भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंस्फोटवादनिरासः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४०३
वर्णा एव सामस्त्येनेकबुद्धिविषयतामापद्यमानाः पदं स्युस्ततो जारा राजा कपिः पिक इत्यादिषु पदविशेषप्रतिपत्तिर्न स्यात् । त एव हि वर्णा इतरत्र चेतरत्र च प्रत्यव-भासन्त इति) अत्र वदामः - सत्यपि समस्तवर्णप्रत्यवमर्शे यथा क्रमानुरोधिन्य एव पिपीलिकाः पंक्तिबुद्धिमारोहन्ति, एवं क्रमानुरोधिन एव वर्णाः पदबुद्धिमारोक्ष्यन्ति । तत्र वर्णानामविशेषेऽपि क्रमविशेषकृता पदविशेषप्रतिपत्तिर्न विरुध्यते । वृद्धव्यवहारे चेमे वर्णाः क्रमाद्यनुगृहीता गृहीतार्थविशेषसम्बन्धाः सन्तः स्वव्यवहारेऽप्येकैकवर्ण-ग्रहणानन्तरं समस्तप्रत्यवमर्शिन्यां बुद्धौ तादृशा एव प्रत्यवभासमानास्तं तमर्थमव्य-भिचारेण प्रत्याययिष्यन्तीति वर्णवादिनो लघीयसी कल्पना, स्फोटवादिनस्तु दृष्टहानि-
भामती
भावनानिचयलब्धजन्मनि निखिलवर्णावगाह्नि स्मृतिज्ञान एकस्मिन् भासमानानां वर्णानां तदेकविज्ञान-विषयतया वैकार्थधीहेतुतया वेकत्वमौपचारिकमवगन्तव्यम् । न चैकार्थधीहेतुत्वेनैकत्वमेकत्वेन चैकार्थधी-हेतुभाव इति परस्पराश्रयम् । नह्यर्थप्रत्ययात् पूर्वमेतावन्तो वर्णा एकस्मृतिसमारोहिणो न प्रथन्ते । न च तत्प्रथानान्तरं वृद्धस्यार्थाधीनोन्नीयते, तदुन्नयनाच्च तेषामेकार्थधियं प्रति कारकत्वमेकमवगम्यैकपदत्वाध्यव-सानमिति नान्योन्याश्रयम् । न चैकस्मृतिसमारोहिणां क्रमाक्रमविपरीतक्रमप्रयुक्तानामभेदो वर्णानामिति यथाकथञ्चित् प्रयुक्तेभ्य एतेभ्योऽर्थप्रत्ययप्रसङ्ग इति वाच्यम्, उक्तं हि—
यावन्तो यादृशा ये च पदार्थप्रतिपादने ।
वर्णाः प्रज्ञातसामर्थ्यास्ते तथैवावबोधकाः ॥ इति ।
ननु पङ्क्तिबुद्धावेकस्यामक्रमायामपि वास्तवो शालादीनामस्ति पङ्क्तिरिति तथैव प्रथा युक्ता,
भामती-व्याख्या
औपाधिक एकत्व स्वाभाविक नानात्व का विरोधी होता है और न माणवक में गौण अग्नित्व धर्म स्वाभाविक मनुष्यत्व का ही बाधक होता है। फलतः प्रत्येक वर्ण के अनुभव से जनित संस्कारों के द्वारा उत्पादित समस्तवर्णावगाहिनी एक ही स्मृति में भासमान नाना वर्णों में स्मृतिरूप एक ज्ञान की विषयता अथवा एकार्थज्ञान की हेतुता होने के कारण एकत्व का औपचारिक भान मानना चाहिए। वर्णों में एकार्थज्ञान-हेतुत्वेन एकत्व और एकत्व के द्वारा एकार्थज्ञान-हेतुत्व की कल्पना से अन्योऽन्याश्रयता की जो प्रसक्ति दी गई, वह उचित नहीं, क्योंकि एकार्थज्ञान-हेतुत्व के बिना ही वर्णों में स्मृतिरूप एकज्ञान की विषयता के द्वारा एकत्व का भान हो जाता है। नाना वर्णों का भान होने पर गृहीतसंगतिक वृद्ध पुरुषों के द्वारा अर्थावबोध उन्नीत नहीं होता - ऐसा नहीं, किन्तु होता है, अतः एकार्थज्ञान को वर्णों में एक कारणता का बोध करके एकपदत्व का अध्यवसान (निश्चय) होता है, अतः किसी प्रकार का अन्योऽन्याश्रय प्रसक्त नहीं होता।
शङ्का—वाक्य के घटकीभूत नाना वर्णों की एक स्मृति हो सकती है, किन्तु उनका क्रम एक ही रहे—यह आवश्यक नहीं, व्युत्क्रम भी हो सकता है, अतः व्युत्क्रम से स्मर्यमाण वर्णों के द्वारा भी अभिलषित अर्थावबोध होना चाहिए।
समाधान—उक्त शङ्का का समाधान करते हुए श्री कुमारिल भट्ट ने कहा है—
यावन्तो यादृशा ये च पदार्थप्रतिपादने ।
वर्णाः प्रज्ञातसामर्थ्याः ते तथैवावबोधकाः ॥ (श्लो. वा. पृ. ५२७)
अर्थात् संगति-ग्रहण-काल में जिस क्रम विशेष से युक्त वर्ण अर्थ प्रत्यायन में समर्थ माने जाते हैं, वे उसी क्रम से युक्त होकर अवबोधक माने जाते हैं, व्युत्क्रम से नहीं।
शङ्का—बहुत-से शाल वृक्षों की पंक्ति एक है। यद्यपि उक्त पंक्ति में स्वतः कोई क्रम