भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअक्षिपुरुषस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २९३
यत्संपर्कजनिते सामये सुखे प्रसिद्धत्वात्, यदि तस्य खंशब्दो विशेषणत्वेन नोपादीयेत, लौकिकं सुखं ब्रह्मेति प्रतीतिः स्यात्। इतरेतरविशेषितौ तु कंखंशब्दौ सुखात्मकं ब्रह्म गमयतः। तत्र द्वितीये ब्रह्मशब्देऽनुपादीयमाने कं खं ब्रह्मेत्येवोच्यमाने कंशब्दस्य विशेषणत्वैनैवोपयुक्तत्वात्सुखस्य गुणस्याध्येयत्वं स्यात्, तन्मा भूदित्युभयोः कंखंशब्दयोर्ब्रह्मशब्दशिरस्त्वं 'कं ब्रह्म खं ब्रह्म' इति। इष्टं हि सुखस्यापि गुणस्य गुणवद्ध्येयत्वम्। तदेवं वाक्योपक्रमे सुखविशिष्टं ब्रह्मोपदिष्टम्। प्रत्येकं च गार्हपत्यादयोऽग्नयः स्वं स्वं महिमानमुपदिश्य 'एषा सोम्य तेऽस्मद्विद्यात्मविद्या च' इत्युपसंहरन्तः पूर्वत्र ब्रह्म निर्दिष्टमिति ज्ञापयन्ति। 'आचार्यस्तु ते गतिं वक्ता' इति च गतिमात्राभिधानप्रतिज्ञानमर्थान्तरविवक्षां वारयति। 'यथा पुष्करपलाश आपो न
भामती
प्रतीकः, यथा ब्रह्मशब्दः परमात्मविषयो नामादिषु क्षिप्यते—इदमेव तद् ब्रह्म ज्ञेयं यन्नामेति। तथेदमेव तद् ब्रह्म यद् भूताकाशमिति प्रतीतिः स्यात्। न चैतत्प्रतीकत्वमिष्टम्। लौकिकस्य सुखस्य साधनपारतन्त्र्यं क्षयिष्णुता चामयस्तेन सह वर्तत इति सामयं सुखम्। तदेवं व्यतिरेके दोषमुक्त्वोभयान्वये गुणमाह ॐ इतरेतरविशेषितौ तु इति ॐ। तदर्थयोर्विशेषितत्वाच्छब्दावपि विशेषितावुच्येते। सुखशब्दसमानाधिकरणो हि खंशब्दो भूताकाशमर्थं परित्यज्य ब्रह्मणि गुणयोगेन वर्तते। तादृशा च खेन सुखं विशिष्यमाणं सामयाद्व्यावृत्तं निरामयं भवति। तस्मादुपपन्नमुभयोपादानम्। ब्रह्मशब्दाभ्यासस्य प्रयोजनमाह ॐ तत्र-द्वितीये इति ॐ। ब्रह्मपदं कंपदस्योपरि प्रयुज्यमानं शिरः, एवं खंपदस्यापि ब्रह्मपदं शिरो ययोः कंखंपदयोस्ते ब्रह्मशिरसी, तयोर्भावो ब्रह्मशिरस्त्वम्। अस्तु प्रस्तुते किमायातमित्यत आह ॐ तदेवं वाक्योपक्रम इति ॐ। नन्वग्निभिः पूर्वं निर्दिश्यतां ब्रह्म, य एषोऽक्षणीत्याचार्यवाक्येऽपि तदेवानुवर्त्तनीयमिति तु कुत इत्याह ॐ आचार्यस्तु ते गतिं वक्तेति च गतिमात्राभिधानम् इति ॐ। यद्यप्येते भिन्नवक्तृणी
भामती-व्याख्या
अभीष्ट नहीं, क्योंकि लौकिक सुख सामय है, लौकिक सुख की परतन्त्रता और नश्वरता ही यहाँ 'आमय' शब्द का अर्थ है, उससे युक्त होने के कारण वैषयिक सुख को सामय कहा जाता है। कं और ख दोनों के व्यतिरिक्त (भिन्न-भिन्न) अर्थों में दोषाभिधान करने के अनन्तर दोनों के अभिन्नाकार में गुण का कथन किया जाता है—"इतरेतरविशेषितौ तु"। कं और खं इन दोनों शब्दों के अर्थों में विशेष्य-विशेषणभाव होने पर भी शब्दों में उसका व्यवहार किया जाता है। 'सुख' शब्द का सामानाधिकरण ('सुखं खं'—इस प्रकार समाभिव्याहृत होकर) 'खं' शब्द अपने भूताकाशरूप अर्थ को छोड़ कर गौणी वृत्ति के द्वारा ब्रह्म का बोधक होता है। उसी प्रकार 'खं' शब्द से समभिव्याहृत होकर 'सुख' शब्द लोक-प्रसिद्ध सामय सुखरूप अर्थ का परित्याग करके ब्रह्मरूप निरामय सुख का गमक होता है। अतः कं और खं दोनों पदों का ग्रहण सार्थक है। 'ब्रह्म' शब्द के अभ्यास (बार-बार कथन) का प्रयोजन कहते हैं—"तत्र द्वितीये ब्रह्मशब्देऽनुपादीयमाने"। "कंखंशब्दयोर्ब्रह्मशिरस्त्वम्"—यहाँ 'कं' शब्द के उत्तर प्रयुज्यमान 'ब्रह्म' शब्द को शिरस्, एवं खं शब्द के उत्तर प्रयुज्यमान 'ब्रह्म' शब्द शिरस् है। जिन कं और खं—दोनों पदों के उत्तर 'ब्रह्म' पद का प्रयोग होता है, वे दोनों पद ब्रह्मशिरस्क कहे जाते हैं—'कं ब्रह्म, खं ब्रह्म'। प्रकरण का उपसंहार प्रस्तुत किया जाता है—"तदेवं वाक्योपक्रमे सुखविशिष्टं ब्रह्म"।
यह जो कहा गया कि अग्निवक्तृक वाक्य के द्वारा आचार्यवक्तृक वाक्य का नियमन क्योंकर होगा? उसका समाधान है—"आचार्यस्तु ते गतिं वक्तेति च गतिमात्राभिधानम्"। यद्यपि उक्त दोनों वाक्य भिन्नवक्तृक हैं, तथापि पूर्व वक्ता (अग्नियों) ने उन दोनों वाक्यों