भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभूतयोनेः ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ३०५
भूतयोनिः यदा तु योनिशब्दो निमित्तवाची, तदा शारीरोऽपि भूतयोनिः स्यात्, धर्माधर्माभ्यां भूतजातस्योपार्जनादिति। एवं प्राप्तेऽभिधीयते - योऽयमदृश्यत्वादिगुणको भूतयोनिः स परमेश्वर एव
भामती तत्र परितुष्यति, अस्तु तर्हि नामरूपबीजशक्तिभूतमव्याकृतं भूतसूक्ष्मं, प्रधीयते हि तेन विकारजातमिति प्रधानं, तत् खलु जडमनिर्वच्यमनिर्वाच्यस्य जडस्य नामरूपप्रपञ्चस्योपादानं युज्यते, सारूप्यात्। न तु चिदात्मा निर्वाच्यः, विरूपो हि सः। अचेतनानामिति भाष्यं सारूप्यप्रतिपादनपरम्। स्यादेतत्—स्मातं प्रधाननिराकरणेनैवैतदपि निराकृतप्रायं तत् कुतोऽस्य शङ्केत्यत आह— ॐ अपि च पूर्वत्राद्रष्टृत्वादि इति ॐ। सति बाधकेऽन्यानाश्रयणमिह तु बाधकं नास्तीत्यर्थः। तेन तदैक्षतेत्यादावुपचयंतो ब्रह्मणो जगद्यो-निताऽविद्याशक्त्याश्रयत्वेन। इह त्वविद्याशक्तेरेव जगद्योनित्वसम्भवे न द्वारद्वारिभावो युक्त इति प्रधान-मेवात्र वाक्ये जगद्योनिरुच्यत इति पूर्वः पक्षः। अथ योनिशब्दो निमित्तकारणपरस्तथापि ब्रह्मैव निमित्तं न तु जीवात्मेति विनिगमनायां न हेतुरस्तीति संशयेन पूर्वः पक्षः। अत्रोच्यते — अक्षरस्य जगद्योनिभावमुक्त्वा ह्यनन्तरम्। यः सर्वज्ञ इति श्रुत्या सर्वज्ञस्य स उच्यते ॥ १ ॥
भामती-व्याख्या सांख्य-सम्मत ही सही। सांख्य-सम्मत प्रधान यदि अप्रामाणिक है, अतः उसका अभ्युपगम अभीष्ट नहीं, तब नाम ( शब्द ) और रूप ( अर्थ ) की बीज-शक्तिरूप अव्याकृत ( सूक्ष्म भूतों ) को प्रधान कहा जा सकता है, क्योंकि 'प्रधीयते येन विकारजातम्'—इस व्युत्पत्ति के अनुसार वह अनिर्वचनीय है और नामरूपात्मक अनिर्वचनीय प्रपञ्च का उपादानकारण है, अतः उसी में कार्य-वर्ग की समानरूपता है, चिदात्मा में नहीं, क्योंकि वह सत्त्वेन निर्वाच्य एवं चेतन होने के कारण कार्य-वर्ग के विरूप है। "अचेतनानामेव तद्दृष्टान्तत्वेनोपादानात्"— इस भाष्य का तात्पर्य कार्य और कारण की समानरूपता के प्रतिपादन में ही है।
शङ्का—सांख्य-स्मृति-सिद्ध प्रधान तत्त्व का निराकरण तो "ईक्षतेर्नाशब्दम्" ( ब्र० सू० १।१।५ ) इस सूत्र में ही किया जा चुका है, तब न तो उसमें जगत् की कारणता मानी जा सकती है और न अव्याकृतात्मक प्रधान में, क्योंकि उसी प्रकार यह प्रधान भी निराकृत-प्राय ही है।
समाधान—उक्त शङ्का का निराकरण भाष्यकार करते हैं—"अपि च पूर्वत्राद्रष्टृत्वाद्य-भिलापसम्भवेऽपि द्रष्टृत्वाद्यभिलापासम्भवान्न प्रधानमभ्युपगतम्"। आशय यह है कि पूर्वत्र ईक्षणाभावरूप बाधक के कारण प्रधान तत्त्व को जगत् का कारण नहीं माना जा सका किन्तु यहाँ अपेक्षित अदृश्यत्वादि का सद्भाव होने के कारण उसमें जगत्कारणता का पूर्व पक्ष उठाया गया है कि "तदैक्षते"—इत्यादि वाक्यों के द्वारा ब्रह्म में जगत् की कारणता का उपचार किया जा सकता है, क्योंकि वह अविद्यारूप शक्ति की विषयता का आश्रय है, किन्तु "यत्तदद्रेश्यम्"—इत्यादि वाक्यों के द्वारा अविद्याशक्ति स्वरूप प्रधान तत्त्व में ही जगद्योनिता का उपपादन सम्भव है, अतः उसके द्वारा ब्रह्म में जगत् की कारणता का संगमन उचित नहीं।
यदि सूत्रस्थ 'योनि' शब्द उपादान कारण का बोधक न होकर निमित्त कारण का वाचक है, तब जीव में जगद्योनिता आशङ्कित हो सकती है, क्योंकि 'ब्रह्म ही जगत् का कारण है, जीव नहीं'—इस प्रकार की विनिगमना में कोई हेतु उपलब्ध नहीं।
सिद्धान्त—अक्षरस्य जगद्योनिभावमुक्त्वा ह्यनन्तरम्।
यः सर्वज्ञ इति श्रुत्या सर्वज्ञस्य स उच्यते ॥ १ ॥
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