भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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३०४ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[अ. १ पा. २ सू. २१

रिति युक्तं, अचेतनानामेव तद्दृष्टान्तत्वेनोपादानात् । 'यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णते च यथा पृथिव्यामोषधयः संभवन्ति । यथा सतः पुरुषात्केशलोमानि तथाऽक्षरात्सम्भव- तीह विश्वम्' (मुण्ड० १।१।७) इति । ननूर्ननाभिः पुरुषश्च चेतनाविव दृष्टान्तत्वे- नोपात्तौ । नेति ब्रूमः, न हि केवलस्य चेतनस्य तत्र सूत्रयोनित्वं वास्ति । चेतनाधि- ष्ठितं ह्यचेतनमूर्णनाभिशरीरं सूत्रस्य योनिः, पुरुषशरीरं च केशलोम्नामिति प्रसिद्धम् । अपि च पूर्वत्रादृष्टत्वाद्यभिलापसंभवेऽपि द्रष्टृत्वाद्यभिलापासंभवान्न प्रधानमभ्युप- गतम् । इह त्वदृश्यत्वादयो धर्माः प्रधाने संभवन्ति । न चात्र विरुध्यमानो धर्मः कश्चिदभिलप्यते । ननु 'यः सर्वज्ञः सर्ववित्' (मुण्ड० १।१।९) इत्ययं वाक्यशेषोऽचे- तने प्रधाने न सम्भवति, कथं प्रधानं भूतयोनिः प्रतिज्ञायत इति । अत्रोच्यते—'यया तदक्षरमधिगम्यते', 'यत्तदद्रेश्यम्' इत्यक्षरशब्देनादृश्यत्वादिगुणं भूतयोनिं श्राव- यित्वा पुनरन्ते श्रावयिष्यति—'अक्षरात्परतः परः' ( मुण्ड० २।१।२) इति । तत्र यः परोऽक्षराच्छुतः, स सर्वज्ञः सर्ववित्संभविष्यति । प्रधानमेव त्वक्षरशब्दनिर्दिष्टं

भामती

परिणममानसरूपा एव हि परिणामा दृष्टाः, यथोर्णनाभिलालापरिणामा लुतातन्तवस्तत्सरूपाः । तथा विवर्ता अपि विवर्तमानसुरूपा एव, न विरूपाः । यथा रज्जुविवर्ता धारोरगादयो रज्जुसरूपाः । न जातु रज्ज्वां कुञ्जर इति विपर्यस्यन्ति । न च हेमपिण्डपरिणामो भवति लूतातन्तुः, तत् कस्य हेतोः ? अत्यन्तवैरूप्यात् । तस्मात्प्रधानमेव जडं जडस्य जगतो योनिरिति युज्यते । स्वविकारानश्नुत इति तदक्षरम् । यः सर्वज्ञः सर्वविदिति चाक्षरात् परात्परस्याख्यानम्, 'अक्षरात् परतः परः' इति श्रुतेः । न हि परस्मादात्मनोऽर्वाग्विकारजातस्य च परस्तात् प्रधानादृतेऽन्यदक्षरं सम्भवति । अतो यः प्रधानात्परः परमात्मा स सर्ववित् , भूतयोनिरस्त्वक्षरं प्रधानमेव तच्च सांख्याभिमतमेवास्तु । अथ तस्याप्रामाणिकत्वान्न

भामती-व्याख्या

मृत्तिका परिणममान और घटादि परिणाम हैं, परिणममान और परिणाम पदार्थों में सरूपता (समानरूपता) देखी जाती है, जैसे कि ऊर्णनाभि (मकड़ी) की लाला (लार, लासा या लुआब) जाले के रूप में परिणत होती है, उन दोनों में समानरूपता अनुभव-सिद्ध है, उसी प्रकार रज्जु विवर्तमान और सर्पादि विवर्त हैं, उन दोनों में भी समानरूपता पाई जाती है, विरूपता (विरुद्धरूपता) नहीं, क्योंकि रज्जु-जैसे प्रलम्बाकार पदार्थ में वैसे ही सर्प, धारा और दण्डादि पदार्थों का भ्रम होता है, हाथी या ऊँट का नहीं। हेम-पिण्ड (सोने का डला) कभी मकड़ी का जाला नहीं बनता, वह क्यों ? उन दोनों में अत्यन्त विरूपता होती है। अतः जड़रूप प्रधान तत्त्व ही इस जड़ जगत् का कारण है—ऐसा मानना ही युक्ति-युक्त है। प्रधान (प्रकृति) को अक्षर इस लिए कहा जाता है कि वह 'अशू व्याप्तौ' धातु से “अशेः सरः” (उणा. ३।७०) इस सूत्र के द्वारा निष्पन्न 'अक्षर' शब्द का 'अश्नुते व्याप्नोति स्वविकारान्'- ऐसी व्युत्पत्ति से लब्ध अर्थ है। “यः सर्वज्ञः सर्ववित्”-इसका अन्वय “अक्षरात् परतः परः” (मुण्ड. २।१।२) इसके साथ है, अर्थात् जो अक्षर (प्रधान) से परे या ऊपर अवस्थित परमात्मतत्त्व है, वह सर्वज्ञ और सर्ववित् है [“अक्षरात् परतः परः”- इस श्रुति में 'परतः' पद अक्षरात् का विशेषण है, अतः विकारवर्ग (कार्य-प्रपञ्च) से पर अवस्थित जो अक्षरसंज्ञक प्रधान तत्त्व है, उससे पर परमात्मा है—इसी भाव को मिश्र जी यहाँ ध्वनित करते हैं-] विकार-समूह से परे अवस्थित जो प्रधान तत्त्व है, उससे भिन्न अन्य कोई अक्षर पदार्थ नहीं। इस प्रधान तत्त्व से परे जो परमात्मा है, वह सर्ववित् है। सभी भूत पदार्थों की योनि (कारण) तो अक्षर नाम से प्रसिद्ध जो प्रधान तत्त्व है, वह