भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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४०४ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. ३ सू. २८

दृष्टकल्पना च, वर्णाश्चेमे क्रमेण गृह्यमाणाः स्फोटं व्यञ्जयन्ति स स्फोटोऽर्थं व्यनक्तीति

भामती

न च तथेह वर्णानां नित्यानां विभूनां चास्ति वास्तवः क्रमः, प्रत्ययोपाधिस्तु भवेत्, स चैक इति कुतस्त्यः क्रम एषामिति चेत्, न; एकस्यामपि स्मृतौ वर्णरूपवत्क्रमवत्पूर्वानुभूततापरामर्शात् । तथाहि—जारा- राजेति पदयोः प्रत्ययन्त्योः स्मृतिधियोस्तत्त्वेऽपि वर्णानां क्रमभेदात्पदभेदः स्फुटतरं चकास्ति । तथा च नाक्रमविपरीतक्रमप्रयुक्तानामविशेषः स्मृतिबुद्धावेकस्यां वर्णानां क्रमप्रयुक्तानाम् । यथाहूः—

पदावधारणोपायान् बहूनिच्छन्ति सूरयः । क्रमन्यूनारिक्तत्त्वस्वरवाक्यस्मृतिश्रुतीः ॥ इति ।

शेषमतिरोहितार्थम् । दिङ्मात्रमत्र सूचितं, विस्तरस्तु तत्त्वविन्दाववगन्तव्य इति । अलं वा

भामती-व्याख्या

नहीं, तथापि उस पंक्ति के घटकीभूत शाल वृक्ष अनेक अनित्य और अविभु हैं, अतः उनमें क्रम अवश्य है, उनकी उसी क्रम से पंक्ति-बुद्धि में प्रथा ( भान ) भी उचित है। किन्तु वर्ण नित्य हैं, अतः उनका कालिक और विभु हैं, अतः उनका दैशिक क्रम सम्भव नहीं। उनका स्वाभाविक क्रम न होने पर भी प्रतीतिरूप उपाधि का क्रम माना जा सकता था, किन्तु स्मृति-रूप प्रतीति भी एक ही मानी जाती है, तब वर्णों में क्रम का भान क्योंकर होगा ?

समाधान—यद्यपि उनकी स्मृतिरूप प्रतीति एक है, तथापि अनुभूतियाँ नाना और क्रमिक हैं, अतः स्मरण ज्ञान में जैसे वर्णों के समान ही उनके क्रम की अनुभूतता परामृष्ट होती है, जैसे—'जारा' और 'राजा' इन दोनों पदों की स्मृतियाँ दो हैं, उनमें वर्णों का क्रम अवश्य स्मृतिजनकीभूत अनुभव के सम्पर्क से प्रतिभात होता है, अत एव उन दोनों पदों का भेद अत्यन्त स्फुटरूप में प्रस्फुरित होता है। उन दोनों पदों का भेद केवल क्रम-भेद पर ही आधृत है, वर्ण-भेद पर नहीं, क्योंकि वर्णों का कोई भेद नहीं। फलतः स्मृति एक होने पर भी अनुक्रम और विक्रम से उच्चरित वर्णोंवाले पदों में अविशेषता न रह कर विशेषता आ जाती है, जैसा कि श्री कुमारिल भट्ट कहते हैं—

पदावधारणोपायान् बहूनिच्छन्ति सूरयः । क्रमन्यूनातिरिक्तत्वस्वरवाक्यस्मृतिश्रुतीः ॥ ( श्लो. वा. पृ. ८६६ )

[ वर्णों का भेद न होने पर भी पदो का भेद क्योंकर होगा ? इस प्रश्न के उत्तर में कहा जाता है कि 'जारा', 'राजा'—इत्यादि पदों के भेद-बोधक बहुत-से उपाय होते हैं, जैसे—(१) अश्व-अश्वकर्णादि में क्रम का न्यूनाधिकभाव, (२) 'इन्द्रशत्रुः' इत्यादि स्थल पर बहुव्रीहि समास है ? अथवा षष्ठी-तत्पुरुष ? इस संशय का निर्णायक स्वर-भेद है, क्योंकि बहुव्रीहि और तत्पुरुषादि समासों के स्वर-भेद का प्रतिपादन व्याकरण में किया गया है। (३) 'पचते' इत्यादि पद सुबन्त ( चतुर्थ्यन्त ) हैं ? अथवा क्रिया-पद ? इस प्रश्न के उत्तर में वाक्य 'एकवाक्यतापन्न पदान्तर के प्रयोग ) को निर्णायक माना है, अर्थात् 'पचते दक्षिणां देहि'—ऐसे वाक्यों में 'पचते' पद चतुर्थ्यन्त और 'ओदनं पचते'—इत्यादि वाक्यों में क्रिया-पद है। (४) 'अश्वस्त्वं देवदत्त' इत्यादि स्थलों पर 'अश्वः' पद घोड़े का वाचक न होकर क्रिया-पद कैसे बना ? इस प्रश्न का उत्तर स्मृति ( व्याकरणरूप स्मृति प्रमाण ) से दिया जाता है कि 'टुओश्वि गतिवृद्ध्योः' धातु का लुङ् लकार में मध्यमैकवचनान्त प्रयोग है । (५) 'उद्भिदा यजेत'—इत्यादि स्थलों पर 'उद्भिदा यागेन' इस प्रकार सामानाधिकरण्य श्रुति के द्वारा 'उद्भिद्' पद में याग-वाचकता निर्णीत होती है ]। शेष भाष्य सुगम है। पूर्वोत्तर मीमांसा-सम्मत शब्दतत्त्व का यहाँ दिग्दर्शनमात्र किया गया है, इस विषय का विस्तार तत्त्वविन्दु