भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 419, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंस्फोटवादनिरसः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् [ ४०१
वर्णानां प्रत्युच्चारणं प्रत्यभिज्ञायमानत्वात्। एवं च सति सालम्बना उदात्तादिप्रत्यया भविष्यन्ति। इतरथा हि वर्णानां प्रत्यभिज्ञायमानानां निर्भेदत्वात्संयोगविभागकृता उदात्तादिविशेषाः कल्पेरन्। संयोगविभागानां चाप्रत्यक्षत्वान्न तदाश्रया विशेषा वर्णेष्वध्यवसातुं शक्यन्त इत्यतो निरालम्बना एवैत उदात्तादिप्रत्ययाः स्युः। अपि च नैवैतदभिनिवेष्टव्यमुदात्तादिभेदेन वर्णानां प्रत्यभिज्ञायमानानां भेदो भवेदिति। न ह्यन्यस्य भेदेनान्यस्याभिद्यमानस्य भेदो भवितुमर्हति। नहि व्यक्तिभेदेन जातिं भिन्नां मन्यन्ते। वर्णेभ्यश्चार्थप्रतीतेः संभवात्स्फोटकल्पनानर्थिका। न कल्पयाम्यहं स्फोटम्, प्रत्यक्षमेव त्वेनमवगच्छामि, एकैकवर्णग्रहणाहितसंस्कारायां बुद्धौ झटिति प्रत्यवभास- नादिति चेत्-न, अस्या अपि बुद्धेर्वर्णविषयत्वात्। एकैकवर्णग्रहणोत्तरकाला हीयमेका
भामती
नहि तेषु प्रत्यभिज्ञानमस्ति । येषु तु वर्णेषु प्रत्यभिज्ञानं न तेषामनुनासिकत्वादयो धर्मा इति नानित्याः । ॐ एवं च सति सालम्बना इति ॐ । यद्येष परस्याग्रहो धर्मिण्यगृह्यमाणे तद्धर्मा न शक्या ग्रहीतुमिति । एवं नामास्तु तथा तुष्यतु परस्तथाप्यदोष इत्यर्थः । तदनेन प्रबन्धेन क्षणिकत्वेन वर्णानामशक्यसङ्गति- ग्रहतया यदवाचकत्वमापादितं वर्णानां तदपाकृतम् । व्यस्तसमस्तप्रकारद्वयासम्भवेन तु यदासञ्जितं तन्निराचिकीर्षुराह ॐ वर्णेभ्यश्चार्थप्रतीतेः इति ॐ । कल्पनामामृष्यमाण एकदेश्याह ॐ न कल्पयामि इति ॐ । निराकरोति ॐ न, अस्या अपि बुद्धेः इति ॐ । निरूपयतु तावद् गौरित्येकं पदमिति धियमायु- ष्मान् । किमियं पूर्वानुभूतान् गकारादीनेव सामस्त्येनावगाहते, किं वा गकाराद्यतिरिक्तं गवयमिव वराहादिभ्यो विलक्षणम् ? यदि गकारादिविलक्षणमवभासयेत् , गकारादिरूषितः प्रत्ययो न स्यात् । न हि वराहधीर्महिषरूषितं वराहमवगाहते । पदतत्त्वमेकं प्रत्येकमभिव्यञ्जयन्तो ध्वनयः प्रयत्नभेदभिन्नाः
भामती-व्याख्या
स्वाभाविक हैं, उन्हें अनित्य और नाना माना जाता है। ध्वनियों में एकत्व-साधनी प्रत्यभिज्ञा का उदय ही नहीं होता, जिन (वर्णों) में प्रत्यभिज्ञा होती है, उनके अनुनासिकत्वादि धर्म नहीं माने जाते, अतः वे अनित्य नहीं होते।
“एवं च सति सालम्बना एवैते उदात्तादिप्रत्ययाः”—इस भाष्य का आशय यह है कि यदि वादी का यह आग्रह मान भी लिया जाय कि वायुरूप धर्मी का श्रोत्र से ग्रहण न हो सकने पर उसके अनुनासिकत्वादि धर्मों का श्रोत्र से ग्रहण नहीं हो सकता। तथापि प्रकृत में कोई दोष नहीं, क्योंकि ध्वनि तत्त्व को अवर्णात्मक शब्द और श्रावण ही माना जाता है, अतः ध्वनिगत धर्मों की प्रतीति सालम्बन हो जाती है। भाष्यकार ने इस प्रबन्ध के द्वारा वर्णों में आरोपित क्षणिकत्व-प्रयुक्त संगतिग्रहाभाव का अपाकरण कर दिया है। वर्णों में व्यस्त और समस्त—इन दो प्रकारों के सम्भव न हो सकने के कारण जो अवाचकत्व प्रसक्त किया गया, उसका निराकरण किया जाता है—“वर्णेभ्यश्चार्थप्रतीतेः संभवात् स्फोटकल्पनाऽ- नर्थिका”। स्फोटवादी कहता है कि “न कल्पयामि स्फोटम्, प्रत्यक्षं त्वेनमवगच्छामि”। सिद्धान्ती उसका निराकरण करता है—“न, अस्या अपि बुद्धेर्वर्णविषयत्वात्”। स्फोटवादी से पूछा जाता है कि आप जो निरूपित करते हैं—“गौरित्येकं पदम्”। यह प्रतीति क्या पूर्वानुभूत गकारादि वर्णों को सामूहिकरूप से ग्रहण करती है ? अथवा जैसे वराह से भिन्न गवय का 'गवयोऽयम्'—यह प्रतीति ग्रहण करती है, वैसे ही पूर्वोक्त प्रतीति क्या गकारादि वर्णों से अतिरिक्त किसी स्फोट तत्त्व का ? यदि गकारादि से भिन्न किसी अन्य तत्त्व का अवगाहन करती है, तब उस प्रतीति में गकारादि वर्णों का भान नहीं होना चाहिए, क्योंकि महिष से भिन्न वराह को विषय करनेवाली प्रतीति में महिष का भान नहीं होता।
५१