भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| १९६ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. ३ सू. २८ |
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त्वात्। तथा हि—अदृश्यमानोऽपि पुरुषविशेषोऽध्ययनध्वनिश्रवणादेव विशेषतो निर्धार्यते—देवदत्तोऽयमधीते यज्ञदत्तोऽयमधीते इति। न चायं वर्णविषयोऽन्यथात्वप्रत्ययो मिथ्याज्ञानं, बाधकप्रत्ययाभावात्। न च वर्णेभ्योऽर्थावगतिर्युक्ता। न ह्येकैको वर्णोऽर्थं प्रत्याययेत्, व्यभिचारात्। न च वर्णसमुदायप्रत्ययोऽस्ति, क्रमवत्त्वाद् वर्णानाम्। पूर्वपूर्ववर्णानुभवजनितसंस्कारसहितोऽन्त्यो वर्णोऽर्थं प्रत्याययिष्यतीति यद्युच्येत। तन्न। संबन्धग्रहणानपेक्षो हि शब्दः स्वयं प्रतीयमानोऽर्थं प्रत्याययेत्, धूमादिवत्। न च पूर्वपूर्ववर्णानुभवजनितसंस्कारसहितस्यान्त्यवर्णस्य प्रतीतिरस्ति; अप्रत्यक्षत्वात्संस्काराणाम्। कार्यप्रत्यायितैः संस्कारैः सहितोऽन्त्यो वर्णोऽर्थं प्रत्याययिष्यतीति चेत्,—न; संस्कारकार्यस्यापि स्मरणस्य क्रमवर्तित्वात्। तस्मा-त्स्फोट एव शब्दः। स चैकैकवर्णप्रत्ययाहितसंस्कारबीजेऽन्त्यवर्णप्रत्ययजनितप-रिपाके प्रत्ययिन्येकप्रत्ययविषयतया झटिति प्रत्यवभासते। न चायमेकप्रत्ययो वर्णविषया स्मृतिः; वर्णानामनेकत्वादेकप्रत्ययविषयत्वानुपपत्तेः। तस्य च प्रत्युच्चारणं प्रत्यभिज्ञायमानत्वान्नित्यत्वम्, भेदप्रत्ययस्य वर्णविषयत्वात्। तस्मान्नित्याच्छब्दात्
भामती
स्यात्। अपि तु रत्नतत्त्वज्ञानवद् यथास्वं द्वित्रिचतुष्पञ्चषड्दर्शनजनितसंस्कारपरिपकसचिवचेतोलब्ध-जन्मनि चरमे चेतसि चकास्ति विशदं पदवाक्यतत्त्वमिति प्रागुत्पन्नायास्त्वनन्तरमर्थधिय उदय इति नोत्तरेषामानर्थक्यं ध्वनीनाम्। नापि प्राचां, तदभावे तज्जनितसंस्कारतत्परिकाभावेनानुग्रहाभावात्। अन्ध्यस्य चेतः केवलस्याजनकत्वात्। न च पदप्रत्ययवत् प्रत्येकमव्यक्तामर्थधियमाधास्यन्ति प्राञ्चो वर्णाः, चरमस्तु तत्सचिवः स्फुटतरामिति युक्तम्। व्यक्ताव्यक्तभावसितायाः प्रत्यक्षज्ञाननियमात्। स्फोटज्ञानस्य च प्रत्यक्षत्वात्। अर्थधियस्त्वप्रत्यक्षतया मानान्तरजन्मनो व्यक्त एवोपजनो न वा स्यान्न पुनरस्फुट इति न समः समाधिः। तस्मान्नित्यः स्फोट एव वाचको न वर्णा इति ।
भामती-व्याख्या
कर रही है। उस स्फोट को पद या वाक्य का घटकीभूत प्रत्येक वर्ण अभिव्यक्त करता है किन्तु एक वर्ण सद्यः स्फुटरूप में अभिव्यक्त नहीं कर सकता कि एक वर्ण के उच्चारण मात्र से अभिव्यक्त स्फोट अभिलषित अर्थ का बोधक हो जाता। अपितु जैसे रत्न तत्त्व अनेक बार के निरीक्षण और परीक्षण से निखरता है, वैसे ही पदतत्त्व और वाक्यतत्त्व नाम का स्फोट भी। यथावसर दो, तीन, चार, पाँच या छः वर्णों के उच्चारण से जनित संस्कारों से युक्त अन्तिम वर्ण के उच्चारण की परिपाटी ही उक्त स्फोट को वह अन्तिम निखार देती है, जिसके अनन्तर अर्थावबोध का उदय होता है, अतः पद के द्वितीयादि वर्णों का उच्चारण निरर्थक नहीं होता। इस प्रकार पूर्व वर्ण भी व्यर्थ नहीं होते, क्योंकि पूर्व-पूर्व वर्ण के उच्चारण से जनित संस्काररूप सहायक के बिना उक्त स्फोट का परिपाक ही निष्पन्न नहीं होता, अतः केवल अन्तिम वर्ण की अनुभूति उस स्फोट को अभिव्यक्त नहीं कर सकती।
शङ्का—जैसे पदादि के घटकीभूत वर्ण क्रमशः स्फोट की उत्तरोत्तर स्फुटाभिव्यक्ति करते हैं, वैसे ही सीधे-सीधे अर्थावबोध की उत्तरोत्तर स्फुटोत्पत्ति कर सकते हैं, अतः मध्यपाती स्फोट की कल्पना व्यर्थ है।
समाधान—स्फोट तत्त्व प्रत्यक्ष है और अर्थ-ज्ञान अप्रत्यक्ष [जैसा कि शबरस्वामी ने कहा है—"अप्रत्यक्षा बुद्धिः" (शाबर. पृ. ३४)]। उत्तरोत्तर स्फुटता प्रत्यक्षभूत पदार्थ पर ही अनुभूत होती है, परोक्ष पदार्थ पर नहीं, अतः वर्णोच्चारण के द्वारा अभिव्यक्त स्फोट ही अर्थ-ज्ञान का जनक होता है, वर्ण नहीं। इस प्रकार वाच्यार्थ की वाचकता स्फोटात्मक