भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ४०० | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. ३ सू. २८ |
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स्यात् ? उदात्तश्चानुदात्तश्च स्वरितश्च सानुनासिकश्च निरनुनासिकश्चेति । अथवा,—ध्वनिकृतोऽयं प्रत्ययभेदो न वर्णकृत इत्यदोषः । कः पुनरयं ध्वनिनीम ? यो दूरादाकर्णयतो वर्णविवेकमप्रतिपद्यमानस्य कर्णपथमवतरति । प्रत्यासीदतश्च पटुमृदुत्वादिभेदं वर्णेष्वासञ्जयति । तन्निबन्धनाश्चोदात्तादयो विशेषा न वर्णस्वरूपनिबन्धनाः,
भामती
गोचरं श्रोत्रम् । तद्गुणांस्तूदात्तादीन् गोचरयिष्यति । ते च शब्दसंसर्गग्रहात् शब्दधर्मत्वेनाध्यवसीयन्ते । न च शब्दस्य प्रत्यभिज्ञानावधृतैकत्वस्य स्वरूपत उदात्तादयो धर्माः परस्परविरोधिनोऽपर्यायेण सम्भवन्ति । तस्माद्यथा मुख्यस्यैकस्य मणिकृपाणदर्पणाद्युपधानवशाज्ञानादेशपरिमाणसंस्थानभेदविभ्रमः, एवमेकस्यापि वर्णस्य व्यञ्जकध्वनिनिबन्धनोऽयं विरुद्धनानाधर्मसंसर्गविभ्रमः, न तु स्वाभाविको नानाधर्मसंसर्गः, इति स्थितेऽभ्युपेत्य परिहारमाह भाष्यकारः ❖ अथवा ध्वनिकृतः इति ❖ । अथेति पूर्वपक्षं व्यावर्तयति । भवेतां नाम गुणगुणिनावेकेन्द्रियग्राह्यौ, तथाप्यदोषः । ध्वनीनामपि शब्दवच्छ्रावणत्वात् । ध्वनिस্বরূপं प्रश्नपूर्वकं वर्णेभ्यो निष्कर्षयति ❖ कः पुनरयम् इति ❖ । न चायमनिर्धारितविशेषवर्णत्वसामान्यमात्रप्रत्ययो न तु वर्णातिरिक्ततदभिव्यञ्जकध्वनिप्रत्यय इति साम्प्रतम् । तस्यानुनासिकत्वादिभेदभिन्नस्य गादिव्यक्तिवत्प्रत्यभिज्ञानाभावादप्रत्यभिज्ञायमानस्य चैकत्वाभावेन सामान्याभावानुपपत्तेः । तस्मादवर्णात्मको वैष शब्दः शब्दातिरिक्तो वा ध्वनिः शब्दव्यञ्जकः श्रावणोऽभ्युपेयः । उभयथापि चाक्षु व्यञ्जनेषु च तत्तद्ध्वनिभेदोपधानेनानुनासिकत्वादयोऽवगम्यमानास्तद्धर्मा एव शब्दे प्रतीयन्ते न तु स्वतः शब्दस्य धर्माः । तथा च येषामनुनासिकत्वादयो धर्माः परस्परविरुद्धा भासन्ते भवतु तेषां ध्वनीनामनित्यता ।
भामती-व्याख्या
वायु के धर्मभूत उदात्तादि का ही शब्द में समारोप हो जाता है। उदात्तादि विरुद्ध धर्म वर्णरूप शब्द के स्वाभाविक धर्म न होने के कारण वर्णगत नानात्व सिद्ध नहीं कर सकते, क्योंकि प्रत्यभिज्ञारूप प्रत्यक्ष प्रमाण से वर्ण में एकत्व निश्चित है। अतः जैसे एक ही मुखरूप बिम्ब का मणि, कृपाण, दर्पणादि उपाधियों में प्रतिफलित विविध आकार के प्रतिबिम्बों के भेद से भेद अवभासित होता है, वैसे ही व्यङ्ग्यभूत वर्ण में व्यंजकीभूत ध्वनिगत उदात्तादि विरुद्ध धर्मों का विभ्रम मात्र हो जाता है—ऐसा समाधान प्रस्फुरित होने पर भी भाष्यकार आक्षेपवादी के आक्षेप को मान कर भी उक्त आक्षेप का परिहार कर रहे हैं—"अथवा ध्वनिकृतोऽयं प्रत्ययभेदो न वर्णकृत इत्यदोषः"। 'अथवा' शब्द के द्वारा पूर्वपक्ष का निराकरण करते हुए भाष्यकार का आशय यह है कि यदि गुण और गुणी द्रव्य का एक ही इन्द्रिय के द्वारा ग्रहण मान भी लिया जाता है, तब भी प्रकृत में कोई दोष नहीं, क्योंकि शब्द की व्यंजकीभूत ध्वनियां भी शब्द के समान ही श्रावण होती हैं। प्रश्नोत्तर के रूप में वर्णों से अतिरिक्त ध्वनि का स्वरूप आविष्कृत करते हैं—"कः पुनरयं ध्वनिनीम ? यो दूरादाकर्णयतो वर्णविवेकमप्रतिपद्यमानस्य कर्णपथमवतरति"। यदि कहा जाय कि ध्वनि भी वर्णात्मक है, इस दोष के कारण व्यक्तिविशेष स्फुटित नहीं होती, केवल वर्णत्व जाति की ही वहाँ प्रतीति होती है। तो वैसा नहीं कह सकते, क्योंकि ध्वनियों में अनुनासिकत्वादि के भेद से अनेकत्व होता है, अतः गकारादि वर्णों के समान उनमें प्रत्यभिज्ञा नहीं हो सकती, अतः एकत्व सिद्ध न हो सकने के कारण ध्वनियों में शब्दत्व ही उपपन्न नहीं होता। अतः ध्वनि या तो अवर्णात्मक शब्द है, अथवा शब्द से भिन्न ही है फिर भी शब्द की व्यंजक और श्रावण है। दोनों रीति से 'अच्' प्रत्याहार-घटक अकारादि स्वरों और हकारादि व्यंजनों में उनकी व्यंजकीभूत ध्वनियों के अनुनासिकत्वादि धर्म ही प्रतीत होते हैं, शब्द में वे स्वाभाविक (अनौपाधिक) नहीं होते। अनुनासिकत्वादि परस्पर-विरुद्ध धर्म जिस ध्वनि तत्त्व के