भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 316, कुल 639 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 316

२९८ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. २ सू. १८

ज्योतिः' ( बृ० ३।९।१० ) इत्यादि । स च कार्यकारणवत्त्वात्पृथिव्यादीनन्तस्तिष्ठन्नयम- यतीति युक्तं देवतात्मनो यमयितृत्वम् । योगिनो वा कस्यचित्सिद्धस्य सर्वानुप्रवेशेन

भामती

प्रवृत्तिनियमनलक्षणं हि कार्य्यं चेतनस्य शरीरिणः स्वशरीरेन्द्रियादौ वा शरीरेण वा वाश्यादौ दृष्टं नाशरीरस्य ब्रह्मणो भवितुमर्हति । नहि जातु वटाङ्कुरः कुटजबीजाज्जायते । तदनेन जन्माद्यस्य यत इत्येतदप्याक्षिप्तं वेदितव्यम् । तस्मात्परमात्मनः शरीरेन्द्रियादिरहितस्यान्तर्यामित्वाभावात् प्रधानस्य वा पृथिव्याद्यभिमानवत्या देवताया वाऽणिमाद्यैश्वर्य्ययोगिनो योगिनो वा जीवात्मनो वाऽन्तर्यामिता स्यात् । तत्र यद्यपि प्रधानस्यादृष्टत्वाश्रुतत्वामत्वत्वाविज्ञातत्वानि सन्ति, तथापि तस्याचेतनस्य द्रष्टृत्व- श्रोतृत्वमन्तृत्वविज्ञातृत्वानि श्रुतानामभावाद् अनात्मत्वाच्चैष त आत्मेति श्रुतेरनुपपत्तेर्न प्रधानस्यान्तर्या- मिता । यद्यपि पृथिव्याद्यभिमानिनो देवस्यात्मत्वमस्ति, अदृष्टत्वादयश्च सह द्रष्टृत्वादिभिरुपपद्यन्ते, शरीरे- न्द्रियादियोगश्च, पृथिव्येव यस्यायतनमग्निर्लोको मनोज्योतिरित्यादिश्रुतेः, तथापि तस्य प्रतिनियतनियमनाद् 'यः सर्वान् लोकानन्तरो यमयति यः सर्वाणि भूतान्यन्तरो यमयति' इति श्रुतिविरोधादनुपपत्तेः, योगी तु यद्यपि लोकभूतवशितया सर्वान् लोकान् सर्वाणि च भूतानि नियन्तुमर्हति तत्र तत्रानेकविधदेहेन्द्रियादि- निर्माणेण स एकधा भवति त्रिधा भवतीत्यादिश्रुतिभ्यः, तथापि जगद्व्यापारवर्ज प्रकरणादिति वक्ष्यमाणेण न्यायेन विकारविषये विद्यासिद्धानां व्यापाराभावात्सोऽपि नान्तर्यामी । तस्मात् पारिशेष्याज्जीव एव

भामती-व्याख्या

लोक में देखा जाता है कि तक्षा ( बढ़ई ) आदि चेतनात्मा अपने पूर्व कर्माजित शरीर और उसके द्वारा वास्य ( वसूला ) आदि साधनों का नियमन करता है, क्योंकि प्रवृत्ति और निवृत्ति का नियमन किसी शरीरधारी चेतन का ही कार्य है, शरीर-रहित ब्रह्म का नहीं । असमर्थ या अयोग्य पदार्थ से कोई कार्य नहीं होता, जैसे कि वट वृक्ष का अंकुर कभी कुटज के बीज से नहीं उगता । इस आक्षेप के द्वारा “जन्माद्यस्य यतः”--इत्यादि शास्त्र भी आक्षिप्त ( आहत ) हो जाता है । अतः शरीर, इन्द्रियादि साधनों से रहित परमात्मा ( ब्रह्म ) में नियन्तृत्व सम्भव नहीं । फलतः पृथिव्यादि की अभिमानिनी प्रकृति ( प्रधान ) या अणिमादि ऐश्वर्यशाली योगी अथवा जीवात्मा ही अन्तर्यामी हो सकता है । इनमें से सांख्याभिमत प्रधानतत्त्व में यद्यपि श्रुति-चर्चित अदृष्टत्व, अश्रुतत्व, अमंतत्व और अविज्ञातत्वादि धर्म हैं, तथापि प्रधान तत्त्व जड है, अतः उसमें श्रुति-कथित द्रष्टृत्व, श्रोतृत्व और मन्तृत्वादि धर्मों का अभाव है, एवं प्रधानतत्त्व अनात्मा है, अतः उसमें "एष ते आत्मा" - इस श्रुति का सामञ्जस्य नहीं होता, इस लिए प्रधान तत्त्व में श्रौत अन्तर्यामिता सम्भव नहीं ।

पृथिव्यादि के अभिमानी देवता में यद्यपि आत्मत्व, अदृश्यत्वादि, द्रष्टृत्वादि धर्म हैं और शरीरेन्द्रियादि का सम्बन्ध भी है, क्योंकि श्रुति कहती है - पृथिव्येव यस्यायतनमग्निर्लोको मनो ज्योतिः" ( बृह. उ. ३।९।१० ) । तथापि उसमें केवल कुछ ही पदार्थों का नियन्तृत्व है' सर्वलोक-नियन्तृत्व नहीं, श्रुति अपने अन्तर्यामी में सर्वलोक-नियन्तृत्व प्रतिपादित करती है - "यः सर्वान् लोकानन्तरो यमयति, यः सर्वाणि भूतान्यन्तरो यमयति" ।

सर्व ऐश्वर्य-सम्पन्न योगी यद्यपि सभी लोकों और भूतों का वशी होने के कारण नियामक हो सकता है । वह सर्व जगत् का नियमन करने के लिए अपने योग-बल से अनेक प्रकार के शरीर और इन्द्रियादि का निर्माण कर लेता है - "स एकधा भवति, त्रिधा भवति" ( छां. ७।२६।२ ) । तथापि "जगद्व्यापारवर्जं प्रकरणात्" ( ब्र सू. ४।४।१७ ) यह सूत्र कहता है कि जगत्सर्जनरूप कार्य ( विद्या-सिद्ध ) योगी नहीं कर सकता, अतः वह भी कथित अन्तर्यामी नहीं हो सकता । परिशेषतः जीव ही यहाँ अन्तर्यामी है, क्योंकि वह चेतन है,