भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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३०० ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. २ सू. १८

देशात्। तस्य हि परमात्मनो धर्मा इह निर्दिश्यमाना दृश्यन्ते। पृथिव्यादि तावदधि- दैवादिभेदभिन्नं समस्तं विकारजातमन्तस्तिष्ठन् यमयतीति परमात्मनो यमयितृत्वं धर्म उपपद्यते, सर्वविकारकारणत्वे सति सर्वशक्त्युपपत्तेः। 'एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः' इति चात्मत्वामृतत्वे मुख्ये परमात्मन उपपद्येते। 'यं पृथिवी न वेद' इति च पृथिवी- देवताया अविज्ञेयमन्तर्यामिणं ब्रुवन्देवतात्मनोऽन्यमन्तर्यामिणं दर्शयति। 'पृथिवी देवता ह्यहमस्मि पृथिवीत्यात्मानं विजानीयात्'। तथा 'अदृष्टोऽश्रुतः' इत्यादिव्यप- देशो रूपादिविहीनत्वात्परमात्मन उपपद्यत इति। यत्त्वकार्यकरणस्य परमात्मनो यमयितृत्वं नोपपद्यत इति। नैष दोषः, यन्नियच्छति तत्कार्यकरणैरेव, तस्य कार्य- करणवत्त्वोपपत्तेः। तस्याप्यन्यो नियन्तेत्यनवस्थादोषश्च न संभवति, भेदाभावात्। भेदे


भामती

श्रुतिस्मृतीतिहासपुराणेषु तावदत्र भवतः सर्वज्ञस्य सर्वशक्तेः परमेश्वरस्य जगद्योनित्वमवगम्यते। न तत् पृथग्जनसाधारण्यनुमानाभासेनागमविरोधिना शक्यमपह्नोतुम्। तथा च सर्वं विकारजातं तदविद्याशक्तिपरिणामस्तस्य शरीरेन्द्रियस्थाने वर्त्तत इति यथायथं पृथिव्यादिदेवताविकार्यकरणस्तानेव पृथिव्यादिदेवतादीन् शक्नोति नियन्तुम्। न चानवस्था, न हि नियन्त्रन्तरं तेन नियम्यते, किन्तु यो जीवो नियन्ता लोकसिद्धः स परमात्मैवोपाध्यवच्छेदकल्पितभेदस्तथा व्याधायत इत्यसकृदावेदितं, तत् कुतो नियन्त्रन्तरं? कुतश्चानवस्था? तथा च नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टेत्याद्या अपि श्रुतय उपपन्नायाः। परमार्थ-


भामती-व्याख्या

सिद्धान्त—

देहेन्द्रियादिनियमने नास्य देहेन्द्रियान्तरम् ।
तत्कर्मोपार्जितं तच्चेत् तदविद्याजितं जगत् ॥

इस जीव में जगत् का नियन्तृत्व (नियमन) देहेन्द्रियादि के द्वारा सम्भव नहीं, क्योंकि नियम्य जगत् के अन्तर्गत देहेन्द्रियादि भी हैं, उनका नियमन अन्य देहेन्द्रियादि के द्वारा सम्भव नहीं। यदि जीवाश्रित अदृष्ट के द्वारा अन्तर्यामित्व का सम्पादन किया जाता है, तब ब्रह्माश्रित या ब्रह्मविषयक अविद्या शक्ति के द्वारा उसमें अन्तर्यामित्व क्यों नहीं बन सकता ? श्रुति, स्मृति, इतिहास और पुराणों में सर्वज्ञ एवं सर्वशक्ति-समन्वित ब्रह्म को जगत् की योनि और अन्तर्यामी माना गया है। जीवों में एक अशक्त, अबोध साधारण जीव भी है, उसमें जगत्-नियन्तृत्व की कल्पना जिस अनुमान के द्वारा की जाती है, वह शास्त्र-विरुद्ध होने के कारण अनुमानाभास है, सदनुमान नहीं। ऐसे अनुमान के द्वारा आगम-सिद्ध ब्रह्मगत अन्तर्यामित्व का अपलाप नहीं किया जा सकता। यह जो कहा जाता है कि लोक-प्रसिद्ध कुलालादि में कार्य-नियमन देहेन्द्रियादि के द्वारा ही देखा जाता है, वह भी यहाँ असम्भव नहीं, क्योंकि परमेश्वर की अविद्या शक्ति के द्वारा विरचित प्रपञ्च ही उसका शरीरेन्द्रियादि है, उनके द्वारा ही वह यथायोग्य समस्त पृथिव्यादि अधिभूत, अधिदेव और अध्यात्म जगत् का नियमन करता है। यहाँ किसी प्रकार की अनवस्था प्रसक्त नहीं होती, क्योंकि यदि जीव से भिन्न किसी नियन्ता की कल्पना की जाती, तब अवश्य नियन्तृ-परम्परा की कल्पना से अनवस्था होती, प्रकृत में जिस परमेश्वर को अन्तर्यामी माना जाता है, वह जीव से भिन्न नहीं, अपितु परमात्मा ही उपाधिरूप अवच्छेदक के भेद से भिन्न-जैसा प्रतीयमान जीव ही लोक में नियन्तृत्वेन प्रसिद्ध है—यह कई बार कहा जा चुका है। तब न तो वह नियन्त्र्यन्तर कहा जा सकता है और न अनवस्था प्रसक्त होती है। जीवात्मा और परमात्मा का वास्तविक भेद न होने के कारण "नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा" (बृह. उ. ३।७।२३) इत्यादि भेद-निषेधक