भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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३२८ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. ३ सू. २

तव्यमिति । अत्रोच्यते—विधारणत्वमात्रमत्र सेतुश्रुत्या विवक्ष्यते, न पारवत्त्वादि । नहि मृद्दारुमयो लोके सेतुरदृष्ट इत्यत्रापि मृद्दारुमय एव सेतुरभ्युपगम्यते । सेतुशब्दार्थोऽपि विधारणत्वमात्रमेव न पारवत्त्वादि, षिञो बन्धनकर्मणः सेतुशब्दव्युत्पत्तेः ।

अपर आह—'तमेवैकं जानथ आत्मानम्' इति यदेतत्संकीर्तितमात्मज्ञानं, यच्चैतत् 'अन्या वाचो विमुञ्चथ' इति वाग्विमोचनं, तदत्रामृतत्वसाधनत्वात् 'अमृतस्यैष सेतुः' इति सेतुश्रुत्या संकीर्त्यते, न तु द्युभ्वाद्यायतनम् । तत्र यदुक्तं सेतुश्रुतेर्ब्रह्मणोऽर्थान्तरेण द्युभ्वाद्यायतनेन भाव्यमित्येतदयुक्तम् ॥ १ ॥

मुक्तोपसृप्यव्यपदेशात् ॥ २ ॥

इतश्च परमेव ब्रह्म द्युभ्वाद्यायतनम् । यस्मान्मुक्तोपसृप्यताऽस्य व्यपदिश्यमाना


भामती

अपर आह इति। नात्र द्युभ्वाद्यायतनस्य सेतुतोच्यते येन पारवत्ता स्यात् , किन्तु जानथेति यज्ज्ञानं कीर्तितं, यश्च वाचो विमुञ्चथेति वाग्विमोकः, तस्यामृतत्वसाधनत्वेन सेतुतोच्यते । तच्चोभयमपि पारवदेव । न च प्राधान्यादेष इति सर्वनाम्ना द्युभ्वाद्यायतनमात्रमेव परामृश्यते, न तु तज्ज्ञानवाग्विमोचने इति साम्प्रतम् , वाग्विमोचनात्मज्ञानभावनयोरेव विधेयत्वेन प्राधान्यात् । आत्मनस्तु द्रव्यस्याव्यापारतयाऽविधेयत्वात् । विधेयस्य व्यापारस्यैव व्यापारवतोऽमृतत्वसाधनत्वात् । न चेदमेकान्तिकं यत्प्रधानमेव सर्वनाम्ना परामृश्यते । क्वचिदयोग्यतया प्रधानमुत्सृज्य योग्यतया गुणोऽपि परामृश्यते ॥ १ ॥


भामती-व्याख्या

'यत्सर्वमिदमारोपितम्, तत्सर्वं परमार्थतो ब्रह्म'—ऐसी ही प्रतीति विवक्षित है, 'यद् ब्रह्म तत्सर्वम्'—ऐसी नहीं, क्योंकि बाध सामानाधिकरण्यस्थल पर बाध्यमान पदार्थ का बाध मन में रख कर सामानाधिकरण्य-व्यवहार होता है, अतः 'यत्सर्वं कल्पितम्'—इस प्रकार बाधित प्रपञ्च का ही निर्देश यत्पद के द्वारा होता है, ब्रह्म का नहीं, अन्यथा ब्रह्म का बाध एवं “कार्यप्रपञ्चं प्रविलापयन्तः”—इस भाष्य का विरोध प्रसक्त होगा ।

अन्य विचारकों का कहना है कि उक्त श्रुति में द्युभ्वादि के आयतन में सेतुरूपता विवक्षित नहीं कि ब्रह्म में पारवत्ता (परिच्छिन्नता) प्रसक्त हो, किन्तु 'जानथ' पद के द्वारा कीर्तित ज्ञान और “अन्या वाचो विमुञ्चथ”—इस वाक्य से निर्दिष्ट अपर विद्या के त्याग में सेतुता (मोक्ष-हेतुता) विवक्षित है, क्योंकि “ज्ञात्वा देवं मुच्यते” (श्वेता. १।८) और “त्यागेनैकेऽमृतत्वमानशुः” (कै. ३) इत्यादि श्रुतियों में ज्ञान और त्याग को ही मोक्ष का साधन माना गया है। ज्ञान और त्याग—दोनों ही पारवान् होने से सेतु पदार्थ हो सकते हैं। यदि कहा जाय कि “अमृतस्यैष सेतुः”—यहाँ पर 'एषः'—इस सर्वनाम पद के द्वारा प्रधानभूत आत्मा का परामर्श करके उसमें ही सेतुता विहित है, उसके ज्ञान और अन्यार्थ के त्याग में नहीं। तो वैसा नहीं कह सकते, क्योंकि प्रकृत में आत्मज्ञान और अन्यवाग्विमोचन ही विधेय होने के कारण प्रधान हैं। क्रिया का ही विधान होता है, आत्मा द्रव्य है, व्यापार (क्रिया) नहीं, अतः विधेय नहीं हो सकता। विधेयरूप प्रधान कर्म (ज्ञान) ही अपने सहायक व्यापारों (विवेकादि अङ्ग कर्मों) से युक्त होकर अमृतत्व का साधन होता है। दूसरी बात यह भी है कि सर्वनाम पदों के द्वारा प्रधानभूत अर्थ का ही परामर्श होता है—ऐसा कोई अकाट्य नियम नहीं, क्योंकि कहीं-कहीं अयोग्य होने के कारण प्रधानार्थ को छोड़ कर गौणीभूत योग्य पदार्थ का परामर्श होता है, जैसे कि “तप्ते पयसि दध्यानयति, सा वैश्वदेव्यामिक्षा”—इत्यादि स्थलों पर शब्दतः अप्रधानभूत पयः पदार्थ का परामर्श किया जाता है, फलतः प्रकृत में 'एष' पद के द्वारा ब्रह्म के बोध का परामर्श किया जा सकता है ॥ १ ॥

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