भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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अक्षिपुरुषस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २८९

कस्मात् ? उपपत्तेः । उपपद्यते हि परमेश्वरे गुणजातमिहोपदिश्यमानम् । आत्मत्वं तावन्मुख्यया वृत्त्या परमेश्वर उपपद्यते; 'स आत्मा तत्त्वमसि' इति श्रुतेः । अमृतत्वाभयत्वे च तस्मिन्नसकृच्छ्रुतौ श्रूयेते । तथा परमेश्वरानुरूपमेतदक्षिस्थानम् । यथा

भामती

एवं प्राप्त उच्यते – 'यः' 'एषः' इति ।

अनिष्पन्नाभिधाने द्वे सर्वनामपदे सती ।
प्राप्य सन्निहितस्यार्थं भवेतामभिधातृणी ॥

सन्निहिताश्च पुरुषात्मादिशब्दास्ते च न यावत् स्वार्थमभिवदन्ति तावत्सर्वनामभ्यां नार्थतुषोऽप्यभिधीयत इति कुतस्तदर्थस्यापरोक्षता । पुरुषात्मशब्दौ च सर्वनामनिरपेक्षौ स्वरसतो जीवे वा परमात्मनि वा वर्त्तेते इति । न च तयोश्चक्षुषि प्रत्यक्षदर्शनमिति निरपेक्षपुरुषपदप्रत्यायितार्थानुरोधेन य एष इति दृश्यत इति च यथासम्भवं व्याख्येयम् । व्याख्यातञ्च सिद्धवदुपादानं शास्त्राद्यपेक्षं विद्वद्विषयं प्ररोचनार्थम् । विदुषः शास्त्रत उपलब्धिरेव दृढतया प्रत्यक्षवदुपचर्यते प्रशंसार्थमित्यर्थः । अपि च तदेव चरमं प्रथमानुगुणतया नीयते यन्नेतुं शक्यम् , अल्पञ्च । इह त्वमृतत्वादयो बहवश्चाशक्याश्च नेतुम् । न हि स्वसत्ताक्षणावस्थानमात्रममृतत्वं भवति । तथा सति किं नाम नामृतं स्यादिति व्यर्थममृतपदम् । भयाभये


भामती-व्याख्या

सिद्धान्त –

अनिष्पन्नाभिधाने द्वे सर्वनामपदे सती ।
प्राप्य सन्निहितस्यार्थं भवेतामभिधातृणी ॥

'यः' और 'एषः'—ये दोनों सर्वनाम पद प्रथम श्रुत होने पर भी सापेक्ष होने के कारण चाक्षुषत्वरूप अर्थ के अभिधान में परिनिष्पन्न (पर्यवसित) नहीं हो सकते, अतः सन्निहित 'पुरुष' पद के विशेष्यरूप अर्थ को पाकर ही वे अभिधाता (वाचक) होते हैं। 'पुरुष' और 'आत्मा' आदि सन्निहित पद जब तक अपने अर्थ का अभिधान नहीं कर लेते, तब तक सर्वनाम पदों ('यः' और 'एषः') के द्वारा किसी भी अर्थ का अभिधान नहीं किया जा सकता, तब अपरोक्षत्व या चाक्षुषत्वरूप अर्थ का बोध वे क्योंकर करा सकेंगे ? 'पुरुष' और 'आत्मा' ये दोनों पद सर्वनाम पदों से निरपेक्ष होकर निसर्गतः जीव या परमात्मा (ब्रह्म) के बोधक होते हैं। जीव और ब्रह्म का चक्षु में प्रत्यक्षतः दर्शन नहीं होता। फलतः निरपेक्ष 'पुरुष' पद के द्वारा जब अपने अर्थ का अभिधान हो जाता है, तब उसके अनुरोध पर 'यः' और 'एषः'—इन दोनों सर्वनाम पदों की यथासम्भव व्याख्या करनी होगी। भाष्यकार ने इस अधिकरण के अन्त में वैसी ही व्याख्या की है—"अस्मिश्च पक्षे प्रसिद्धवदुपादानं शास्त्राद्यपेक्षं विद्वद्विषयं प्ररोचनार्थम्"। आशय यह है कि महावाक्यादि के द्वारा विद्वान् को जो बोध प्राप्त होता है, वह परोक्ष होने पर भी सुदृढ़ होने के कारण प्रत्यक्ष कह दिया गया है कि उक्त ज्ञान की स्तुति सम्पन्न हो । [ "तत्त्वमसि" आदि शास्त्र के द्वारा प्रत्यक्ष बोध की उत्पत्ति माननेवाले आचार्यों के मत से ब्रह्म के लिए भी 'एष दृश्यते शास्त्रेण'—ऐसा व्यवहार हो सकता है, किन्तु वाचस्पति मिश्र के मत से नहीं]।

दूसरी बात यह भी है कि प्रथमोपस्थिति के अनुसार पश्चादुपस्थित पदार्थ का सामञ्जस्य वहाँ ही किया जाता है, जहाँ वैसा करना सम्भव हो । प्रकृत में अमृतत्वादि ऐसे बहुत धर्म हैं, जिनका अन्यत्र संगमन सम्भव नहीं, क्योंकि किसी पदार्थ का केवल अपनी सत्ता के क्षण में रहना (कतिपयक्षणावस्थायित्व) मुख्यतः अमृतत्व नहीं कहा जा सकता, वैसा मान लेने पर संसार की कौन वस्तु अमृत न बन जायगी ? तब 'अमृत' विशेषण अत्यन्त व्यर्थ

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