भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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पृष्ठ 423

स्फोटवादनिरसः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४०५

गरीयसी कल्पना स्यात् । अथापि नाम प्रत्युच्चारणमन्येऽन्ये वर्णाः स्युः, तथापि प्रत्यभिज्ञालम्बनभावेन वर्णसामान्यानामवश्याभ्युपगन्तव्यत्वाद्या वर्णेष्वर्थप्रतिपादनप्रक्रिया रचिता सा सामान्येषु संचारयितव्या । ततश्च नित्येभ्यः शब्देभ्यो देवादिव्यक्तीनां प्रभव इत्यविरुद्धम् ॥ २८ ॥

अत एव च नित्यत्वम् ॥ २९ ॥

स्वतन्त्रस्य कर्तुरस्मरणादिभिः स्थिते वेदस्य नित्यत्वे देवादिव्यक्तिप्रभवाभ्युपगमेन तस्य विरोधमाशङ्क्य 'अतः प्रभवात्' इति परिहृत्येदानों तदेव वेदनित्यत्वं स्थितं द्रढयति—अत एव च नित्यत्वमिति । अत एव नियताकृतेर्देवादेर्जगतो वेदशब्दप्रभवत्त्वाद्देशब्दे नित्यत्वमपि प्रत्येत्तव्यम् । तथा च मन्त्रवर्णः—'यज्ञेन वाचः पदवीयमायन्तामन्वविन्दन्नृषिषु प्रविष्टाम्' (ऋ० सं० १०।७१।३) इति स्थितामेव वाचमनुविन्नां दर्शयति । वेदव्यासश्चैवमेव स्मरति—'युगान्तेऽन्तर्हितान्वेदान्सेतिहासान्महर्षयः । लेभिरे तपसा पूर्वमनुज्ञाताः स्वयंभुवा' इति ॥ २९ ॥

भामती

नैयायिकैर्विवादेन, सन्त्वनित्या एव वर्णास्तथापि गत्वाद्यवच्छेदेनैव सङ्गतिग्रहोऽनादिश्च व्यवहारः सेत्स्यतीत्याह ॐ अथापि नाम इति ॐ ॥ २८ ॥

ननु प्राच्यामेव मीमांसायां वेदस्य नित्यत्वं सिद्धं तत् किं पुनः साध्यत इत्यत आह ॐ स्वतन्त्रस्य कर्तुरस्मरणादेव हि स्थिते वेदस्य नित्यत्वे इति ॐ । नह्यनित्याज्जगदुत्पत्तुमर्हति तस्याप्युत्पत्तिमत्त्वेन सापेक्षत्वात् । तस्मान्नित्यो वेदो जगदुत्पत्तिहेतुत्वाद् , ईश्वरवदिति सिद्धमेव नित्यत्वमनेन दृढीकृतम् । शेषमतिरोहितार्थम् ॥ २९ ॥

भामती-व्याख्या

के आरम्भ में ही किया गया है। नैयायिकों के साथ विवाद न करके यदि वर्णात्मक शब्द को अनित्य भी मान लिया जाय, तब भी कोई दोष नहीं, क्योंकि गकारादि वर्णों में प्रत्यभिज्ञायमान गत्वादि जातियों को सभी नित्य मानते हैं। उन्हीं जातियों में गोत्वादि की वाच्यता या वाचकतावच्छेदकता मान कर अनादि व्यवहार का निर्वाह किया जा सकता है—ऐसा भाष्यकार कह रहे हैं—"अथापि नाम प्रत्युच्चारणमन्येऽन्ये वर्णाः स्युः, तथापि या वर्णेष्वर्थप्रतिपादनप्रक्रिया रचिता, सा सामान्येषु सञ्चारयितव्या" ॥ २८ ॥

श्री शबरस्वामी ने कहा है—"यच्चैते पदसंघाताः पुरुषकृता दृश्यन्ते इति । परिहृतं तदस्मरणादिभिः" (शाबर. पृ. ९९) इस भाष्य को ध्यान में रख कर कहा गया है—'स्वतन्त्रस्य कर्तुरस्मरणादिति स्थिते वेदस्य नित्यत्वे' । अर्थात् पूर्व मीमांसा के वेदअपौरुषेयत्वाधिकरण में ही वेदों की नित्यता सिद्ध कर दी गई थी, इस उत्तर मीमांसा के देवताधिकरण में पूर्वपक्षी की ओर से वेद-नित्यत्व का विरोध उठाते हुए कहा गया कि जिन विग्रहधारी देवताओं को ज्ञान में अधिकार दिया जाता है, वे अनित्य हैं और उनकी उत्पत्ति वैदिक शब्दों से मानी गई है, कादाचित्क कार्य का कारण भी कादाचित्क या अनित्य ही होता है, अतः वेदों को नित्य मानना तर्क-संगत नहीं। इस विरोध का परिहार करते हुए सिद्धान्ती ने कहा—"अतः प्रभवात्" । अर्थात् जातिरूप नित्य शब्द से व्यक्तिरूप अनित्य देवताओं का प्रभव (जन्म) माना जाता है। अनित्य कार्य का कारण भी अनित्य होता है—ऐसा कोई नियम नहीं, क्योंकि अनित्य शब्द का कारण आकाश एवं अनित्य जगत् का कारण ईश्वर नित्य ही माना गया है। प्रत्युत यह नियम अवश्य है कि अनित्य कारण से जगत् की उत्पत्ति नहीं मानी जा सकती, अन्यथा उत्पादक-परम्परा-कल्पना-प्रयुक्त अनवस्था प्रसक्त होगी।