भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४०२ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. ३ सू. २८
बुद्धिर्गौरिति समस्तवर्णविषया, नार्थान्तरविषया। कथमेतदवगम्यते ? यतोऽस्यामपि बुद्धौ गकारादयो वर्णा अनुवर्तन्ते, न तु दकारादयः। यदि ह्यस्या बुद्धेर्गकारादिभ्योऽर्थान्तरं स्फोटो विषयः स्यात्ततो दकारादय इव गकारादयोऽप्यस्या बुद्धेर्व्यावर्तेरन्, नतु तथास्ति। तस्मादियमेकबुद्धिर्वर्णविषयैव स्मृतिः। नन्वनेकत्वाद्वर्णानां नैकबुद्धिविषयतोपपद्यत इत्युक्तं - तत्प्रतिब्रूमः—संभवत्यनेकस्याप्येकबुद्धिविषयत्वम्, पङ्क्तिर्वनं सेना शतं सहस्रमित्यादिदर्शनात्। या तु गौरित्येकोऽयं शब्द इति बुद्धिः, सा बहुष्वेव वर्णेष्वेकार्थावच्छेदनिबन्धनेौपचारिकी वनसेनादिवुद्धिष्वदेव। अत्राह-यदि
भामती
तुल्यस्थानकरणनिष्पाद्यतयाऽन्योन्यविसदृशतत्तत्पदव्यञ्जकध्वनिसादृश्येन स्वव्यञ्जनीयस्यैकस्य पदतत्त्वस्य मिथो विसदृशानेकपदसादृश्यान्यापादयन्तः सादृश्योपाधानभेदादेकमप्यभागमपि नानेव भागवदिव भासयन्ति मुखमिवैकं नियतवर्णपरिमाणस्थानसंस्थानभेदमपि मणिकृपाणदर्पणादयोऽनेकमनेकवर्णपरिमाणस्थानसंस्थानभेदम्। एवञ्च कल्पिता एवास्य भागा वर्णा इति चेत्, तत्किमिदानीं वर्णभेदानसत्यपि बाधके मिथ्येति वस्तुमभ्यवसितोऽसि ? एकधीरेव नानारवस्य बाधिकेति चेत्, हन्तास्यां नाना वर्णाः प्रथन्त इति नानावभास एवैकत्वं कस्मान्न बाधते। अथवा वनसेनादिवुद्धिवदेकत्वनानात्वे न विरुद्ध्ये। नो खलु सेनावनबुद्धी गजपदाति तुरगादीनां चम्पकाशोककिंशुकानीनाञ्च भेदमपबाधमाने उदीयेते, अपि तु भिन्नानामेव सतां केनचिदेकेनोपाधिनाऽवच्छिन्नानामेकत्वमापादयतः। न चौपाधिकेनैकत्वेन स्वाभाविकं नानात्वं विरुध्यते, नह्योपचारिकमग्नित्वं माणवकस्य स्वाभाविकनरत्वविरोधि। तस्मात्प्रत्येकवर्णानुभवजनित-
भामती-व्याख्या
शङ्का—प्रत्येक ध्वनि एक पदतत्त्व की अभिव्यक्ति करती हुई उसे अनेक और सावयव-रूप में दर्शाती है, क्योंकि ध्वनियां स्वयं बाह्य और आभ्यन्तर प्रयत्न के भेद से भिन्न होती हैं। 'गङ्गा, औष्ण्यम्, वृक्षः' के समान विसदृश (विजातीय) पदों की व्यञ्जकीभूत ध्वनियों के सदृश होने पर भी ताल्वादि तुल्य स्थान एवं वाग्रूप समान करण से निष्पाद्य होती हैं। अत एव वे (ध्वनियां) अपने व्यञ्जनीय पदतत्त्व में परस्पर विसदृश अनेक पदों की सदृशताएँ आरोपित करती हैं, सादृश्यरूप उपाधि के भेद से भिन्न प्रतीत होती हैं। जैसे मणि, कृपाण, दर्पणादि उपाधियाँ नियत वर्ण, परिमाण और संस्थान विशेषवाले एक ही मुख को अनेक वर्ण, परिमाण और संस्थान के भेद से भिन्न-जैसा झलकाती हैं, वैसे ही कथित व्यञ्जकीभूत ध्वनियाँ एक ही पदतत्त्व को अनेक रूपों में अभिव्यञ्जित करती हैं। इस प्रकार अखण्ड स्फोट तत्त्व के वर्णरूप अवयव कल्पितमात्र हैं, उनके आधार पर ही स्फोट की प्रतीति वर्ण-दूषित होती है।
समाधान—तब क्या किसी बाधक प्रमाण के न होने पर भी अनुभूयमान वर्णों को मिथ्या कहने पर आप (स्फोटवादी) तुले हुए हैं ? पदाद्विगत एकत्व-प्रतीति को ही नानात्व की बाधिका मानने पर वर्णगत नानात्व की प्रतीति को एकत्व का बाधक क्यों नहीं मान लिया जाता ?
अथवा जैसे वन और सेना आदि की प्रतीतियों में औपाधिक और अनौपाधिकरूप से एकत्व और नानात्व का समन्वय देखा जाता है, वैसा ही वर्णों की प्रतीति में भी सम्भव है, क्योंकि 'एकं वनम्, एका सेना'—ये दोनों बुद्धियां क्रमशः गज, वाजी और पदाति (पैदल) के नानात्व एवं चम्पक, अशोक और किंशुकानि वृक्षों के भेद (नानात्व) का बाध करके उत्पन्न नहीं होती हैं। अपितु उनके नानात्व को अक्षुण्ण रखती हुई किसी एक उपाधि से अवच्छिन्न गजादि और चम्पकादि नाना पदार्थों में एकत्व का आपादन करती हैं। न तो