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भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

देवताया विग्रहादिमत्त्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् [ ३९३

संभवात् । तथा ‘नाम रूपं च भूतानां कर्मणां च प्रवर्तनम् । वेदशब्देभ्य एवादौ निर्ममे स महेश्वरः ॥’ ( मनु० १।२१ ) इति । ‘सर्वेषां तु स नामानि कर्माणि च पृथक्पृथक् । वेदशब्देभ्य एवादौ पृथक्संस्थाश्च निर्ममे ॥’ इति च । अपिच चिकीर्षितमर्थमनुतिष्ठंस्तस्य वाचकं शब्दं पूर्वं स्मृत्वा पश्चात्तदर्थमनुतिष्ठतीति सर्वेषां नः प्रत्यक्षमेतत् । तथा प्रजापतेरपि स्रष्टुः सृष्टेः पूर्वं वैदिकाः शब्दा मनसि प्रादुर्बभूवुः, पश्चात्तदनुगतानर्थान्ससर्जैति गम्यते । तथा च श्रुतिः—‘स भूरिति व्याहरत्स भूमिमसृजत’ ( तै० ब्रा० २।२।४।२ ) इत्येवमादिका भूरादिशब्देभ्य एव मनसि प्रादुर्भूतेभ्यो भूरादिलोकान्सृष्टान्दर्शयति । किमात्मकं पुनः शब्दमभिप्रेत्येदं शब्दप्रभवत्वमुच्यते ? स्फोट-

भामती

स्वतन्त्रत्वमपि तु पूर्वसृष्ट्यनुसारेण । एतच्चास्माभिरुपपादितम्, उपपादयिष्यति चाग्रे भाष्यकारः । अपि चाद्यत्वेऽप्येतद् दृश्यते तद्दर्शनात् प्राग्वामपि कर्तॄणां तथाभावोऽनुमीयत इत्याह ॐअपि च चिकीर्षितमितिॐ । आक्षिपति ॐ किमात्मकं पुनः इति ॐ । अयमभिसन्धिः—वाचकशब्दप्रभवत्वं हि देवानाम् अभ्युपेयम्, अवाचकेन तेषां बुद्धावनालेखनात् । तत्र न तावद् वस्वादीनां वकारादयो वर्णा वाचकास्तेषां प्रत्यूच्चारणमन्यत्वेनाशक्यसङ्गतिग्रहत्वात् , अगृहीतसङ्गतेश्च वाचकत्वेऽतिप्रसङ्गात् । अपि चैते प्रत्येकं वा वाक्यार्थमभिदधीरन् मिलिता वा ? न तावत् प्रत्येकम्, एकवर्णोच्चारणानन्तरमर्थप्रत्ययादर्शनात् , वर्णान्तरोच्चारणानर्थक्यप्रसङ्गाच्च । नापि मिलिताः, तेषामेकवक्तृप्रयुज्यमानानां

भामती-व्याख्या

उत्सर्ग ( सृष्टि या रचना ) प्रतिपादित है, वह कुमारसम्भवादि के समान नूतन रचना नहीं, अपितु सर्वज्ञ प्रजापति ने पूर्व कल्प में अनादि प्रचलित वेदों का स्मरण करके ऋषियों को अध्ययन कराया, उन्होंने उत्तरभावी गुरु-शिष्य-परम्परा रूप सम्प्रदाय का प्रवर्त्तन किया । इस रहस्य का उपपादन हम ( वाचस्पति मिश्र ) ने कर दिया है और भाष्यकार भी आगे चलकर करेंगे ।

आज-कल भी शब्द-स्मरणपूर्वक घटादि की रचना देख कर पूर्वकाल में भी वैसा ही अनुमान किया जा सकता है—“अपि च चिकीर्षितमर्थमनुतिष्ठंस्तस्य वाचकं शब्दं पूर्वं स्मृत्वा पश्चात् तमर्थमनुतिष्ठतीति सर्वेषां नः प्रत्यक्षम्” । अर्थात् ‘घटं कुरु’—ऐसा कुलाल सुनता है और ‘घट’ शब्द के द्वारा उसके वाच्यभूत घटजातीय पदार्थों का स्मरण कर घटादि को मूर्तरूप देता है । इसी प्रकार सृष्टि के समय प्रजापति के मन में वैदिक शब्द प्रादुर्भूत होते हैं, उनके अनुरूप पदार्थों की रचना होती है, जैसा कि श्रुति कहती है—“स भूरिति व्याहरन् भूमिमसृजत” ( तै. ब्रा. २।२।४।२ )

**शब्द में अवाचकत्व की शङ्का—**जगत् में जो शब्द प्रभवत्व का प्रतिपादन किया गया है, वह किस प्रकार के शब्द को ध्यान में रखकर कहा गया है ? देवताओं में उनके वाचक शब्दों की जन्यता माननी होगी । अवाचक शब्दों के द्वारा उनके आकार का बुद्धि में उल्लेख सम्भव नहीं । वसु आदि देवताओं के जो वाचक वकरादि वर्ण हैं प्रत्येक उच्चारण में उनका भेद हो जाने के कारण उनका किसी अर्थ के साथ सङ्गति ग्रहण सम्भव नहीं । जिस शब्द का जिस अर्थ के साथ सङ्गति-ग्रहण नहीं होता उसके द्वारा उसका स्मरण करने में अतिप्रसङ्ग उपस्थित होता है । दूसरी जिज्ञासा यह भी होती है कि क्या वर्ण-समूह में प्रत्येक वर्ण वाक्यार्थ का अभिधायक होता है अथवा मिलकर ? प्रत्येक वर्ण के उच्चारण के अनन्तर वाक्यार्थ की प्रतीति नहीं देखी जाती, अन्यथा अन्य वर्णों का उच्चारण व्यर्थ हो जाता है । वर्णों का एक काल में समूहित होना सम्भव नहीं, क्योंकि प्रत्येक क्षण में उत्पन्न और विनष्ट

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३९४ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. ३ सू. २८

