भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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ऋतं पिबतो ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् २८५


सयुजा सखाया' (मुण्ड ३।१।१) इत्येवमादिष्वपि। तत्रापि ह्यध्यात्मधिकारान्न प्राकृतौ सुपर्णावुच्येते। 'तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्ति' इत्यदनलिङ्गाद्विज्ञानात्मा भवति। 'अनश्नन्नन्योऽभिचाकशीति' इत्यनशनचेतनत्वाभ्यां परमात्मा। अनन्तरे च मन्त्रे तावेव द्रष्टृद्रष्टव्यभावेन विशिनष्टि—'समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नोऽनीशया शोचति मुह्यमानः। जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः' (मुण्ड० ३।१।२) इति। अपर आह—'द्वा सुपर्णा' इति नेयमृगस्याधिकरणस्य सिद्धान्तं भजते; पैङ्गिरहस्यब्राह्मणेनान्यथा व्याख्यातत्त्वात्। 'तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्तीति सत्त्वमनश्नन्नन्योऽभिचाकशीतीत्यनश्नन्नन्योऽभिपश्यति ज्ञस्तावैतौ सत्त्वक्षेत्रज्ञौ' इति। सत्त्वशब्दो जीवः, क्षेत्रज्ञशब्दः परमात्मेति यदुच्येत—तन्न; सत्त्वक्षेत्रज्ञशब्दयोरन्तःकरणशारीरपरतया प्रसिद्धत्वात्। तत्रैव च व्याख्यातत्त्वात्—'तदेतत् सत्त्वं येन स्वप्नं पश्यति, अथ योऽयं शारीर उपद्रष्टा स क्षेत्रज्ञस्तावैतौ सत्त्वक्षेत्रज्ञौ' इति। नाप्यस्याधिकरणस्य पूर्वपक्षं भजते। नह्यत्र शारीरः क्षेत्रज्ञः कर्तृत्व-


भामती

भाष्यकृता स्फोरितः। तद्दर्शनादिति च 'समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नः' इत्यत्र मन्त्रे। न खलु मुख्ये कर्तृत्वे सम्भवति करणे कर्तृत्वोपचारो युक्त इति कृत्वाचिन्तामुद्घाटयति ॐ अपर आह ॐ। ॐ सत्त्वं ॐ बुद्धिः। शङ्कते ॐ सत्त्वशब्दः इति ॐ। सिद्धान्तार्थं ब्राह्मणं व्याचष्टे इत्यर्थः। निराकरोति ॐ तन्न इति ॐ। ॐ येन स्वप्नं पश्यति इति ॐ। येनेति करणमुपदिशति, ततश्च भिन्नं कर्तारं क्षेत्रज्ञम् ॐ यो यं शारीर उपद्रष्टा इति ॐ। अस्तु तर्ह्यस्याधिकरणस्य पूर्वपक्ष एव ब्राह्मणार्थः, वचनविरोवे न्यायस्याभासत्वादित्यत आह। ॐ नाप्यस्याधिकरणस्य पूर्वपक्षं भजते इति ॐ। एवं हि पूर्वपक्ष-


भामती-व्याख्या

उसके उपपादन में गुहाधिकरण की क्षमता है, क्योंकि] “द्वा सुपर्णा”—इस वाक्य में भी सन्देह किया जाता है कि क्या यहाँ सुपर्णों (दो पक्षियों) के रूप में बुद्धि और जीव विवक्षित हैं? अथवा जीव और ब्रह्म? जैसे 'एधांसि पचन्ति' (लकड़ियां भोजन पकाती हैं) यहाँ पाक के करण (साधनीभूत) काष्ठों में पाक-कर्तृत्व का गौण प्रयोग होता है, वैसे ही बुद्धिरूप करण में कर्म फल-भोग-कर्तृत्व का गौण प्रयोग मान कर बुद्धि और जीव को भोक्ता के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है—ऐसे पूर्वपक्ष का जो सिद्धान्त हो सकता है, वह भाष्यकार ने “समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नः”—इस मन्त्र में द्रष्टृत्व-द्रष्टव्यत्वरूप विशेषणों के माध्यम से स्पष्ट कर दिया है—अध्यात्मधिकारान्न प्राकृतौ सुपर्णावुच्येते।”

इस सिद्धान्त की 'कृत्वाचिन्ता' का कारण (अनाभिमतता या अस्वरसता) दिखाते हैं—"अपर आह”। 'सत्त्वं' शब्द का अर्थ है—बुद्धि, अर्थात् पैङ्गिरहस्य नाम के ब्राह्मण में उक्त मन्त्र की व्याख्या करते हुए बुद्धि और जीव का कथित पक्षियों के रूप में प्रस्तुत किया है अतः जीव और ब्रह्म का वहाँ ग्रहण नहीं कर सकते। शङ्कावादी उक्त ब्राह्मण ही सिद्धान्त के अनुगुण व्याख्या करते हुए कहता है कि उक्त ब्राह्मण में 'सत्त्व' शब्द से जीव और 'क्षेत्रज्ञ' पद से ब्रह्म का ग्रहण क्यों न किया जाय? उसकी इस शङ्का का निराकरण करते हुए कहा गया है—"तन्न”। लोक एवं वेद में 'सत्त्व' शब्द बुद्धि एवं 'क्षेत्रज्ञ' शब्द शारीर (जीव) के लिए प्रसिद्ध माना जाता है। उसी अर्थ में उसकी व्याख्या भी की जाती है—"येन स्वप्नं पश्यति, अथ योऽयं शारीर उपद्रष्टा स क्षेत्रज्ञः, तावैतौ सत्त्वक्षेत्रज्ञौ”। 'येन' शब्द के द्वारा स्वप्न-दर्शन के करण (साधन) का उपदेश किया गया है। उससे भिन्न स्वप्न-द्रष्टा (क्षेत्रज्ञ) का निर्देश किया गया है—"योऽयं शारीर उपद्रष्टा”। उक्त ब्राह्मण को पूर्वपक्ष का उपस्थापक क्यों न मान लिया जाय? इस प्रश्न का उत्तर है—"नाप्यस्याधिकरणस्य पूर्वपक्षं भजते।”