भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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भूतयोनेः ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ३०७

इति, उत्तरसूत्रे तद्वक्ष्यामः । अपि चात्र द्वे विद्ये वेदितव्ये उक्ते—‘परा चैवापरा च’ इति । तत्रापरामृग्वेदादिलक्षणां विद्यामुक्त्वा ब्रवीति—‘अथ परा, यया तदक्षरमधिगम्यते’ इत्यादि । तत्र परस्या विद्याया विषयत्वेनाक्षरं श्रुतम् । यदि पुनः परमेश्वरादन्यददृश्यकत्वादिगुणकमक्षरं परिकल्प्येत, नेयं परा विद्या स्यात् । परापरविभागो ह्ययं विद्ययोरभ्युदयनिःश्रेयसफलतया परिकल्प्यते । न च प्रधानविद्या निःश्रेयसफला केनचिदभ्युपगम्यते । तिस्रश्च विद्याः प्रतिज्ञायेरन्, त्वत्पक्षेऽक्षराद् भूतयोनेः परस्य परमात्मनः प्रतिपाद्यमानत्वात् । द्वे एव तु विद्ये वेदितव्ये इह निर्दिष्टे । ‘कस्मिन्नु

भामती
विवर्तस्तु प्रपञ्चोऽयं ब्रह्मणोऽपरिणामिनः ।
अनादिवासनोद्भूतो न सारूप्यमपेक्षते ॥

न खलु बाह्यसारूप्यनिबन्धन एव सर्वो विभ्रम इति नियमनिमित्तमस्ति, आन्तरादपि कामक्रोधभयोन्मादस्वप्नादेर्मानसापराधात्सारूप्यानपेक्षात्तस्य तस्य विभ्रमस्य दर्शनात् । अपि च हेतुमति विभ्रमे तदभावानुयोगो युज्यते । अनाद्यविद्यावासनाप्रवाहपतितस्तु नानुयोगमर्हति । तस्मात् परमात्मविवर्ततया प्रपञ्चस्तद्योनिर्भुजङ्ग इव रज्जुविवर्ततया तद्योनिर्न तु तत्परिणामतया । तस्मात्तद्धर्मसर्ववित्त्वातोर्लिङ्गाद् यत्तदद्रेश्यमित्यत्र ब्रह्मैवोपविश्यते ज्ञेयत्वेन, न तु प्रधानं जीवात्मा वोपास्यत्वेनेति सिद्धम् । न केवलं लिङ्गादपि तु परा विद्येति समाख्यानादप्येतदेव प्रतिपत्तव्यमित्याह ॐ अपि चात्र द्वे

भामती-व्याख्या
विवर्तस्तु प्रपञ्चोऽयं ब्रह्मणोऽपरिणामिनः ।
अनादिवासनोद्भूतो न सारूप्यमपेक्षते ॥

अद्वैतवेदान्त-सिद्धान्त में प्रपञ्च को ब्रह्म का परिणाम नहीं, विवर्त माना जाता है। परिणाम में सारूप्य की अपेक्षा होती है, विवर्त में नहीं। रज्जु में सर्पादि का जहाँ विभ्रम होता है, वहाँ सर्पादि को रज्जु का विवर्त कहा जाता है। यद्यपि शुक्त्यादि में उसके विवर्तभूत रजतादि का सारूप्य पाया जाता है, तथापि समस्त विभ्रम बाह्य सारूप्य-प्रयुक्त ही होता है—ऐसे नियम का कोई निमित्त उपलब्ध नहीं, क्योंकि आन्तरिक काम, क्रोध के उद्वेग रूप मानस अपराध के द्वारा जो विविध स्वप्नरूप विभ्रम देखा जाता है, वहाँ सारूप्य की अपेक्षा नहीं होती। दूसरी बात यह भी है कि सादि विभ्रम में सारूप्य की कारणता का सन्देह एवं सारूप्य न होने के कारण ‘कथं विभ्रमकारणत्वम् ?’ इस प्रकार का प्रश्न किया भी जा सकता है, किन्तु अनादि वासनोद्भूत विभ्रम के लिए वैसा प्रश्न कदापि नहीं किया जा सकता। आचार्य धर्मकीर्ति ने भी अनादि वासनाओं से जनित विविध विभ्रम माने हैं—‘‘अनादि-वासनोद्भूतविकल्पपरिनिष्ठितः’’ (प्र. वा. पृ० ३२१)। फलतः ब्रह्म का विवर्त होने के कारण प्रपञ्च वैसे ही ब्रह्मयोनिक कहा जाता है, जैसे सर्प रज्जु का विवर्त होने के कारण ही रज्जुयोनिक (रज्जुककारणक) कहा जाता है, रज्जु का परिणाम होने के कारण नहीं। इस प्रकार ब्रह्म के सर्वज्ञत्वादि धर्मों का निर्देश होने के कारण ‘‘यत्तदद्रेश्यम्’’—यहाँ ब्रह्म का ही उपदेश सिद्ध होता है प्रधान या जीवात्मा का उपास्यत्वेन उपदेश नहीं।

केवल ब्रह्म के धर्मों (लिङ्गों) के निर्देश से ही ब्रह्मपरता का यहाँ ज्ञान नहीं होता, अपि तु ‘पराविद्या’—इस प्रकार की समाख्या के बल पर भी उक्त श्रुति में ब्रह्मपरता अवगत होती है, ऐसा कहा जाता है—‘‘अपि चात्र द्वे विद्ये वेदितव्ये उक्ते—‘परा चैवापरा च’ इति ।’’ [अर्थात् जैसे लिङ्ग (सामर्थ्य) रूप तृतीय प्रमाण के द्वारा अङ्ग और प्रधान का सम्बन्ध अवगत होता है, वैसे ही समाख्या रूप षष्ठ प्रमाण के द्वारा भी ब्रह्म प्रधान (मुख्य) और