भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
अक्षिपुरुषस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २९१
भवेदेषाऽनवक्लृप्तिः, यद्येतदेकमेवैकं स्थानमस्य निर्दिष्टं भवेत्। सन्ति ह्यन्यान्यपि पृथिव्यादीनि स्थानान्यस्य निर्दिष्टानि—'यः पृथिव्यां तिष्ठन्' (बृ० ३।७।३) इत्यादिना। तेषु हि चक्षुरपि निर्दिष्टम् —'यश्चक्षुषि तिष्ठन्' इति। 'स्थानादिव्यपदेशात्' इत्यादिग्रहणेनैतद्दर्शयति—न केवलं स्थानमेवैकमनुचितं ब्रह्मणो निर्दिश्यमानं दृश्यते, किं तर्हि ? नामरूपमित्येवंजातीयकमप्यनामरूपस्य ब्रह्मणोऽनुचितं निर्दिश्यमानं दृश्यते—'तस्योदिति नाम', 'हिरण्मयश्मश्रुः' (छा० १।६।७,६) इत्यादि। निर्गुणमपि सद् ब्रह्म नामरूपगतैर्गुणैः सगुणमुपासनार्थं तत्र तत्रोपदिश्यत इत्येतदप्युक्तमेव। सर्वगतस्यापि ब्रह्मण उपलब्ध्यर्थं स्थानविशेषो न विरुध्यते, शालग्राम इव विष्णोरित्येतदप्युक्तमेव ॥ १४ ॥
सुखविशिष्टाभिधानादेव च ॥ १५ ॥
अपि च नैवात्र विवदितव्यं—किं ब्रह्मास्मिन्वाक्येऽभिधीयते न वेति ? सुखविशिष्टाभिधानादेव ब्रह्मत्वं सिद्धम्। सुखविशिष्टं हि ब्रह्म यद्वाक्योपक्रमे प्रक्रान्तं
भामती
यादसामब्धिः। तत्कथमत्यल्पं चक्षुरधिष्ठानं परमात्मनः परममहत इति शङ्कार्थः। परिहरति ॐ अत्रोच्यते इति ॐ। स्थानान्यादयो येषां ते स्थानादयो नामरूपप्रकारास्तेषां व्यपदेशात् सर्वगतस्यैकस्थाननियमो नावकल्पते, न तु नानास्थानत्वं नभस इव नानासूचीपाशादिस्थानत्वम्। विशेषतस्तु ब्रह्मणस्तानि तान्युपासनास्थानानीति तैरस्य युक्तो व्यपदेशः ॥ १४ ॥
अपि च प्रकृतानुसारादपि ब्रह्मैवात्र प्रत्येत्तव्यं, न तु प्रतिबिम्बजीवदेवता इत्याह सूत्रकारः— ॐ सुखविशिष्टाभिधानादेव च ॐ। एवं खलूपाख्यायते — उपकोसलो ह वै कामलायनः सत्यकामे जाबाले ब्रह्मचर्यमुवास, तस्याचार्यस्य द्वादश वर्षाण्यग्नीनुपचचार, स चाचार्योऽन्यान्यं ब्रह्मचारिणः स्वाध्यायं ग्राहयित्वा समावर्त्तयामास, तमेवैकमुपकोसलं न समावर्त्तयति स्म, जायया च तत्समावर्त्तनायार्थितोऽपि तद्वचनमवधीर्याचार्यः प्रोषितवान्।
भामती-व्याख्या
पुनराकाशवत् सर्वगतस्य ब्रह्मणोऽक्ष्यल्पं स्थानमुपपद्यते ?” ब्रह्मरूप स्थानी पदार्थ का स्थान वैसे ही महान् होता है, जैसे जल-जन्तुओं का समुद्र, तब उस महान् ब्रह्म का अक्षि-जैसा स्वल्प स्थान क्योंकर बन सकता है—यह शङ्का का अर्थ है। उस शङ्का का परिहार है—'अत्रोच्यते'। सूत्र-घटक 'स्थानादि' शब्द का समास है—'स्थानानि आदयो येषां ते स्थानादयः'। इस प्रकार नामरूपादि समस्त प्रपञ्च जिसका निवास-स्थान है, ऐसा सर्वगत परमेश्वर किसी एक स्थान पर नियन्त्रित क्योंकर हो सकेगा ? उक्त शङ्का के परिहार सूत्र का भाव यह है कि जैसे व्यापक आकाश का सूची-पाश (सुई के छेद) के समान स्वल्प स्थान निर्दिष्ट होता है, वैसे ही व्यापक ब्रह्म का अक्षि, दहरादि स्वल्प स्थान में निर्देश उपासना के लिए हो जाना अनुचित नहीं ॥ १४ ॥
प्रकरण के अनुसार भी अक्षिपुरुष के रूप में ब्रह्म ही निर्दिष्ट है, प्रतिबिम्ब, जीव और देवता नहीं—ऐसा सूत्रकार कहता है—'सुखविशिष्टाभिधानादेव च।' ऐसी उपाख्या (कथा) प्रसिद्ध है कि कमल के उपकोसलनामक पुत्र ने आचार्य सत्यकाम जाबालि की शरण में बारह वर्ष-पर्यन्त ब्रह्मचर्य व्रत का पालन किया, आचार्य की अग्नियों की सेवा की। आचार्य ने अन्य बहुत-से अन्तेवासियों को वेद-वेदाङ्ग पढ़ाकर उनका समावर्त्तन (गुरु-कुल से अवकाश) संस्कार कर दिया, किन्तु एक उपकोसल का समावर्त्तन नहीं किया। गुरु-पत्नी के अनुरोध करने पर भी आचार्य ने उसका समावर्त्तन नहीं किया। तब अत्यन्त खिन्नमनस्क उपकोसल
२९२ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. २ सू. १५
'प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्म' इति, तदेवेहाभिहितं, प्रकृतपरिग्रहस्य न्याय्यत्वात् । 'आचार्यस्तु ते गतिं वक्ता' (छा० ४।१४।१) इति च गतिमात्राभिधानप्रतिज्ञानात् । कथं पुनर्वाक्योपक्रमे सुखविशिष्टं ब्रह्म विज्ञायत इति ? उच्यते—'प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्म' इत्येतदग्नीनां वचनं श्रुत्वोपकोसल उवाच —'विजानाम्यहं यत्प्राणो ब्रह्म, कं च खं च तु न विजानामि' इति । तत्रेदं प्रतिवचनम् —'यद्वाव कं तदेव खं यदेव खं तदेव कम्' (छा० ४।१०।५) इति । तत्र खंशब्दो भूताकाशे निरूढो लोके । यदि तस्य विशेषणत्वेन कंशब्दः सुखवाची नोपादीयेत, तथा सति केवले भूताकाशे ब्रह्मशब्दो नामादिष्विव प्रतीकाभिप्रायेण प्रयुक्त इति प्रतीतिः स्यात् । तथा कंशब्दस्य विषयेन्द्रि-
भामती
ततोऽतिदूनमानसमग्निपरिचरणकुशलमुपेत्य त्रयोऽग्नयः करुणापराधीनचेतसः श्रद्धानायाऽस्मै दृढभक्तये समेत्य ब्रह्मविद्यामूचिरे—प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्मेति । अथोपकोसल उवाच—विजानाम्यहं प्राणो ब्रह्मेति, स हि सूत्रात्मा विभूतिमत्तया ब्रह्मरूपाविर्भावाद् ब्रह्मेति, किन्तु कं च खं च ब्रह्मेत्येतन्न विजानामि, नहि विषयेन्द्रियसम्पर्कजं सुखमनित्यं लोकसिद्धं खं च भूताकाशमचेतनं ब्रह्म भवितुमर्हति । अथैनमग्नयः प्रत्यूचुः—यद्वाव कं तदेव खं यदेव खं तदेव कमिति । एवं संभूयोक्त्वा प्रत्येकं च स्वविषयां विद्यामूचुः – पृथिव्यग्निरन्नमादित्य इत्यादिना । पुनस्त एनं संभूयोचुः – एषा सोम्य तेऽस्मद्विद्या प्रत्येकममुक्ता स्वविषया विद्या, आत्मविद्या चास्माभिः संभूय पूर्वमुक्ता – प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्मेति, आचार्यस्तु ते गतिं वक्ता । ब्रह्मविद्येयमुक्तास्माभिर्गतिमात्रं त्ववशिष्टं नोक्तम् , तत्तु विद्याफलप्राप्तये जावालस्तवाचार्यो वक्ष्यतीत्युक्तवाऽग्नय उपरेमिरे । एवं व्यवस्थिते यद्वाव कं तदेव खं यदेव खं तदेव कमित्येतद् व्याचष्टे भाष्यकारः ॐ तत्र खंशब्दः इति ॐ । ॐ प्रतीकाभिप्रायेण इति ॐ । आश्रयान्तरप्रत्ययस्याश्रयान्तरे क्षेपः
भामती-व्याख्या
को गार्हपत्य, दक्षिणा और आहवनीय नाम की) तीनों अग्नियों ने मिलकर करुणार्द्र मन से उस अपने परम श्रद्धालु भक्त उपकोसल को ब्रह्मविद्या का उपदेश किया —“प्राणो ब्रह्म, कं ब्रह्म, खं ब्रह्म” । उपकोसल ने कहा- मैं 'प्राणो ब्रह्म'--यह जानता हूं, क्योंकि प्राणरूप सूत्रात्मा हिरण्यगर्भ) बृहद् विभूतियों से सम्पन्न होने के कारण ब्रह्म कहा जाता है, किन्तु “कं च खं च ब्रह्म”—यह समझ में नहीं आता, क्योंकि विषय और इन्द्रियों के सम्बन्ध से जनित लौकिक अनित्य सुख और लोक-प्रसिद्ध अवकाशात्मक आकाश कभी ब्रह्म नहीं हो सकते । तब उस ब्रह्मचारी को अग्नियों ने मिलकर कहा - "यद्वाव कं तदेव खं यदेव खं तदेव कम् ।” इस प्रकार का सामूहिक उपदेश देने के अनन्तर तीनों [ गार्हपत्य, अन्वाहार्यपचन (दक्षिणाग्नि) और आहवनीय ] अग्नियों ने क्रमशः पृथक्-पृथक् शिक्षा दी - "पृथिव्यग्निरन्नमादित्यः”—इत्यादि । पुनः तीनों ने मिलकर उपदेश किया- "एषा सोम्य तेऽस्मद्विद्या” अर्थात् यह हमारी अपनी विद्या है और आत्मविद्या का तो हम तीनों ने मिलकर उपदेश किया था —“प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्म आचार्यस्तु ते गतिं वक्ता ।” अर्थात् हम लोगों ने केवल आत्मविद्या कह दी है, गति (मार्ग) मात्र अवशिष्ट है, वह विद्या-फल की प्राप्ति के लिए आचार्य जाबाल कहेंगे । इतना कहकर अग्नियां उपरत हो गईं । "यदेव कं तदेव खं यदेव खं तदेव कम्” - इसकी व्याख्या भाष्यकार कर रहे हैं— “तत्र खं शब्दो भूताकाशे निरूढः” । भाष्यकार ने जो कहा है— “ब्रह्मशब्दो नामादिष्विव प्रतीकाभिप्रायेण प्रयुक्तः” । वहाँ प्रतीक का अर्थ है— 'अन्यविषयक प्रतीति का अन्यत्र क्षेपण (आरोपण ), जैसे 'ब्रह्म' शब्द, परमात्मा का वाचक है, किन्तु उसका नामादि में प्रयोग (अर्थात् इसको ही ब्रह्म समझना चाहिए जो कि नामादि है) । उसी प्रकार जो भूताकाश है, उसे ही ब्रह्म समझना । यह सिद्धान्ततः
अक्षिपुरुषस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २९३
यत्संपर्कजनिते सामये सुखे प्रसिद्धत्वात्, यदि तस्य खंशब्दो विशेषणत्वेन नोपादीयेत, लौकिकं सुखं ब्रह्मेति प्रतीतिः स्यात्। इतरेतरविशेषितौ तु कंखंशब्दौ सुखात्मकं ब्रह्म गमयतः। तत्र द्वितीये ब्रह्मशब्देऽनुपादीयमाने कं खं ब्रह्मेत्येवोच्यमाने कंशब्दस्य विशेषणत्वैनैवोपयुक्तत्वात्सुखस्य गुणस्याध्येयत्वं स्यात्, तन्मा भूदित्युभयोः कंखंशब्दयोर्ब्रह्मशब्दशिरस्त्वं 'कं ब्रह्म खं ब्रह्म' इति। इष्टं हि सुखस्यापि गुणस्य गुणवद्ध्येयत्वम्। तदेवं वाक्योपक्रमे सुखविशिष्टं ब्रह्मोपदिष्टम्। प्रत्येकं च गार्हपत्यादयोऽग्नयः स्वं स्वं महिमानमुपदिश्य 'एषा सोम्य तेऽस्मद्विद्यात्मविद्या च' इत्युपसंहरन्तः पूर्वत्र ब्रह्म निर्दिष्टमिति ज्ञापयन्ति। 'आचार्यस्तु ते गतिं वक्ता' इति च गतिमात्राभिधानप्रतिज्ञानमर्थान्तरविवक्षां वारयति। 'यथा पुष्करपलाश आपो न