भामती

रूपतो व्यक्तितो वा प्रतिक्षणमपवर्गवतां मिथः साहित्यसम्भवाभावात् । न च प्रत्येकसमुदायाभ्यामन्यः प्रकारः सम्भवति । न च स्वरूपसाहित्याभावेऽपि वर्णानामाग्नेयादीनामिव संस्कारद्वारकमस्ति साहित्यमिति साम्प्रतं, विकल्पासहत्वात् । को नु खल्वयं संस्कारोऽभिमतः, किमपूर्वं नामाग्नेयादिजन्यमिव, किंवा भावनापरनामा स्मृतिप्रभवबीजम् । न तावत् प्रथमः कल्पः, नहि शब्दः स्वरूपतोऽज्ञातो वाऽविदितोऽविदितसङ्गतिरर्थधीहेतुरिन्द्रियवत् । उच्चरितस्य बधिरेणागृहीतस्य गृहीतस्य वाऽगृहीतसङ्गतेरप्रत्ययात् । तस्माद्विदितो विदितसङ्गतिर्विदितसमस्तज्ञापनाङ्गश्च शब्दो धूमादिवत् प्रत्यायकोऽभ्युपेयः । तथा चापूर्वाभिधानोऽस्य संस्कारः प्रत्ययानाङ्गमिस्यर्थप्रत्ययाःप्रागवगन्तव्यः । न च तदा तस्यावगमोपायोऽस्ति । अर्थप्रत्ययात्तु तदवगमं समर्थयमानो दुरुत्तरमितरेतराश्रयमाविशति—संस्कारावसायादर्थप्रत्ययः, ततश्च तदवसाय इति । भावनाभिधानस्तु संस्कारः स्मृतिप्रसवसामर्थ्यमात्मनो, न च तदेवार्थप्रत्ययप्रसवसामर्थ्यमपि भवितुमर्हति । नापि तस्यैव सामर्थ्यस्य सामर्थ्यान्तरम् । न हि येव वह्नेर्दहनशक्तिः सैव तस्य प्रकाशनशक्तिः । नापि दहनशक्तेः प्रकाशनशक्तिः । अपि च व्युत्क्रमेणोच्चरितेभ्यो वर्णेभ्यः सेवासित स्मृतिबीजं वासनेत्यर्थप्रत्ययः प्रसज्येत, न चास्ति । तस्मान्न कथञ्चिदपि वर्णा

भामती-व्याख्या

होनेवाले वर्णों का परस्पर मिलन सम्भव नहीं, प्रत्येक या मिलकर इन दो प्रकारों को छोड़कर वर्णों की बोधकता का कोई अन्य प्रकार सम्भव नहीं, जैसे दर्शपूर्णमासगत आग्नेय आदि कर्मों में अपने जनित संस्कारों के माध्यम से समूहीकरण या मिलन होता है, वैसा वर्णों का मिलित होना सम्भावित नहीं, क्योंकि कथित संस्कार के विषय में यह जिज्ञासा होती है कि उसका स्वरूप क्या है ? क्या वह आग्नेय आदि कर्मों से जनित अदृष्ट के समान कोई संस्कार पदार्थ है ? अथवा स्मृति-जनक भावनासंज्ञक संस्कार ? प्रथम कल्प उचित नहीं, क्योंकि [ अदृष्टरूप संस्कारों की उत्पत्ति वहाँ ही मानी जाती है, जहाँ मुख्य कार्य की उत्पत्ति से पहले हीं अवगत कारणत्व अन्यथा अनुपपन्न हो, जैसे “यजेत स्वर्गकामः”—इत्यादि वाक्यों के द्वारा यागगत स्वर्ग-साधनता स्वर्गोत्पत्ति के पूर्व ही अवगत है, क्षणिक याग में कालान्तरभावी स्वर्ग की साधनता उपपन्न नहीं हो सकती, अतः याग-जन्य अदृष्टरूप संस्कार की कल्पना की जाती है, किन्तु ] शब्द, शब्द के सहायक अङ्ग-कलाप एवं शब्द की संगति का जब तक ज्ञान न हो, तब तक शब्द में शाब्द-बोधरूप मुख्य कार्य की साधनता का ज्ञान सम्भव नहीं, क्योंकि किसी बधिर व्यक्ति के द्वारा अगृहीत शब्द एवं अगृहीतसंगतिक शब्द शाब्द ज्ञान का जनक नहीं होता, फलतः शाब्द बोध की उत्पत्ति से पूर्व शब्द में उसकी साधनता एवं अदृष्टात्मक संस्कार में अङ्गता का ज्ञान नहीं हो सकता । शाब्द बोध की उत्पत्ति के द्वारा उसमें अङ्गता का ज्ञान मानने पर अन्योन्याश्रयता प्रसक्त होती है कि अदृष्टात्मक संस्कार के द्वारा शाब्द बोध और शाब्द बोध के द्वारा संस्कारों का ज्ञान होगा ।

द्वितीय कल्प भी संगत नहीं, क्योंकि भावनात्मक संस्कार स्मृति का जनक और आत्मा का गुण माना जाता है, वह शाब्द-बोधादिरूप अनुभवों से जनित होता है, उनका जनक नहीं हो सकता । द्रव्य में अनेक शक्तियाँ होती हैं, किन्तु एक शक्ति से दूसरा कार्य नहीं हो सकता, जैसे अग्नि में दहन-शक्ति और प्रकाशन-शक्ति—ये दोनों शक्तियाँ हैं, किन्तु दहन-शक्ति से प्रकाशन और प्रकाशन-शक्ति से दहन की उत्पत्ति नहीं मानी जाती, ऐसे ही स्मृति की जनक भावना शक्ति से अनुभव की उत्पत्ति नहीं हो सकती । दूसरी बात यह भी है कि व्युत्क्रम से उच्चरित वर्णों के द्वारा भी वही ( स्मृति-जनक ) संस्कार उत्पन्न होता देखा जाता है, तब उससे भी शाब्द बोध की उत्पत्ति होनी चाहिए, किन्तु होती नहीं। अतः गकारादि वर्णरूप शब्द कभी भी अर्थ-ज्ञान का जनक नहीं हो सकता ।

देवताया विग्रहादिमत्त्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ३९५

मित्याह । वर्णपक्षे हि तेषामुत्पन्नप्रध्वंसित्वान्नित्येभ्यः शब्देभ्यो देवादिव्यक्तीनां प्रभव इत्यनुपपन्नं स्यात् । उत्पन्नप्रध्वंसिनश्च वर्णाः, प्रत्युच्चारणमन्यथा चान्यथा च प्रतीयमान-

भामती

अर्थधीहेतवः, नापि तदतिरिक्तः स्फोटात्मा, तस्यानुभवानारोहात् । अर्थधियस्तु कार्यात्तदवगमे परस्परा- श्रयप्रसङ्ग इत्युक्तप्रायम् । सत्तामात्रेण तु तस्य नित्यस्यार्थधीहेतुभावे सर्वदाऽर्थप्रत्ययोत्पादप्रसङ्गो निरपे- क्षस्य हेतोः सदातनत्वात् । तस्माद्वाचकाच्छब्दाद्वाच्योत्पाद इत्यनुपपन्नमिति । अत्राचार्यदेशीयमतमाह ॐ स्फोटमित्याह इति ॐ । मृष्यामहे न वर्णाः प्रत्यायका इति, न स्फोट इति तु न मृष्यामः । तदनुभवानन्तरं विवितसङ्कतेरर्थधीसमुत्पादात् । न च वर्णातिरिक्तस्य तस्यानुभवो नास्ति । गौरित्येकं पदं गामानय शुक्लामित्येकं वाक्यमिति नानावर्णपदातिरिक्तैकपदवाक्यावगतेः सर्व- जनीनत्वात् । न चायमसति बाधके एकपदवाक्यानुभवः शक्यो मिथ्येति वक्तुम् । नाप्यौपाधिकः । उपाधिः खल्वेकधीग्राह्यता वा स्यात् , एकार्थधीहेतुता वा ? न तावदेकधीगोचराणां धवखदिरपलाशा- नामेकनिर्भासः प्रत्ययः समस्ति । तथा सति धवखदिरपलाशा इति न जातु स्यात् । नाप्येकार्थधीहेतुता, तद्धेतुत्वस्य वर्णेषु व्यासेधात् । तद्धेतुत्वेन तु साहित्यकल्पनेऽन्योन्याश्रयप्रसङ्गः—साहित्यात्तद्धेतुत्वं तद्धेतु- त्वाच्च साहित्यमिति । तस्मादयमबाधितोऽनुपाधिक पदवाक्यगोचर एकनिर्भासो वर्णातिरिक्तं वाचकमक- मवलम्बते स स्फोट इति, तं च ध्वनयः प्रत्येकं व्यञ्जयन्तोऽपि न द्रागित्येव विशदयन्ति, येन द्रागर्थधीः

