भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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पृष्ठ 309

अक्षिपुरुषस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २९१

भवेदेषाऽनवक्लृप्तिः, यद्येतदेकमेवैकं स्थानमस्य निर्दिष्टं भवेत्। सन्ति ह्यन्यान्यपि पृथिव्यादीनि स्थानान्यस्य निर्दिष्टानि—'यः पृथिव्यां तिष्ठन्' (बृ० ३।७।३) इत्यादिना। तेषु हि चक्षुरपि निर्दिष्टम् —'यश्चक्षुषि तिष्ठन्' इति। 'स्थानादिव्यपदेशात्' इत्यादिग्रहणेनैतद्दर्शयति—न केवलं स्थानमेवैकमनुचितं ब्रह्मणो निर्दिश्यमानं दृश्यते, किं तर्हि ? नामरूपमित्येवंजातीयकमप्यनामरूपस्य ब्रह्मणोऽनुचितं निर्दिश्यमानं दृश्यते—'तस्योदिति नाम', 'हिरण्मयश्मश्रुः' (छा० १।६।७,६) इत्यादि। निर्गुणमपि सद् ब्रह्म नामरूपगतैर्गुणैः सगुणमुपासनार्थं तत्र तत्रोपदिश्यत इत्येतदप्युक्तमेव। सर्वगतस्यापि ब्रह्मण उपलब्ध्यर्थं स्थानविशेषो न विरुध्यते, शालग्राम इव विष्णोरित्येतदप्युक्तमेव ॥ १४ ॥

सुखविशिष्टाभिधानादेव च ॥ १५ ॥

अपि च नैवात्र विवदितव्यं—किं ब्रह्मास्मिन्वाक्येऽभिधीयते न वेति ? सुखविशिष्टाभिधानादेव ब्रह्मत्वं सिद्धम्। सुखविशिष्टं हि ब्रह्म यद्वाक्योपक्रमे प्रक्रान्तं

भामती

यादसामब्धिः। तत्कथमत्यल्पं चक्षुरधिष्ठानं परमात्मनः परममहत इति शङ्कार्थः। परिहरति ॐ अत्रोच्यते इति ॐ। स्थानान्यादयो येषां ते स्थानादयो नामरूपप्रकारास्तेषां व्यपदेशात् सर्वगतस्यैकस्थाननियमो नावकल्पते, न तु नानास्थानत्वं नभस इव नानासूचीपाशादिस्थानत्वम्। विशेषतस्तु ब्रह्मणस्तानि तान्युपासनास्थानानीति तैरस्य युक्तो व्यपदेशः ॥ १४ ॥

अपि च प्रकृतानुसारादपि ब्रह्मैवात्र प्रत्येत्तव्यं, न तु प्रतिबिम्बजीवदेवता इत्याह सूत्रकारः— ॐ सुखविशिष्टाभिधानादेव च ॐ। एवं खलूपाख्यायते — उपकोसलो ह वै कामलायनः सत्यकामे जाबाले ब्रह्मचर्यमुवास, तस्याचार्यस्य द्वादश वर्षाण्यग्नीनुपचचार, स चाचार्योऽन्यान्यं ब्रह्मचारिणः स्वाध्यायं ग्राहयित्वा समावर्त्तयामास, तमेवैकमुपकोसलं न समावर्त्तयति स्म, जायया च तत्समावर्त्तनायार्थितोऽपि तद्वचनमवधीर्याचार्यः प्रोषितवान्।

भामती-व्याख्या

पुनराकाशवत् सर्वगतस्य ब्रह्मणोऽक्ष्यल्पं स्थानमुपपद्यते ?” ब्रह्मरूप स्थानी पदार्थ का स्थान वैसे ही महान् होता है, जैसे जल-जन्तुओं का समुद्र, तब उस महान् ब्रह्म का अक्षि-जैसा स्वल्प स्थान क्योंकर बन सकता है—यह शङ्का का अर्थ है। उस शङ्का का परिहार है—'अत्रोच्यते'। सूत्र-घटक 'स्थानादि' शब्द का समास है—'स्थानानि आदयो येषां ते स्थानादयः'। इस प्रकार नामरूपादि समस्त प्रपञ्च जिसका निवास-स्थान है, ऐसा सर्वगत परमेश्वर किसी एक स्थान पर नियन्त्रित क्योंकर हो सकेगा ? उक्त शङ्का के परिहार सूत्र का भाव यह है कि जैसे व्यापक आकाश का सूची-पाश (सुई के छेद) के समान स्वल्प स्थान निर्दिष्ट होता है, वैसे ही व्यापक ब्रह्म का अक्षि, दहरादि स्वल्प स्थान में निर्देश उपासना के लिए हो जाना अनुचित नहीं ॥ १४ ॥

प्रकरण के अनुसार भी अक्षिपुरुष के रूप में ब्रह्म ही निर्दिष्ट है, प्रतिबिम्ब, जीव और देवता नहीं—ऐसा सूत्रकार कहता है—'सुखविशिष्टाभिधानादेव च।' ऐसी उपाख्या (कथा) प्रसिद्ध है कि कमल के उपकोसलनामक पुत्र ने आचार्य सत्यकाम जाबालि की शरण में बारह वर्ष-पर्यन्त ब्रह्मचर्य व्रत का पालन किया, आचार्य की अग्नियों की सेवा की। आचार्य ने अन्य बहुत-से अन्तेवासियों को वेद-वेदाङ्ग पढ़ाकर उनका समावर्त्तन (गुरु-कुल से अवकाश) संस्कार कर दिया, किन्तु एक उपकोसल का समावर्त्तन नहीं किया। गुरु-पत्नी के अनुरोध करने पर भी आचार्य ने उसका समावर्त्तन नहीं किया। तब अत्यन्त खिन्नमनस्क उपकोसल

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