भामती
प्रतीकः, यथा ब्रह्मशब्दः परमात्मविषयो नामादिषु क्षिप्यते—इदमेव तद् ब्रह्म ज्ञेयं यन्नामेति। तथेदमेव तद् ब्रह्म यद् भूताकाशमिति प्रतीतिः स्यात्। न चैतत्प्रतीकत्वमिष्टम्। लौकिकस्य सुखस्य साधनपारतन्त्र्यं क्षयिष्णुता चामयस्तेन सह वर्तत इति सामयं सुखम्। तदेवं व्यतिरेके दोषमुक्त्वोभयान्वये गुणमाह ॐ इतरेतरविशेषितौ तु इति ॐ। तदर्थयोर्विशेषितत्वाच्छब्दावपि विशेषितावुच्येते। सुखशब्दसमानाधिकरणो हि खंशब्दो भूताकाशमर्थं परित्यज्य ब्रह्मणि गुणयोगेन वर्तते। तादृशा च खेन सुखं विशिष्यमाणं सामयाद्व्यावृत्तं निरामयं भवति। तस्मादुपपन्नमुभयोपादानम्। ब्रह्मशब्दाभ्यासस्य प्रयोजनमाह ॐ तत्र-द्वितीये इति ॐ। ब्रह्मपदं कंपदस्योपरि प्रयुज्यमानं शिरः, एवं खंपदस्यापि ब्रह्मपदं शिरो ययोः कंखंपदयोस्ते ब्रह्मशिरसी, तयोर्भावो ब्रह्मशिरस्त्वम्। अस्तु प्रस्तुते किमायातमित्यत आह ॐ तदेवं वाक्योपक्रम इति ॐ। नन्वग्निभिः पूर्वं निर्दिश्यतां ब्रह्म, य एषोऽक्षणीत्याचार्यवाक्येऽपि तदेवानुवर्त्तनीयमिति तु कुत इत्याह ॐ आचार्यस्तु ते गतिं वक्तेति च गतिमात्राभिधानम् इति ॐ। यद्यप्येते भिन्नवक्तृणी
भामती-व्याख्या
अभीष्ट नहीं, क्योंकि लौकिक सुख सामय है, लौकिक सुख की परतन्त्रता और नश्वरता ही यहाँ 'आमय' शब्द का अर्थ है, उससे युक्त होने के कारण वैषयिक सुख को सामय कहा जाता है। कं और ख दोनों के व्यतिरिक्त (भिन्न-भिन्न) अर्थों में दोषाभिधान करने के अनन्तर दोनों के अभिन्नाकार में गुण का कथन किया जाता है—"इतरेतरविशेषितौ तु"। कं और खं इन दोनों शब्दों के अर्थों में विशेष्य-विशेषणभाव होने पर भी शब्दों में उसका व्यवहार किया जाता है। 'सुख' शब्द का सामानाधिकरण ('सुखं खं'—इस प्रकार समाभिव्याहृत होकर) 'खं' शब्द अपने भूताकाशरूप अर्थ को छोड़ कर गौणी वृत्ति के द्वारा ब्रह्म का बोधक होता है। उसी प्रकार 'खं' शब्द से समभिव्याहृत होकर 'सुख' शब्द लोक-प्रसिद्ध सामय सुखरूप अर्थ का परित्याग करके ब्रह्मरूप निरामय सुख का गमक होता है। अतः कं और खं दोनों पदों का ग्रहण सार्थक है। 'ब्रह्म' शब्द के अभ्यास (बार-बार कथन) का प्रयोजन कहते हैं—"तत्र द्वितीये ब्रह्मशब्देऽनुपादीयमाने"। "कंखंशब्दयोर्ब्रह्मशिरस्त्वम्"—यहाँ 'कं' शब्द के उत्तर प्रयुज्यमान 'ब्रह्म' शब्द को शिरस्, एवं खं शब्द के उत्तर प्रयुज्यमान 'ब्रह्म' शब्द शिरस् है। जिन कं और खं—दोनों पदों के उत्तर 'ब्रह्म' पद का प्रयोग होता है, वे दोनों पद ब्रह्मशिरस्क कहे जाते हैं—'कं ब्रह्म, खं ब्रह्म'। प्रकरण का उपसंहार प्रस्तुत किया जाता है—"तदेवं वाक्योपक्रमे सुखविशिष्टं ब्रह्म"।
यह जो कहा गया कि अग्निवक्तृक वाक्य के द्वारा आचार्यवक्तृक वाक्य का नियमन क्योंकर होगा? उसका समाधान है—"आचार्यस्तु ते गतिं वक्तेति च गतिमात्राभिधानम्"। यद्यपि उक्त दोनों वाक्य भिन्नवक्तृक हैं, तथापि पूर्व वक्ता (अग्नियों) ने उन दोनों वाक्यों
२९४ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ १ पा. २ सू. १५
श्लिष्यन्त एवमेवंविदि पापं कर्म न श्लिष्यते' (छा० ४।१४।३) इति चाक्षिस्थानं पुरुषं विजानतः पापेनानुपघातं ब्रुवन्नक्षिस्थानस्य पुरुषस्य ब्रह्मत्वं दर्शयति । तस्मात् प्रकृतस्यैव ब्रह्मणोऽक्षिस्थानतां संयद्वामत्वादिगुणतां चोक्त्वाऽर्चिरादिकां तद्विदो गतिं वक्ष्यामीत्युपक्रमते - 'य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यत एष आत्मेति होवाच' (छा० ४।१५।१) इति ॥ १५ ॥
भामती
वाक्ये, तथापि पूर्वेण वक्त्रा एकवाक्यतां गमिते गतिमात्राभिधानात् । किमुक्तं भवति—तुभ्यं ब्रह्मविद्याऽस्माभिरुपदिष्टा, तद्विदस्तु गतिर्नोक्ता, तां च किञ्चिदधिकमाध्येयं पूरयित्वाऽऽचार्यो वक्ष्यतीति । तदनेन पूर्वसंबद्धार्थान्तरविवक्षा वारितेति । अथैवमग्निभिरुपदिष्टे प्रोषित आचार्यः कालेनाजगाम, आगतश्च वीक्ष्योपकोशलमुवाच, ब्रह्मविद इव ते सोम्य मुखं प्रसन्नं भाति, कोऽनु त्वामनुशशासेति, उपकोशलस्तु ह्रीणो भीतश्च को नु मामनुशिष्याद् भगवन् ! प्रोषिते त्वयीत्यापाततोऽपह्नाय निर्बध्यमानो यथावदग्नीनामनुशासनमवोचत् । तदुनश्रुत्य चाचार्यः सुचिरं क्लिष्ट उपकोशले समुपजातदयार्द्रहृदयः प्रत्युवाच—सोम्य किल तुभ्यमग्नयो न ब्रह्म साकल्येनाबोचन्, तबहं तुभ्यं साकल्येन वक्ष्यामि, यदनुभव-माहात्म्याद्यथा पुष्करपलाश आपो न श्लिष्यन्त एवमेवंविदि पापं कर्म न श्लिष्यत इति। एवमुक्तवत्याचार्य आहोपकोशलः—ब्रवीतु मे भगवानिति। तस्मै होवाचाचार्योऽर्चिरादिकां गतिं वक्तुमनाः, यदुक्तमग्निभिः प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्मेति तत्पूरणाय एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यते इत्यादि। एतदुक्तं भवति—आचार्येण ये यत् सुखं ब्रह्माक्षिस्थानं संयद्वामं वामनी भामनीत्येवंगुणकं प्राणसहितमुपासते, ते सर्वेऽपहतपाप्मानोऽन्यत्कर्म कुर्वन्तु मा वाकार्षुः, अर्चिषमर्चिरभिमानिनीं देवतामभिसम्भवन्ति प्रतिपद्यन्ते, अर्चिषोऽहरहर्देवताम्
भामती-व्याख्या
की एकवाक्यता स्थापित कर दी है। भाव यह है कि अग्नियों का कहना है कि हमने ब्रह्मविद्या का उपदेश कर दिया है, ब्रह्म-विद्या-सम्पन्न पुरुष की गति नहीं कही है, उसको कुछ परिवर्द्धनों के साथ आचार्य कहेंगे। इससे यह नितान्त स्पष्ट हो जाता है कि आचार्य पूर्व-प्रसक्त पदार्थ से भिन्न अर्थ की विवक्षा नहीं कर सकता। इस प्रकार तीनों अग्नियों का उपदेश पूरा हुआ था कि देशान्तर गये आचार्य जाबालि समय पर आ गए। उपकोसल को देख कर बोले—'हे सोम्य ! ब्रह्मवेत्ता के समान तुम्हारा मुख प्रसन्न हो रहा है, किसने तुम्हें ब्रह्मविद्या का पावन उपदेश किया ? उपकोसल कुछ लज्जित कुछ डरा-सा बोला—'कौन मुझे उपदेश देता, भगवन् आपके देशान्तर चले जाने पर ? इस प्रकार आपाततः अपलाप करने पर आचार्य ने पूछा—'क्या इन अग्नियों ने उपदेश किया ? आचार्य के प्रश्नों का बौछार ने उसे सत्य-सत्य कह देने के लिए बाध्य कर दिया। अग्नियों ने जैसे उपदेश दिया, वह सब उपकोसल ने कह सुनाया। वह सब सुन एवं उपकोसल के चिर ब्रह्मचर्य-पालन-जनित क्लेश पर दयार्द्र होकर आचार्य ने उपकोसल को कहा—'सोम्य ! अग्नियों ने तुम्हें ब्रह्म का पूर्णतया उपदेश नहीं दिया, अतः में तुम्हें पूर्ण ब्रह्मविद्या का उपदेश देता हूं, पहले ब्रह्मविद्या का माहात्म्य सुनो—जैसे कमल-पत्र को जल प्रभावित ( गीला ) नहीं कर सकता, वैसे ही ब्रह्मवेत्ता पुरुष को पाप कर्म दूषित नहीं कर सकता। आचार्य के वैसा कहने पर उपकोसल ने कहा—भगवन् ! वह लोकोत्तर उपदेश आप मुझे देने की कृपा करें। आचार्य ने उपकोसल को अर्चिरादि का मार्ग बताने की इच्छा से अग्नियों द्वारा प्रदत्त "प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्म'—इस उपदेश का पूरक उपदेश दिया—"यह एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यते एष आत्मेति" इत्यादि सारांश यह है कि आचार्य ने कहा कि जो लोग अक्षिस्थित्व, वामनीत्व, भामनीत्वादि गुणों से युक्त ब्रह्मरूप सुख की प्राणों के साथ उपासना करते हैं, वे अन्य कर्म करें या न करें
अक्षिपुरुषस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २९५
श्रुतोपनिषत्कगत्यभिधानञ्च ॥ १५ ॥
इतश्चाक्षिस्थानः पुरुषः परमेश्वरः, यस्माच्छ्रुतोपनिषत्कस्य श्रुतरहस्यविज्ञानस्य ब्रह्मविदो या गतिर्देवयानाख्या प्रसिद्धा श्रुतौ—'अथोत्तरेण तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्ययाऽऽत्मानमन्विष्यादित्यमभिजायन्ते । एतद्वै प्राणानामायतनमेतदमृतमभयमेतत्परायणमेतस्मान्न पुनरावर्तन्ते' (प्रश्न० १।१०) इति । स्मृतावपि—'अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् । तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः' (गी०
भामती
अह्नः आपूर्यमाणपक्षम्, शुक्लपक्षदेवताम्, ततः षण्मासान् येषु मासेषूत्तरां दिशमेति सविता, ते षण्मासा उत्तरायणं, तद्देवतां प्रतिपद्यन्ते, तेभ्यो मासेभ्यः संवत्सरदेवताम्, तत आदित्यम्, आदित्याच्चन्द्रमसं चन्द्रमसो विद्युतं, तत्र स्थितानेतान् पुरुषः कश्चिद् ब्रह्मलोकादवतीर्यामानवोऽमानव्यां सृष्टौ भवो ब्रह्मलोकभव इति यावत्, स तादृशः पुरुष एतान् सत्यलोकस्थं कार्यं ब्रह्म गमयति । स एव देवपथो देवैरर्चिरादिभिर्नैतृभिरुपलक्षित इति देवपथः, स एव ब्रह्मणा गन्तव्येनोपलक्षित इति ब्रह्मपथः, एतेन पथा प्रतिपद्यमानाः सत्यलोकस्थं ब्रह्म इमं मानवं मनोः सर्गं किं भूतमावर्तं जन्मजरामरणपौनःपुन्यमावृत्तिस्तत्कर्त्ताऽऽवर्तो मानवो लोकस्तं नावर्तन्ते । तथा च स्मृतिः—
'ब्रह्मणा सह ते सर्वे सम्प्राप्ते प्रतिसञ्चरे ।
