भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२९४ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ १ पा. २ सू. १५
श्लिष्यन्त एवमेवंविदि पापं कर्म न श्लिष्यते' (छा० ४।१४।३) इति चाक्षिस्थानं पुरुषं विजानतः पापेनानुपघातं ब्रुवन्नक्षिस्थानस्य पुरुषस्य ब्रह्मत्वं दर्शयति । तस्मात् प्रकृतस्यैव ब्रह्मणोऽक्षिस्थानतां संयद्वामत्वादिगुणतां चोक्त्वाऽर्चिरादिकां तद्विदो गतिं वक्ष्यामीत्युपक्रमते - 'य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यत एष आत्मेति होवाच' (छा० ४।१५।१) इति ॥ १५ ॥
भामती
वाक्ये, तथापि पूर्वेण वक्त्रा एकवाक्यतां गमिते गतिमात्राभिधानात् । किमुक्तं भवति—तुभ्यं ब्रह्मविद्याऽस्माभिरुपदिष्टा, तद्विदस्तु गतिर्नोक्ता, तां च किञ्चिदधिकमाध्येयं पूरयित्वाऽऽचार्यो वक्ष्यतीति । तदनेन पूर्वसंबद्धार्थान्तरविवक्षा वारितेति । अथैवमग्निभिरुपदिष्टे प्रोषित आचार्यः कालेनाजगाम, आगतश्च वीक्ष्योपकोशलमुवाच, ब्रह्मविद इव ते सोम्य मुखं प्रसन्नं भाति, कोऽनु त्वामनुशशासेति, उपकोशलस्तु ह्रीणो भीतश्च को नु मामनुशिष्याद् भगवन् ! प्रोषिते त्वयीत्यापाततोऽपह्नाय निर्बध्यमानो यथावदग्नीनामनुशासनमवोचत् । तदुनश्रुत्य चाचार्यः सुचिरं क्लिष्ट उपकोशले समुपजातदयार्द्रहृदयः प्रत्युवाच—सोम्य किल तुभ्यमग्नयो न ब्रह्म साकल्येनाबोचन्, तबहं तुभ्यं साकल्येन वक्ष्यामि, यदनुभव-माहात्म्याद्यथा पुष्करपलाश आपो न श्लिष्यन्त एवमेवंविदि पापं कर्म न श्लिष्यत इति। एवमुक्तवत्याचार्य आहोपकोशलः—ब्रवीतु मे भगवानिति। तस्मै होवाचाचार्योऽर्चिरादिकां गतिं वक्तुमनाः, यदुक्तमग्निभिः प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्मेति तत्पूरणाय एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यते इत्यादि। एतदुक्तं भवति—आचार्येण ये यत् सुखं ब्रह्माक्षिस्थानं संयद्वामं वामनी भामनीत्येवंगुणकं प्राणसहितमुपासते, ते सर्वेऽपहतपाप्मानोऽन्यत्कर्म कुर्वन्तु मा वाकार्षुः, अर्चिषमर्चिरभिमानिनीं देवतामभिसम्भवन्ति प्रतिपद्यन्ते, अर्चिषोऽहरहर्देवताम्
भामती-व्याख्या
की एकवाक्यता स्थापित कर दी है। भाव यह है कि अग्नियों का कहना है कि हमने ब्रह्मविद्या का उपदेश कर दिया है, ब्रह्म-विद्या-सम्पन्न पुरुष की गति नहीं कही है, उसको कुछ परिवर्द्धनों के साथ आचार्य कहेंगे। इससे यह नितान्त स्पष्ट हो जाता है कि आचार्य पूर्व-प्रसक्त पदार्थ से भिन्न अर्थ की विवक्षा नहीं कर सकता। इस प्रकार तीनों अग्नियों का उपदेश पूरा हुआ था कि देशान्तर गये आचार्य जाबालि समय पर आ गए। उपकोसल को देख कर बोले—'हे सोम्य ! ब्रह्मवेत्ता के समान तुम्हारा मुख प्रसन्न हो रहा है, किसने तुम्हें ब्रह्मविद्या का पावन उपदेश किया ? उपकोसल कुछ लज्जित कुछ डरा-सा बोला—'कौन मुझे उपदेश देता, भगवन् आपके देशान्तर चले जाने पर ? इस प्रकार आपाततः अपलाप करने पर आचार्य ने पूछा—'क्या इन अग्नियों ने उपदेश किया ? आचार्य के प्रश्नों का बौछार ने उसे सत्य-सत्य कह देने के लिए बाध्य कर दिया। अग्नियों ने जैसे उपदेश दिया, वह सब उपकोसल ने कह सुनाया। वह सब सुन एवं उपकोसल के चिर ब्रह्मचर्य-पालन-जनित क्लेश पर दयार्द्र होकर आचार्य ने उपकोसल को कहा—'सोम्य ! अग्नियों ने तुम्हें ब्रह्म का पूर्णतया उपदेश नहीं दिया, अतः में तुम्हें पूर्ण ब्रह्मविद्या का उपदेश देता हूं, पहले ब्रह्मविद्या का माहात्म्य सुनो—जैसे कमल-पत्र को जल प्रभावित ( गीला ) नहीं कर सकता, वैसे ही ब्रह्मवेत्ता पुरुष को पाप कर्म दूषित नहीं कर सकता। आचार्य के वैसा कहने पर उपकोसल ने कहा—भगवन् ! वह लोकोत्तर उपदेश आप मुझे देने की कृपा करें। आचार्य ने उपकोसल को अर्चिरादि का मार्ग बताने की इच्छा से अग्नियों द्वारा प्रदत्त "प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्म'—इस उपदेश का पूरक उपदेश दिया—"यह एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यते एष आत्मेति" इत्यादि सारांश यह है कि आचार्य ने कहा कि जो लोग अक्षिस्थित्व, वामनीत्व, भामनीत्वादि गुणों से युक्त ब्रह्मरूप सुख की प्राणों के साथ उपासना करते हैं, वे अन्य कर्म करें या न करें