भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ३०८ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. २ सू. २१ |
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भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवति' (मु० १।१।३) इति चैकविज्ञानेन सर्वविज्ञानापेक्षणं सर्वात्मके ब्रह्मणि विवक्ष्यमाणेऽवकल्प्यते, नाचेतनमात्रैकायतन प्रधाने, भोग्यव्यतिरिक्ते वा भोक्तरि। अपि च 'स ब्रह्मविद्यां सर्वविद्याप्रतिष्ठामथर्वाय ज्येष्ठपुत्राय प्राह' (मुण्ड० १।१।१) इति ब्रह्मविद्यां प्राधान्येनोपक्रम्य परापरविभागेन परां विद्यामक्षराधिगमनीं दर्शयंस्तस्या ब्रह्मविद्यात्वं दर्शयति। सा च ब्रह्मविद्यासमाख्या तदधिगम्यस्याक्षरस्याब्रह्मत्वे बाधिता स्यात्। अपरर्ग्वेदादिलक्षणा कर्मविद्या ब्रह्मविद्योपक्रम उपन्यस्यते ब्रह्मविद्याप्रशंसार्थै। 'प्लवा होते अदृढा यज्ञरूपा अष्टादशोक्त-
भामती
विद्य इति ॐ। लिङ्गान्तरमाह “कस्मिन् नु भगवः” इति। भोगा भोग्यास्तेभ्यो व्यतिरिक्ते भोक्तरि। अवच्छिन्नो हि जीवात्मा भोग्येभ्यो विषयेभ्यो व्यतिरिक्त इति तज्ज्ञानेन न सर्वं ज्ञातं भवति । समाख्यान्तरमाह ॐ अपि च स ब्रह्मविद्यां सर्वविद्याप्रतिष्ठाम् इति ॐ। ॐ प्लवा होतेऽदृढा यज्ञरूपा अष्टादश इति ॐ। प्लवन्ते गच्छन्ति अस्थायिन इति प्लवाः। अत एवादृढाः। के ते यज्ञरूपाः। रूप्यन्तेऽनेनेति रूपं, यज्ञो रूपमुपाधिर्येषां ते यज्ञरूपाः। तत्र षोडशर्त्विजः। ऋतुयजनेनोपाधिना ऋत्विक्शब्दः प्रवृत्त इति यज्ञोपाधय ऋत्विजः। एवं यजमानोऽपि यज्ञोपाधिरेव। एवं पत्नी, 'पत्युर्नो यज्ञसंयोगेः' इति स्मरणात्। त एतेऽष्टादश यज्ञरूपाः, येष्वृत्विगादिषूक्तं कर्म यज्ञः, यदाश्रयो यज्ञ इत्यर्थः। तच्च कर्मावरं, स्वर्गाद्य-
भामती-व्याख्या
उसके प्रतिपादक होने के कारण अङ्गभूत श्रुति-वाक्य का सम्बन्ध प्रतीत होता है। यौगिक शब्द को समाख्या कहते हैं। 'परा विद्या' शब्द भी वैसा ही है, क्योंकि "परस्य परमात्मनः प्रतिपाद्यमानत्वात्" अर्थात् जिस विद्या में पर ब्रह्म का प्रतिपादन है, उसे परा विद्या कहते हैं, इस लिए भी उक्त श्रुति की प्रतिपाद्य वस्तु ब्रह्म ही है।
"कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवति” (मुण्ड. १।१।३) इस प्रकार जिस एक तत्त्व के ज्ञान से समस्त प्रपञ्च का ज्ञान हो जाता है, वह एकमात्र ब्रह्म ही है, प्रधान या जीव नहीं, क्योंकि प्रधान केवल जड़-वर्ग का आश्रय है समस्त जगत् का आश्रय या सर्वात्मक नहीं और जीव भी शब्दादि भोग्य पदार्थों से भिन्न होने से सर्वात्मक नहीं, अतः प्रधान और जीव का ज्ञान हो जाने पर भी सर्व प्रपञ्च का ज्ञान सम्भव नहीं।
अन्य समाख्या प्रमाण दिखाते हैं- अपि च "स ब्रह्मविद्यां सर्वविद्याप्रतिष्ठामथर्वाय ज्येष्ठपुत्राय प्राह" (मुण्ड. १।१।१)। इस श्रुति में 'ब्रह्मविद्या' पद 'ब्रह्मणो विद्या'- इस प्रकार के षष्ठी तत्पुरुष समास के आधार पर ब्रह्मविषयिणी विद्या का वाचक है, प्रधानादि का ग्रहण करने पर उस ब्रह्मविद्या कहना बाधित हो जायगा - "ब्रह्मविद्या समाख्या तदधिगम्यस्याब्रह्मत्वे बाधिता स्यात्"। ब्रह्मविद्या की प्रशंसा के लिए ही ऋग्वेदादि रूप कर्मविद्या का उपन्यास किया गया है, क्योंकि “प्लवा ह्येते अदृढा यज्ञरूपा अष्टादशोक्तमवरं येषु कर्म। एतच्छ्रेयो येऽभिनन्दन्ति मूढा जरां मृत्युं ते पुनरेवापियन्ति ॥ (मुण्ड. १।२।७)। इस श्रुति में कर्मविद्या की निन्दा की गई है कि कर्म के कर्त्ता अधिक से अधिक अठारह ऋत्विक् हैं, वे 'ऋतुषु याजयन्ति' - इस व्युत्पत्ति के अनुसार यज्ञ कराने के कारण यज्ञरूपाः (यज्ञोपाधिकाः) कहे जाते हैं। इन्हें 'अदृढा प्लवाः' इसलिए कहा जाता है कि ये जीर्ण शीर्ण प्लव (नौका) के समान संसार सागर के पार नहीं ले जा सकते, मोक्षरूप नित्य फल कर्मों के द्वारा नहीं दिला सकते। अध्वर्युमण्डल के चार, होतृमण्डल के चार, उद्गातृमण्डल के चार और ब्रह्ममण्डल के चार को मिलाकर सोलह ऋत्विक् हैं। ये जैसे यज्ञोपाधिक हैं, वैसे ही यजमान भी है, क्योंकि 'यजति' - इस व्युत्पत्ति से उसके साथ यज्ञ का स्पष्ट सम्बन्ध है। इसी प्रकार यजमान