भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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४०६ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. ३ सू. ३०

समाननामरूपत्वाच्चावृत्तावप्यविरोधो दर्शनात्स्मृतेश्च ॥ ३० ॥

अथापि स्यात्—यदि पश्वादिव्यक्तिवद्देवादिव्यक्तयोऽपि संतत्यैवोत्तपद्येरन्निरु- ध्येरंश्च ततोऽभिधानाभिधेयाभिधातृव्यवहाराविच्छेदात्संबन्धनित्यत्वेन विरोधः शब्दे परिह्रियेत। यदा तु खलु सकलं त्रैलोक्यं परित्यक्तनामरूपं निर्लेपं प्रलीयते, प्रभवति चाभिनवमिति श्रुतिस्मृतिवादा वदन्ति, तदा कथमविरोध इति ? तत्रेदमुभिधीयते— समाननामरूपत्वादिति। तदापि संसारस्यानादित्वं तावदभ्युपगन्तव्यम्। प्रतिपाद-

भामती

शङ्कापवोत्तरत्वात् सूत्रस्य शङ्कापदानि पठति ॐ अथापि स्याद् इति ॐ। अभिधानाभिधेयाविच्छेदे हि सम्बन्ध्नित्यत्वं भवेत्। एवमध्यापकाध्येतृपरम्पराविच्छेदे वेदस्य नित्यत्वं स्यात्। निरन्वयस्य तु तु जगतः प्रबिलयेऽत्यन्तासत्क्षापूर्वस्योत्पावेऽभिधानाभिधेयावत्यन्तमुच्छिन्नान्निविति किमाश्रयः सम्बन्धः स्यात् ? अध्यापकाध्येतृसन्तानविच्छेदे च किमाश्रयो वेदः स्यात् ? न च जीवास्तद्वासनावासिताः सन्तीति वाच्यम्, अन्तःकरणाद्युपाधिकल्पिता हि ते तद्विच्छेदे न स्थातुमर्हन्ति। न च ब्रह्मणिस्तद्वासना, तस्य विद्यात्मनः शुद्धस्वभावस्य तदयोगात्। ब्रह्मणश्च सृष्टाद्यवान्तःकरणादयस्तदवच्छिन्नाश्च जीवाः प्रादुर्भ- वन्तो न पूर्वकर्माविद्यावासनावन्तो भवितुमर्हन्ति, अपूर्वत्वात्। तस्माद्विरुद्धमिवं शब्दार्थसम्बन्धवेद- नित्यत्वं सृष्टिप्रलयाभ्युपगमेनेति। अभिधातृग्रहणेनाध्यापकाध्येतारावुक्तौ। शङ्कां निराकर्तुं सूत्रमवतार- यति ॐ तत्रेदमुभिधीयते समाननामरूपत्वाद् इति ॐ, यद्यपि महाप्रलयसमये नान्तःकरणादयः समुदाचर- द्वृत्तयः सन्ति, तथापि स्वकारणेऽनिर्व्वाच्यायामविद्यायां लीनाः सूक्ष्मेण शक्तिरूपेण कर्मविक्षेपकाविद्या- वासनाभिः सहावतिष्ठन्त एव। तथा च स्मृतिः—

भामती-व्याख्या

फलतः जगत्प्रभवत्वरूप हेतु के द्वारा केवल कथित विरोध का परिहार ही नहीं किया जाता, अपितु प्रसाधित वेद-नित्यत्व का दृढीकरण भी किया जाता है—“अत एव च नित्यत्वम्”। इससे यह अनुमान पर्यवसित होता है—“नित्यो वेदः, जगदुत्पत्तिहेतुत्वाद्, ईश्वरवत्” ।। २९।।

यह तीसवाँ सूत्र जिस शङ्का का समाधान है, वह शङ्का प्रस्तु। की जाती है—“अथापि स्यात्”। यदि वाचक और वाच्य—दोनों अविच्छिन्न हैं, तब उनका सम्बन्ध भी नित्य होगा। इसी प्रकार अध्यापक और अध्येताओं की परम्परा का अविच्छेद होने पर वेद में नित्यत्व रहेगा। यदि बौद्ध-सिद्धान्त के अनुसार जगत् का निरन्वय विनाश, अत्यन्त असत् जगत् का उत्पाद एवं वाचक और वाच्य दोनों का अत्यन्त उच्छेद माना जाता है, तब वाच्यवाचक- भावरूप सम्बन्ध का आधार क्या रहेगा ? अध्यापक और अध्येताओं की परम्परा का विच्छेद मानने पर वेद का आश्रय कौन रहेगा ? अध्ययनवासनाओं से युक्त जीवों की सत्ता भी नहीं मानी जा सकती, क्योंकि जीव तो अन्तःकरणरूप उपाधि से कल्पित होते हैं, अन्तःकरण का अभाव होने पर वे क्योंकर अवस्थित रह सकेंगे ? ब्रह्म में भी वे अध्ययन-संस्कार नहीं रह सकते, क्योंकि नित्य, शुद्ध, बुद्ध और असङ्ग ब्रह्म में उनके अवस्थान की सम्भावना ही नहीं। ब्रह्म से सृष्टि के आरम्भ में नूतन अन्तःकरणादि उपाधियाँ उत्पन्न होती है, उनसे अवच्छिन्न होकर उत्पन्न होते हुए जीव पूर्व कर्माजित वासनाओं से युक्त नहीं हो सकते, क्योंकि वे नूतन हैं, पूर्व जन्म में थे ही नहीं। फलतः शब्दार्थ-सम्बन्ध और वेद का नित्यत्व मानना सृष्टि-प्रलय की प्रक्रिया से अत्यन्त विरुद्ध ही है। भाष्य में 'अभिधातृ' शब्द के द्वारा अध्यापक और अध्येता—इन दोनों का ग्रहण किया गया है।

उक्त शङ्का का निराकरण करने के लिए अग्रिम सूत्र का अवतरण किया जाता है— “तत्रेदमुभिधीयते समाननामरूपत्वादिति”। यद्यपि महाप्रलय में अन्तःकरणादि सक्रिय नहीं