परस्यान्ते कृतात्मानः प्रविशन्ति परं पदम् ॥'
तदेनेनोपाख्यानव्याख्यानेन "श्रुतोपनिषत्कगत्यभिधानाच्च"—
भामती-व्याख्या
अर्चिरादि मार्ग के अभिमानी अहरादि देवता को प्राप्त करते हैं, उसके द्वारा अहर्गणात्मक शुक्ल पक्ष के अभिमानी उसके अनन्तर उत्तरायण के जिन छः मासों में सूर्य उत्तर दिशा में आता है, उनके अभिमानी देवता को, तदनन्तर संवत्सर-देवता, अदनन्तर आदित्य, को प्राप्त कर आदित्य से चन्द्रमा, चन्द्रमा से विद्युल्लोक में अवस्थित होते हैं। वहाँ कोई अमानव (ब्रह्म-लोकोद्भूत) पुरुष ब्रह्मलोक से अवतीर्ण होकर इन उपासकों को सत्यलोक में अवस्थित कार्य ब्रह्म (हिरण्यगर्भ) के पास ले जाता है। यह वह देव-पथ कहलाता है, जो कि अर्चिरादि देवगणों से उपलक्षित है। इसे ही ब्रह्म-पथ भी कहा जाता है, क्योंकि उपासको के द्वारा गन्तव्य ब्रह्म से अभिलक्षित होता है। सत्य लोकस्थ ब्रह्म को प्राप्त जीव पुनः "इमं मानवमावर्तं नावर्तन्ते"। मनु के द्वारा विरचित यह मनुष्य-लोक मानवलोक है, इसको आवर्त इस लिए कहा जाता है कि इस लोक में जीव के जन्म, जरा, मरण की पुनः पुनः आवृत्ति होती रहती है। ब्रह्मलोकस्थ जीव ब्रह्म के साथ-साथ मुक्त हो जाते हैं, जन्म-मरण के प्रवाह में वे कभी नहीं आते, जैसा कहा है—
ब्रह्मणा सह ते सर्वे संप्राप्ते प्रतिसञ्चरे ।
परस्यान्ते कृतात्मानः प्रविशन्ति परं पदम् ॥ (कूर्मपु० १२।२१६)
प्रतिसंचर का अर्थ है—प्रलय अर्थात् उस ब्रह्मा की आयु पूरी हो जाने पर उस लोक के सभी जीव पर ब्रह्म का साक्षात्कार करके उसमें विलीन हो जाते हैं ॥ १५ ॥
कथित उपाख्यान-व्याख्या के द्वारा ही "श्रुतोपनिषत्कगत्यभिधानाच्च"—इस सूत्र की भी व्याख्या हो जाती है, क्योंकि श्रुत्यन्त-विज्ञान-वेत्ता पुरुष के उद्देश्य से जो कहा गया है—"अथोत्तरेण तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया विद्ययाऽऽत्मानमन्विष्यादित्यमभिजायन्ते, एतद्वै प्राणानामायतनमेतदमृतमभयमेतत्परायणमेतस्मान्न पुनरावर्तन्ते" (प्रश्नो० १।१०)'। [अर्थात् वे उत्तरायण मार्ग से तप, ब्रह्मचर्य, श्रद्धा और विद्या (प्रजापति से अपने तादात्म्यानुचिन्तन) के द्वारा आत्मा
| २१६ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. २ सू. १७ |
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८।२४) इति । सैवेहाक्षिपुरुषविदोऽभिधीयमाना दृश्यते – 'अथ यदु चैवास्मिञ्छव्यं कुर्वन्ति यदि च नार्चिषमेवाभिसंभवन्ति' इत्युपक्रम्य, 'आदित्याच्चन्द्रमसं चन्द्रमसो विद्युतं तत्पुरुषोऽमानवः स एनान्ब्रह्म गमयत्येष देवपथो ब्रह्मपथ एतेन प्रतिपद्यमाना इमं मानवमावर्तं नावर्तन्ते (छा० ४।१५।५) इति । तदिह ब्रह्मविद्विषयया प्रसिद्धया गत्याऽक्षिस्थानस्य ब्रह्मत्वं निश्चीयते ॥ १६ ॥
अनवस्थितेरसम्भवाच्च नेतरः ॥ १७ ॥
यत्पुनरुक्तं छायात्मा, विज्ञानात्मा, देवतात्मा वा स्यादक्षिस्थान इति । अत्रोच्यते—न छायात्मादितिरिह ग्रहणमर्हति । कस्मात् ? अनवस्थितेः । न तावच्छायात्मनश्चक्षुषि नित्यमवस्थानं सम्भवति । यदैव हि कश्चित्पुरुषश्चक्षुरासीदति तदा चक्षुषि पुरुषच्छाया दृश्यते, अपगते तस्मिन्न दृश्यते । 'य एषोऽक्षिणि पुरुषः' इति च श्रुतिः सन्निधानात् स्वचक्षुषि दृश्यमानं पुरुषमुपास्यत्वेनोपदिशति । न चोपासनाकाले छायाकारं कश्चित्पुरुषं चक्षुःसमीपे सन्निधाप्योपास्त इति युक्तं कल्पयितुम् । 'अस्यैव शरीरस्य नाशमन्वेष नश्यति' (छा० ८।९।१) इति श्रुतिश्छायात्मनोऽप्यनवस्थितत्वं दर्शयति । असम्भवश्च तस्मिन्नमृतत्वादीनां गुणानां न छायात्मनि प्रतीतिः । तथा विज्ञानात्मनोऽपि साधारणे कृत्स्नशरीरेन्द्रियसम्बन्धे सति चक्षुष्येवावस्थितत्वं वक्तुं न शक्यम् । ब्रह्मणस्तु व्यापिनोऽपि दृष्ट उपलब्धयर्थो हृदयादिविशेषसम्बन्धः । समानश्च विज्ञानात्मन्यप्यमृतत्वादीनां गुणानामसम्बन्धः । यद्यपि विज्ञानात्मा परमात्मनोऽनन्य एव, तथाप्यविद्याकामकर्मकृतं तस्मिन्मर्त्यत्वमध्यारोपितं भयं चेत्यमृतत्वाभयत्वे नोपपद्येते । संयद्वामत्वादयश्चैतस्मिन्नैश्वर्यादनुपपन्ना एव । देवतात्मनस्तु 'रश्मिभिरेषोऽस्मिन्प्रतिष्ठितः' इति श्रुतेर्यद्यपि चक्षुष्यवस्थानं स्यात्तथाप्यात्मत्वं तावन्न सम्भवति, पराग्रूपत्वात् । अमृतत्वादयोऽपि न सम्भवन्ति, उत्पत्तिप्रलयश्रवणात् । अमरत्वमपि देवानां चिरकाला play/अवस्थानापेक्षम् । ऐश्वर्यमपि परमेश्वरायत्तं न स्वाभाविकम्, 'भीषाऽस्माद्वातः पवते भीषोदेति सूर्यः । भीषाऽस्मादग्निश्चेन्द्रश्च
भामती
इत्यपि सूत्रं व्याख्यातम् ॥ १६ ॥
य एषोऽक्षिणीति नित्यवत् श्रुतम नित्ये छायापुरुषे नावकल्पते । कल्पनागौरवं चास्मिन् पक्षे प्रसज्यत इत्याह ॐ न चोपासनाकाल इति ॐ । ॐ तथा विज्ञानात्मनोऽपि इति ॐ । विज्ञानात्मनो हि न प्रदेशे उपासनाऽन्यत्र दृष्टचरी, ब्रह्मणस्तु तत्र श्रुतपूर्वत्यर्थः । ॐ भीषा ॐ भिया । ॐ अस्मात् ॐ ब्रह्मणः । शेषमति-
भामती-व्याख्या
का अन्वेषण कर आदित्य-लोक को जीत लेते ( प्राप्त करते ) हैं । यह ( आदित्यरूप ब्रह्म) हिरण्यगर्भ ही प्राणों का आयतन ( आश्रय ), अमृत, अभय और परागति है, इसको प्राप्त कर जीव पुनः मनुष्यलोक को नहीं लौटते ]। ब्रह्मवेत्ता की जो गति होती है, वही अक्षिपुरुष के उपासक की भी है, अतः अक्षिपुरुष ब्रह्म ही है ॥ १६ ॥
"य एषोऽक्षिणि पुरुषः"—यह श्रवण ऐसे पुरुष का प्रतीत होता है, जो कि नित्य अक्षि-सन्निहित है, छाया-पुरुष में वैसी नित्यावस्थिति सम्भव नहीं, क्योंकि वह अनवस्थित ( अनित्य ) है । छाया-पुरुषादि की कल्पना में महान् गौरव दिखाते हैं—"न चोपासनाकाले छायाकारं कंञ्चित् पुरुषं चक्षुः समीपे सन्निधाप्योपास्ते इति युक्तं कल्पयितुम्, असम्भवात्" । "तथा विज्ञानात्मनोऽपि"—इस भाष्य का आशय यह है कि विज्ञानात्मा (जीव) की किसी प्रदेश-विशेष में उपासना अन्यत्र नहीं देखी जाती किन्तु ब्रह्म की विविध प्रदेशों में उपासना
अन्तर्यामिणो ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २९७
मृत्युर्धावति पञ्चमः' (तै० २।८) इति मन्त्रवर्णात् । तस्मात्परमेश्वर एवायमक्षिस्यावः प्रत्येतव्यः । अस्मिंश्च पक्षे दृश्यत इति प्रसिद्धवदुपादानं शास्त्रापेक्षं विद्वद्विषयं प्ररोचनार्थमिति व्याख्येयम् ॥ १७ ॥
( ५ अन्तर्याम्यधिकरणम् । सू० १८-२० )
अन्तर्याम्यधिदैवादिषु तद्धर्मव्यपदेशात् ॥ १८ ॥
'य इमं च लोकं परं च लोकं सर्वाणि च भूतानि योऽन्तरो यमयति' इत्युपक्रम्य श्रूयते—'यः पृथिव्यां तिष्ठन्पृथिव्या अन्तरो यं पृथिवी न वेद यस्य पृथिवी शरीरं यः पृथिवीमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृतः' (बृह० ३।७।१, २) इत्यादि । अत्राधि-दैवतमधिलोक मधिवैदमधियज्ञमधिभूतमध्यात्मं च कश्चिदन्तरवस्थितो यमयिताऽन्त-र्यामीति श्रूयते । स किमधिदेवाद्यभिमानी देवतात्मा कश्चित्, किं वा प्राप्ताणिमाद्यै-श्वर्यः कश्चिद्योगी, किंवा परमात्मा, किंवाऽर्थान्तरं किञ्चिदित्यपूर्वसंज्ञादर्शनात्सं-शयः । किं तावन्तः प्रतिभाति ? संज्ञाया अप्रसिद्धत्वात्संज्ञिनाप्यप्रसिद्धेनार्थान्तरेण केनचिद्भवितव्यमिति । अथवा नानिरूपितरूपमर्थान्तरं शक्यमस्तीत्यभ्युपगन्तुम् । अन्तर्यामिशब्दश्चान्तर्यमनयोगेन प्रवृत्तो नात्यन्तमप्रसिद्धः । तस्मात्पृथिव्याद्यभिमानी कश्चिद्देवोऽन्तर्यामी स्यात् । तथा च श्रूयते - 'पृथिव्येव यस्यायतनमग्निर्लोको मनो
भामती
रोहितार्थम् ॥ १७ ॥
स्वकर्मोपार्जितं देहं तेनान्यच्च नियच्छति ।
तक्षादिरशरीरस्तु नात्मान्तर्यामितां भजेत् ॥
भामती-व्याख्या
बहुधा श्रुत है । "भीषास्मात्"—इस श्रुति में 'भीषा' शब्द का अर्थ है—भयेन, 'अस्मात्' पद का अभिप्रेत अर्थ है—ब्रह्मणः । अवशिष्ट भाष्य स्पष्टार्थंक है ॥ १७ ॥
विषय—बृहदारण्यकोपनिषत् में “य इमं च लोकं परं च लोकं सर्वाणि च भूतानि योऽन्तरो यमयति”—ऐसा उपक्रम करके कहा गया है कि “यः पृथिव्यां तिष्ठन् पृथिव्या अन्तरो यं पृथिवी न वेद, यस्य पृथिवी शरीरम्, यः पृथिवीमन्तरो यमयत्येष ते आत्मान्तर्याम्यमृतः” (बृह. उ. ३।७।१, २) । इस श्रुति में ऐसे किसी अन्तर्यामी पुरुष का प्रतिपादन किया गया है, जो देवता, लोक, वेद, यज्ञ, भूत और आत्मा (शरीर) में रह कर उनका नियमन करता है।
संशय—उक्त अन्तर्यामी क्या अधिदेवादि का अभिमानी कोई देवता है ? या अणिमादि [ ( १ ) अणिमा (सूक्ष्म हो जाना), ( २ ) महिमा (महान् हो जाना), ( ३ ) लघिमा (हल्का हो जाना), ( ४ ) गरिमा (गुरु या वजनदार हो जाना), ( ५ ) प्राप्ति (पृथिवी पर बैठे-बैठे चन्द्रादि को छू लेना), ( ६ ) प्राकाम्य (सत्यसङ्कल्पता), ( ७ ) ईशित्व (सर्वभूत-नियमन) और ( ८ ) वशित्व (सर्वभूतों का वशीकरण) ] सिद्धियों से सम्पन्न कोई योगी है ? या परमात्मा ? अथवा कोई अन्य ही पदार्थ है ?