भामती-व्याख्या

वर्णों से अतिरिक्त स्फोटात्मक शब्द भी अर्थ-ज्ञान का उत्पादक नहीं हो सकता, क्योंकि वैसा कोई शब्द अनुभव में नहीं आता। अर्थ-ज्ञानरूप कार्य के द्वारा स्फोट का ज्ञान मानने पर अन्योऽन्याश्रय दोष प्रसक्त होता है। अज्ञायमान स्फोट को सत्तामात्र से अर्थ-ज्ञान का जनक मानने पर सर्वदा अर्थज्ञान होना चाहिए, क्योंकि स्फोट की नित्य सत्ता मानी जाती है और अर्थ-ज्ञान की उत्पत्ति में अन्य किसी सामग्री की अपेक्षा भी नहीं मानी जाती। फलतः वाचक शब्द के द्वारा वाच्यार्थ के ज्ञान की उत्पत्ति उपपन्न ( तर्क-संगत ) नहीं।

स्फोटवाद—उक्त शङ्का के समाधान में 'स्फोटमित्याह' । उसका कहना है कि यह तो सत्य ही है कि वर्णात्मक शब्द अर्थ-बोध-जनक नहीं किन्तु 'स्फोटात्मक शब्द अर्थ-बोधक नहीं'—यह नहीं माना जा सकता, क्योंकि स्फोट का अनुभव होने के अनन्तर ही उस व्यक्ति को तुरन्त शाब्द-बोध हो जाता है, जिसको शब्द और अर्थ का संगति-ग्रह हो चुका होता है। यह जो कहा गया कि वर्गों से अतिरिक्त स्फोटरूप शब्द अनुभव में नहीं आता। वह कहना संगत नहीं, क्योंकि नाना वर्णों से अतिरिक्त 'गौरित्येकं पदम्'—इस प्रकार एक पद और 'गामानय शुक्लामित्येकं वाक्यम्'—इस प्रकार एक वाक्य की अनुभूति तो सर्वमत-सिद्ध है। जब तक कि कोई बाधक प्रमाण उपलब्ध न हो, तब तक इस एक पद और एक वाक्य की अनुभूति का अपलाप नहीं किया जा सकता । 'एक ज्ञान की विषयता या मुख्य एक अर्थ के ज्ञान की जनकता होने के कारण वर्णों में ही एकपदता और एकवाक्यता की औपाधिक प्रतीति होती है, वर्णों से अतिरिक्त एकपद या एकवाक्य की कोई सत्ता सम्भव नहीं'—ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि जैसे धव, खदिर और पलाश नाम के अनेक वृक्षों में एकता का निर्भास नहीं होता, अन्यथा 'धवखदिरपलाशाः'—इस प्रकार बहुवचन का प्रयोग संगत न हो सकेगा। वैसे ही गकार, अकार और विसर्गरूप अनेक वर्णों में एकता का भान नहीं होता। एकार्थ-ज्ञान की हेतुता तो वर्णों में स्फोटवादी ही नहीं मानता। एकार्थ-ज्ञान की हेतुता के द्वारा एकता की कल्पना करने पर अन्योऽन्याश्रय दोष प्राप्त होता है। इस प्रकार अबाधित और अनौपाधिक एकपदतादि की प्रतीति ही वर्णों से अतिरिक्त स्फोटात्मक शब्द को सिद्ध

१९६ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. ३ सू. २८

त्वात्। तथा हि—अदृश्यमानोऽपि पुरुषविशेषोऽध्ययनध्वनिश्रवणादेव विशेषतो निर्धार्यते—देवदत्तोऽयमधीते यज्ञदत्तोऽयमधीते इति। न चायं वर्णविषयोऽन्यथात्वप्रत्ययो मिथ्याज्ञानं, बाधकप्रत्ययाभावात्। न च वर्णेभ्योऽर्थावगतिर्युक्ता। न ह्येकैको वर्णोऽर्थं प्रत्याययेत्, व्यभिचारात्। न च वर्णसमुदायप्रत्ययोऽस्ति, क्रमवत्त्वाद् वर्णानाम्। पूर्वपूर्ववर्णानुभवजनितसंस्कारसहितोऽन्त्यो वर्णोऽर्थं प्रत्याययिष्यतीति यद्युच्येत। तन्न। संबन्धग्रहणानपेक्षो हि शब्दः स्वयं प्रतीयमानोऽर्थं प्रत्याययेत्, धूमादिवत्। न च पूर्वपूर्ववर्णानुभवजनितसंस्कारसहितस्यान्त्यवर्णस्य प्रतीतिरस्ति; अप्रत्यक्षत्वात्संस्काराणाम्। कार्यप्रत्यायितैः संस्कारैः सहितोऽन्त्यो वर्णोऽर्थं प्रत्याययिष्यतीति चेत्,—न; संस्कारकार्यस्यापि स्मरणस्य क्रमवर्तित्वात्। तस्मा-त्स्फोट एव शब्दः। स चैकैकवर्णप्रत्ययाहितसंस्कारबीजेऽन्त्यवर्णप्रत्ययजनितप-रिपाके प्रत्ययिन्येकप्रत्ययविषयतया झटिति प्रत्यवभासते। न चायमेकप्रत्ययो वर्णविषया स्मृतिः; वर्णानामनेकत्वादेकप्रत्ययविषयत्वानुपपत्तेः। तस्य च प्रत्युच्चारणं प्रत्यभिज्ञायमानत्वान्नित्यत्वम्, भेदप्रत्ययस्य वर्णविषयत्वात्। तस्मान्नित्याच्छब्दात्

भामती

स्यात्। अपि तु रत्नतत्त्वज्ञानवद् यथास्वं द्वित्रिचतुष्पञ्चषड्दर्शनजनितसंस्कारपरिपकसचिवचेतोलब्ध-जन्मनि चरमे चेतसि चकास्ति विशदं पदवाक्यतत्त्वमिति प्रागुत्पन्नायास्त्वनन्तरमर्थधिय उदय इति नोत्तरेषामानर्थक्यं ध्वनीनाम्। नापि प्राचां, तदभावे तज्जनितसंस्कारतत्परिकाभावेनानुग्रहाभावात्। अन्ध्यस्य चेतः केवलस्याजनकत्वात्। न च पदप्रत्ययवत् प्रत्येकमव्यक्तामर्थधियमाधास्यन्ति प्राञ्चो वर्णाः, चरमस्तु तत्सचिवः स्फुटतरामिति युक्तम्। व्यक्ताव्यक्तभावसितायाः प्रत्यक्षज्ञाननियमात्। स्फोटज्ञानस्य च प्रत्यक्षत्वात्। अर्थधियस्त्वप्रत्यक्षतया मानान्तरजन्मनो व्यक्त एवोपजनो न वा स्यान्न पुनरस्फुट इति न समः समाधिः। तस्मान्नित्यः स्फोट एव वाचको न वर्णा इति ।

