भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३९८ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [अ. १ पा. ३ सू. २८
विति। ननु वर्णा अप्युच्चारणभेदेन भिन्नाः प्रतीयन्ते देवदत्तयज्ञदत्तयोरध्ययनध्वनि- श्रवणादेव भेदप्रतीतेरित्युक्तम्। अत्राभिधीयते, - सति वर्णविषये निश्चिते प्रत्यभिज्ञाने संयोगविभागाभिव्यङ्ग्यत्वाद्वर्णानामभिव्यञ्जकवैचित्र्यनिमित्तोऽयं वर्णविषयो विचित्रः प्रत्ययो न स्वरूपनिमित्तः। अपि च वर्णव्यक्तिभेदवादिनापि प्रत्यभिज्ञानसिद्धये वर्णाकृतयः कल्पयितव्याः। तासु च परोपाधिको भेदप्रत्यय इत्यभ्युपगन्तव्यम्। तद्वरं वर्णव्यक्तिष्वेव परोपाधिको भेदप्रत्ययः स्वरूपनिमित्तं च प्रत्यभिज्ञानमिति कल्पनालाघवम्। एष एव च वर्णविषयस्य भेदप्रत्ययस्य बाधकः प्रत्ययो यत्प्रत्य-
भामती विष्णुशर्मेति युक्तम्। यतो बहुषु गकारमुच्चारयत्सु निपुणमनुभवः परीक्ष्यताम्। यथा कालाक्षीं च स्वस्तिमतीं चेक्षमाणस्य व्यक्तिभेदप्रथायां सत्यामेव तदनुगतमेकं सामान्यं प्रथते, तथा किं गकारादिषु भेदेन प्रथमानेष्वेव गत्वमेकं तदनुगतं चकास्ति, किं वा यथा गोत्वमाजानत एकं भिन्नदेशपरिमाणसंस्थानव्यक्त्यु- पधानभेदाद्भिन्नदेशमिवाल्पमिव महदिव दीर्घमिव वामनमिव तथा गव्यक्तिराजानत एकाऽपि व्यञ्जक- भेदात्तद्धर्मानुपातिनीव प्रथत इति भवन्त एव विद्वाङ्कुर्वन्तु। तत्र गव्यक्तिभेदमङ्गीकृत्यापि यो गत्वस्यै- कस्य परोपधानभेदकल्पनाप्रयासः स वरं गव्यक्तावेवास्तु किमन्तर्गडुना गत्वेनाभ्युपेतेन। यदाहुः — तेन यत्प्रार्थ्यते जातेस्तद्वर्णादेव लप्स्यते। व्यक्तिलभ्यं तु नादेभ्य इति गत्वादिधीर्वृथा ॥
भामती-व्याख्या (गी० ४।४०)। इस विषय का विस्तार से वर्णन न्यायगणिका में (पृ० १६७ पर) किया गया है। शङ्का- यद्यपि गकार वर्णं नाना हैं, तथापि उनमें 'गत्व' जाति एक होने के कारण उक्त प्रत्यभिज्ञा हो जाती है। गकारादि व्यक्तियों में भेद उच्चारयिता पुरुषों के भेद से स्पष्ट उपलब्ध होता है, अत एव अध्येता पुरुषों का भेद परिलक्षित होता है—'सोमशर्माऽधीते न विष्णु शर्मा'। समाधान जहाँ बहुत व्यक्ति एक ही गकार का उच्चारण कर रहे हों, वहाँ यह गंभीर विचार करना है कि जैसे कालाक्षी और स्वस्तिमती नाम की गो व्यक्तियों में भेद प्रतीत होने पर भी उनमें अनुगत एक 'गोत्व' जाति प्रथित होती है। वैसे ही क्या गकार व्यक्तियों का भेद होने पर भी 'गत्व' नाम की एक जाति प्रतीत होती है? अथवा जैसे 'आकाशत्व' जाति की ऊहा से शून्य व्यक्ति को घट, मठ, मठादि उपाधियों के भेद से एक ही आकाश व्यक्ति नाना रूपों में अवभात होता है, वैसे ही 'गोत्व' जाति की कल्पना से रहित व्यक्ति एक ही गकार व्यक्ति में व्यञ्जक नाना उपाधियों के भेद से भेद का भान करता है? इस प्रश्न का ठीक उत्तर तो आप (विचारकगण) ही जानें, हमारा तो यह कहना है कि गकार व्यक्तियों का भेद मानकर उनमें कल्पित 'गत्व' जाति में जो एकत्व माना जाता है, वह एकत्व गकार व्यक्ति में ही मान लेना चाहिए, मध्य में 'गत्व' की कल्पना से क्या लाभ? श्री कुमारिल भट्ट भी यही कहते हैं— तेन यत्प्रार्थ्यते जातेः तद् वर्णादेव लप्स्यते। व्यक्तिलभ्यं च नादेभ्य इति गत्वादिधीर्वृथा॥ (श्लो० वा० पृ० ५१६) अर्थात् गत्वादि जाति की कल्पना से जो प्रत्यभिज्ञा की उपपत्ति की जाती है, वह वर्ण व्यक्ति की एकता से ही उपपन्न हो जाती है और व्यक्तियों में जो भेद अवभासित होता है, वह नाद (वायवीय संयोग-विभागरूप उच्चारण) के भेद से निभ जाता है, जैसा कि महर्षि जैमिनि