पूर्वपक्ष—
स्वकर्मोपार्जितं देहं तेनान्यच्च नियच्छति ।
तक्षादिरशरीरस्तु नात्मान्तर्यामितां भजेत् ॥
३८
२९८ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. २ सू. १८
ज्योतिः' ( बृ० ३।९।१० ) इत्यादि । स च कार्यकारणवत्त्वात्पृथिव्यादीनन्तस्तिष्ठन्नयम- यतीति युक्तं देवतात्मनो यमयितृत्वम् । योगिनो वा कस्यचित्सिद्धस्य सर्वानुप्रवेशेन
भामती
प्रवृत्तिनियमनलक्षणं हि कार्य्यं चेतनस्य शरीरिणः स्वशरीरेन्द्रियादौ वा शरीरेण वा वाश्यादौ दृष्टं नाशरीरस्य ब्रह्मणो भवितुमर्हति । नहि जातु वटाङ्कुरः कुटजबीजाज्जायते । तदनेन जन्माद्यस्य यत इत्येतदप्याक्षिप्तं वेदितव्यम् । तस्मात्परमात्मनः शरीरेन्द्रियादिरहितस्यान्तर्यामित्वाभावात् प्रधानस्य वा पृथिव्याद्यभिमानवत्या देवताया वाऽणिमाद्यैश्वर्य्ययोगिनो योगिनो वा जीवात्मनो वाऽन्तर्यामिता स्यात् । तत्र यद्यपि प्रधानस्यादृष्टत्वाश्रुतत्वामत्वत्वाविज्ञातत्वानि सन्ति, तथापि तस्याचेतनस्य द्रष्टृत्व- श्रोतृत्वमन्तृत्वविज्ञातृत्वानि श्रुतानामभावाद् अनात्मत्वाच्चैष त आत्मेति श्रुतेरनुपपत्तेर्न प्रधानस्यान्तर्या- मिता । यद्यपि पृथिव्याद्यभिमानिनो देवस्यात्मत्वमस्ति, अदृष्टत्वादयश्च सह द्रष्टृत्वादिभिरुपपद्यन्ते, शरीरे- न्द्रियादियोगश्च, पृथिव्येव यस्यायतनमग्निर्लोको मनोज्योतिरित्यादिश्रुतेः, तथापि तस्य प्रतिनियतनियमनाद् 'यः सर्वान् लोकानन्तरो यमयति यः सर्वाणि भूतान्यन्तरो यमयति' इति श्रुतिविरोधादनुपपत्तेः, योगी तु यद्यपि लोकभूतवशितया सर्वान् लोकान् सर्वाणि च भूतानि नियन्तुमर्हति तत्र तत्रानेकविधदेहेन्द्रियादि- निर्माणेण स एकधा भवति त्रिधा भवतीत्यादिश्रुतिभ्यः, तथापि जगद्व्यापारवर्ज प्रकरणादिति वक्ष्यमाणेण न्यायेन विकारविषये विद्यासिद्धानां व्यापाराभावात्सोऽपि नान्तर्यामी । तस्मात् पारिशेष्याज्जीव एव
भामती-व्याख्या
लोक में देखा जाता है कि तक्षा ( बढ़ई ) आदि चेतनात्मा अपने पूर्व कर्माजित शरीर और उसके द्वारा वास्य ( वसूला ) आदि साधनों का नियमन करता है, क्योंकि प्रवृत्ति और निवृत्ति का नियमन किसी शरीरधारी चेतन का ही कार्य है, शरीर-रहित ब्रह्म का नहीं । असमर्थ या अयोग्य पदार्थ से कोई कार्य नहीं होता, जैसे कि वट वृक्ष का अंकुर कभी कुटज के बीज से नहीं उगता । इस आक्षेप के द्वारा “जन्माद्यस्य यतः”--इत्यादि शास्त्र भी आक्षिप्त ( आहत ) हो जाता है । अतः शरीर, इन्द्रियादि साधनों से रहित परमात्मा ( ब्रह्म ) में नियन्तृत्व सम्भव नहीं । फलतः पृथिव्यादि की अभिमानिनी प्रकृति ( प्रधान ) या अणिमादि ऐश्वर्यशाली योगी अथवा जीवात्मा ही अन्तर्यामी हो सकता है । इनमें से सांख्याभिमत प्रधानतत्त्व में यद्यपि श्रुति-चर्चित अदृष्टत्व, अश्रुतत्व, अमंतत्व और अविज्ञातत्वादि धर्म हैं, तथापि प्रधान तत्त्व जड है, अतः उसमें श्रुति-कथित द्रष्टृत्व, श्रोतृत्व और मन्तृत्वादि धर्मों का अभाव है, एवं प्रधानतत्त्व अनात्मा है, अतः उसमें "एष ते आत्मा" - इस श्रुति का सामञ्जस्य नहीं होता, इस लिए प्रधान तत्त्व में श्रौत अन्तर्यामिता सम्भव नहीं ।
पृथिव्यादि के अभिमानी देवता में यद्यपि आत्मत्व, अदृश्यत्वादि, द्रष्टृत्वादि धर्म हैं और शरीरेन्द्रियादि का सम्बन्ध भी है, क्योंकि श्रुति कहती है - पृथिव्येव यस्यायतनमग्निर्लोको मनो ज्योतिः" ( बृह. उ. ३।९।१० ) । तथापि उसमें केवल कुछ ही पदार्थों का नियन्तृत्व है' सर्वलोक-नियन्तृत्व नहीं, श्रुति अपने अन्तर्यामी में सर्वलोक-नियन्तृत्व प्रतिपादित करती है - "यः सर्वान् लोकानन्तरो यमयति, यः सर्वाणि भूतान्यन्तरो यमयति" ।
सर्व ऐश्वर्य-सम्पन्न योगी यद्यपि सभी लोकों और भूतों का वशी होने के कारण नियामक हो सकता है । वह सर्व जगत् का नियमन करने के लिए अपने योग-बल से अनेक प्रकार के शरीर और इन्द्रियादि का निर्माण कर लेता है - "स एकधा भवति, त्रिधा भवति" ( छां. ७।२६।२ ) । तथापि "जगद्व्यापारवर्जं प्रकरणात्" ( ब्र सू. ४।४।१७ ) यह सूत्र कहता है कि जगत्सर्जनरूप कार्य ( विद्या-सिद्ध ) योगी नहीं कर सकता, अतः वह भी कथित अन्तर्यामी नहीं हो सकता । परिशेषतः जीव ही यहाँ अन्तर्यामी है, क्योंकि वह चेतन है,
अन्तर्यामिणो ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २९९
यमयितृत्वं स्यात् , न तु परमात्मा प्रतीयते, अकार्यकरणत्वादित्येवं प्राप्त इदमुच्यते— योऽन्तर्याम्यधिदेवादिषु श्रूयते, स परमात्मैव स्यान्नान्य इति । कुतः ? तद्धर्मव्यप-
भामती
चेतनो देहेन्द्रियादिमान् द्रष्टृत्वादिसम्पन्नः स्वयमदृश्यादिः स्वात्मनि वृत्तिविरोधादमृतश्च देहनाशेऽप्य- नाशात् । अन्यथाऽऽमुष्मिकफलोपभोगाभावेन कृतविप्रणाशाकृताभ्यागमप्रसङ्गात् । य आत्मनि तिष्ठन्निति चाभेदेऽपि कथञ्चिद्भेदोपचारात् स भगवः कस्मिन् प्रतिष्ठितः स्वे महिन्नोतिवत् । यमात्मा न वेदेति च स्वात्मनि वृत्तिविरोधाभिप्रायम् । यस्यात्मा शरीरमित्यादि च सर्वं स्वे महिम्नीतिवद्योजनीयं, यदि पुन- रात्मनोऽपि नियन्तुरन्यो नियन्ता भवेद् वेदिता वा ततस्तस्याप्यन्य इत्यनवस्था स्यात् । सर्वलोकभूत- नियन्तृत्वञ्च जीवस्यादृष्टद्वारा, तदुपार्जितौ हि धर्माधर्मौ नियच्छत इत्यनया द्वारा जीवो नियच्छति । एकवचनञ्च जात्यभिप्रायम् । तस्माज्जीवात्मैवान्तर्यामी, न परमात्मेति ।
एवं प्राप्तेऽभिधीयते— देहेन्द्रियादिनियमे नास्य देहेन्द्रियान्तरम् । तत्कर्मोपार्जितं तच्चेत्तदविद्याजितं जगत् ॥
भामती-व्याख्या
देहेन्द्रियादि से युक्त है, द्रष्टृत्वादि-सम्पन्न और स्वयं अदृश्य है, क्योंकि दर्शनादि क्रिया द्रष्टा से भिन्न दृश्य जगत् को ही व्याप्त करती है । वह अमृत इसलिए कहा जाता है कि देह और इन्द्रियादि का नाश हो जाने पर भी नष्ट नहीं होता, अन्यथा पारलौकिक कर्म-फलों का उपभोग न ही सकने के कारण कृत-प्रणाश एवं पूर्व जन्म में न होने के कारण अकृत कर्मों के फलभूत इस शरीर का अभ्यागम ( प्राप्ति ) मानना होगा । “य आत्मनि तिष्ठन्”—ऐसा व्यवहार भी जीव में वैसे ही सम्पन्न हो जाता है, जैसे ब्रह्म में “स भगवः कस्मिन् प्रतिष्ठितः ? स्वे महिम्नि” ( छां. ७।२४।१ ) ऐसा व्यवहार [ “स्वे महिम्नि”—यहाँ पर श्रुति ने ही भूमा से भिन्न गो और अश्वादि को ‘महिमा’ पद का अर्थ बताकर ‘प्रतिष्ठ’ शब्द का गौण अर्थ सूचित किया है, भाष्यकार कहते हैं—“तदाश्रितः तत्प्रतिष्ठश्चैत्रो भवति” ( छां. पृ. ४३१ ), किन्तु “स्वे महिम्नि” इस वाक्य से पूर्व ‘यत्र नान्यत् पश्यति” ( छां. ७।२४।१ ) इस वाक्य की व्याख्या में भाष्यकार ने कहा है—“नन्वयमेव दोषः —संसारानिवृत्तिः, क्रियाकारकफलभेदो हि संसारः इति चेत्, न, अविद्याकृतभेदापेक्षत्वात्” अर्थात् जीव और ब्रह्म का अविद्यावस्थ भेद लेकर अभिन्न वस्तु में भी अधिकरणत्व और आधेयत्वादि का व्यवहार किया जा सकता है] । “यमात्मा न वेद”—ऐसा कहना जीवात्मा के लिए उचित है, क्योंकि आत्मगत (अपने में रहनेवाली ) वेदन ( दर्शन ) क्रिया की कर्मता स्वयं अपने में नहीं रह सकती । “यस्यात्मा शरीरम्”—इत्यादि भेद-सापेक्ष व्यवहार अविद्या की छाया में वैसे ही सम्पन्न किए जा सकते हैं, जैसे—“स्वे महिम्नि” । यदि जीवात्मा का भी कोई अन्य नियन्ता ( अन्तर्यामी ) माना जाता है, तब उस नियन्ता का भी कोई अन्य नियन्ता और उसका भी कोई अन्य—इस प्रकार अनवस्था प्रसक्त होती है । सभी प्राणियों और लोकों का नियमन जीव अपने अदृष्टों के द्वारा करता है अर्थात् जीव के द्वारा उपार्जित धर्माधर्म मुख्यतः जगत् का नियमन करते हैं और उसका व्यवहार जीव में वैसे ही हो जाता है, जैसे सैनिकों के द्वारा किए गए जय-पराज- यादि का व्यवहार राजा में होता है । जगत् के नियन्ता धर्माधर्मादि यद्यपि अनेक हैं, तथापि अदृष्टत्वरूप जाति की एकता को ध्यान में रख कर ‘यः’ और यमयति’—इस प्रकार नियन्तृगत एकत्व का व्यवहार संगत हो जाता है । फलतः जीवात्मा ही जगत् का अन्तर्यामी है, परमात्मा नहीं ।
३०० ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. २ सू. १८
देशात्। तस्य हि परमात्मनो धर्मा इह निर्दिश्यमाना दृश्यन्ते। पृथिव्यादि तावदधि- दैवादिभेदभिन्नं समस्तं विकारजातमन्तस्तिष्ठन् यमयतीति परमात्मनो यमयितृत्वं धर्म उपपद्यते, सर्वविकारकारणत्वे सति सर्वशक्त्युपपत्तेः। 'एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः' इति चात्मत्वामृतत्वे मुख्ये परमात्मन उपपद्येते। 'यं पृथिवी न वेद' इति च पृथिवी- देवताया अविज्ञेयमन्तर्यामिणं ब्रुवन्देवतात्मनोऽन्यमन्तर्यामिणं दर्शयति। 'पृथिवी देवता ह्यहमस्मि पृथिवीत्यात्मानं विजानीयात्'। तथा 'अदृष्टोऽश्रुतः' इत्यादिव्यप- देशो रूपादिविहीनत्वात्परमात्मन उपपद्यत इति। यत्त्वकार्यकरणस्य परमात्मनो यमयितृत्वं नोपपद्यत इति। नैष दोषः, यन्नियच्छति तत्कार्यकरणैरेव, तस्य कार्य- करणवत्त्वोपपत्तेः। तस्याप्यन्यो नियन्तेत्यनवस्थादोषश्च न संभवति, भेदाभावात्। भेदे
भामती
श्रुतिस्मृतीतिहासपुराणेषु तावदत्र भवतः सर्वज्ञस्य सर्वशक्तेः परमेश्वरस्य जगद्योनित्वमवगम्यते। न तत् पृथग्जनसाधारण्यनुमानाभासेनागमविरोधिना शक्यमपह्नोतुम्। तथा च सर्वं विकारजातं तदविद्याशक्तिपरिणामस्तस्य शरीरेन्द्रियस्थाने वर्त्तत इति यथायथं पृथिव्यादिदेवताविकार्यकरणस्तानेव पृथिव्यादिदेवतादीन् शक्नोति नियन्तुम्। न चानवस्था, न हि नियन्त्रन्तरं तेन नियम्यते, किन्तु यो जीवो नियन्ता लोकसिद्धः स परमात्मैवोपाध्यवच्छेदकल्पितभेदस्तथा व्याधायत इत्यसकृदावेदितं, तत् कुतो नियन्त्रन्तरं? कुतश्चानवस्था? तथा च नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टेत्याद्या अपि श्रुतय उपपन्नायाः। परमार्थ-
भामती-व्याख्या
सिद्धान्त—
देहेन्द्रियादिनियमने नास्य देहेन्द्रियान्तरम् ।
तत्कर्मोपार्जितं तच्चेत् तदविद्याजितं जगत् ॥
इस जीव में जगत् का नियन्तृत्व (नियमन) देहेन्द्रियादि के द्वारा सम्भव नहीं, क्योंकि नियम्य जगत् के अन्तर्गत देहेन्द्रियादि भी हैं, उनका नियमन अन्य देहेन्द्रियादि के द्वारा सम्भव नहीं। यदि जीवाश्रित अदृष्ट के द्वारा अन्तर्यामित्व का सम्पादन किया जाता है, तब ब्रह्माश्रित या ब्रह्मविषयक अविद्या शक्ति के द्वारा उसमें अन्तर्यामित्व क्यों नहीं बन सकता ? श्रुति, स्मृति, इतिहास और पुराणों में सर्वज्ञ एवं सर्वशक्ति-समन्वित ब्रह्म को जगत् की योनि और अन्तर्यामी माना गया है। जीवों में एक अशक्त, अबोध साधारण जीव भी है, उसमें जगत्-नियन्तृत्व की कल्पना जिस अनुमान के द्वारा की जाती है, वह शास्त्र-विरुद्ध होने के कारण अनुमानाभास है, सदनुमान नहीं। ऐसे अनुमान के द्वारा आगम-सिद्ध ब्रह्मगत अन्तर्यामित्व का अपलाप नहीं किया जा सकता। यह जो कहा जाता है कि लोक-प्रसिद्ध कुलालादि में कार्य-नियमन देहेन्द्रियादि के द्वारा ही देखा जाता है, वह भी यहाँ असम्भव नहीं, क्योंकि परमेश्वर की अविद्या शक्ति के द्वारा विरचित प्रपञ्च ही उसका शरीरेन्द्रियादि है, उनके द्वारा ही वह यथायोग्य समस्त पृथिव्यादि अधिभूत, अधिदेव और अध्यात्म जगत् का नियमन करता है। यहाँ किसी प्रकार की अनवस्था प्रसक्त नहीं होती, क्योंकि यदि जीव से भिन्न किसी नियन्ता की कल्पना की जाती, तब अवश्य नियन्तृ-परम्परा की कल्पना से अनवस्था होती, प्रकृत में जिस परमेश्वर को अन्तर्यामी माना जाता है, वह जीव से भिन्न नहीं, अपितु परमात्मा ही उपाधिरूप अवच्छेदक के भेद से भिन्न-जैसा प्रतीयमान जीव ही लोक में नियन्तृत्वेन प्रसिद्ध है—यह कई बार कहा जा चुका है। तब न तो वह नियन्त्र्यन्तर कहा जा सकता है और न अनवस्था प्रसक्त होती है। जीवात्मा और परमात्मा का वास्तविक भेद न होने के कारण "नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा" (बृह. उ. ३।७।२३) इत्यादि भेद-निषेधक
