भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदेवताया विग्रहादिमत्त्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ३९७
स्फोटरूपादभिधायकात्क्रियाकारकफललक्षणं जगदभिधेयभूतं प्रभवतीति ।
'वर्णा एव तु शब्दः' इति भगवानुपवर्षः। ननूत्पन्नप्रध्वंसित्वं वर्णानामुक्तं, तन्न, त एवेति प्रत्यभिज्ञानात् । सादृश्यात्प्रत्यभिज्ञानं केशादिष्विवेति चेत्, न; प्रत्यभिज्ञानस्य प्रमाणान्तरेण बाधानुपपत्तेः । प्रत्यभिज्ञानमाकृतिनिमित्तमिति चेत्—न, व्यक्तिप्रत्यभिज्ञानात् । यदि हि प्रत्युच्चारणं गवादिव्यक्तिवदन्या अन्या वर्णव्यक्तयः प्रतीयेरं-स्तत आकृतिनिमित्तं प्रत्यभिज्ञानं स्यात्, नत्वेतदस्ति, वर्णव्यक्तय एव हि प्रत्युच्चारणं प्रत्यभिज्ञायन्ते । द्विर्गोशब्द उच्चारित इति हि प्रतिपत्तिर्न तु द्वौ गोशब्दा-
भामती
तदेतदाचार्यदेशीयमतं स्वमतमुपपादयन्नपाकरोति ॐ वर्णा एव तु शब्दः इति ॐ । एवं हि वर्णातिरिक्तः स्फोटोऽभ्युपेयेत, यदि वर्णानां वाचकत्वं न सम्भवेत्, स चानुभवपद्धतिमध्यसीत । द्विधा चावाचकत्वं वर्णानां, क्षणिकत्वेनाशक्यसङ्गतिग्रहत्वाद्वा, व्यस्तसमस्तप्रकारद्वयाभावाद्वाऽऽस्थीयते । न तावत्प्रथमः कल्पः, वर्णानां क्षणिकत्वे मानाभावात् । ननु वर्णानां प्रत्युच्चारणमन्यत्वं सर्वजनप्रसिद्धम् । न, प्रत्यभिज्ञानानुभवविरोधात् । न चासत्यप्येकत्वे ज्वालादिवत्सा दृश्यनिबन्धनमेतत् प्रत्यभिज्ञानमिति साम्प्रतम् । सादृश्यनिबन्धनत्वमस्य बलवद्बाधकोपनिपाताद्वाऽऽस्थीयेत, क्वचिज्ज्यालादौ व्यभिचारदर्शनाद्वा ? तत्र क्वचिद्व्यभिचारदर्शनेन तदुत्प्रेक्षायामुच्यते बुद्धेः स्वतःप्रामाण्यावादिभिः—
उत्प्रेक्षेत हि यो मोहादज्ञातमपि बाधनम् । स सर्वव्यवहारेषु संशयात्मा क्षयं व्रजेत् ॥ इति ।
प्रपञ्चितं चेतदस्माभिर्न्यायकणिकायाम् । न चेदं प्रत्यभिज्ञानं गत्वादिजातिविषयं, न गादिव्यक्तिविषयं, तासां प्रतिनरं भेदोपलम्भात् । अत एव शब्दभेदोपलम्भाद्भवतैवमुन्नीयते—सोमशर्माऽधीते न
भामती-व्याख्या
शब्द में ही पर्यवसित होती है।
सिद्धान्त और स्फोटवाद का निरास—मीमांसा-सूत्रों के वृत्तिकार भगवान् उपवर्ष का कहना है कि "वर्णा एव तु शब्दः"। वर्णों से अतिरिक्त स्फोट का अभ्युपगम तब किया जा सकता था, जब कि वर्णों में अर्थ की वाचकता सम्भव न होती। वर्णों की अवाचकता से ही स्फोट का कथञ्चित् अनुमान किया जा सकता था। वर्णों में अवाचकता का उपपादन तीन प्रकार से किया जा सकता था—(१) वर्णों में क्षणिकत्व होने या (२) वर्णों का अर्थ के साथ संगतिग्रह न हो सकने अथवा (३) व्यस्त (प्रत्येक) वर्ण और समस्त (मिलित सभी) वर्ण में वाचकता सम्भव न हो सकने के कारण। इनमें प्रथम कल्प उचित नहीं, क्योंकि वर्णों की क्षणिकता में कोई प्रमाण नहीं। प्रत्येक उच्चारण के भेद से गकारादि वर्णों का भेद नहीं माना जा सकता, क्योंकि 'सोऽयं गकारः'—इस प्रकार की प्रत्यभिज्ञा वर्ण के अभेद को सिद्ध कर रही है। जैसे दीप-शिखा क्षण-भेद से भिन्न होने पर भी सभी ज्वाला-सन्तानों में सादृश्य होने के कारण 'सेयं दीपज्वाला'—इस प्रकार की प्रत्यभिज्ञा उपपन्न हो जाती है, वैसे ही गकारादि का भेद होने पर भी उनमें 'सोऽयं गकारः'—ऐसी प्रत्यभिज्ञा उपपन्न क्यों न हो जायगी ? इस शङ्का का समाधान करते हुए श्री कुमारिल भट्ट ने कहा है—
उत्प्रेक्षेत च यो मोहादज्ञातमपि बाधनम् । स सर्वव्यवहारेषु संशयात्मा क्षयं व्रजेत् ॥ ( )
अर्थात् दीप-ज्वालादि के समान वर्णों में भी सादृश्यमूलक प्रत्यभिज्ञा की उपपत्ति करने पर आत्मादि नित्य पदार्थों में भी प्रत्यभिज्ञा का अन्यथा-नयन हो जायगा, तब आत्मनित्यत्वादि में संशय हो जायेगा और गीता की यह उक्ति लागू हो जायगी—"संशयात्मा विनश्यति"