भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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अक्षिपुरुषस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २९५

श्रुतोपनिषत्कगत्यभिधानञ्च ॥ १५ ॥

इतश्चाक्षिस्थानः पुरुषः परमेश्वरः, यस्माच्छ्रुतोपनिषत्कस्य श्रुतरहस्यविज्ञानस्य ब्रह्मविदो या गतिर्देवयानाख्या प्रसिद्धा श्रुतौ—'अथोत्तरेण तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्ययाऽऽत्मानमन्विष्यादित्यमभिजायन्ते । एतद्वै प्राणानामायतनमेतदमृतमभयमेतत्परायणमेतस्मान्न पुनरावर्तन्ते' (प्रश्न० १।१०) इति । स्मृतावपि—'अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् । तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः' (गी०

भामती

अह्नः आपूर्यमाणपक्षम्, शुक्लपक्षदेवताम्, ततः षण्मासान् येषु मासेषूत्तरां दिशमेति सविता, ते षण्मासा उत्तरायणं, तद्देवतां प्रतिपद्यन्ते, तेभ्यो मासेभ्यः संवत्सरदेवताम्, तत आदित्यम्, आदित्याच्चन्द्रमसं चन्द्रमसो विद्युतं, तत्र स्थितानेतान् पुरुषः कश्चिद् ब्रह्मलोकादवतीर्यामानवोऽमानव्यां सृष्टौ भवो ब्रह्मलोकभव इति यावत्, स तादृशः पुरुष एतान् सत्यलोकस्थं कार्यं ब्रह्म गमयति । स एव देवपथो देवैरर्चिरादिभिर्नैतृभिरुपलक्षित इति देवपथः, स एव ब्रह्मणा गन्तव्येनोपलक्षित इति ब्रह्मपथः, एतेन पथा प्रतिपद्यमानाः सत्यलोकस्थं ब्रह्म इमं मानवं मनोः सर्गं किं भूतमावर्तं जन्मजरामरणपौनःपुन्यमावृत्तिस्तत्कर्त्ताऽऽवर्तो मानवो लोकस्तं नावर्तन्ते । तथा च स्मृतिः—

'ब्रह्मणा सह ते सर्वे सम्प्राप्ते प्रतिसञ्चरे ।
परस्यान्ते कृतात्मानः प्रविशन्ति परं पदम् ॥'

तदेनेनोपाख्यानव्याख्यानेन "श्रुतोपनिषत्कगत्यभिधानाच्च"—

भामती-व्याख्या

अर्चिरादि मार्ग के अभिमानी अहरादि देवता को प्राप्त करते हैं, उसके द्वारा अहर्गणात्मक शुक्ल पक्ष के अभिमानी उसके अनन्तर उत्तरायण के जिन छः मासों में सूर्य उत्तर दिशा में आता है, उनके अभिमानी देवता को, तदनन्तर संवत्सर-देवता, अदनन्तर आदित्य, को प्राप्त कर आदित्य से चन्द्रमा, चन्द्रमा से विद्युल्लोक में अवस्थित होते हैं। वहाँ कोई अमानव (ब्रह्म-लोकोद्भूत) पुरुष ब्रह्मलोक से अवतीर्ण होकर इन उपासकों को सत्यलोक में अवस्थित कार्य ब्रह्म (हिरण्यगर्भ) के पास ले जाता है। यह वह देव-पथ कहलाता है, जो कि अर्चिरादि देवगणों से उपलक्षित है। इसे ही ब्रह्म-पथ भी कहा जाता है, क्योंकि उपासको के द्वारा गन्तव्य ब्रह्म से अभिलक्षित होता है। सत्य लोकस्थ ब्रह्म को प्राप्त जीव पुनः "इमं मानवमावर्तं नावर्तन्ते"। मनु के द्वारा विरचित यह मनुष्य-लोक मानवलोक है, इसको आवर्त इस लिए कहा जाता है कि इस लोक में जीव के जन्म, जरा, मरण की पुनः पुनः आवृत्ति होती रहती है। ब्रह्मलोकस्थ जीव ब्रह्म के साथ-साथ मुक्त हो जाते हैं, जन्म-मरण के प्रवाह में वे कभी नहीं आते, जैसा कहा है—

ब्रह्मणा सह ते सर्वे संप्राप्ते प्रतिसञ्चरे ।
परस्यान्ते कृतात्मानः प्रविशन्ति परं पदम् ॥ (कूर्मपु० १२।२१६)

प्रतिसंचर का अर्थ है—प्रलय अर्थात् उस ब्रह्मा की आयु पूरी हो जाने पर उस लोक के सभी जीव पर ब्रह्म का साक्षात्कार करके उसमें विलीन हो जाते हैं ॥ १५ ॥

कथित उपाख्यान-व्याख्या के द्वारा ही "श्रुतोपनिषत्कगत्यभिधानाच्च"—इस सूत्र की भी व्याख्या हो जाती है, क्योंकि श्रुत्यन्त-विज्ञान-वेत्ता पुरुष के उद्देश्य से जो कहा गया है—"अथोत्तरेण तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्ययाऽऽत्मानमन्विष्यादित्यमभिजायन्ते, एतद्वै प्राणानामायतनमेतदमृतमभयमेतत्परायणमेतस्मान्न पुनरावर्तन्ते" (प्रश्नो० १।१०)'। [अर्थात् वे उत्तरायण मार्ग से तप, ब्रह्मचर्य, श्रद्धा और विद्या (प्रजापति से अपने तादात्म्यानुचिन्तन) के द्वारा आत्मा