| अन्तर्यामिणो ब्रह्मत्वम् ] | हिन्दूसहितभामतीसंवलितम् | ३०१ |
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हि सत्यनवस्थादोषोपपत्तिः । तस्मात्परमात्मैवान्तर्यामी ॥ १८ ॥
न च स्मार्तमतद्धर्माभिलापात् ॥ १९ ॥
स्यादेतत्—अदृष्टत्वादयो धर्माः सांख्यस्मृतिकल्पितस्य प्रधानस्याप्युपपद्यन्ते, रूपादिहीनतया तस्य तैरभ्युपगमात् । 'अप्रतर्क्यमविज्ञेयं प्रसुप्तमिव सर्वतः' (मनु० १।५) इति हि स्मरन्ति, तस्यापि नियन्तृत्वं सर्वविकारकारणत्वादुपपद्यते । तस्मात् प्रधानमन्तर्यामिशब्दं स्यात् । 'ईक्षतेर्नाशब्दम्' (ब्र० सू० १।१।५) इत्यत्र निराकृतमपि सत्प्रधानमिहादृष्टत्वादिव्यपदेशसंभवेन पुनराशङ्क्यते । अत उत्तरमुच्यते—न च स्मार्तं प्रधानमन्तर्यामिशब्दं भवितुमर्हति । कस्मात् ? अतद्धर्माभिलापात् । यद्यप्यदृष्टत्वादिव्यपदेशः प्रधानस्य संभवति, तथापि न द्रष्टृत्वादिव्यपदेशः संभवति, प्रधानस्याचेतनत्वेन तैरभ्युपगमात् । 'अदृष्टो द्रष्टाऽश्रुतः श्रोताऽमतो मन्ताऽविज्ञातो विज्ञाता' (बृह० ३।७।२३) इति हि वाक्यशेष इह भवति । आत्मत्वमपि न प्रधानस्योपपद्यते ॥ १९ ॥
यदि प्रधानमात्मत्वद्रष्टृत्वाद्यसंभवान्नान्तर्याम्यभ्युपगम्यते, शारीरस्तर्ह्यन्तर्यामी भवतु । शारीरो हि चेतनत्वाद् द्रष्टा श्रोता मन्ता विज्ञाता च भवति, आत्मा च प्रत्यक्त्वात् । अमृतश्च, धर्माधर्मफलोपभोगोपपत्तेः । अदृष्टत्वादयश्च धर्माः शारीरे प्रसिद्धाः, दर्शनादिक्रियायाः कर्तरि प्रवृत्तिविरोधात् । 'न दृष्टेर्द्रष्टारं पश्येः' (बृ० ३।४।२) इत्यादिश्रुतिभ्यश्च । तस्य च कार्यकारणसंघातमन्तर्यमयितुं शीलं, भोक्तृत्वात् । तस्माच्छारीरोऽन्तर्यामीत्यत उत्तरं पठति—
शारीरश्चोभयेऽपि हि भेदेनैनमधीयते ॥ २० ॥
नेति पूर्वसूत्रादनुवर्तते । शारीरश्च नान्तर्यामीष्यते । कस्मात् ? यद्यपि द्रष्टृत्वादयो धर्मास्तस्य संभवन्ति, तथापि घटाकाशवदुपाधिपरिच्छिन्नत्वान्न कात्स्न्येन पृथिव्यादिष्वन्तरवस्थातुं नियन्तुं च शक्नोति । अपि चोभयेऽपि हि शाखिनः काण्वा माध्यन्दिनाश्चान्तर्यामिणो भेदेनैनं शारीरं पृथिव्यादिवदधिष्ठानत्वेन नियम्यत्वेन चाधीयते—'यो विज्ञाने तिष्ठन्' (बृ० ३।७।२२) इति काण्वाः । 'य आत्मनि तिष्ठन्' इति माध्यन्दिनाः । 'य आत्मनि तिष्ठन्' इत्यस्मिन्नपि पाठे विज्ञानशब्देन शारीर उच्यते । विज्ञानमयो हि शारीरः । तस्माच्छारीरादन्य ईश्वरोऽन्तर्यामीति सिद्धम् । कथं पुनरेकस्मिन् देहे द्वौ द्रष्टारावुपपद्येते ? यश्चायमीश्वरोऽन्तर्यामी, यश्चायमितरः शारीरः । का पुनरिहानुपपत्तिः ? 'नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा' इत्यादि श्रुतिवचनं विरुध्येत । अत्र हि प्रकृतादन्तर्यामिणोऽन्यं द्रष्टारं, श्रोतारं, मन्तारं, विज्ञातारं चात्मानं प्रतिषेधति । नियन्त्रन्तरप्रतिषेधार्थमेतद्वचनमिति चेत्—न, नियन्त्रन्तराप्रसङ्गादविशेषश्रवणाच्च । अत्रोच्यते—अविद्याप्रत्युपस्थापितकार्यकरणोपाधिनिमित्तोऽयं शारीरान्तर्यामिणोर्भेदव्यपदेशो न पारमार्थिकः । एको हि प्रत्यगात्मा भवति, न द्वौ प्रत्यगात्मानौ संभवतः । एकस्यैव तु भेदव्यवहार उपाधिकृतः, यथा घटाकाशो महाकाश इति । ततश्च ज्ञातृज्ञेयादिभेदश्रुतयः प्रत्यक्षादीनि च प्रमाणानि संसारानुभवो विधि-
भामती
तोऽन्तर्यामिणोऽन्यस्य जीवात्मनो द्रष्टुरभावात् । अविद्याकल्पितजीवपरमात्मभेदाश्रयास्तु ज्ञातृज्ञेयभेदश्रु-
भामती-व्याख्या
श्रुतियां सार्थक मानी जाती हैं, क्योंकि द्रष्टा जीव से परमार्थतः भिन्न कोई अन्तर्यामी नही माना जाता । अविद्या के द्वारा जीव और ब्रह्म के कल्पित भेद को ही विषय करती हैं—ज्ञाता
| ३०२ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. २ सू. १९ |
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प्रतिषेधशास्त्रं चेति सर्वमेतदुपपद्यते। तथा च श्रुतिः—‘यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरं पश्यति’ इत्यविद्याविषये सर्वं व्यवहारं दर्शयति। ‘यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं पश्येत्’ इति विद्याविषये सर्वं व्यवहारं वारयति॥ २०॥
भामती
तयः प्रत्यक्षादीनि प्रमाणानि संसारानुभवो विधिनिषेधशास्त्राणि च। एवं चाधिदैवादिश्वेकस्यैवान्तर्यामिणः प्रत्यभिज्ञानं समञ्जसं भवति, यः सर्वान् लोकान् यः सर्वाणि भूतानीत्यत्र य इत्येकवचनमुपपद्यते। अमृतत्वञ्च परमात्मनि समञ्जसं नान्यत्र। य आत्मनि तिष्ठन्नित्यादौ चाभेदेऽपि भेदोपचारक्लेशो न भविष्यति। तस्मात्परमात्मान्तर्यामी न जीवाविरिति सिद्धम्। पृथिव्यादिस्तनयित्न्वन्तमधिदैवम्। यः सर्वेषु लोकेष्वित्यधिलोकम्। यः सर्वेषु वेदेष्वित्यधिवेदम्। यः सर्वेषु यज्ञेष्वित्यधियज्ञम्। यः सर्वेषु भूतेष्वित्यधिभूतम्। प्राणाद्यात्मान्तमध्यात्मम्। संज्ञाया अप्रसिद्धत्वादित्युपक्रममात्रं पूर्वः पक्षः। ॐदर्शनादिक्रियायाः कर्त्तरि प्रवृत्तिविरोधात्ॐ। कर्त्तरि आत्मनि प्रवृत्तिविरोधादित्यर्थः॥ १८–२०॥
भामती-व्याख्या
और ज्ञेय का भेद बतानेवाली श्रुतियाँ, प्रत्यक्षादि लौकिक प्रमाण, संसरण (जन्म-मरण) की अनुभूति एवं विधि-निषेधात्मक शास्त्र। इस प्रकार का अन्तर्यामी मानने पर ही आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक प्रपञ्च में अन्तर्यामी पुरुष की एकत्व-प्रत्यभिज्ञा समञ्जस होती है एवं “यः सर्वान् लोकान्”, “यः सर्वाणि भूतानि”—यहाँ एकवचनान्त ‘यः’ शब्द का प्रयोग उपपन्न हो जाता है। अमृतत्व तो मुख्यरूप से ब्रह्म में ही घटता है, अन्यत्र नहीं। “य आत्मनि तिष्ठन्”—यहाँ पर जीव-पक्ष में जो औपचारिक (औपाधिक) भेद की कल्पना करनी पड़ती थी, वह कल्पना-क्लेश भी ब्रह्म-पक्ष में नहीं, क्योंकि सिद्धान्त में अभेद ही माना जाता है। अतः परमात्मा ही सर्वान्तर्यामी है, जीव और देवादि नही—यह सिद्ध हो गया।
भाष्यकार ने जो इस अधिकरण के आरम्भ में कहा है—(१) “अत्राधिदैवतम्, (२) अधिलोकम्, (३) अधिवेदम्, (४) अधियज्ञम्, (५) अधिभूतम्, (६) अध्यात्मं च अन्तर्यामी श्रूयते।” उस भाष्य के अधिदैर्वादि भेद बृहदारण्यक उपनिषत् के वाक्यों में इस प्रकार हैं—(१) “यः पृथिव्यां तिष्ठन्” (बृह. उ. ३।७।३) यहाँ से लेकर “यः स्तनयित्नौ तिष्ठन्”—यहाँ तक अधिदैवत (पृथिव्यादि के अभिमानी देवताओं में वर्तमान) अन्तर्यामी प्रतिपादित है [शुक्ल यजुर्वेदीय बृहदारण्यक नाम की दो पुस्तकें हैं—(१) माध्यन्दिनी या वाजसनेयी शाखा की और (२) दूसरी काण्व शाखा की। इनमें वाचस्पति मिश्र ने यहाँ माध्यन्दिनीय बृहदारण्यक का क्रम उद्धृत किया है, क्योंकि काण्वशाखीय बृहदारण्यक में “यः स्तनयित्नौ”—ऐसा पाठ नहीं, अपितु “यस्य तेजः शरीरं यस्तेजोऽन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृत इत्यधिदैवतम्” (बृह. उ. ३।७।१४) ऐसा पाठ है]। “यः सर्वेषु लोकेषु”—इत्यादि खण्ड में अधिलोक, “यः सर्वेषु वेदेषु”—इत्यादि खण्ड में अधिवेद, “यः सर्वेषु यज्ञेषु” इत्यादि खण्ड में अधियज्ञ, “यः सर्वेषु भूतेषु” इत्यादि खण्ड में अधिभूत और “यः प्राणेषु तिष्ठन्”—यहाँ से लेकर “य आत्मनि तिष्ठन्”—यहाँ तक अध्यात्म अन्तर्यामी चर्चित है।
भाष्यकार ने जो कहा है—‘‘संज्ञाया अप्रसिद्धत्वात् संज्ञिनाऽप्यप्रसिद्धेन भवितव्यम्’’। वह पूर्वपक्ष का उपक्रम मात्र है, उस पक्ष पर पूर्व पक्षी का भी विश्वास नहीं, अत एव “अथवा” से पक्षान्तर प्रस्तुत किया गया है। भाष्यकार ने “न च स्मार्तम्” ब्र. सू. १।२।१९) इस सूत्र में कहा है—“दर्शनादिक्रियायाः कर्त्तरि प्रवृत्तिविरोधात्”। वहाँ ‘कर्तरि’ शब्द का
अक्षरपुरुषस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ३०३
( ६ अदृश्यत्वाधिकरणम् । सू० २१-२३ )
अदृश्यत्वादिगुणको धर्मोक्तेः ॥ २१ ॥
'अथ परा, यया तदक्षरमधिगम्यते', 'यत्तदद्रेश्यमग्राह्यमगोत्रमवर्णमचक्षुःश्रोत्रं तदपाणिपादं नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मं तदव्ययं यद् भूतयोनिं परिपश्यन्ति धीराः' (मुण्ड० १।१।५,६) इति श्रूयते । तत्र संशयः किमयमहश्यत्वादिगुणको भूतयोनिः प्रधानं स्यात्, उत शारीरः, आहोस्वित्परमेश्वर इति । तत्र प्रधानमचेतनं भूतयोनि-
भामती
"अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते" । "यत्तदद्रेश्यं" बुद्धीन्द्रियाविषयः । "अग्राह्यं" कर्मेन्द्रियागोचरः । "अगोत्रं" कारणरहितम् । "अवर्णं" ब्राह्मणत्वादिहीनम् । न केवलमिन्द्रियाणामविषयः, इन्द्रियाण्यप्यस्य न सन्तीत्याह "अचक्षुश्श्रोत्रम्" इति बुद्धीन्द्रियाण्युपलक्षयति । "अपाणिपादम्' इति कर्मेन्द्रियाणि । 'नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मं' दुर्विज्ञातत्वात् । स्यादेतत्—नित्यं सत्कि परिणामि नित्यं ? नेत्याह "अव्ययं" कूटस्थनित्यमित्यर्थः ।
परिणामो विवर्तो वा सरूपस्योपलभ्यते ।
चिदात्मना तु सारूप्यं जडानां नोपपद्यते ॥
जडं प्रधानमेवातो जगद्योनिः प्रतीयताम् ।
योनिशब्दो निमित्तं चेत् कुतो जीवनिराक्रिया ॥
भामती-व्याख्या
अभिप्रेत अर्थ है—"आत्मनि", क्योंकि लोक-प्रसिद्ध शरीररूप कर्ता में दर्शन क्रिया की प्रवृत्ति विरुद्ध नहीं, किन्तु चिदात्मा में ही श्रुति के द्वारा दर्शन क्रिया की कर्मता निषिद्ध है ॥१८-२०॥
विषय—"अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते यत्तदद्रेश्यमग्राह्यमगोत्रमवर्णमचक्षुःश्रोत्रं तदपाणिपादम् । नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मं तदव्ययं यद् भूतयोनिं परिपश्यन्ति धीराः" (मुण्ड. १।१।५-६) । इस श्रुति में भाष्यकार ने 'अद्रेश्यम्' शब्द का अर्थ किया है—'अदृश्यं सर्वेषां बुद्धीन्द्रियाणामगम्यम्' । 'अग्राह्यम्' का अर्थ "कर्मेन्द्रियाविषयम्" किया है । 'अगोत्रम्' शब्द का अर्थ कारण-रहित है । 'अवर्णम्' शब्द से ब्राह्मणत्वादि वर्णों का अभाव विवक्षित है । वह केवल इन्द्रियों का अविषय ही नहीं, अपितु इन्द्रियों से रहित भी है—यह दिखाने के लिए कहा है—"अचक्षुःश्रोत्रम्" । 'चक्षुःश्रोत्र' शब्द सभी बुद्धीन्द्रियों का और "अपाणिपादम्"—यहाँ 'पाणिपाद' शब्द सभी कर्मेन्द्रियों का उपलक्षक है । 'नित्य' शब्द का 'अविनाशी' और 'विभु' शब्द का व्यापक अर्थ है । दुर्विज्ञेय होने के कारण "सुसूक्ष्मं" कहा गया है । सांख्य-सम्मत प्रधान तत्त्व को नित्य परिणामी माना जाता है, उस प्रकार की नित्यता का निषेध करने के लिए कहा है—'अव्ययम्' अर्थात् वह अक्षर तत्त्व कूटस्थ नित्य है, परिणामी नित्य नहीं ।
संशय—उक्त श्रुति के द्वारा सांख्याभिमत 'प्रधान' विवक्षित है ? या शारीर (जीव) ? अथवा ब्रह्म ?