भामती-व्याख्या

कर रही है। उस स्फोट को पद या वाक्य का घटकीभूत प्रत्येक वर्ण अभिव्यक्त करता है किन्तु एक वर्ण सद्यः स्फुटरूप में अभिव्यक्त नहीं कर सकता कि एक वर्ण के उच्चारण मात्र से अभिव्यक्त स्फोट अभिलषित अर्थ का बोधक हो जाता। अपितु जैसे रत्न तत्त्व अनेक बार के निरीक्षण और परीक्षण से निखरता है, वैसे ही पदतत्त्व और वाक्यतत्त्व नाम का स्फोट भी। यथावसर दो, तीन, चार, पाँच या छः वर्णों के उच्चारण से जनित संस्कारों से युक्त अन्तिम वर्ण के उच्चारण की परिपाटी ही उक्त स्फोट को वह अन्तिम निखार देती है, जिसके अनन्तर अर्थावबोध का उदय होता है, अतः पद के द्वितीयादि वर्णों का उच्चारण निरर्थक नहीं होता। इस प्रकार पूर्व वर्ण भी व्यर्थ नहीं होते, क्योंकि पूर्व-पूर्व वर्ण के उच्चारण से जनित संस्काररूप सहायक के बिना उक्त स्फोट का परिपाक ही निष्पन्न नहीं होता, अतः केवल अन्तिम वर्ण की अनुभूति उस स्फोट को अभिव्यक्त नहीं कर सकती।

शङ्का—जैसे पदादि के घटकीभूत वर्ण क्रमशः स्फोट की उत्तरोत्तर स्फुटाभिव्यक्ति करते हैं, वैसे ही सीधे-सीधे अर्थावबोध की उत्तरोत्तर स्फुटोत्पत्ति कर सकते हैं, अतः मध्यपाती स्फोट की कल्पना व्यर्थ है।

समाधान—स्फोट तत्त्व प्रत्यक्ष है और अर्थ-ज्ञान अप्रत्यक्ष [जैसा कि शबरस्वामी ने कहा है—"अप्रत्यक्षा बुद्धिः" (शाबर. पृ. ३४)]। उत्तरोत्तर स्फुटता प्रत्यक्षभूत पदार्थ पर ही अनुभूत होती है, परोक्ष पदार्थ पर नहीं, अतः वर्णोच्चारण के द्वारा अभिव्यक्त स्फोट ही अर्थ-ज्ञान का जनक होता है, वर्ण नहीं। इस प्रकार वाच्यार्थ की वाचकता स्फोटात्मक

देवताया विग्रहादिमत्त्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ३९७

स्फोटरूपादभिधायकात्क्रियाकारकफललक्षणं जगदभिधेयभूतं प्रभवतीति ।

'वर्णा एव तु शब्दः' इति भगवानुपवर्षः। ननूत्पन्नप्रध्वंसित्वं वर्णानामुक्तं, तन्न, त एवेति प्रत्यभिज्ञानात् । सादृश्यात्प्रत्यभिज्ञानं केशादिष्विवेति चेत्, न; प्रत्यभिज्ञानस्य प्रमाणान्तरेण बाधानुपपत्तेः । प्रत्यभिज्ञानमाकृतिनिमित्तमिति चेत्—न, व्यक्तिप्रत्यभिज्ञानात् । यदि हि प्रत्युच्चारणं गवादिव्यक्तिवदन्या अन्या वर्णव्यक्तयः प्रतीयेरं-स्तत आकृतिनिमित्तं प्रत्यभिज्ञानं स्यात्, नत्वेतदस्ति, वर्णव्यक्तय एव हि प्रत्युच्चारणं प्रत्यभिज्ञायन्ते । द्विर्गोशब्द उच्चारित इति हि प्रतिपत्तिर्न तु द्वौ गोशब्दा-

भामती

तदेतदाचार्यदेशीयमतं स्वमतमुपपादयन्नपाकरोति ॐ वर्णा एव तु शब्दः इति ॐ । एवं हि वर्णातिरिक्तः स्फोटोऽभ्युपेयेत, यदि वर्णानां वाचकत्वं न सम्भवेत्, स चानुभवपद्धतिमध्यसीत । द्विधा चावाचकत्वं वर्णानां, क्षणिकत्वेनाशक्यसङ्गतिग्रहत्वाद्वा, व्यस्तसमस्तप्रकारद्वयाभावाद्वाऽऽस्थीयते । न तावत्प्रथमः कल्पः, वर्णानां क्षणिकत्वे मानाभावात् । ननु वर्णानां प्रत्युच्चारणमन्यत्वं सर्वजनप्रसिद्धम् । न, प्रत्यभिज्ञानानुभवविरोधात् । न चासत्यप्येकत्वे ज्वालादिवत्सा दृश्यनिबन्धनमेतत् प्रत्यभिज्ञानमिति साम्प्रतम् । सादृश्यनिबन्धनत्वमस्य बलवद्बाधकोपनिपाताद्वाऽऽस्थीयेत, क्वचिज्ज्यालादौ व्यभिचारदर्शनाद्वा ? तत्र क्वचिद्व्यभिचारदर्शनेन तदुत्प्रेक्षायामुच्यते बुद्धेः स्वतःप्रामाण्यावादिभिः—

उत्प्रेक्षेत हि यो मोहादज्ञातमपि बाधनम् । स सर्वव्यवहारेषु संशयात्मा क्षयं व्रजेत् ॥ इति ।

प्रपञ्चितं चेतदस्माभिर्न्यायकणिकायाम् । न चेदं प्रत्यभिज्ञानं गत्वादिजातिविषयं, न गादिव्यक्तिविषयं, तासां प्रतिनरं भेदोपलम्भात् । अत एव शब्दभेदोपलम्भाद्भवतैवमुन्नीयते—सोमशर्माऽधीते न

