एक अशक्त, अबोध साधारण जीव भी है, उसमें जगत्-नियन्तृत्व की कल्पना जिस अनुमान के द्वारा की जाती है, वह शास्त्र-विरुद्ध होने के कारण अनुमानाभास है, सदनुमान नहीं। ऐसे अनुमान के द्वारा आगम-सिद्ध ब्रह्मगत अन्तर्यामित्व का अपलाप नहीं किया जा सकता। यह जो कहा जाता है कि लोक-प्रसिद्ध कुलालादि में कार्य-नियमन देहेन्द्रियादि के द्वारा ही देखा जाता है, वह भी यहाँ असम्भव नहीं, क्योंकि परमेश्वर की अविद्या शक्ति के द्वारा विरचित प्रपञ्च ही उसका शरीरेन्द्रियादि है, उनके द्वारा ही वह यथायोग्य समस्त पृथिव्यादि अधिभूत, अधिदेव और अध्यात्म जगत् का नियमन करता है। यहाँ किसी प्रकार की अनवस्था प्रसक्त नहीं होती, क्योंकि यदि जीव से भिन्न किसी नियन्ता की कल्पना की जाती, तब अवश्य नियन्तृ-परम्परा की कल्पना से अनवस्था होती, प्रकृत में जिस परमेश्वर को अन्तर्यामी माना जाता है, वह जीव से भिन्न नहीं, अपितु परमात्मा ही उपाधिरूप अवच्छेदक के भेद से भिन्न-जैसा प्रतीयमान जीव ही लोक में नियन्तृत्वेन प्रसिद्ध है—यह कई बार कहा जा चुका है। तब न तो वह नियन्त्र्यन्तर कहा जा सकता है और न अनवस्था प्रसक्त होती है। जीवात्मा और परमात्मा का वास्तविक भेद न होने के कारण "नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा" (बृह. उ. ३।७।२३) इत्यादि भेद-निषेधक