पूर्वपक्ष—
परिणामो विवर्तो वा सरूपस्योपलभ्यते ।
चिदात्मना तु सारूप्यं जडानां नोपपद्यते ॥ १ ॥
जडं प्रधानमेवातो जगद्योनिः प्रतीयताम् ।
योनिशब्दो निमित्तं चेत् कुतो जीवनिराक्रिया ॥ २ ॥
| ३०४ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [अ. १ पा. २ सू. २१ |
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रिति युक्तं, अचेतनानामेव तद्दृष्टान्तत्वेनोपादानात् । 'यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णते च यथा पृथिव्यामोषधयः संभवन्ति । यथा सतः पुरुषात्केशलोमानि तथाऽक्षरात्सम्भव- तीह विश्वम्' (मुण्ड० १।१।७) इति । ननूर्ननाभिः पुरुषश्च चेतनाविव दृष्टान्तत्वे- नोपात्तौ । नेति ब्रूमः, न हि केवलस्य चेतनस्य तत्र सूत्रयोनित्वं वास्ति । चेतनाधि- ष्ठितं ह्यचेतनमूर्णनाभिशरीरं सूत्रस्य योनिः, पुरुषशरीरं च केशलोम्नामिति प्रसिद्धम् । अपि च पूर्वत्रादृष्टत्वाद्यभिलापसंभवेऽपि द्रष्टृत्वाद्यभिलापासंभवान्न प्रधानमभ्युप- गतम् । इह त्वदृश्यत्वादयो धर्माः प्रधाने संभवन्ति । न चात्र विरुध्यमानो धर्मः कश्चिदभिलप्यते । ननु 'यः सर्वज्ञः सर्ववित्' (मुण्ड० १।१।९) इत्ययं वाक्यशेषोऽचे- तने प्रधाने न सम्भवति, कथं प्रधानं भूतयोनिः प्रतिज्ञायत इति । अत्रोच्यते—'यया तदक्षरमधिगम्यते', 'यत्तदद्रेश्यम्' इत्यक्षरशब्देनादृश्यत्वादिगुणं भूतयोनिं श्राव- यित्वा पुनरन्ते श्रावयिष्यति—'अक्षरात्परतः परः' ( मुण्ड० २।१।२) इति । तत्र यः परोऽक्षराच्छुतः, स सर्वज्ञः सर्ववित्संभविष्यति । प्रधानमेव त्वक्षरशब्दनिर्दिष्टं
भामती
परिणममानसरूपा एव हि परिणामा दृष्टाः, यथोर्णनाभिलालापरिणामा लुतातन्तवस्तत्सरूपाः । तथा विवर्ता अपि विवर्तमानसुरूपा एव, न विरूपाः । यथा रज्जुविवर्ता धारोरगादयो रज्जुसरूपाः । न जातु रज्ज्वां कुञ्जर इति विपर्यस्यन्ति । न च हेमपिण्डपरिणामो भवति लूतातन्तुः, तत् कस्य हेतोः ? अत्यन्तवैरूप्यात् । तस्मात्प्रधानमेव जडं जडस्य जगतो योनिरिति युज्यते । स्वविकारानश्नुत इति तदक्षरम् । यः सर्वज्ञः सर्वविदिति चाक्षरात् परात्परस्याख्यानम्, 'अक्षरात् परतः परः' इति श्रुतेः । न हि परस्मादात्मनोऽर्वाग्विकारजातस्य च परस्तात् प्रधानादृतेऽन्यदक्षरं सम्भवति । अतो यः प्रधानात्परः परमात्मा स सर्ववित् , भूतयोनिरस्त्वक्षरं प्रधानमेव तच्च सांख्याभिमतमेवास्तु । अथ तस्याप्रामाणिकत्वान्न
भामती-व्याख्या
मृत्तिका परिणममान और घटादि परिणाम हैं, परिणममान और परिणाम पदार्थों में सरूपता (समानरूपता) देखी जाती है, जैसे कि ऊर्णनाभि (मकड़ी) की लाला (लार, लासा या लुआब) जाले के रूप में परिणत होती है, उन दोनों में समानरूपता अनुभव-सिद्ध है, उसी प्रकार रज्जु विवर्तमान और सर्पादि विवर्त हैं, उन दोनों में भी समानरूपता पाई जाती है, विरूपता (विरुद्धरूपता) नहीं, क्योंकि रज्जु-जैसे प्रलम्बाकार पदार्थ में वैसे ही सर्प, धारा और दण्डादि पदार्थों का भ्रम होता है, हाथी या ऊँट का नहीं। हेम-पिण्ड (सोने का डला) कभी मकड़ी का जाला नहीं बनता, वह क्यों ? उन दोनों में अत्यन्त विरूपता होती है। अतः जड़रूप प्रधान तत्त्व ही इस जड़ जगत् का कारण है—ऐसा मानना ही युक्ति-युक्त है। प्रधान (प्रकृति) को अक्षर इस लिए कहा जाता है कि वह 'अशू व्याप्तौ' धातु से “अशेः सरः” (उणा. ३।७०) इस सूत्र के द्वारा निष्पन्न 'अक्षर' शब्द का 'अश्नुते व्याप्नोति स्वविकारान्'- ऐसी व्युत्पत्ति से लब्ध अर्थ है। “यः सर्वज्ञः सर्ववित्”-इसका अन्वय “अक्षरात् परतः परः” (मुण्ड. २।१।२) इसके साथ है, अर्थात् जो अक्षर (प्रधान) से परे या ऊपर अवस्थित परमात्मतत्त्व है, वह सर्वज्ञ और सर्ववित् है [“अक्षरात् परतः परः”- इस श्रुति में 'परतः' पद अक्षरात् का विशेषण है, अतः विकारवर्ग (कार्य-प्रपञ्च) से पर अवस्थित जो अक्षरसंज्ञक प्रधान तत्त्व है, उससे पर परमात्मा है—इसी भाव को मिश्र जी यहाँ ध्वनित करते हैं-] विकार-समूह से परे अवस्थित जो प्रधान तत्त्व है, उससे भिन्न अन्य कोई अक्षर पदार्थ नहीं। इस प्रधान तत्त्व से परे जो परमात्मा है, वह सर्ववित् है। सभी भूत पदार्थों की योनि (कारण) तो अक्षर नाम से प्रसिद्ध जो प्रधान तत्त्व है, वह
भूतयोनेः ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ३०५
भूतयोनिः यदा तु योनिशब्दो निमित्तवाची, तदा शारीरोऽपि भूतयोनिः स्यात्, धर्माधर्माभ्यां भूतजातस्योपार्जनादिति। एवं प्राप्तेऽभिधीयते - योऽयमदृश्यत्वादिगुणको भूतयोनिः स परमेश्वर एव
भामती तत्र परितुष्यति, अस्तु तर्हि नामरूपबीजशक्तिभूतमव्याकृतं भूतसूक्ष्मं, प्रधीयते हि तेन विकारजातमिति प्रधानं, तत् खलु जडमनिर्वच्यमनिर्वाच्यस्य जडस्य नामरूपप्रपञ्चस्योपादानं युज्यते, सारूप्यात्। न तु चिदात्मा निर्वाच्यः, विरूपो हि सः। अचेतनानामिति भाष्यं सारूप्यप्रतिपादनपरम्। स्यादेतत्—स्मातं प्रधाननिराकरणेनैवैतदपि निराकृतप्रायं तत् कुतोऽस्य शङ्केत्यत आह— ॐ अपि च पूर्वत्राद्रष्टृत्वादि इति ॐ। सति बाधकेऽन्यानाश्रयणमिह तु बाधकं नास्तीत्यर्थः। तेन तदैक्षतेत्यादावुपचयंतो ब्रह्मणो जगद्यो-निताऽविद्याशक्त्याश्रयत्वेन। इह त्वविद्याशक्तेरेव जगद्योनित्वसम्भवे न द्वारद्वारिभावो युक्त इति प्रधान-मेवात्र वाक्ये जगद्योनिरुच्यत इति पूर्वः पक्षः। अथ योनिशब्दो निमित्तकारणपरस्तथापि ब्रह्मैव निमित्तं न तु जीवात्मेति विनिगमनायां न हेतुरस्तीति संशयेन पूर्वः पक्षः। अत्रोच्यते — अक्षरस्य जगद्योनिभावमुक्त्वा ह्यनन्तरम्। यः सर्वज्ञ इति श्रुत्या सर्वज्ञस्य स उच्यते ॥ १ ॥
भामती-व्याख्या सांख्य-सम्मत ही सही। सांख्य-सम्मत प्रधान यदि अप्रामाणिक है, अतः उसका अभ्युपगम अभीष्ट नहीं, तब नाम ( शब्द ) और रूप ( अर्थ ) की बीज-शक्तिरूप अव्याकृत ( सूक्ष्म भूतों ) को प्रधान कहा जा सकता है, क्योंकि 'प्रधीयते येन विकारजातम्'—इस व्युत्पत्ति के अनुसार वह अनिर्वचनीय है और नामरूपात्मक अनिर्वचनीय प्रपञ्च का उपादानकारण है, अतः उसी में कार्य-वर्ग की समानरूपता है, चिदात्मा में नहीं, क्योंकि वह सत्त्वेन निर्वाच्य एवं चेतन होने के कारण कार्य-वर्ग के विरूप है। "अचेतनानामेव तद्दृष्टान्तत्वेनोपादानात्"— इस भाष्य का तात्पर्य कार्य और कारण की समानरूपता के प्रतिपादन में ही है।
शङ्का—सांख्य-स्मृति-सिद्ध प्रधान तत्त्व का निराकरण तो "ईक्षतेर्नाशब्दम्" ( ब्र० सू० १।१।५ ) इस सूत्र में ही किया जा चुका है, तब न तो उसमें जगत् की कारणता मानी जा सकती है और न अव्याकृतात्मक प्रधान में, क्योंकि उसी प्रकार यह प्रधान भी निराकृत-प्राय ही है।
समाधान—उक्त शङ्का का निराकरण भाष्यकार करते हैं—"अपि च पूर्वत्राद्रष्टृत्वाद्य-भिलापसम्भवेऽपि द्रष्टृत्वाद्यभिलापासम्भवान्न प्रधानमभ्युपगतम्"। आशय यह है कि पूर्वत्र ईक्षणाभावरूप बाधक के कारण प्रधान तत्त्व को जगत् का कारण नहीं माना जा सका किन्तु यहाँ अपेक्षित अदृश्यत्वादि का सद्भाव होने के कारण उसमें जगत्कारणता का पूर्व पक्ष उठाया गया है कि "तदैक्षते"—इत्यादि वाक्यों के द्वारा ब्रह्म में जगत् की कारणता का उपचार किया जा सकता है, क्योंकि वह अविद्यारूप शक्ति की विषयता का आश्रय है, किन्तु "यत्तदद्रेश्यम्"—इत्यादि वाक्यों के द्वारा अविद्याशक्ति स्वरूप प्रधान तत्त्व में ही जगद्योनिता का उपपादन सम्भव है, अतः उसके द्वारा ब्रह्म में जगत् की कारणता का संगमन उचित नहीं।
यदि सूत्रस्थ 'योनि' शब्द उपादान कारण का बोधक न होकर निमित्त कारण का वाचक है, तब जीव में जगद्योनिता आशङ्कित हो सकती है, क्योंकि 'ब्रह्म ही जगत् का कारण है, जीव नहीं'—इस प्रकार की विनिगमना में कोई हेतु उपलब्ध नहीं।
सिद्धान्त—अक्षरस्य जगद्योनिभावमुक्त्वा ह्यनन्तरम्।
यः सर्वज्ञ इति श्रुत्या सर्वज्ञस्य स उच्यते ॥ १ ॥
३९
| ३०६ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. २ सू. २१ |
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स्यान्नान्य इति। कथमेतदवगम्यते ? धर्मोक्तेः। परमेश्वरस्य हि धर्म इहोच्यमानो दृश्यते - 'यः सर्वज्ञः सर्वविद्' इति। न हि प्रधानस्याचेतनस्य शारीरस्य वोपाधिपरिच्छिन्नदृष्टेः सर्वज्ञत्वं सर्ववित्त्वं वा सम्भवति। नन्वक्षरशब्दनिर्दिष्टाद् भूतयोनेः परस्यैवैतत्सर्वज्ञत्वं सर्ववित्त्वं च न भूतयोनिविषयमित्युक्तम्। अत्रोच्यते-नैवं संभवति। यत्कारणं 'अक्षरात्सम्भवतीह विश्वम्' इति प्रकृतं भूतयोनिमिह जायमानप्रकृतित्वेन निर्दिश्यानन्तरमपि जायमानप्रकृतित्वेनैव सर्वज्ञं निर्दिशति-'यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्य ज्ञानमयं तपः। तस्मादेतद् ब्रह्म नाम रूपमन्नं च जायते' इति। तस्मान्निर्देशसाम्येन प्रत्यभिज्ञायमानत्वात्प्रकृतस्यैवाक्षरस्य भूतयोनेः सर्वज्ञत्वं सर्ववित्त्वं च धर्म उच्यत इति गम्यते। 'अक्षरात्परतः परः' इत्यत्रापि न प्रकृताद् भूतयोनेरक्षरात्परः कश्चिदभिधीयते। कथमेतदवगम्यते ? 'येनाक्षरं पुरुषं वेद सत्यं प्रोवाच तां तत्त्वतो ब्रह्मविद्याम्' (मुण्ड० १।२।१३) इति प्रकृत्य तस्यैवाक्षरस्य भूतयोनेरदृश्यत्वादिगुणकस्य वक्तव्यत्वेन प्रतिज्ञातत्वात् । कथं तर्हि 'अक्षरात्परतः परः, इति व्यपदिश्यते
