भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंद्युभ्वाद्यायतनस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दोसहितभामतीसंवलितम् ३२३
प्रथमाध्याये तृतीयः पादः।
[ अत्रास्पष्टब्रह्मलिङ्गानां प्रायो ज्ञेयब्रह्मविषयाणां विचारः ]
( १ द्युभ्वाद्यधिकरणम्। सू० १-७ )
द्युभ्वाद्यायतनं स्वशब्दात् ॥ १ ॥
इदं श्रूयते — ‘यस्मिन्द्यौः पृथिवी चान्तरिक्षमोतं मनः सह प्राणैश्च सर्वैः। तमेवैकं जानथ आत्मानमन्या वाचो विमुञ्चथामृतस्यैष सेतुः’ (मुण्ड० २।२।५) इति। अत्र यदेतद् द्युप्रभृतीनामामोतत्ववचनादायतनं किंचिदवगम्यते, तत्किं परं ब्रह्म स्याद्, आहोस्विदर्थान्तरमिति संदिह्यते। तत्रार्थान्तरं किमप्यायतनं स्यादिति प्राप्तम्, कस्मात्? ‘अमृतस्यैष सेतुः’ इति श्रवणात्। पारवान्हि लोके सेतुः प्रख्यातः। न च परस्य ब्रह्मणः पारवत्त्वं शक्यमभ्युपगन्तुम्, ‘अनन्तमपारम्’ (बृह० २।४।१२) इति श्रवणात्।
भामती
इह ज्ञेयत्वेन ब्रह्मोपक्षिप्यते। तत्र
पारवत्त्वेन सेतुत्वाद्भेदे षष्ठ्याः प्रयोगतः।
द्युभ्वाद्यायतनं युक्तं नामृतं ब्रह्म कर्हिचित् ॥
पारावारमध्यपाती हि सेतुः ताभ्यामवच्छिद्यमानो जलविधारको लोके दृष्टः, न तु बन्धहेतुमात्रम्, हडिनिगडादिष्वपि प्रयोगप्रसङ्गात्। न चानवच्छिन्नं ब्रह्म सेतुभावमनुभवति। न चामृतं सद् ब्रह्मामृतस्य सेतुरिति युज्यते। न च ब्रह्मणोऽन्यदमृतमस्ति, यस्य तत्सेतुः, स्यात्। न चाभेदे षष्ठ्याः प्रयोगो दृष्टपूर्वः। तदिदमुक्तम् ॐ अमृतस्यैष सेतुरिति श्रवणाद् इति ॐ । अमृतस्येति श्रवणात्,
भामती-व्याख्या
इस पाद में ज्ञेय ब्रह्म का विचार प्रस्तुत है। इस अधिकरण के विषयादि इस प्रकार हैं—
विषय — “यस्मिन् द्यौः पृथिवी चान्तरिक्षमोतं मनः सह प्राणैश्च सर्वैः। तमेवैकं जानथ आत्मानमन्या वाचो विमुञ्चथामृतस्यैष सेतुः॥ (मुण्ड. २।२।५) अर्थात् जिस परम तत्त्व में द्युलोक' पृथिवी, आकाश, मन और सब इन्द्रियाँ अवस्थित हैं। उसी आधार तत्त्व को आत्मा समझो और अनात्मा (अपर विद्या) के प्रतिपादक वचनों का परित्याग करो। इसी एक तत्त्व का ज्ञान अमृत (मोक्ष) का सेतु (संसार सागर का पारगामी बाँध) है।
संशय — उक्त श्रुति के द्वारा प्रतिपादित द्युलोकादि का आधार तत्त्व क्या ब्रह्म से भिन्न कोई अन्य पदार्थ है? अथवा ब्रह्म?
पूर्वपक्ष —
पारवत्त्वेन सेतुत्वाद् भेदे षष्ठ्याः प्रयोगतः।
द्युभ्वाद्यायतनं युक्तं नामृतं ब्रह्म कर्हिचित् ॥
अर्थात् द्युलोकादि का आधार ब्रह्म से भिन्न कोई अन्य पदार्थ ही होगा, क्योंकि लोक में ऐसे बन्धे को सेतु कहा जाता है, जो सागर, नदी या तालाब के मध्य में मिट्टी या पत्थर से बाँधा गया हो एवं इस पार और उस पार के दोनों तटों के बीच में अवस्थित हो। 'षिञ् बन्धने' धातु से निष्पन्न 'सेतु' शब्द का प्रयोग उक्त अर्थ को छोड़ कर केवल बन्धन के साधन में नहीं होता, अन्यथा हडि [प्राचीन कारागारों में जिस बड़े काठ में छेद करके चोरादि का पैर फँसा दिया जाता था, जिसके आधार पर 'काठ मारना', 'काठ में पैर देना' आदि कहावतें प्रचलित हैं, उस काठ की बेड़ी को हडि कहते हैं] और निगड़ (लोहे की साँकल या हथकड़ी) आदि बन्धन-साधनों में 'सेतु' शब्द का प्रयोग प्रसक्त होगा। अनवच्छिन्न ब्रह्म सर्वथा अवच्छेद-