भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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देवताया विग्रहादिमत्त्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् [ ३९३

संभवात् । तथा ‘नाम रूपं च भूतानां कर्मणां च प्रवर्तनम् । वेदशब्देभ्य एवादौ निर्ममे स महेश्वरः ॥’ ( मनु० १।२१ ) इति । ‘सर्वेषां तु स नामानि कर्माणि च पृथक्पृथक् । वेदशब्देभ्य एवादौ पृथक्संस्थाश्च निर्ममे ॥’ इति च । अपिच चिकीर्षितमर्थमनुतिष्ठंस्तस्य वाचकं शब्दं पूर्वं स्मृत्वा पश्चात्तदर्थमनुतिष्ठतीति सर्वेषां नः प्रत्यक्षमेतत् । तथा प्रजापतेरपि स्रष्टुः सृष्टेः पूर्वं वैदिकाः शब्दा मनसि प्रादुर्बभूवुः, पश्चात्तदनुगतानर्थान्ससर्जैति गम्यते । तथा च श्रुतिः—‘स भूरिति व्याहरत्स भूमिमसृजत’ ( तै० ब्रा० २।२।४।२ ) इत्येवमादिका भूरादिशब्देभ्य एव मनसि प्रादुर्भूतेभ्यो भूरादिलोकान्सृष्टान्दर्शयति । किमात्मकं पुनः शब्दमभिप्रेत्येदं शब्दप्रभवत्वमुच्यते ? स्फोट-

भामती

स्वतन्त्रत्वमपि तु पूर्वसृष्ट्यनुसारेण । एतच्चास्माभिरुपपादितम्, उपपादयिष्यति चाग्रे भाष्यकारः । अपि चाद्यत्वेऽप्येतद् दृश्यते तद्दर्शनात् प्राग्वामपि कर्तॄणां तथाभावोऽनुमीयत इत्याह ॐअपि च चिकीर्षितमितिॐ । आक्षिपति ॐ किमात्मकं पुनः इति ॐ । अयमभिसन्धिः—वाचकशब्दप्रभवत्वं हि देवानाम् अभ्युपेयम्, अवाचकेन तेषां बुद्धावनालेखनात् । तत्र न तावद् वस्वादीनां वकारादयो वर्णा वाचकास्तेषां प्रत्यूच्चारणमन्यत्वेनाशक्यसङ्गतिग्रहत्वात् , अगृहीतसङ्गतेश्च वाचकत्वेऽतिप्रसङ्गात् । अपि चैते प्रत्येकं वा वाक्यार्थमभिदधीरन् मिलिता वा ? न तावत् प्रत्येकम्, एकवर्णोच्चारणानन्तरमर्थप्रत्ययादर्शनात् , वर्णान्तरोच्चारणानर्थक्यप्रसङ्गाच्च । नापि मिलिताः, तेषामेकवक्तृप्रयुज्यमानानां

भामती-व्याख्या

उत्सर्ग ( सृष्टि या रचना ) प्रतिपादित है, वह कुमारसम्भवादि के समान नूतन रचना नहीं, अपितु सर्वज्ञ प्रजापति ने पूर्व कल्प में अनादि प्रचलित वेदों का स्मरण करके ऋषियों को अध्ययन कराया, उन्होंने उत्तरभावी गुरु-शिष्य-परम्परा रूप सम्प्रदाय का प्रवर्त्तन किया । इस रहस्य का उपपादन हम ( वाचस्पति मिश्र ) ने कर दिया है और भाष्यकार भी आगे चलकर करेंगे ।

आज-कल भी शब्द-स्मरणपूर्वक घटादि की रचना देख कर पूर्वकाल में भी वैसा ही अनुमान किया जा सकता है—“अपि च चिकीर्षितमर्थमनुतिष्ठंस्तस्य वाचकं शब्दं पूर्वं स्मृत्वा पश्चात् तमर्थमनुतिष्ठतीति सर्वेषां नः प्रत्यक्षम्” । अर्थात् ‘घटं कुरु’—ऐसा कुलाल सुनता है और ‘घट’ शब्द के द्वारा उसके वाच्यभूत घटजातीय पदार्थों का स्मरण कर घटादि को मूर्तरूप देता है । इसी प्रकार सृष्टि के समय प्रजापति के मन में वैदिक शब्द प्रादुर्भूत होते हैं, उनके अनुरूप पदार्थों की रचना होती है, जैसा कि श्रुति कहती है—“स भूरिति व्याहरन् भूमिमसृजत” ( तै. ब्रा. २।२।४।२ )

**शब्द में अवाचकत्व की शङ्का—**जगत् में जो शब्द प्रभवत्व का प्रतिपादन किया गया है, वह किस प्रकार के शब्द को ध्यान में रखकर कहा गया है ? देवताओं में उनके वाचक शब्दों की जन्यता माननी होगी । अवाचक शब्दों के द्वारा उनके आकार का बुद्धि में उल्लेख सम्भव नहीं । वसु आदि देवताओं के जो वाचक वकरादि वर्ण हैं प्रत्येक उच्चारण में उनका भेद हो जाने के कारण उनका किसी अर्थ के साथ सङ्गति ग्रहण सम्भव नहीं । जिस शब्द का जिस अर्थ के साथ सङ्गति-ग्रहण नहीं होता उसके द्वारा उसका स्मरण करने में अतिप्रसङ्ग उपस्थित होता है । दूसरी जिज्ञासा यह भी होती है कि क्या वर्ण-समूह में प्रत्येक वर्ण वाक्यार्थ का अभिधायक होता है अथवा मिलकर ? प्रत्येक वर्ण के उच्चारण के अनन्तर वाक्यार्थ की प्रतीति नहीं देखी जाती, अन्यथा अन्य वर्णों का उच्चारण व्यर्थ हो जाता है । वर्णों का एक काल में समूहित होना सम्भव नहीं, क्योंकि प्रत्येक क्षण में उत्पन्न और विनष्ट

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