भामती
तेन निर्देशसामान्यात्प्रत्यभिज्ञानतः स्फुटम् ।
अक्षरं सर्वविद्विश्वयोनिनचितनं भवेत् ॥ २ ॥
अक्षरात्परत इति श्रुतिस्त्वव्याकृते मता ।
अश्नुते यत् स्वकार्याणि ततोऽव्याकृतमक्षरम् ॥ ३ ॥
नेह तिरोहितमिवास्ति किञ्चित् ॥ यत्तु सारूप्याभावान्न चिदात्मनः परिणामः प्रपञ्च इति । अद्धा
भामती-व्याख्या
तेन निर्देशसामान्यात् प्रत्यभिज्ञानतः स्फुटम् ।
अक्षरं सर्वविद् विश्वयोनिनचितनं भवेत् ॥ २ ॥
अक्षरात्परत इति श्रुतिस्त्वव्याकृते मता ।
अश्नुते यत्स्वकार्याणि ततोऽव्याकृतमक्षरम् ॥ ३ ॥
[ “तदक्षरमधिगम्यते, तद्भूतयोनिं परिपश्यन्ति धीराः" इस प्रकार जिस अक्षर तत्त्व में जगत्कारणता का प्रतिपादन किया गया, उसी में “यः सर्वज्ञः सर्ववित्”—इस प्रकार सर्वज्ञत्वादि धर्म श्रुत हैं, उस से परे अवस्थित पदार्थ में नहीं, अतः चिदात्मा सर्वज्ञ ब्रह्म ही जगत् का कारण सिद्ध होता है, प्रधान नहीं। दूसरी बात यह भी है कि “यथा सतः पुरुषात् केशलोमानि, तथा अक्षरात् सम्भवतीह विश्वम्” (मुण्ड-१।१।७) इस श्रुति के द्वारा जिस चिदात्मा अक्षर तत्त्व में जगत्कारणता स्पष्टरूप से प्रतिपादित है, उसी अक्षर तत्त्व का निर्देश “अक्षरमधिगम्यते, यत्तदद्रेश्यम्”—इत्यादि वाक्य में किया गया है, अतः समान निर्देश के द्वारा चेतनगत जगत्कारणता प्रत्यभिज्ञात होती है। यह जो कहा गया कि सर्वज्ञता अक्षर तत्त्व से परे अवस्थित परमात्मा में होती है, वह कहना उचित नहीं, क्योंकि पहले वाक्य में 'अक्षर' शब्द का प्रयोग जगत्कारणीभूत ब्रह्म के लिए और “अक्षरात् परतः परः” (मुण्ड. २।१।२) इस वाक्य में 'अव्याकृत' के लिए 'अश्नुते स्वकार्याणि' - इस व्युत्पत्ति के द्वारा किया गया है, अतः अव्याकृतसंज्ञक अक्षर से ही परत्व का अभिधान जगद्योनिरूप अक्षर में किया गया है, इस अक्षर से नहीं। सर्वज्ञत्वादि का अन्वय प्रथम अक्षर पदार्थ में ही विवक्षित है, वह ब्रह्म है] शेषभाष्य अत्यन्त सुगम है !
यह जो कहा गया कि प्रपञ्च का ब्रह्म में सारूप्य न होने के कारण उपादान कारणत्व सम्भव नहीं, उस पर हमारा कहना है कि—
भूतयोनेः ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ३०७
इति, उत्तरसूत्रे तद्वक्ष्यामः । अपि चात्र द्वे विद्ये वेदितव्ये उक्ते—‘परा चैवापरा च’ इति । तत्रापरामृग्वेदादिलक्षणां विद्यामुक्त्वा ब्रवीति—‘अथ परा, यया तदक्षरमधिगम्यते’ इत्यादि । तत्र परस्या विद्याया विषयत्वेनाक्षरं श्रुतम् । यदि पुनः परमेश्वरादन्यददृश्यकत्वादिगुणकमक्षरं परिकल्प्येत, नेयं परा विद्या स्यात् । परापरविभागो ह्ययं विद्ययोरभ्युदयनिःश्रेयसफलतया परिकल्प्यते । न च प्रधानविद्या निःश्रेयसफला केनचिदभ्युपगम्यते । तिस्रश्च विद्याः प्रतिज्ञायेरन्, त्वत्पक्षेऽक्षराद् भूतयोनेः परस्य परमात्मनः प्रतिपाद्यमानत्वात् । द्वे एव तु विद्ये वेदितव्ये इह निर्दिष्टे । ‘कस्मिन्नु
भामती
विवर्तस्तु प्रपञ्चोऽयं ब्रह्मणोऽपरिणामिनः ।
अनादिवासनोद्भूतो न सारूप्यमपेक्षते ॥
न खलु बाह्यसारूप्यनिबन्धन एव सर्वो विभ्रम इति नियमनिमित्तमस्ति, आन्तरादपि कामक्रोधभयोन्मादस्वप्नादेर्मानसापराधात्सारूप्यानपेक्षात्तस्य तस्य विभ्रमस्य दर्शनात् । अपि च हेतुमति विभ्रमे तदभावानुयोगो युज्यते । अनाद्यविद्यावासनाप्रवाहपतितस्तु नानुयोगमर्हति । तस्मात् परमात्मविवर्ततया प्रपञ्चस्तद्योनिर्भुजङ्ग इव रज्जुविवर्ततया तद्योनिर्न तु तत्परिणामतया । तस्मात्तद्धर्मसर्ववित्त्वातोर्लिङ्गाद् यत्तदद्रेश्यमित्यत्र ब्रह्मैवोपविश्यते ज्ञेयत्वेन, न तु प्रधानं जीवात्मा वोपास्यत्वेनेति सिद्धम् । न केवलं लिङ्गादपि तु परा विद्येति समाख्यानादप्येतदेव प्रतिपत्तव्यमित्याह ॐ अपि चात्र द्वे
भामती-व्याख्या
विवर्तस्तु प्रपञ्चोऽयं ब्रह्मणोऽपरिणामिनः ।
अनादिवासनोद्भूतो न सारूप्यमपेक्षते ॥
अद्वैतवेदान्त-सिद्धान्त में प्रपञ्च को ब्रह्म का परिणाम नहीं, विवर्त माना जाता है। परिणाम में सारूप्य की अपेक्षा होती है, विवर्त में नहीं। रज्जु में सर्पादि का जहाँ विभ्रम होता है, वहाँ सर्पादि को रज्जु का विवर्त कहा जाता है। यद्यपि शुक्त्यादि में उसके विवर्तभूत रजतादि का सारूप्य पाया जाता है, तथापि समस्त विभ्रम बाह्य सारूप्य-प्रयुक्त ही होता है—ऐसे नियम का कोई निमित्त उपलब्ध नहीं, क्योंकि आन्तरिक काम, क्रोध के उद्वेग रूप मानस अपराध के द्वारा जो विविध स्वप्नरूप विभ्रम देखा जाता है, वहाँ सारूप्य की अपेक्षा नहीं होती। दूसरी बात यह भी है कि सादि विभ्रम में सारूप्य की कारणता का सन्देह एवं सारूप्य न होने के कारण ‘कथं विभ्रमकारणत्वम् ?’ इस प्रकार का प्रश्न किया भी जा सकता है, किन्तु अनादि वासनोद्भूत विभ्रम के लिए वैसा प्रश्न कदापि नहीं किया जा सकता। आचार्य धर्मकीर्ति ने भी अनादि वासनाओं से जनित विविध विभ्रम माने हैं—‘‘अनादि-वासनोद्भूतविकल्पपरिनिष्ठितः’’ (प्र. वा. पृ० ३२१)। फलतः ब्रह्म का विवर्त होने के कारण प्रपञ्च वैसे ही ब्रह्मयोनिक कहा जाता है, जैसे सर्प रज्जु का विवर्त होने के कारण ही रज्जुयोनिक (रज्जुककारणक) कहा जाता है, रज्जु का परिणाम होने के कारण नहीं। इस प्रकार ब्रह्म के सर्वज्ञत्वादि धर्मों का निर्देश होने के कारण ‘‘यत्तदद्रेश्यम्’’—यहाँ ब्रह्म का ही उपदेश सिद्ध होता है प्रधान या जीवात्मा का उपास्यत्वेन उपदेश नहीं।
केवल ब्रह्म के धर्मों (लिङ्गों) के निर्देश से ही ब्रह्मपरता का यहाँ ज्ञान नहीं होता, अपि तु ‘पराविद्या’—इस प्रकार की समाख्या के बल पर भी उक्त श्रुति में ब्रह्मपरता अवगत होती है, ऐसा कहा जाता है—‘‘अपि चात्र द्वे विद्ये वेदितव्ये उक्ते—‘परा चैवापरा च’ इति ।’’ [अर्थात् जैसे लिङ्ग (सामर्थ्य) रूप तृतीय प्रमाण के द्वारा अङ्ग और प्रधान का सम्बन्ध अवगत होता है, वैसे ही समाख्या रूप षष्ठ प्रमाण के द्वारा भी ब्रह्म प्रधान (मुख्य) और
| ३०८ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. २ सू. २१ |
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भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवति' (मु० १।१।३) इति चैकविज्ञानेन सर्वविज्ञानापेक्षणं सर्वात्मके ब्रह्मणि विवक्ष्यमाणेऽवकल्प्यते, नाचेतनमात्रैकायतन प्रधाने, भोग्यव्यतिरिक्ते वा भोक्तरि। अपि च 'स ब्रह्मविद्यां सर्वविद्याप्रतिष्ठामथर्वाय ज्येष्ठपुत्राय प्राह' (मुण्ड० १।१।१) इति ब्रह्मविद्यां प्राधान्येनोपक्रम्य परापरविभागेन परां विद्यामक्षराधिगमनीं दर्शयंस्तस्या ब्रह्मविद्यात्वं दर्शयति। सा च ब्रह्मविद्यासमाख्या तदधिगम्यस्याक्षरस्याब्रह्मत्वे बाधिता स्यात्। अपरर्ग्वेदादिलक्षणा कर्मविद्या ब्रह्मविद्योपक्रम उपन्यस्यते ब्रह्मविद्याप्रशंसार्थै। 'प्लवा होते अदृढा यज्ञरूपा अष्टादशोक्त-
भामती
विद्य इति ॐ। लिङ्गान्तरमाह “कस्मिन् नु भगवः” इति। भोगा भोग्यास्तेभ्यो व्यतिरिक्ते भोक्तरि। अवच्छिन्नो हि जीवात्मा भोग्येभ्यो विषयेभ्यो व्यतिरिक्त इति तज्ज्ञानेन न सर्वं ज्ञातं भवति । समाख्यान्तरमाह ॐ अपि च स ब्रह्मविद्यां सर्वविद्याप्रतिष्ठाम् इति ॐ। ॐ प्लवा होतेऽदृढा यज्ञरूपा अष्टादश इति ॐ। प्लवन्ते गच्छन्ति अस्थायिन इति प्लवाः। अत एवादृढाः। के ते यज्ञरूपाः। रूप्यन्तेऽनेनेति रूपं, यज्ञो रूपमुपाधिर्येषां ते यज्ञरूपाः। तत्र षोडशर्त्विजः। ऋतुयजनेनोपाधिना ऋत्विक्शब्दः प्रवृत्त इति यज्ञोपाधय ऋत्विजः। एवं यजमानोऽपि यज्ञोपाधिरेव। एवं पत्नी, 'पत्युर्नो यज्ञसंयोगेः' इति स्मरणात्। त एतेऽष्टादश यज्ञरूपाः, येष्वृत्विगादिषूक्तं कर्म यज्ञः, यदाश्रयो यज्ञ इत्यर्थः। तच्च कर्मावरं, स्वर्गाद्य-
भामती-व्याख्या
उसके प्रतिपादक होने के कारण अङ्गभूत श्रुति-वाक्य का सम्बन्ध प्रतीत होता है। यौगिक शब्द को समाख्या कहते हैं। 'परा विद्या' शब्द भी वैसा ही है, क्योंकि "परस्य परमात्मनः प्रतिपाद्यमानत्वात्" अर्थात् जिस विद्या में पर ब्रह्म का प्रतिपादन है, उसे परा विद्या कहते हैं, इस लिए भी उक्त श्रुति की प्रतिपाद्य वस्तु ब्रह्म ही है।
"कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवति” (मुण्ड. १।१।३) इस प्रकार जिस एक तत्त्व के ज्ञान से समस्त प्रपञ्च का ज्ञान हो जाता है, वह एकमात्र ब्रह्म ही है, प्रधान या जीव नहीं, क्योंकि प्रधान केवल जड़-वर्ग का आश्रय है समस्त जगत् का आश्रय या सर्वात्मक नहीं और जीव भी शब्दादि भोग्य पदार्थों से भिन्न होने से सर्वात्मक नहीं, अतः प्रधान और जीव का ज्ञान हो जाने पर भी सर्व प्रपञ्च का ज्ञान सम्भव नहीं।
