भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 344, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३२६ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. ३ सू. १ |
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द्यौः पृथिव्यन्तरिक्षं मनः प्राणा इत्येवमात्मकं जगदोतत्वेन निर्दिष्टं तस्यायतनं परं ब्रह्म भवितुमर्हति । कुतः ? स्वशब्दाद्, आत्मशब्दादित्यर्थः । आत्मशब्दो हीह भवति — 'तमेवैकं जानथ आत्मानम्' इति । आत्मशब्दश्च परमात्मपरिग्रहे सम्यगवकल्पते, नार्थान्तरपरिग्रहे । क्वचिच्च स्वशब्देनैव ब्रह्मण आयतनत्वं श्रूयते — 'सन्मूलाः सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सदायतनाः सत्प्रतिष्ठाः' (छा० ६।८।४) इति । स्वशब्देनैव चेह पुरस्तादुपरिष्टाच्च ब्रह्म संकीर्त्यते — 'पुरुष एवेदं विश्वं कर्म तपो ब्रह्म परामृतम्' इति । 'ब्रह्मैवेदममृतं पुरस्ताद् ब्रह्म पश्चाद्ब्रह्म दक्षिणतश्चोत्तरेण (मुण्ड० २।२।११) इति च ।
भामती
वा वायुर्वा जीवो वा सूत्रात्मा वाऽभ्युपेयते । किन्तु पारवत्तामात्रपरो लाक्षणिकः सेतुशब्दोऽभ्युपेयः । सोऽस्माकं पारवत्तावर्जं विधारणत्वमात्रेण योगमात्राद्रूढिं परित्यज्य प्रवर्त्स्यति । जीवानामामृतत्वपदप्राप्ति-साधनत्वं वाऽऽत्मज्ञानस्य पारवत एव लक्षयिष्यति । अमृतशब्दश्च भावप्रधानः, यथा 'द्व्येकयोर्द्विवचनैक-वचने' इत्यत्र द्वित्वैकत्वे द्व्येकशब्दार्थो, अन्यथा द्व्यकेष्विति स्यात् । तदिदमुक्तं भाष्यकृता ॐ अमृतत्व-साधनत्वाद् इति ॐ । तथा चामृतस्येति च सेतुरिति च ब्रह्मणि द्युभ्वाद्यायतन उपपत्स्येते । अत्र च स्वशब्दादिति तन्त्रोच्चरितगात्मशब्दादिति च सदायतना इति सच्छब्दादिति च ब्रह्मशब्दादिति च सूचयति । सर्वे ह्येतेऽस्य स्वशब्दाः ।
भामती-व्याख्या
पूर्वपक्ष में भी नहीं अपनाया जा सकता, क्योंकि वैसा पदार्थ प्रधान, अव्याकृत, वायु, जीव और हिरण्यगर्भ में से कोई भी नहीं। हाँ, पारवत्ता (परिच्छिन्नता) मात्र में 'सेतु' शब्द की लक्षणा अवश्य की जा सकती है, वैसा तो हमारे (सिद्धान्ती के) पक्ष में भी सम्भव है अर्थात् पारवत्ता (परिच्छिन्नता) को छोड़ कर विधारणत्वमात्र की विवक्षा की जा सकती, अतः 'षिञ् बन्धने' धातु से निष्पन्न 'सेतु' शब्द अपने लोक-प्रसिद्ध रूढ अर्थ का परित्याग करके धारणरूप (बन्धनात्मक) योगार्थ को लेकर प्रवृत्त हो जायगा, अतः 'अमृतस्य सेतुः' का अर्थ 'अमृतत्वस्य धारकं ब्रह्म' — ऐसा अर्थ सम्पन्न हो जायगा । अथवा 'अमृतत्वस्य (जीवानां मोक्षस्य) साधनं ब्रह्मज्ञानम्' — ऐसे अर्थ में लक्षणा की जा सकती है । 'अमृत' शब्द अमृतत्वरूप भावार्थपरक वैसे ही माना जा सकता है, जैसे "द्व्येकयोर्द्विवचनैकवचने" (पा० सू० १।४।२२) यहाँ 'द्वि' और 'एक' शब्द से द्वित्व और एकत्व विवक्षित होता है, अत एव द्वित्व और एकत्व पदार्थों के दो होने के कारण 'द्व्यकयोः' यहाँ द्विवचन सम्पन्न हो जाता है, अन्यथा दो और एक को मिलाने पर बहुत संख्या हो जाती है, अतः 'द्व्यकेषु' — इस प्रकार का प्रयोग होना चाहिए । इस वस्तु-स्थिति को ध्यान में रख कर भाष्यकार ने कहा है — "अमृतत्वसाधनत्वात्" । इस प्रकार 'अमृतस्य' और 'सेतु' — ये दोनों निर्देश ब्रह्म को द्युभ्वादि का आयतन मान लेने पर उपपन्न हो जाते हैं। यहाँ 'स्वशब्दात्' — यह तन्त्रोच्चरित 'स्वशब्द' का एक वार उच्चारण किया गया है [तन्त्र और प्रसङ्ग का लक्षण श्री भाष्यकार ने किया है—
साधारणं भवेत् तन्त्रं परार्थे त्वप्रयोजकः ।
एवमेव प्रसङ्गः स्याद् विद्यमाने स्वके विधौ ॥ (शा० भा० पृ० २०१६)
अनेक प्रधान कर्मों का उपकार जिस अङ्ग कर्म के एक वार के अनुष्ठान से ही सम्पन्न हो जाता है, उस अङ्ग कर्म को तन्त्रानुष्ठित और अनेक अर्थों का बोध कराने के लिए सकृत् उच्चरित शब्द को तन्त्रोच्चरित कहा जाता है । अन्यार्थ-प्रयुक्त कर्म का प्रसङ्गतः अन्यार्थ-साधन प्रसङ्ग कहलाता है, जैसे आभिक्षा की निष्पत्ति के लिए तपे दूध में दधि डालना