भामती-व्याख्या

शब्द में ही पर्यवसित होती है।

सिद्धान्त और स्फोटवाद का निरास—मीमांसा-सूत्रों के वृत्तिकार भगवान् उपवर्ष का कहना है कि "वर्णा एव तु शब्दः"। वर्णों से अतिरिक्त स्फोट का अभ्युपगम तब किया जा सकता था, जब कि वर्णों में अर्थ की वाचकता सम्भव न होती। वर्णों की अवाचकता से ही स्फोट का कथञ्चित् अनुमान किया जा सकता था। वर्णों में अवाचकता का उपपादन तीन प्रकार से किया जा सकता था—(१) वर्णों में क्षणिकत्व होने या (२) वर्णों का अर्थ के साथ संगतिग्रह न हो सकने अथवा (३) व्यस्त (प्रत्येक) वर्ण और समस्त (मिलित सभी) वर्ण में वाचकता सम्भव न हो सकने के कारण। इनमें प्रथम कल्प उचित नहीं, क्योंकि वर्णों की क्षणिकता में कोई प्रमाण नहीं। प्रत्येक उच्चारण के भेद से गकारादि वर्णों का भेद नहीं माना जा सकता, क्योंकि 'सोऽयं गकारः'—इस प्रकार की प्रत्यभिज्ञा वर्ण के अभेद को सिद्ध कर रही है। जैसे दीप-शिखा क्षण-भेद से भिन्न होने पर भी सभी ज्वाला-सन्तानों में सादृश्य होने के कारण 'सेयं दीपज्वाला'—इस प्रकार की प्रत्यभिज्ञा उपपन्न हो जाती है, वैसे ही गकारादि का भेद होने पर भी उनमें 'सोऽयं गकारः'—ऐसी प्रत्यभिज्ञा उपपन्न क्यों न हो जायगी ? इस शङ्का का समाधान करते हुए श्री कुमारिल भट्ट ने कहा है—

उत्प्रेक्षेत च यो मोहादज्ञातमपि बाधनम् । स सर्वव्यवहारेषु संशयात्मा क्षयं व्रजेत् ॥ ( )

अर्थात् दीप-ज्वालादि के समान वर्णों में भी सादृश्यमूलक प्रत्यभिज्ञा की उपपत्ति करने पर आत्मादि नित्य पदार्थों में भी प्रत्यभिज्ञा का अन्यथा-नयन हो जायगा, तब आत्मनित्यत्वादि में संशय हो जायेगा और गीता की यह उक्ति लागू हो जायगी—"संशयात्मा विनश्यति"

३९८ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [अ. १ पा. ३ सू. २८

विति। ननु वर्णा अप्युच्चारणभेदेन भिन्नाः प्रतीयन्ते देवदत्तयज्ञदत्तयोरध्ययनध्वनि- श्रवणादेव भेदप्रतीतेरित्युक्तम्। अत्राभिधीयते, - सति वर्णविषये निश्चिते प्रत्यभिज्ञाने संयोगविभागाभिव्यङ्ग्यत्वाद्वर्णानामभिव्यञ्जकवैचित्र्यनिमित्तोऽयं वर्णविषयो विचित्रः प्रत्ययो न स्वरूपनिमित्तः। अपि च वर्णव्यक्तिभेदवादिनापि प्रत्यभिज्ञानसिद्धये वर्णाकृतयः कल्पयितव्याः। तासु च परोपाधिको भेदप्रत्यय इत्यभ्युपगन्तव्यम्। तद्वरं वर्णव्यक्तिष्वेव परोपाधिको भेदप्रत्ययः स्वरूपनिमित्तं च प्रत्यभिज्ञानमिति कल्पनालाघवम्। एष एव च वर्णविषयस्य भेदप्रत्ययस्य बाधकः प्रत्ययो यत्प्रत्य-

भामती विष्णुशर्मेति युक्तम्। यतो बहुषु गकारमुच्चारयत्सु निपुणमनुभवः परीक्ष्यताम्। यथा कालाक्षीं च स्वस्तिमतीं चेक्षमाणस्य व्यक्तिभेदप्रथायां सत्यामेव तदनुगतमेकं सामान्यं प्रथते, तथा किं गकारादिषु भेदेन प्रथमानेष्वेव गत्वमेकं तदनुगतं चकास्ति, किं वा यथा गोत्वमाजानत एकं भिन्नदेशपरिमाणसंस्थानव्यक्त्यु- पधानभेदाद्भिन्नदेशमिवाल्पमिव महदिव दीर्घमिव वामनमिव तथा गव्यक्तिराजानत एकाऽपि व्यञ्जक- भेदात्तद्धर्मानुपातिनीव प्रथत इति भवन्त एव विद्वाङ्कुर्वन्तु। तत्र गव्यक्तिभेदमङ्गीकृत्यापि यो गत्वस्यै- कस्य परोपधानभेदकल्पनाप्रयासः स वरं गव्यक्तावेवास्तु किमन्तर्गडुना गत्वेनाभ्युपेतेन। यदाहुः — तेन यत्प्रार्थ्यते जातेस्तद्वर्णादेव लप्स्यते। व्यक्तिलभ्यं तु नादेभ्य इति गत्वादिधीर्वृथा ॥

भामती-व्याख्या (गी० ४।४०)। इस विषय का विस्तार से वर्णन न्यायगणिका में (पृ० १६७ पर) किया गया है। शङ्का- यद्यपि गकार वर्णं नाना हैं, तथापि उनमें 'गत्व' जाति एक होने के कारण उक्त प्रत्यभिज्ञा हो जाती है। गकारादि व्यक्तियों में भेद उच्चारयिता पुरुषों के भेद से स्पष्ट उपलब्ध होता है, अत एव अध्येता पुरुषों का भेद परिलक्षित होता है—'सोमशर्माऽधीते न विष्णु शर्मा'। समाधान जहाँ बहुत व्यक्ति एक ही गकार का उच्चारण कर रहे हों, वहाँ यह गंभीर विचार करना है कि जैसे कालाक्षी और स्वस्तिमती नाम की गो व्यक्तियों में भेद प्रतीत होने पर भी उनमें अनुगत एक 'गोत्व' जाति प्रथित होती है। वैसे ही क्या गकार व्यक्तियों का भेद होने पर भी 'गत्व' नाम की एक जाति प्रतीत होती है? अथवा जैसे 'आकाशत्व' जाति की ऊहा से शून्य व्यक्ति को घट, मठ, मठादि उपाधियों के भेद से एक ही आकाश व्यक्ति नाना रूपों में अवभात होता है, वैसे ही 'गोत्व' जाति की कल्पना से रहित व्यक्ति एक ही गकार व्यक्ति में व्यञ्जक नाना उपाधियों के भेद से भेद का भान करता है? इस प्रश्न का ठीक उत्तर तो आप (विचारकगण) ही जानें, हमारा तो यह कहना है कि गकार व्यक्तियों का भेद मानकर उनमें कल्पित 'गत्व' जाति में जो एकत्व माना जाता है, वह एकत्व गकार व्यक्ति में ही मान लेना चाहिए, मध्य में 'गत्व' की कल्पना से क्या लाभ? श्री कुमारिल भट्ट भी यही कहते हैं— तेन यत्प्रार्थ्यते जातेः तद् वर्णादेव लप्स्यते। व्यक्तिलभ्यं च नादेभ्य इति गत्वादिधीर्वृथा॥ (श्लो० वा० पृ० ५१६) अर्थात् गत्वादि जाति की कल्पना से जो प्रत्यभिज्ञा की उपपत्ति की जाती है, वह वर्ण व्यक्ति की एकता से ही उपपन्न हो जाती है और व्यक्तियों में जो भेद अवभासित होता है, वह नाद (वायवीय संयोग-विभागरूप उच्चारण) के भेद से निभ जाता है, जैसा कि महर्षि जैमिनि