अन्य समाख्या प्रमाण दिखाते हैं- अपि च "स ब्रह्मविद्यां सर्वविद्याप्रतिष्ठामथर्वाय ज्येष्ठपुत्राय प्राह" (मुण्ड. १।१।१)। इस श्रुति में 'ब्रह्मविद्या' पद 'ब्रह्मणो विद्या'- इस प्रकार के षष्ठी तत्पुरुष समास के आधार पर ब्रह्मविषयिणी विद्या का वाचक है, प्रधानादि का ग्रहण करने पर उस ब्रह्मविद्या कहना बाधित हो जायगा - "ब्रह्मविद्या समाख्या तदधिगम्यस्याब्रह्मत्वे बाधिता स्यात्"। ब्रह्मविद्या की प्रशंसा के लिए ही ऋग्वेदादि रूप कर्मविद्या का उपन्यास किया गया है, क्योंकि “प्लवा ह्येते अदृढा यज्ञरूपा अष्टादशोक्तमवरं येषु कर्म। एतच्छ्रेयो येऽभिनन्दन्ति मूढा जरां मृत्युं ते पुनरेवापियन्ति ॥ (मुण्ड. १।२।७)। इस श्रुति में कर्मविद्या की निन्दा की गई है कि कर्म के कर्त्ता अधिक से अधिक अठारह ऋत्विक् हैं, वे 'ऋतुषु याजयन्ति' - इस व्युत्पत्ति के अनुसार यज्ञ कराने के कारण यज्ञरूपाः (यज्ञोपाधिकाः) कहे जाते हैं। इन्हें 'अदृढा प्लवाः' इसलिए कहा जाता है कि ये जीर्ण शीर्ण प्लव (नौका) के समान संसार सागर के पार नहीं ले जा सकते, मोक्षरूप नित्य फल कर्मों के द्वारा नहीं दिला सकते। अध्वर्युमण्डल के चार, होतृमण्डल के चार, उद्गातृमण्डल के चार और ब्रह्ममण्डल के चार को मिलाकर सोलह ऋत्विक् हैं। ये जैसे यज्ञोपाधिक हैं, वैसे ही यजमान भी है, क्योंकि 'यजति' - इस व्युत्पत्ति से उसके साथ यज्ञ का स्पष्ट सम्बन्ध है। इसी प्रकार यजमान
भूतयोनेः ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतोसंवलितम् ३०९
मवरं येषु कर्म । एतच्छ्रेयो येऽभिनन्दन्ति मूढा जरामृत्युं ते पुनरेवापियन्ति' (मुण्ड० १।२।७) इत्येवमादिनिन्दावचनात् । निन्दित्वा चापरां विद्यां ततो विरक्तस्य परविद्या- धिकारं दर्शयति—'परीक्ष्य लोकान्कर्मचितान्ब्राह्मणो निर्वेदमायान्नास्त्यकृतः कृतेन । तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्सम्तिपाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम्' (मुण्ड० १।२।१२) इति । यत्तूक्तम्—अचेतनानां पृथिव्यादीनां दृष्टान्तत्वेनोपादानाद्दार्ष्टान्तिकेनाप्यचेतनेन भूतयोनिना भवितव्यमिति—तदयुक्तम्, न हि दृष्टान्तदार्ष्टान्तिकयोरत्यन्तसाम्येन भवितव्यमिति नियमोऽस्ति । अपि च स्थूलाः पृथिव्यादयो दृष्टान्तत्वेनोपात्ता इति न स्थूल एव दार्ष्टान्तिको भूतयोनिरभ्युपगम्यते । तस्माददृश्यत्वादिगुणको भूतयोनिः परमेश्वर एव ॥ २१ ॥
विशेषणभेदव्यपदेशाभ्यां च नेतरौ ॥ २२ ॥
इतश्च परमेश्वर एव भूतयोनिर्नैतरौ—शारीरः प्रधानं वा । कस्मात् ? विशेषण- भेदव्यपदेशाभ्याम् । विशिनष्टि हि प्रकृतं भूतयोनिं शारीराद्विलक्षणत्वेन—'दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः सबाह्याभ्यन्तरो ह्यजः । अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रः' (मुण्ड० २।१।२) इति । न ह्येतद्दिव्यत्वादिविशेषणमविद्याप्रत्युपस्थापितनामरूपपरिच्छेदाभिमानिनस्तद्धर्मांस्वा- त्मनि कल्पयतः शारीरस्योपपद्यते । तस्मात्साक्षादौपनिषदः पुरुष इहोच्यते । तथा प्रधानादपि प्रकृतं भूतयोनिं भेदेन व्यपदिशति—'अक्षरात्परतः परः' इति । अक्षर- मव्याकृतं नामरूपबीजशक्तिरूपं भूतसूक्ष्ममीश्वराश्रयं तस्यैवोपाधिभूतं सर्वस्माद्वि- कारात्परो योऽविकारस्तस्मात्परतः पर इति भेदेन व्यपदेशात्परमात्मानमिह विवक्षितं
भामती
वरफलत्वात् । अपियन्ति प्राप्नुवन्ति । ॐ न हि दृष्टान्तदार्ष्टान्तिकयोः ॐ इत्युकाभिप्रायम् ॥ २१ ॥ विशेषणं हेतुं व्याचष्टे ॐ विशिनष्टि हि इति ॐ । शारीरादित्यूपलक्षणं, प्रधानादित्यपि द्रष्टव्यम् । भेदव्यपदेशं व्याचष्टे ॐ तथा प्रधानादपि इति ॐ । स्यादेतत्—किमागमिकं सांख्याभिमतं प्रधानम् ?
भामती-व्याख्या
की पत्नी भी यज्ञरूप या यज्ञोपधिक है, क्योंकि "पत्युर्नो यज्ञसंयोगे" (पा. सू. ४।१।३३) इस सूत्र के द्वारा पति' शब्द की इकार को नकार का आदेश यज्ञ के सम्बन्ध से ही होकर 'पत्नी' शब्द निष्पन्न होता है। इस प्रकार सोलह ऋत्विजों, यजमान और उसकी पत्नी को मिलाकर सब अष्टादश (अठारह) सदस्य 'यज्ञरूपाः' कहे जाते हैं। उनमें रहनेवाला अर्थात् उनके आश्रित कर्म यज्ञ है। वह कर्म अवर (निकृष्ट) इस लिए कहा जाता है कि वह केवल स्वर्गादि अनित्य फलों का ही जनक है, मोक्षरूप नित्य फल का प्रापक नहीं। जो लोग उन कर्मों का अभिनन्दन और अनुष्ठान करते हैं, वे जरा और मृत्यु के चक्कर में अपियन्ति (पड़े रहते हैं)। भाष्यकार ने जो कहा है—'न हि दृष्टान्तदार्ष्टान्तिकयोरत्यन्तसाम्येन भवितव्यम्' । उसका भी अभिप्राय यही है कि विवर्तवाद में पृथिव्यादि कार्य और उसके कारण का सारूप्य अपेक्षित नहीं ॥ २१ ॥
जीव-व्यावर्तक विशेषण एवं प्रधान से भिन्नता के निर्देश से जीव और प्रधान तत्त्व को जगत् का कारण नहीं कहा जा सकता । इस सूत्र में निर्दिष्ट विशेषण और भेद-व्यपदेश—इन दो हेतुओं में से प्रथम (विशेषण) हेतु की व्याख्या करते हैं—"विशिनष्टि हि प्रकृतं भूतयोनिं शारीराद् विलक्षणत्वेन—'दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः" (मुण्ड. २।१।२) ।" भाष्यकार ने जो कहा है—"शारीराद् विलक्षणत्वेन"। वहाँ 'शारीर' पद प्रधान तत्त्व का भी उपलक्षक है अर्थात् दिव्यत्वादि (स्वयंप्रकाशत्वादि) गुण जैसे जीव के व्यावर्तक हैं, वैसे ही प्रधान या
३१० ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. २ सू. २३
दर्शयति। नात्र प्रधानं नाम किंचित्स्वतन्त्रं तत्त्वमभ्युपगम्य तस्माद् भेदव्यपदेश उच्यते। किं तर्हि? यदि प्रधानमपि कल्प्यमानं श्रुत्यविरोधेनाव्याकृतादिशब्दवाच्यं भूतसूक्ष्मं परिकल्प्येत, परिकल्प्यताम्। तस्माद् भेदव्यपदेशात्परमेश्वरो भूतयोनिरित्येतदिह प्रतिपाद्यते ॥ २२ ॥
कुतश्च परमेश्वरो भूतयोनिः—
रूपोपन्यासाच्च ॥ २३ ॥
अपि च 'अक्षरात्परतः परः' इत्यस्यानन्तरम् 'एतस्माज्जायते प्राणः' इति प्राणप्रभृतीनां पृथिवीपर्यन्तानां तत्त्वानां सर्गमुक्त्वा तस्यैव भूतयोनेः सर्वविकारात्मकं रूपमुपन्यस्यमानं पश्यामः — 'अग्निर्मूर्धा चक्षुषी चन्द्रसूर्यौ दिशः श्रोत्रे वाग्विवृताश्च वेदाः। वायुः प्राणो हृदयं विश्वमस्य पद्भ्यां पृथिवी ह्येष सर्वभूतान्तरात्मा' (मुण्ड० २।१।४ इति)। तच्च परमेश्वरस्यैवोचितं, सर्वविकारकारणत्वात्। न शारीरस्य तनु- महिम्नः। नापि प्रधानस्यायं रूपोपन्यासः संभवति, सर्वभूतान्तरात्मत्वासंभवात्। तस्मात्परमेश्वर एव भूतयोनिर्ननेतरादिति गम्यते। कथं पुनर्भूतयोनेरेयं रूपोपन्यास इति गम्यते? प्रकरणात्, 'एषः' इति च प्रकृतानुकर्षणात्। भूतयोनिं हि प्रकृत्य 'एतस्माज्जायते प्राणः', 'एष सर्वभूतान्तरात्मा' इति वचनं भूतयोनिविषयमेव भवति। यथोपाध्यायं प्रकृत्यैतस्मादधीत्यैष वेदवेदाङ्गपारग इति वचनमुपाध्यायविषयं भवति, तद्वत्। कथं पुनरदृश्यत्वादिगुणकस्य भूतयोनेर्विग्रहवद्रूपं संभवति? सर्वात्मत्वविव- क्षयेदमुच्यते, न तु विग्रहवत्त्वविवक्षयेत्यदोषः। 'अहमन्नमहमन्नादः' (तै० ३।१०।६) इत्यादिवत्। अन्ये पुनर्मन्यन्ते—नायं भूतयोने रूपोपन्यासः, जायमानत्वेनोपन्यासात्।
भामती
तथा च बहुसमञ्जसं स्यादित्यत आह ॐ नात्र प्रधानं नाम किञ्चित् इति ॐ ॥ २२ ॥
तदेतत् परमतेनाक्षेपसमाधानाभ्यां व्याख्याय स्वमतेन व्याचष्टे ॐ अन्ये पुनर्मन्यन्ते इति ॐ। पुनःशब्दोऽपि पूर्वस्माद्विशेषं द्योतयन्स्वेष्टतां सूचयति। जायमानवर्गमध्यपतितस्याग्निमूर्धादिरूपवतः सति
भामती-व्याख्या
अव्याकृत के भी व्यावर्तक हैं। भेद-व्यपदेशरूप द्वितीय हेतु की व्याख्या करते है—"तथा प्रधानादपि प्रकृतं भूतयोनिं भेदेन व्यपदिशति —'अक्षरात्परतः परः' (मुण्ड. २।१।२) इति"। अव्याकृत या प्रधान तत्त्व की संज्ञा 'अक्षर' है, जगत् का कारण पदार्थ उस अक्षर से परे है।
शङ्का—जिस प्रधान तत्त्व से भेद का निर्देश किया गया है, वह क्या आगम-सिद्ध सांख्याभिमत प्रधान (प्रकृति) विवक्षित है? यदि ऐसा ही है, तब दो प्रधान रूप कारण और समस्त विकारात्मक प्रपञ्च में कार्य-कारणभाव के नियामक सारूप्यादि धर्मों का सामञ्जस्य हो जाता है।
समाधान—सांख्य-सम्मत प्रधान तत्त्व को वेदान्त-सिद्धान्त में कोई स्वतन्त्र पदार्थ नहीं माना जाता। यदि अव्याकृत (सूक्ष्मभूत शक्ति) को ही सांख्याचार्य प्रधान मानते हैं, तब के लिए प्रधानप्रतियोगिक भेदवत्ता का निर्देश किया गया है ॥ २२ ॥
"रूपोपन्यासाच्च"—इस सूत्र की पराभिमत व्याख्या की गई कि "अग्निर्मूर्धा चक्षुषी चन्द्रसूर्यौ दिशः श्रोत्रे वाग् विवृताश्च वेदाः" (मुण्ड. २।१।२) इत्यादि वाक्यों के द्वारा निर्दिष्ट स्वरूप परमेश्वर में ही घटता है, अन्यत्र नहीं। अब भाष्यकार स्वाभिमत व्याख्या अन्यमुखतः प्रस्तुत करते हैं—"अन्ये पुनर्मन्यन्ते"। यहाँ प्रयुक्त 'पुनः' शब्द के द्वारा पहली व्याख्या की अपेक्षा विशेष वैलक्षण्य दिखाते हुए इस व्याख्या की स्वाभीष्टता सूचित की है। पहली व्याख्या