भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंद्युभ्वाद्यायतनस्य ब्रह्मत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ३२५
द्यायतनत्वोपपत्तेः। श्रुतिप्रसिद्धो वा वायुः स्यात्, ‘वायुर्वै गोतम तत्सूत्रं वायुना वै गौतम सूत्रेणायं च लोकः परश्च लोकः सर्वाणि च भूतानि संदृब्धानि भवन्ति' (बृह० ३।७।२ इति वायोरपि विधारणत्वश्रवणात्। शारीरो वा स्यात्, तस्यापि भोक्तृत्वाद्भोग्यं प्रपञ्चं प्रत्यायतनत्वोपपत्तेरित्येवं प्राप्त इदमाह-द्युभ्वाद्यायतन-मिति। द्यौश्च भूश्च द्युभुवौ, द्युभुवावादी यस्य तदिदं द्युभ्वादि। यदेतदस्मिन्वाक्ये
भामती
सूचितम्। अथ तु साक्षाच्छ्रुत्युक्तं द्युभ्वाद्यायतनमाद्रियसे, ततो वायुरेवास्तु। ‘वायुना वै गौतम सूत्रेणायं च लोकः परश्च लोकः सर्वाणि च भूतानि संदृब्धानि भवन्ति' इति श्रुतेः। यदि त्वात्मशब्दाभिधेयत्वं न विद्यत इति न परितुष्यसि, भवतु तर्हि शारीरस्तस्य भोक्तुर्भोग्यान् द्युप्रभृतीन् प्रत्यायतनत्वात्। यदि पुनरस्य द्युभ्वाद्यायतनस्य सर्वज्ञश्रुतेरत्रापि न परितुष्यसि, भवतु ततो हिरण्यगर्भ एव भगवान् सर्वज्ञः सूत्रात्मा द्युभ्वाद्यायतनम्। तस्य हि कार्यत्वेन पारवत्त्वं चामृतात्परब्रह्मणो भेदश्चेत्यादि सर्वमुपपद्यते। अयमपि वायुना वै गौतम सूत्रेणेति श्रुतिमुपन्यस्यता सूचितः। तस्मादयं द्युप्रभृतीनामायतनमिति।
एवं प्राप्तेऽभिधीयते। द्युभ्वाद्यायतनं परब्रह्मैव, न प्रधानाद्याकृतवायुशारीरहिरण्यगर्भाः। कुतः? स्वशब्दात्।
धारणाद्धामृतत्वस्य साधनाद्वाऽस्य सेतुता।
पूर्वपक्षेऽपि मुख्यर्थः सेतुशब्दो हि नेष्यते॥
नहि मृद्दारुमयो मूर्त्तः पारावारमध्यवर्ती पाथसां विधारको लोकसिद्धः सेतुः प्रधानं वाऽव्याकृतं
भामती-व्याख्या
यदि साक्षात् श्रुति-प्रतिपादित पदार्थ को ही द्युभ्वादि का आयतन मानना अभीष्ट है, तब वायु का ग्रहण किया जा सकता है, क्योंकि श्रुति स्पष्ट कहती है—"वायुना वै गौतम सूत्रेणायं च लोकः पारश्च लोकः सर्वाणि च भूतानि संदृब्धानि भवन्ति” (बृह० उ० ३।७।१)। अर्थात् वायु ही वह एक सूत्र (धागा) है, जिसमें सभी लोक, और भूत गुंथे हुए हैं।
यदि वायु को 'आत्मा' शब्द का अभिधेय नहीं माना जा सकता, तब शारीर (जीवात्मा) को द्युभ्वादि का आयतन कहा जा सकता है, क्योंकि वह भोक्ता होने के कारण भोग्यरूप द्युलोकादि का आयतन हो सकता है। जीव अपने अदृष्टों के द्वारा जगत् का स्रष्टा (उपादान कारण) और ब्रह्म से भिन्न होने के कारण अमृत (ब्रह्म) का सेतु (प्रापक) भी है। यदि द्युभ्वादि के आयतन पदार्थ में “यः सर्वज्ञः सर्ववित्" (मुण्ड० २।२।७) इस प्रकार श्रुत सर्वज्ञत्व की जीव में उपपत्ति नहीं हो सकती, तब सर्वज्ञ भगवान् हिरण्यगर्भ को द्युभ्वादि का आयतन मान सकते हैं, क्योंकि वह विराट् शरीरावच्छिन्न होने के कारण कार्य (परिच्छिन्न) है, अतः पारवान् एवं अमृतरूप परब्रह्म से भिन्न होने के कारण अमृत का सेतु (प्रापक) है—इस प्रकार सभी विशेषणों का सामञ्जस्य हिरण्यगर्भ में हो जाता है। "वायुना वै गौतम सूत्रेण" (बृह० उ० ३।७।२) इस श्रुति का उल्लेख करके भाष्यकार ने यह सूत्रात्मा हिरण्यगर्भ का पक्ष भी सूचित किया है।
सिद्धान्त—द्युभ्वादि का आयतन परब्रह्म ही है, प्रधानादि (प्रधान, अव्याकृत, वायु, जीव और हिरण्यगर्भ) नहीं, क्योंकि स्वकीय (स्वोपस्थापक) आत्मादि शब्दों के द्वारा यहाँ पर ब्रह्म ही आयतनत्वेन उपस्थित है एवं
धारणाद्धामृतत्वस्य साधनाद्वाऽस्य सेतुता।
पूर्वपक्षेऽपि मुख्यार्थः सेतुशब्दो हि नेष्यते॥
'सेतु' शब्द का मुख्य अर्थ जो लोक में प्रसिद्ध है—'मिट्टी या लकड़ी का बाँध', वह तो