भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 417, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंदेवताया विग्रहादिमत्त्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ३९९
भिन्नानम्। कथं ह्येकस्मिन्काले बहूनामुच्चारयतामेक एव सन्गकारो युगपदनेकरूपः
भामती
न च स्वस्तिमत्यादिवद् गव्यक्तिभेदप्रत्ययः स्फुटः प्रत्युच्चारणमस्ति । तथा सति दश गकारानु- बचारयच्चैत्र इति प्रत्ययः स्यात्, न स्याद् दशकृत्व उच्चारयद गकारमिति । न चैष जात्यभिप्रायोऽभ्यासो यथा शतकृत्वस्तित्तिरीनुपायुङ्क्त देवदत्त इति । अत्र हि सोरस्ताडं क्रन्दतोऽपि गकाराभिव्यक्तौ लोकस्यो- च्चारणाभ्यासप्रत्ययस्याविनिवृत्तेः । चोदकः प्रत्यभिज्ञानबाधकमुत्थापयति ॐ कथं ह्येकस्मिन् काले बहूनामुच्चारयताम् इति ॐ । यद्युगपद्विरुद्धधर्मसंसर्गवत् तन्नाना । यथा गवाश्वाविद्विशफेकशफकेशरगल- कम्बलादिमान् । युगपदुदात्तानुदात्तादिविरुद्धधर्मसंसर्गावांश्चायं वर्णः, तस्मान्नाना भवितुमर्हति । न चोदा- त्तादयो व्यञ्जकधर्माः, न वर्णधर्मा इति साम्प्रतम् । व्यञ्जका ह्यस्य वायवः । तेषामश्रावणत्वे कथं तद्धर्माः श्रावणाः स्युः । इदं तावदत्र वक्तव्यं, न हि गुणगोचरमिन्द्रियं गुणिनमपि गोचरयति, मा भूवन् घ्राणरसनश्रोत्राणां गन्धरसशब्दगोचराणां तद्वन्तः पृथिव्युदकाकाशा गोचराः । एवं च मा नाम भूद्वायु-
भामती-व्याख्या
कहते हैं—"नादवृद्धिपरा" (जै० सू० १।१।१७) । अतः गत्वादि जाति की कल्पना व्यर्थ है। जैसे स्वस्तिमती आदि गोव्यक्तियों का भेद-भान नितान्त स्फुट है, वैसा गकारादि व्यक्तियों का प्रत्येक उच्चारण में भेद स्पष्ट प्रतीत नहीं होता । गकारादि व्यक्तियों का भेद मानने पर 'दश गकारानुदचारयत् चैत्रः'—ऐसा अनुभव होना चाहिए किन्तु वहाँ जो 'दशकृत्व उदचार- यद गकारम्'—ऐसा अनुभव होता है, वह नहीं होना चाहिए था । उच्चारणगत अभ्यास (आवृत्ति) के द्वारा उच्चार्यमाण गकार व्यक्ति की एकता अक्षुण्ण रहती है । गत्व जाति के माध्यम से यह उच्चारणभ्यास सम्पन्न क्यों नहीं हो सकता, जैसे 'दशकृत्वः तित्तिरीमुपा- युङ्क्त देवदत्तः'—यहाँ पर एक तित्तिरि व्यक्ति का कई वार उपयोग नहीं हो सकता, अतः तित्तिरिजातीय पक्षियों का उपयोग माना जाता है ? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि प्रथमतः उच्चारण शब्द का ही होता है, जात्यादिका नहीं । दूसरी बात यह हैं कि कितना भी छाती पीट-पीट कर रोना-धोना कर लिया जाय किन्तु वर्णोच्चारण की आवृत्ति का अनुभव निवृत्त नहीं किया जा सकता ।
आक्षेपवादी वर्णगत एकत्व की साधिका प्रत्यभिज्ञा का बाध प्रस्तुत करता है—"कथं ह्येकस्मिन् काले बहूनामुच्चारयतामेक एव सन् गकारो युगपदनेकरूपः स्यात्" । आशय यह है कि जो पदार्थ एक ही समय विरोधी धर्मों का सम्बन्धी होता है, वह नाना (अनेक) होता है, जैसे गो और अश्व क्रमशः द्विशफ (कटे खुरवाले) और एकशफ, केशर (सटा) और गल-कम्बल (सास्ना.) आदि विरुद्ध धर्मों के सम्बन्धी होने के कारण परस्पर भिन्न हैं। वर्ण भी उदात्त और अनुदात्तादि विरुद्ध धर्मवान् होने के कारण अनेक होते हैं । 'उदात्तादि धर्म वर्ण के न होकर उसके व्यञ्जकीभूत ध्वनि के धर्म हैं'—ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि वर्णों की व्यञ्जक जो ध्वनि है, वह वायुरूप है, वायु का श्रोत्र से ग्रहण नहीं होता, अतः वायु के धर्मभूत उदात्तादि का श्रावण प्रत्यक्ष क्योंकर होगा ? परिशेषतः उदात्तादि विरुद्ध धर्मों को वर्ण का ही धर्म मानना होगा, अतः गकारादि वर्ण अनेक होते हैं, एक नहीं ।
सिद्धान्ती का अभिप्राय यह है कि किसी गुण का विषय करनेवाले करण (इन्द्रिय) से उस गुण के आधारभूत द्रव्य का नियमतः ग्रहण नहीं होता, जैसे कि घ्राण, रसन और श्रोत्र के क्रमशः गन्ध, रस और शब्दरूप गुण ही विषय होते हैं, उन गुणों के आधारभूत पृथिवी, जल और आकाश द्रव्य नहीं, उसी प्रकार वायवीय ध्वनि के धर्मभूत उदात्तादि धर्मों का श्रोत्र के द्वारा ग्रहण होने पर उसके धर्मीभूत वायुद्रव्य का ग्रहण न होना अनुचित नहीं।