भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ३०२ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. २ सू. १९ |
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प्रतिषेधशास्त्रं चेति सर्वमेतदुपपद्यते। तथा च श्रुतिः—‘यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरं पश्यति’ इत्यविद्याविषये सर्वं व्यवहारं दर्शयति। ‘यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं पश्येत्’ इति विद्याविषये सर्वं व्यवहारं वारयति॥ २०॥
भामती
तयः प्रत्यक्षादीनि प्रमाणानि संसारानुभवो विधिनिषेधशास्त्राणि च। एवं चाधिदैवादिश्वेकस्यैवान्तर्यामिणः प्रत्यभिज्ञानं समञ्जसं भवति, यः सर्वान् लोकान् यः सर्वाणि भूतानीत्यत्र य इत्येकवचनमुपपद्यते। अमृतत्वञ्च परमात्मनि समञ्जसं नान्यत्र। य आत्मनि तिष्ठन्नित्यादौ चाभेदेऽपि भेदोपचारक्लेशो न भविष्यति। तस्मात्परमात्मान्तर्यामी न जीवाविरिति सिद्धम्। पृथिव्यादिस्तनयित्न्वन्तमधिदैवम्। यः सर्वेषु लोकेष्वित्यधिलोकम्। यः सर्वेषु वेदेष्वित्यधिवेदम्। यः सर्वेषु यज्ञेष्वित्यधियज्ञम्। यः सर्वेषु भूतेष्वित्यधिभूतम्। प्राणाद्यात्मान्तमध्यात्मम्। संज्ञाया अप्रसिद्धत्वादित्युपक्रममात्रं पूर्वः पक्षः। ॐदर्शनादिक्रियायाः कर्त्तरि प्रवृत्तिविरोधात्ॐ। कर्त्तरि आत्मनि प्रवृत्तिविरोधादित्यर्थः॥ १८–२०॥
भामती-व्याख्या
और ज्ञेय का भेद बतानेवाली श्रुतियाँ, प्रत्यक्षादि लौकिक प्रमाण, संसरण (जन्म-मरण) की अनुभूति एवं विधि-निषेधात्मक शास्त्र। इस प्रकार का अन्तर्यामी मानने पर ही आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक प्रपञ्च में अन्तर्यामी पुरुष की एकत्व-प्रत्यभिज्ञा समञ्जस होती है एवं “यः सर्वान् लोकान्”, “यः सर्वाणि भूतानि”—यहाँ एकवचनान्त ‘यः’ शब्द का प्रयोग उपपन्न हो जाता है। अमृतत्व तो मुख्यरूप से ब्रह्म में ही घटता है, अन्यत्र नहीं। “य आत्मनि तिष्ठन्”—यहाँ पर जीव-पक्ष में जो औपचारिक (औपाधिक) भेद की कल्पना करनी पड़ती थी, वह कल्पना-क्लेश भी ब्रह्म-पक्ष में नहीं, क्योंकि सिद्धान्त में अभेद ही माना जाता है। अतः परमात्मा ही सर्वान्तर्यामी है, जीव और देवादि नही—यह सिद्ध हो गया।
भाष्यकार ने जो इस अधिकरण के आरम्भ में कहा है—(१) “अत्राधिदैवतम्, (२) अधिलोकम्, (३) अधिवेदम्, (४) अधियज्ञम्, (५) अधिभूतम्, (६) अध्यात्मं च अन्तर्यामी श्रूयते।” उस भाष्य के अधिदैर्वादि भेद बृहदारण्यक उपनिषत् के वाक्यों में इस प्रकार हैं—(१) “यः पृथिव्यां तिष्ठन्” (बृह. उ. ३।७।३) यहाँ से लेकर “यः स्तनयित्नौ तिष्ठन्”—यहाँ तक अधिदैवत (पृथिव्यादि के अभिमानी देवताओं में वर्तमान) अन्तर्यामी प्रतिपादित है [शुक्ल यजुर्वेदीय बृहदारण्यक नाम की दो पुस्तकें हैं—(१) माध्यन्दिनी या वाजसनेयी शाखा की और (२) दूसरी काण्व शाखा की। इनमें वाचस्पति मिश्र ने यहाँ माध्यन्दिनीय बृहदारण्यक का क्रम उद्धृत किया है, क्योंकि काण्वशाखीय बृहदारण्यक में “यः स्तनयित्नौ”—ऐसा पाठ नहीं, अपितु “यस्य तेजः शरीरं यस्तेजोऽन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याम्यमृत इत्यधिदैवतम्” (बृह. उ. ३।७।१४) ऐसा पाठ है]। “यः सर्वेषु लोकेषु”—इत्यादि खण्ड में अधिलोक, “यः सर्वेषु वेदेषु”—इत्यादि खण्ड में अधिवेद, “यः सर्वेषु यज्ञेषु” इत्यादि खण्ड में अधियज्ञ, “यः सर्वेषु भूतेषु” इत्यादि खण्ड में अधिभूत और “यः प्राणेषु तिष्ठन्”—यहाँ से लेकर “य आत्मनि तिष्ठन्”—यहाँ तक अध्यात्म अन्तर्यामी चर्चित है।
भाष्यकार ने जो कहा है—‘‘संज्ञाया अप्रसिद्धत्वात् संज्ञिनाऽप्यप्रसिद्धेन भवितव्यम्’’। वह पूर्वपक्ष का उपक्रम मात्र है, उस पक्ष पर पूर्व पक्षी का भी विश्वास नहीं, अत एव “अथवा” से पक्षान्तर प्रस्तुत किया गया है। भाष्यकार ने “न च स्मार्तम्” ब्र. सू. १।२।१९) इस सूत्र में कहा है—“दर्शनादिक्रियायाः कर्त्तरि प्रवृत्तिविरोधात्”। वहाँ ‘कर्तरि’ शब्द का