भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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३२४ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. ३ सू. १

अर्थान्तरे चायतने परिगृह्यमाणे स्मृतिप्रसिद्धं प्रधानं परिग्रहीतव्यं, तस्य कारणत्वा-

भामती

सेतुरिति श्रवणाद् - इति योजना । तत्रामृतस्येति श्रवणादपि विशदतया न व्याख्यातम् । सेतुरिति श्रवणादिति व्याचष्टे ॐ पारवान् इति ॐ । तथा च पारवत्यमृतव्यतिरिक्ते सेतावनुश्रीयमाणे प्रधानं वा सांख्यपरिकल्पितं भवेत् । तत् खलु स्वकार्योपहितमर्यादतया पुरुषं यावदगच्छद्भवति पारवत्, भवति च द्युभ्वाद्यायतनं तत्प्रकृतित्वात् , प्रकृत्यायतनास्तत्वाच्च विकाराणां भवति चात्माऽऽत्मशब्दस्य स्वभाववचनत्वात् , प्रकाशात्मा प्रदीप इतिवत् । भवति चास्य ज्ञानमपवर्गोपयोगि, तदभावे प्रधानाद्विवेकेन पुरुषस्यानवधारणादपवर्गानुपपत्तेः । यदि त्वस्मिन् प्रमाणाभावेन न परितुष्यति, अस्तु तर्हि नामरूपबीजशक्तिभूतमव्याकृतं भूतसूक्ष्मं द्युभ्वाद्यायतनं, तस्मिन् प्रामाणिके सर्वस्योक्तस्योपपत्तेः । एतदपि प्रधानोपन्यासेन

भामती-व्याख्या

विनिर्मुक्त होने के कारण सेतु नहीं कहा जा सकता, क्योकि अमृत का सेतु अमृत का प्रापक होता है, ब्रह्म स्वयं अमृतरूप है, किसी अन्य अमृत का प्रापक नहीं। ब्रह्म से भिन्न और कोई अमृत तत्त्व नहीं होता, जिसका प्रापक ब्रह्म हो सके। ब्रह्म से भिन्न यदि कोई अमृत नहीं, ब्रह्म ही अमृत है, तब उसके लिए जैसे 'ब्रह्म ब्रह्मणः सेतुः' - ऐसा प्रयोग नहीं होता, वैसे ही 'ब्रह्म अमृतस्य सेतुः'-ऐसा भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि षष्ठी विभक्ति का प्रयोग अभेद में नहीं, भेद में ही होता है। भाष्यकार यही कह रहे हैं- "अमृतस्यैष सेतुरिति श्रवणात्।" यहाँ 'अमृतस्येति श्रवणात्' और 'एष सेतुरिति श्रवणात्' - ऐसा अन्वय विवक्षित है, इस प्रकार पूर्व पक्षी अपने पक्ष की सिद्धि में दो हेतुओं का प्रदर्शन करना चाहता है-(१) भेदार्थक षष्ठी विभक्ति का प्रयोग और (२) परिच्छिन्नार्थ-बोधक 'सेतु' शब्द का ग्रहण। इन दो हेतुओं में प्रथम हेतु अत्यन्त स्पष्ट होने के कारण व्याख्या की अपेक्षा नहीं रखता, अतः द्वितीय हेतु 'सेतुरिति श्रवणात्' की व्याख्या की जा रही है- "पारवान् हि लोके सेतुः प्रख्यातः"। इस प्रकार परवान् [ जिस पदार्थ को पार किया जा सके, ऐसे देशतः परिच्छिन्न ] और अमृत ( ब्रह्म ) से भिन्न किसी सेतु पदार्थ का अनुसन्धान होने पर वह सांख्य-परिकल्पित प्रधान ( प्रकृति ) तत्त्व हो सकता है। वह यद्यपि सांख्य-मतानुसार नित्य ( कालतः अपरिच्छिन्न ) और व्यापक ( देशतः अपरिच्छिन्न ) माना गया है, तथापि वस्तु-परिच्छेद-रूप पार से युक्त ( पारवान् ) है, क्योंकि प्रकृति अपने प्राकृत कार्य-वर्ग से मर्यादित है अर्थात् वह अपने महदादि परिणाम को ही अपने आक्रोड ( तादात्म्य ) में ले सकती है, पुरुष-पर्यन्त नहीं जा सकती, पुरुष-तादात्म्यापत्ति को वस्तुतः प्राप्त नहीं कर सकती, जैसा कि श्रुति कहती है- "अव्यक्तात् पुरुषः परः, ( कठो. ३।११ ) । अत एव अमृत पुरुष से भिन्न और द्युभ्वादि का आयतन है, क्योंकि वह द्युभ्वादि की प्रकृति ( उपादान कारण ) है और समस्त विकार-वर्ग प्रकृत्यायतनेक ( प्रकृत्याश्रित ) होता है। "तमेव जानथ आत्मानम्" ( मुण्ड. २।२।५ ) इस वाक्य में कथित आत्मा भी प्रधान तत्त्व है, क्योंकि यहाँ 'आत्मा' शब्द स्वभाव का वाचक है, जैसे कहा जाता है- 'प्रकाशात्मा प्रदीपः', वैसे ही प्रधान भी त्रिगुणात्मा है। अमृत ( मोक्ष ) का सेतु ( प्रापक ) भी प्रधान है, क्योंकि उसका ज्ञान मोक्ष का उपयोगी है, प्रधान के ज्ञान का अभाव होने पर प्रधान और पुरुष का विवेक-ग्रह न हो सकेगा, तब अपवर्ग की प्राप्ति क्योंकर होगी? यदि सांख्य-सम्मत प्रधान की अशाब्दता ( अप्रामाणिकता ) के कारण प्रधान-पक्ष में परितोष नहीं, तब वेदान्त-सम्मत अव्यक्त ( भूतसूक्ष्म ) को द्युभ्वादि का आयतन माना जा सकता है, वह प्रामाणिक है, उसमें अपरतोष का कोई कारण नहीं। प्रधान-पक्ष-परिग्रह के द्वारा ही भाष्यकार ने अव्यक्त-पक्ष भी सूचित कर दिया है।