भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअन्तर्यामिणो ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २९९
यमयितृत्वं स्यात् , न तु परमात्मा प्रतीयते, अकार्यकरणत्वादित्येवं प्राप्त इदमुच्यते— योऽन्तर्याम्यधिदेवादिषु श्रूयते, स परमात्मैव स्यान्नान्य इति । कुतः ? तद्धर्मव्यप-
भामती
चेतनो देहेन्द्रियादिमान् द्रष्टृत्वादिसम्पन्नः स्वयमदृश्यादिः स्वात्मनि वृत्तिविरोधादमृतश्च देहनाशेऽप्य- नाशात् । अन्यथाऽऽमुष्मिकफलोपभोगाभावेन कृतविप्रणाशाकृताभ्यागमप्रसङ्गात् । य आत्मनि तिष्ठन्निति चाभेदेऽपि कथञ्चिद्भेदोपचारात् स भगवः कस्मिन् प्रतिष्ठितः स्वे महिन्नोतिवत् । यमात्मा न वेदेति च स्वात्मनि वृत्तिविरोधाभिप्रायम् । यस्यात्मा शरीरमित्यादि च सर्वं स्वे महिम्नीतिवद्योजनीयं, यदि पुन- रात्मनोऽपि नियन्तुरन्यो नियन्ता भवेद् वेदिता वा ततस्तस्याप्यन्य इत्यनवस्था स्यात् । सर्वलोकभूत- नियन्तृत्वञ्च जीवस्यादृष्टद्वारा, तदुपार्जितौ हि धर्माधर्मौ नियच्छत इत्यनया द्वारा जीवो नियच्छति । एकवचनञ्च जात्यभिप्रायम् । तस्माज्जीवात्मैवान्तर्यामी, न परमात्मेति ।
एवं प्राप्तेऽभिधीयते— देहेन्द्रियादिनियमे नास्य देहेन्द्रियान्तरम् । तत्कर्मोपार्जितं तच्चेत्तदविद्याजितं जगत् ॥
भामती-व्याख्या
देहेन्द्रियादि से युक्त है, द्रष्टृत्वादि-सम्पन्न और स्वयं अदृश्य है, क्योंकि दर्शनादि क्रिया द्रष्टा से भिन्न दृश्य जगत् को ही व्याप्त करती है । वह अमृत इसलिए कहा जाता है कि देह और इन्द्रियादि का नाश हो जाने पर भी नष्ट नहीं होता, अन्यथा पारलौकिक कर्म-फलों का उपभोग न ही सकने के कारण कृत-प्रणाश एवं पूर्व जन्म में न होने के कारण अकृत कर्मों के फलभूत इस शरीर का अभ्यागम ( प्राप्ति ) मानना होगा । “य आत्मनि तिष्ठन्”—ऐसा व्यवहार भी जीव में वैसे ही सम्पन्न हो जाता है, जैसे ब्रह्म में “स भगवः कस्मिन् प्रतिष्ठितः ? स्वे महिम्नि” ( छां. ७।२४।१ ) ऐसा व्यवहार [ “स्वे महिम्नि”—यहाँ पर श्रुति ने ही भूमा से भिन्न गो और अश्वादि को ‘महिमा’ पद का अर्थ बताकर ‘प्रतिष्ठ’ शब्द का गौण अर्थ सूचित किया है, भाष्यकार कहते हैं—“तदाश्रितः तत्प्रतिष्ठश्चैत्रो भवति” ( छां. पृ. ४३१ ), किन्तु “स्वे महिम्नि” इस वाक्य से पूर्व ‘यत्र नान्यत् पश्यति” ( छां. ७।२४।१ ) इस वाक्य की व्याख्या में भाष्यकार ने कहा है—“नन्वयमेव दोषः —संसारानिवृत्तिः, क्रियाकारकफलभेदो हि संसारः इति चेत्, न, अविद्याकृतभेदापेक्षत्वात्” अर्थात् जीव और ब्रह्म का अविद्यावस्थ भेद लेकर अभिन्न वस्तु में भी अधिकरणत्व और आधेयत्वादि का व्यवहार किया जा सकता है] । “यमात्मा न वेद”—ऐसा कहना जीवात्मा के लिए उचित है, क्योंकि आत्मगत (अपने में रहनेवाली ) वेदन ( दर्शन ) क्रिया की कर्मता स्वयं अपने में नहीं रह सकती । “यस्यात्मा शरीरम्”—इत्यादि भेद-सापेक्ष व्यवहार अविद्या की छाया में वैसे ही सम्पन्न किए जा सकते हैं, जैसे—“स्वे महिम्नि” । यदि जीवात्मा का भी कोई अन्य नियन्ता ( अन्तर्यामी ) माना जाता है, तब उस नियन्ता का भी कोई अन्य नियन्ता और उसका भी कोई अन्य—इस प्रकार अनवस्था प्रसक्त होती है । सभी प्राणियों और लोकों का नियमन जीव अपने अदृष्टों के द्वारा करता है अर्थात् जीव के द्वारा उपार्जित धर्माधर्म मुख्यतः जगत् का नियमन करते हैं और उसका व्यवहार जीव में वैसे ही हो जाता है, जैसे सैनिकों के द्वारा किए गए जय-पराज- यादि का व्यवहार राजा में होता है । जगत् के नियन्ता धर्माधर्मादि यद्यपि अनेक हैं, तथापि अदृष्टत्वरूप जाति की एकता को ध्यान में रख कर ‘यः’ और यमयति’—इस प्रकार नियन्तृगत एकत्व का व्यवहार संगत हो जाता है । फलतः जीवात्मा ही जगत् का अन्तर्यामी है, परमात्मा नहीं ।