देवताया विग्रहादिमत्त्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ३९९


भिन्नानम्। कथं ह्येकस्मिन्काले बहूनामुच्चारयतामेक एव सन्गकारो युगपदनेकरूपः

भामती

न च स्वस्तिमत्यादिवद् गव्यक्तिभेदप्रत्ययः स्फुटः प्रत्युच्चारणमस्ति । तथा सति दश गकारानु- बचारयच्चैत्र इति प्रत्ययः स्यात्, न स्याद् दशकृत्व उच्चारयद गकारमिति । न चैष जात्यभिप्रायोऽभ्यासो यथा शतकृत्वस्तित्तिरीनुपायुङ्क्त देवदत्त इति । अत्र हि सोरस्ताडं क्रन्दतोऽपि गकाराभिव्यक्तौ लोकस्यो- च्चारणाभ्यासप्रत्ययस्याविनिवृत्तेः । चोदकः प्रत्यभिज्ञानबाधकमुत्थापयति ॐ कथं ह्येकस्मिन् काले बहूनामुच्चारयताम् इति ॐ । यद्युगपद्विरुद्धधर्मसंसर्गवत् तन्नाना । यथा गवाश्वाविद्विशफेकशफकेशरगल- कम्बलादिमान् । युगपदुदात्तानुदात्तादिविरुद्धधर्मसंसर्गावांश्चायं वर्णः, तस्मान्नाना भवितुमर्हति । न चोदा- त्तादयो व्यञ्जकधर्माः, न वर्णधर्मा इति साम्प्रतम् । व्यञ्जका ह्यस्य वायवः । तेषामश्रावणत्वे कथं तद्धर्माः श्रावणाः स्युः । इदं तावदत्र वक्तव्यं, न हि गुणगोचरमिन्द्रियं गुणिनमपि गोचरयति, मा भूवन् घ्राणरसनश्रोत्राणां गन्धरसशब्दगोचराणां तद्वन्तः पृथिव्युदकाकाशा गोचराः । एवं च मा नाम भूद्वायु-

भामती-व्याख्या

कहते हैं—"नादवृद्धिपरा" (जै० सू० १।१।१७) । अतः गत्वादि जाति की कल्पना व्यर्थ है। जैसे स्वस्तिमती आदि गोव्यक्तियों का भेद-भान नितान्त स्फुट है, वैसा गकारादि व्यक्तियों का प्रत्येक उच्चारण में भेद स्पष्ट प्रतीत नहीं होता । गकारादि व्यक्तियों का भेद मानने पर 'दश गकारानुदचारयत् चैत्रः'—ऐसा अनुभव होना चाहिए किन्तु वहाँ जो 'दशकृत्व उदचार- यद गकारम्'—ऐसा अनुभव होता है, वह नहीं होना चाहिए था । उच्चारणगत अभ्यास (आवृत्ति) के द्वारा उच्चार्यमाण गकार व्यक्ति की एकता अक्षुण्ण रहती है । गत्व जाति के माध्यम से यह उच्चारणभ्यास सम्पन्न क्यों नहीं हो सकता, जैसे 'दशकृत्वः तित्तिरीमुपा- युङ्क्त देवदत्तः'—यहाँ पर एक तित्तिरि व्यक्ति का कई वार उपयोग नहीं हो सकता, अतः तित्तिरिजातीय पक्षियों का उपयोग माना जाता है ? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि प्रथमतः उच्चारण शब्द का ही होता है, जात्यादिका नहीं । दूसरी बात यह हैं कि कितना भी छाती पीट-पीट कर रोना-धोना कर लिया जाय किन्तु वर्णोच्चारण की आवृत्ति का अनुभव निवृत्त नहीं किया जा सकता ।

आक्षेपवादी वर्णगत एकत्व की साधिका प्रत्यभिज्ञा का बाध प्रस्तुत करता है—"कथं ह्येकस्मिन् काले बहूनामुच्चारयतामेक एव सन् गकारो युगपदनेकरूपः स्यात्" । आशय यह है कि जो पदार्थ एक ही समय विरोधी धर्मों का सम्बन्धी होता है, वह नाना (अनेक) होता है, जैसे गो और अश्व क्रमशः द्विशफ (कटे खुरवाले) और एकशफ, केशर (सटा) और गल-कम्बल (सास्ना.) आदि विरुद्ध धर्मों के सम्बन्धी होने के कारण परस्पर भिन्न हैं। वर्ण भी उदात्त और अनुदात्तादि विरुद्ध धर्मवान् होने के कारण अनेक होते हैं । 'उदात्तादि धर्म वर्ण के न होकर उसके व्यञ्जकीभूत ध्वनि के धर्म हैं'—ऐसा नहीं कह सकते, क्योंकि वर्णों की व्यञ्जक जो ध्वनि है, वह वायुरूप है, वायु का श्रोत्र से ग्रहण नहीं होता, अतः वायु के धर्मभूत उदात्तादि का श्रावण प्रत्यक्ष क्योंकर होगा ? परिशेषतः उदात्तादि विरुद्ध धर्मों को वर्ण का ही धर्म मानना होगा, अतः गकारादि वर्ण अनेक होते हैं, एक नहीं ।

सिद्धान्ती का अभिप्राय यह है कि किसी गुण का विषय करनेवाले करण (इन्द्रिय) से उस गुण के आधारभूत द्रव्य का नियमतः ग्रहण नहीं होता, जैसे कि घ्राण, रसन और श्रोत्र के क्रमशः गन्ध, रस और शब्दरूप गुण ही विषय होते हैं, उन गुणों के आधारभूत पृथिवी, जल और आकाश द्रव्य नहीं, उसी प्रकार वायवीय ध्वनि के धर्मभूत उदात्तादि धर्मों का श्रोत्र के द्वारा ग्रहण होने पर उसके धर्मीभूत वायुद्रव्य का ग्रहण न होना अनुचित नहीं।

४००ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. ३ सू. २८

स्यात् ? उदात्तश्चानुदात्तश्च स्वरितश्च सानुनासिकश्च निरनुनासिकश्चेति । अथवा,—ध्वनिकृतोऽयं प्रत्ययभेदो न वर्णकृत इत्यदोषः । कः पुनरयं ध्वनिनीम ? यो दूरादाकर्णयतो वर्णविवेकमप्रतिपद्यमानस्य कर्णपथमवतरति । प्रत्यासीदतश्च पटुमृदुत्वादिभेदं वर्णेष्वासञ्जयति । तन्निबन्धनाश्चोदात्तादयो विशेषा न वर्णस्वरूपनिबन्धनाः,


