भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ३९४ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. ३ सू. २८ |
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भामती
रूपतो व्यक्तितो वा प्रतिक्षणमपवर्गवतां मिथः साहित्यसम्भवाभावात् । न च प्रत्येकसमुदायाभ्यामन्यः प्रकारः सम्भवति । न च स्वरूपसाहित्याभावेऽपि वर्णानामाग्नेयादीनामिव संस्कारद्वारकमस्ति साहित्यमिति साम्प्रतं, विकल्पासहत्वात् । को नु खल्वयं संस्कारोऽभिमतः, किमपूर्वं नामाग्नेयादिजन्यमिव, किंवा भावनापरनामा स्मृतिप्रभवबीजम् । न तावत् प्रथमः कल्पः, नहि शब्दः स्वरूपतोऽज्ञातो वाऽविदितोऽविदितसङ्गतिरर्थधीहेतुरिन्द्रियवत् । उच्चरितस्य बधिरेणागृहीतस्य गृहीतस्य वाऽगृहीतसङ्गतेरप्रत्ययात् । तस्माद्विदितो विदितसङ्गतिर्विदितसमस्तज्ञापनाङ्गश्च शब्दो धूमादिवत् प्रत्यायकोऽभ्युपेयः । तथा चापूर्वाभिधानोऽस्य संस्कारः प्रत्ययानाङ्गमिस्यर्थप्रत्ययाःप्रागवगन्तव्यः । न च तदा तस्यावगमोपायोऽस्ति । अर्थप्रत्ययात्तु तदवगमं समर्थयमानो दुरुत्तरमितरेतराश्रयमाविशति—संस्कारावसायादर्थप्रत्ययः, ततश्च तदवसाय इति । भावनाभिधानस्तु संस्कारः स्मृतिप्रसवसामर्थ्यमात्मनो, न च तदेवार्थप्रत्ययप्रसवसामर्थ्यमपि भवितुमर्हति । नापि तस्यैव सामर्थ्यस्य सामर्थ्यान्तरम् । न हि येव वह्नेर्दहनशक्तिः सैव तस्य प्रकाशनशक्तिः । नापि दहनशक्तेः प्रकाशनशक्तिः । अपि च व्युत्क्रमेणोच्चरितेभ्यो वर्णेभ्यः सेवासित स्मृतिबीजं वासनेत्यर्थप्रत्ययः प्रसज्येत, न चास्ति । तस्मान्न कथञ्चिदपि वर्णा
भामती-व्याख्या
होनेवाले वर्णों का परस्पर मिलन सम्भव नहीं, प्रत्येक या मिलकर इन दो प्रकारों को छोड़कर वर्णों की बोधकता का कोई अन्य प्रकार सम्भव नहीं, जैसे दर्शपूर्णमासगत आग्नेय आदि कर्मों में अपने जनित संस्कारों के माध्यम से समूहीकरण या मिलन होता है, वैसा वर्णों का मिलित होना सम्भावित नहीं, क्योंकि कथित संस्कार के विषय में यह जिज्ञासा होती है कि उसका स्वरूप क्या है ? क्या वह आग्नेय आदि कर्मों से जनित अदृष्ट के समान कोई संस्कार पदार्थ है ? अथवा स्मृति-जनक भावनासंज्ञक संस्कार ? प्रथम कल्प उचित नहीं, क्योंकि [ अदृष्टरूप संस्कारों की उत्पत्ति वहाँ ही मानी जाती है, जहाँ मुख्य कार्य की उत्पत्ति से पहले हीं अवगत कारणत्व अन्यथा अनुपपन्न हो, जैसे “यजेत स्वर्गकामः”—इत्यादि वाक्यों के द्वारा यागगत स्वर्ग-साधनता स्वर्गोत्पत्ति के पूर्व ही अवगत है, क्षणिक याग में कालान्तरभावी स्वर्ग की साधनता उपपन्न नहीं हो सकती, अतः याग-जन्य अदृष्टरूप संस्कार की कल्पना की जाती है, किन्तु ] शब्द, शब्द के सहायक अङ्ग-कलाप एवं शब्द की संगति का जब तक ज्ञान न हो, तब तक शब्द में शाब्द-बोधरूप मुख्य कार्य की साधनता का ज्ञान सम्भव नहीं, क्योंकि किसी बधिर व्यक्ति के द्वारा अगृहीत शब्द एवं अगृहीतसंगतिक शब्द शाब्द ज्ञान का जनक नहीं होता, फलतः शाब्द बोध की उत्पत्ति से पूर्व शब्द में उसकी साधनता एवं अदृष्टात्मक संस्कार में अङ्गता का ज्ञान नहीं हो सकता । शाब्द बोध की उत्पत्ति के द्वारा उसमें अङ्गता का ज्ञान मानने पर अन्योन्याश्रयता प्रसक्त होती है कि अदृष्टात्मक संस्कार के द्वारा शाब्द बोध और शाब्द बोध के द्वारा संस्कारों का ज्ञान होगा ।
द्वितीय कल्प भी संगत नहीं, क्योंकि भावनात्मक संस्कार स्मृति का जनक और आत्मा का गुण माना जाता है, वह शाब्द-बोधादिरूप अनुभवों से जनित होता है, उनका जनक नहीं हो सकता । द्रव्य में अनेक शक्तियाँ होती हैं, किन्तु एक शक्ति से दूसरा कार्य नहीं हो सकता, जैसे अग्नि में दहन-शक्ति और प्रकाशन-शक्ति—ये दोनों शक्तियाँ हैं, किन्तु दहन-शक्ति से प्रकाशन और प्रकाशन-शक्ति से दहन की उत्पत्ति नहीं मानी जाती, ऐसे ही स्मृति की जनक भावना शक्ति से अनुभव की उत्पत्ति नहीं हो सकती । दूसरी बात यह भी है कि व्युत्क्रम से उच्चरित वर्णों के द्वारा भी वही ( स्मृति-जनक ) संस्कार उत्पन्न होता देखा जाता है, तब उससे भी शाब्द बोध की उत्पत्ति होनी चाहिए, किन्तु होती नहीं। अतः गकारादि वर्णरूप शब्द कभी भी अर्थ-ज्ञान का जनक नहीं हो सकता ।