भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 306, कुल 639 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 306

२८८ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. २ सू. १३

श्रूयते। तत्र संशयः - किमयं प्रतिबिम्बात्माऽक्ष्यधिकरणो निर्दिश्यते, अथवा विज्ञा- नात्मा, उत देवतात्मेन्द्रियस्याधिष्ठाता, अथेश्वर इति। किं तावत्प्राप्तम् ? छायात्मा पुरुषप्रतिरूप इति। कुतः ? तस्य दृश्यमानत्वप्रसिद्धेः। 'य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यते' इति च प्रसिद्धवदुपदेशात्। विज्ञानात्मनो वाऽयं निर्देश इति युक्तम्। स हि चक्षुषा रूपं पश्यंश्चक्षुषि सन्निहितो भवति। आत्मशब्दश्चास्मिन्पक्षेऽनुकूलो भवति। आदित्य- पुरुषो वा चक्षुषोऽनुग्राहकः प्रतीयते; 'रश्मिभिरेषोऽस्मिन्प्रतिष्ठितः' ( बृ० ५।५।२ ) इति श्रुतेः, अमृतत्त्वादीनां च देवतात्मन्यपि कथंचित्संभवात्। 'नेश्वरः; स्थानविशेष- निर्देशादित्येवं प्राप्ते ब्रूमः- परमेश्वर एवाक्षिण्यभ्यन्तरः पुरुष इहोपदिष्ट इति।

भामती

ऋतं पिबन्तावित्यत्र हि जीवपरमात्मानौ प्रथमावगताविति तदनुरोधेन गुहाप्रवेशादयः पश्चादव- गता व्याख्याताः, तद्वदिहापि य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यत इति प्रत्यक्षाभिधानात् प्रथममवगते छायापुरुषे तदनुरोधेनामृतत्वाभयत्वादयः स्तुत्या कथञ्चिद् व्याख्येयाः। तत्र चामृतत्वं कतिपयक्षणावस्थानाद्, अभयत्वमचेतनत्वात्, पुरुषत्वं पुरुषाकारत्वाद्, आत्मत्वं कनीनिकायां व्यापनात्, ब्रह्मरूपत्वमुक्तरूपा- मृतत्वादियोगात्। एवं वामनीत्वादयोऽप्यस्य स्तुत्यैव कथञ्चिन्नेतव्याः। कञ्च खं चेत्यादि तु वाक्यमग्नीनां नाचार्यवाक्यं नियन्तुमर्हति। आचार्यस्तु ते गतिं वक्तेति च गत्यन्तराभिप्रायं, न तूक्तपरिशिष्टाभिप्रायम्। तस्माच्छायापुरुष एवात्रोपास्य इति पूर्वः पक्षः। सम्भवमात्रेण तु जीवदेवते उपन्यस्ते, बाधकान्तरोप- दर्शनाय चैष दृश्यत इत्यस्यात्राभावात्। अन्तस्तद्धर्मोपदेशादित्यनेन निराकृतत्वात्।

भामती-व्याख्या

जैसे "ऋतं पिबन्तौ" ( कठो. १।३।१ ) यहाँ पर जीव और ब्रह्म प्रथमतः अवगत हैं, अतः उसके अनुरोध पर पश्चात् अवगत गुहा-प्रवेशादि भी जीव-ब्रह्मपरक माने जाते हैं। वैसे ही "य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यते"- ऐसा प्रत्यक्षाभिधान होने के कारण प्रथमावगत छाया पुरुष में ही पश्चात्कथित अमृतत्व, अभयत्वादि धर्मों का स्तुत्यर्थक समन्वय करना होगा, ब्रह्म में नहीं, क्योंकि वह परोक्ष है, 'एष' पद के द्वारा उसका निर्देश नहीं किया जा सकता। छाया-पुरुष में कतिपयक्षणावस्थाायित्व होने के कारण अमृतत्व, अचेतन होने के कारण अभयत्व ( भय की अनुभूति का अभाव ), पुरुष की छाया में पुरुषाकारता होने के कारण पुरुषत्व, कनीनिका ( काली पुतली ) पर्यन्त गति होने के कारण आत्मत्व ( 'अत सातत्य गमने' धातु से निष्पन्न आत्मत्व का अर्थभूत सर्वतः व्याप्तत्व ), अमृतत्वादि का योग होने के कारण ब्रह्मत्व घट जाता है। इसी प्रकार वामनीत्व ( वामसंज्ञक कर्म-फलों का ) नेतृत्व, भामनीत्व ( प्रकाशरूपत्व ) आदि की व्याख्या भी प्रस्तुत की जा सकती है। यह जो कहा जाता है कि "प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्म" ( छां. ४।१०।५ ) ऐसे उपक्रम के अनुरोध पर "य एषोऽक्षिणि पुरुषः" (छां. ४।१५।१)। वहाँ भी ब्रह्म का परामर्श किया जाना चाहिए। वह कहना उचित नहीं, क्योंकि 'प्राणो ब्रह्म'-यह अग्नियों का एवं "य एषोऽक्षिणि पुरुषः"-यह आचार्य का वाक्य है। अन्यकर्तृक वाक्य के अनुरोध पर अन्यकर्तृक वाक्य का नियमन नहीं किया जा सकता। "आचार्यस्तु ते गतिं वक्ता" ( छां. ४।१४।१ ) यह वाक्य भी अग्नियों का ही है, अतः वह भी इस आचार्य-वाक्य का नियमन नहीं कर सकता। पूर्व पक्ष की निर्भरता छाया-पुरुष में ही है, जीव और अधिष्ठाता देव का उपन्यास केवल सम्भावना के आधार पर कर दिया गया है, वस्तु-स्थिति को लेकर नहीं, क्योंकि 'एष दृश्यते'-इस वाक्य का सामञ्जस्य भी देवतादि में नहीं होता, 'अन्तस्तद्धर्मोपदेशात्'-इस अधिकरण के द्वारा जीवादि का निरास किया जा चुका है।