भामती

गोचरं श्रोत्रम् । तद्गुणांस्तूदात्तादीन् गोचरयिष्यति । ते च शब्दसंसर्गग्रहात् शब्दधर्मत्वेनाध्यवसीयन्ते । न च शब्दस्य प्रत्यभिज्ञानावधृतैकत्वस्य स्वरूपत उदात्तादयो धर्माः परस्परविरोधिनोऽपर्यायेण सम्भवन्ति । तस्माद्यथा मुख्यस्यैकस्य मणिकृपाणदर्पणाद्युपधानवशाज्ञानादेशपरिमाणसंस्थानभेदविभ्रमः, एवमेकस्यापि वर्णस्य व्यञ्जकध्वनिनिबन्धनोऽयं विरुद्धनानाधर्मसंसर्गविभ्रमः, न तु स्वाभाविको नानाधर्मसंसर्गः, इति स्थितेऽभ्युपेत्य परिहारमाह भाष्यकारः ❖ अथवा ध्वनिकृतः इति ❖ । अथेति पूर्वपक्षं व्यावर्तयति । भवेतां नाम गुणगुणिनावेकेन्द्रियग्राह्यौ, तथाप्यदोषः । ध्वनीनामपि शब्दवच्छ्रावणत्वात् । ध्वनिस্বরূপं प्रश्नपूर्वकं वर्णेभ्यो निष्कर्षयति ❖ कः पुनरयम् इति ❖ । न चायमनिर्धारितविशेषवर्णत्वसामान्यमात्रप्रत्ययो न तु वर्णातिरिक्ततदभिव्यञ्जकध्वनिप्रत्यय इति साम्प्रतम् । तस्यानुनासिकत्वादिभेदभिन्नस्य गादिव्यक्तिवत्प्रत्यभिज्ञानाभावादप्रत्यभिज्ञायमानस्य चैकत्वाभावेन सामान्याभावानुपपत्तेः । तस्मादवर्णात्मको वैष शब्दः शब्दातिरिक्तो वा ध्वनिः शब्दव्यञ्जकः श्रावणोऽभ्युपेयः । उभयथापि चाक्षु व्यञ्जनेषु च तत्तद्ध्वनिभेदोपधानेनानुनासिकत्वादयोऽवगम्यमानास्तद्धर्मा एव शब्दे प्रतीयन्ते न तु स्वतः शब्दस्य धर्माः । तथा च येषामनुनासिकत्वादयो धर्माः परस्परविरुद्धा भासन्ते भवतु तेषां ध्वनीनामनित्यता ।


भामती-व्याख्या

वायु के धर्मभूत उदात्तादि का ही शब्द में समारोप हो जाता है। उदात्तादि विरुद्ध धर्म वर्णरूप शब्द के स्वाभाविक धर्म न होने के कारण वर्णगत नानात्व सिद्ध नहीं कर सकते, क्योंकि प्रत्यभिज्ञारूप प्रत्यक्ष प्रमाण से वर्ण में एकत्व निश्चित है। अतः जैसे एक ही मुखरूप बिम्ब का मणि, कृपाण, दर्पणादि उपाधियों में प्रतिफलित विविध आकार के प्रतिबिम्बों के भेद से भेद अवभासित होता है, वैसे ही व्यङ्ग्यभूत वर्ण में व्यंजकीभूत ध्वनिगत उदात्तादि विरुद्ध धर्मों का विभ्रम मात्र हो जाता है—ऐसा समाधान प्रस्फुरित होने पर भी भाष्यकार आक्षेपवादी के आक्षेप को मान कर भी उक्त आक्षेप का परिहार कर रहे हैं—"अथवा ध्वनिकृतोऽयं प्रत्ययभेदो न वर्णकृत इत्यदोषः"। 'अथवा' शब्द के द्वारा पूर्वपक्ष का निराकरण करते हुए भाष्यकार का आशय यह है कि यदि गुण और गुणी द्रव्य का एक ही इन्द्रिय के द्वारा ग्रहण मान भी लिया जाता है, तब भी प्रकृत में कोई दोष नहीं, क्योंकि शब्द की व्यंजकीभूत ध्वनियां भी शब्द के समान ही श्रावण होती हैं। प्रश्नोत्तर के रूप में वर्णों से अतिरिक्त ध्वनि का स्वरूप आविष्कृत करते हैं—"कः पुनरयं ध्वनिनीम ? यो दूरादाकर्णयतो वर्णविवेकमप्रतिपद्यमानस्य कर्णपथमवतरति"। यदि कहा जाय कि ध्वनि भी वर्णात्मक है, इस दोष के कारण व्यक्तिविशेष स्फुटित नहीं होती, केवल वर्णत्व जाति की ही वहाँ प्रतीति होती है। तो वैसा नहीं कह सकते, क्योंकि ध्वनियों में अनुनासिकत्वादि के भेद से अनेकत्व होता है, अतः गकारादि वर्णों के समान उनमें प्रत्यभिज्ञा नहीं हो सकती, अतः एकत्व सिद्ध न हो सकने के कारण ध्वनियों में शब्दत्व ही उपपन्न नहीं होता। अतः ध्वनि या तो अवर्णात्मक शब्द है, अथवा शब्द से भिन्न ही है फिर भी शब्द की व्यंजक और श्रावण है। दोनों रीति से 'अच्' प्रत्याहार-घटक अकारादि स्वरों और हकारादि व्यंजनों में उनकी व्यंजकीभूत ध्वनियों के अनुनासिकत्वादि धर्म ही प्रतीत होते हैं, शब्द में वे स्वाभाविक (अनौपाधिक) नहीं होते। अनुनासिकत्वादि परस्पर-विरुद्ध धर्म जिस ध्वनि तत्त्व के

स्फोटवादनिरसः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् [ ४०१

वर्णानां प्रत्युच्चारणं प्रत्यभिज्ञायमानत्वात्। एवं च सति सालम्बना उदात्तादिप्रत्यया भविष्यन्ति। इतरथा हि वर्णानां प्रत्यभिज्ञायमानानां निर्भेदत्वात्संयोगविभागकृता उदात्तादिविशेषाः कल्पेरन्। संयोगविभागानां चाप्रत्यक्षत्वान्न तदाश्रया विशेषा वर्णेष्वध्यवसातुं शक्यन्त इत्यतो निरालम्बना एवैत उदात्तादिप्रत्ययाः स्युः। अपि च नैवैतदभिनिवेष्टव्यमुदात्तादिभेदेन वर्णानां प्रत्यभिज्ञायमानानां भेदो भवेदिति। न ह्यन्यस्य भेदेनान्यस्याभिद्यमानस्य भेदो भवितुमर्हति। नहि व्यक्तिभेदेन जातिं भिन्नां मन्यन्ते। वर्णेभ्यश्चार्थप्रतीतेः संभवात्स्फोटकल्पनानर्थिका। न कल्पयाम्यहं स्फोटम्, प्रत्यक्षमेव त्वेनमवगच्छामि, एकैकवर्णग्रहणाहितसंस्कारायां बुद्धौ झटिति प्रत्यवभास- नादिति चेत्-न, अस्या अपि बुद्धेर्वर्णविषयत्वात्। एकैकवर्णग्रहणोत्तरकाला हीयमेका

