भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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देवताया विग्रहादिमत्त्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ३९५

मित्याह । वर्णपक्षे हि तेषामुत्पन्नप्रध्वंसित्वान्नित्येभ्यः शब्देभ्यो देवादिव्यक्तीनां प्रभव इत्यनुपपन्नं स्यात् । उत्पन्नप्रध्वंसिनश्च वर्णाः, प्रत्युच्चारणमन्यथा चान्यथा च प्रतीयमान-

भामती

अर्थधीहेतवः, नापि तदतिरिक्तः स्फोटात्मा, तस्यानुभवानारोहात् । अर्थधियस्तु कार्यात्तदवगमे परस्परा- श्रयप्रसङ्ग इत्युक्तप्रायम् । सत्तामात्रेण तु तस्य नित्यस्यार्थधीहेतुभावे सर्वदाऽर्थप्रत्ययोत्पादप्रसङ्गो निरपे- क्षस्य हेतोः सदातनत्वात् । तस्माद्वाचकाच्छब्दाद्वाच्योत्पाद इत्यनुपपन्नमिति । अत्राचार्यदेशीयमतमाह ॐ स्फोटमित्याह इति ॐ । मृष्यामहे न वर्णाः प्रत्यायका इति, न स्फोट इति तु न मृष्यामः । तदनुभवानन्तरं विवितसङ्कतेरर्थधीसमुत्पादात् । न च वर्णातिरिक्तस्य तस्यानुभवो नास्ति । गौरित्येकं पदं गामानय शुक्लामित्येकं वाक्यमिति नानावर्णपदातिरिक्तैकपदवाक्यावगतेः सर्व- जनीनत्वात् । न चायमसति बाधके एकपदवाक्यानुभवः शक्यो मिथ्येति वक्तुम् । नाप्यौपाधिकः । उपाधिः खल्वेकधीग्राह्यता वा स्यात् , एकार्थधीहेतुता वा ? न तावदेकधीगोचराणां धवखदिरपलाशा- नामेकनिर्भासः प्रत्ययः समस्ति । तथा सति धवखदिरपलाशा इति न जातु स्यात् । नाप्येकार्थधीहेतुता, तद्धेतुत्वस्य वर्णेषु व्यासेधात् । तद्धेतुत्वेन तु साहित्यकल्पनेऽन्योन्याश्रयप्रसङ्गः—साहित्यात्तद्धेतुत्वं तद्धेतु- त्वाच्च साहित्यमिति । तस्मादयमबाधितोऽनुपाधिक पदवाक्यगोचर एकनिर्भासो वर्णातिरिक्तं वाचकमक- मवलम्बते स स्फोट इति, तं च ध्वनयः प्रत्येकं व्यञ्जयन्तोऽपि न द्रागित्येव विशदयन्ति, येन द्रागर्थधीः

भामती-व्याख्या

वर्णों से अतिरिक्त स्फोटात्मक शब्द भी अर्थ-ज्ञान का उत्पादक नहीं हो सकता, क्योंकि वैसा कोई शब्द अनुभव में नहीं आता। अर्थ-ज्ञानरूप कार्य के द्वारा स्फोट का ज्ञान मानने पर अन्योऽन्याश्रय दोष प्रसक्त होता है। अज्ञायमान स्फोट को सत्तामात्र से अर्थ-ज्ञान का जनक मानने पर सर्वदा अर्थज्ञान होना चाहिए, क्योंकि स्फोट की नित्य सत्ता मानी जाती है और अर्थ-ज्ञान की उत्पत्ति में अन्य किसी सामग्री की अपेक्षा भी नहीं मानी जाती। फलतः वाचक शब्द के द्वारा वाच्यार्थ के ज्ञान की उत्पत्ति उपपन्न ( तर्क-संगत ) नहीं।

स्फोटवाद—उक्त शङ्का के समाधान में 'स्फोटमित्याह' । उसका कहना है कि यह तो सत्य ही है कि वर्णात्मक शब्द अर्थ-बोध-जनक नहीं किन्तु 'स्फोटात्मक शब्द अर्थ-बोधक नहीं'—यह नहीं माना जा सकता, क्योंकि स्फोट का अनुभव होने के अनन्तर ही उस व्यक्ति को तुरन्त शाब्द-बोध हो जाता है, जिसको शब्द और अर्थ का संगति-ग्रह हो चुका होता है। यह जो कहा गया कि वर्गों से अतिरिक्त स्फोटरूप शब्द अनुभव में नहीं आता। वह कहना संगत नहीं, क्योंकि नाना वर्णों से अतिरिक्त 'गौरित्येकं पदम्'—इस प्रकार एक पद और 'गामानय शुक्लामित्येकं वाक्यम्'—इस प्रकार एक वाक्य की अनुभूति तो सर्वमत-सिद्ध है। जब तक कि कोई बाधक प्रमाण उपलब्ध न हो, तब तक इस एक पद और एक वाक्य की अनुभूति का अपलाप नहीं किया जा सकता । 'एक ज्ञान की विषयता या मुख्य एक अर्थ के ज्ञान की जनकता होने के कारण वर्णों में ही एकपदता और एकवाक्यता की औपाधिक प्रतीति होती है, वर्णों से अतिरिक्त एकपद या एकवाक्य की कोई सत्ता सम्भव नहीं'—ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि जैसे धव, खदिर और पलाश नाम के अनेक वृक्षों में एकता का निर्भास नहीं होता, अन्यथा 'धवखदिरपलाशाः'—इस प्रकार बहुवचन का प्रयोग संगत न हो सकेगा। वैसे ही गकार, अकार और विसर्गरूप अनेक वर्णों में एकता का भान नहीं होता। एकार्थ-ज्ञान की हेतुता तो वर्णों में स्फोटवादी ही नहीं मानता। एकार्थ-ज्ञान की हेतुता के द्वारा एकता की कल्पना करने पर अन्योऽन्याश्रय दोष प्राप्त होता है। इस प्रकार अबाधित और अनौपाधिक एकपदतादि की प्रतीति ही वर्णों से अतिरिक्त स्फोटात्मक शब्द को सिद्ध