भामती

नहि तेषु प्रत्यभिज्ञानमस्ति । येषु तु वर्णेषु प्रत्यभिज्ञानं न तेषामनुनासिकत्वादयो धर्मा इति नानित्याः । ॐ एवं च सति सालम्बना इति ॐ । यद्येष परस्याग्रहो धर्मिण्यगृह्यमाणे तद्धर्मा न शक्या ग्रहीतुमिति । एवं नामास्तु तथा तुष्यतु परस्तथाप्यदोष इत्यर्थः । तदनेन प्रबन्धेन क्षणिकत्वेन वर्णानामशक्यसङ्गति- ग्रहतया यदवाचकत्वमापादितं वर्णानां तदपाकृतम् । व्यस्तसमस्तप्रकारद्वयासम्भवेन तु यदासञ्जितं तन्निराचिकीर्षुराह ॐ वर्णेभ्यश्चार्थप्रतीतेः इति ॐ । कल्पनामामृष्यमाण एकदेश्याह ॐ न कल्पयामि इति ॐ । निराकरोति ॐ न, अस्या अपि बुद्धेः इति ॐ । निरूपयतु तावद् गौरित्येकं पदमिति धियमायु- ष्मान् । किमियं पूर्वानुभूतान् गकारादीनेव सामस्त्येनावगाहते, किं वा गकाराद्यतिरिक्तं गवयमिव वराहादिभ्यो विलक्षणम् ? यदि गकारादिविलक्षणमवभासयेत् , गकारादिरूषितः प्रत्ययो न स्यात् । न हि वराहधीर्महिषरूषितं वराहमवगाहते । पदतत्त्वमेकं प्रत्येकमभिव्यञ्जयन्तो ध्वनयः प्रयत्नभेदभिन्नाः

भामती-व्याख्या

स्वाभाविक हैं, उन्हें अनित्य और नाना माना जाता है। ध्वनियों में एकत्व-साधनी प्रत्यभिज्ञा का उदय ही नहीं होता, जिन (वर्णों) में प्रत्यभिज्ञा होती है, उनके अनुनासिकत्वादि धर्म नहीं माने जाते, अतः वे अनित्य नहीं होते।

“एवं च सति सालम्बना एवैते उदात्तादिप्रत्ययाः”—इस भाष्य का आशय यह है कि यदि वादी का यह आग्रह मान भी लिया जाय कि वायुरूप धर्मी का श्रोत्र से ग्रहण न हो सकने पर उसके अनुनासिकत्वादि धर्मों का श्रोत्र से ग्रहण नहीं हो सकता। तथापि प्रकृत में कोई दोष नहीं, क्योंकि ध्वनि तत्त्व को अवर्णात्मक शब्द और श्रावण ही माना जाता है, अतः ध्वनिगत धर्मों की प्रतीति सालम्बन हो जाती है। भाष्यकार ने इस प्रबन्ध के द्वारा वर्णों में आरोपित क्षणिकत्व-प्रयुक्त संगतिग्रहाभाव का अपाकरण कर दिया है। वर्णों में व्यस्त और समस्त—इन दो प्रकारों के सम्भव न हो सकने के कारण जो अवाचकत्व प्रसक्त किया गया, उसका निराकरण किया जाता है—“वर्णेभ्यश्चार्थप्रतीतेः संभवात् स्फोटकल्पनाऽ- नर्थिका”। स्फोटवादी कहता है कि “न कल्पयामि स्फोटम्, प्रत्यक्षं त्वेनमवगच्छामि”। सिद्धान्ती उसका निराकरण करता है—“न, अस्या अपि बुद्धेर्वर्णविषयत्वात्”। स्फोटवादी से पूछा जाता है कि आप जो निरूपित करते हैं—“गौरित्येकं पदम्”। यह प्रतीति क्या पूर्वानुभूत गकारादि वर्णों को सामूहिकरूप से ग्रहण करती है ? अथवा जैसे वराह से भिन्न गवय का 'गवयोऽयम्'—यह प्रतीति ग्रहण करती है, वैसे ही पूर्वोक्त प्रतीति क्या गकारादि वर्णों से अतिरिक्त किसी स्फोट तत्त्व का ? यदि गकारादि से भिन्न किसी अन्य तत्त्व का अवगाहन करती है, तब उस प्रतीति में गकारादि वर्णों का भान नहीं होना चाहिए, क्योंकि महिष से भिन्न वराह को विषय करनेवाली प्रतीति में महिष का भान नहीं होता।

५१

४०२ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. ३ सू. २८

बुद्धिर्गौरिति समस्तवर्णविषया, नार्थान्तरविषया। कथमेतदवगम्यते ? यतोऽस्यामपि बुद्धौ गकारादयो वर्णा अनुवर्तन्ते, न तु दकारादयः। यदि ह्यस्या बुद्धेर्गकारादिभ्योऽर्थान्तरं स्फोटो विषयः स्यात्ततो दकारादय इव गकारादयोऽप्यस्या बुद्धेर्व्यावर्तेरन्, नतु तथास्ति। तस्मादियमेकबुद्धिर्वर्णविषयैव स्मृतिः। नन्वनेकत्वाद्वर्णानां नैकबुद्धिविषयतोपपद्यत इत्युक्तं - तत्प्रतिब्रूमः—संभवत्यनेकस्याप्येकबुद्धिविषयत्वम्, पङ्क्तिर्वनं सेना शतं सहस्रमित्यादिदर्शनात्। या तु गौरित्येकोऽयं शब्द इति बुद्धिः, सा बहुष्वेव वर्णेष्वेकार्थावच्छेदनिबन्धनेौपचारिकी वनसेनादिवुद्धिष्वदेव। अत्राह-यदि

भामती

तुल्यस्थानकरणनिष्पाद्यतयाऽन्योन्यविसदृशतत्तत्पदव्यञ्जकध्वनिसादृश्येन स्वव्यञ्जनीयस्यैकस्य पदतत्त्वस्य मिथो विसदृशानेकपदसादृश्यान्यापादयन्तः सादृश्योपाधानभेदादेकमप्यभागमपि नानेव भागवदिव भासयन्ति मुखमिवैकं नियतवर्णपरिमाणस्थानसंस्थानभेदमपि मणिकृपाणदर्पणादयोऽनेकमनेकवर्णपरिमाणस्थानसंस्थानभेदम्। एवञ्च कल्पिता एवास्य भागा वर्णा इति चेत्, तत्किमिदानीं वर्णभेदानसत्यपि बाधके मिथ्येति वस्तुमभ्यवसितोऽसि ? एकधीरेव नानारवस्य बाधिकेति चेत्, हन्तास्यां नाना वर्णाः प्रथन्त इति नानावभास एवैकत्वं कस्मान्न बाधते। अथवा वनसेनादिवुद्धिवदेकत्वनानात्वे न विरुद्ध्ये। नो खलु सेनावनबुद्धी गजपदाति तुरगादीनां चम्पकाशोककिंशुकानीनाञ्च भेदमपबाधमाने उदीयेते, अपि तु भिन्नानामेव सतां केनचिदेकेनोपाधिनाऽवच्छिन्नानामेकत्वमापादयतः। न चौपाधिकेनैकत्वेन स्वाभाविकं नानात्वं विरुध्यते, नह्योपचारिकमग्नित्वं माणवकस्य स्वाभाविकनरत्वविरोधि। तस्मात्प्रत्येकवर्णानुभवजनित-

भामती-व्याख्या

शङ्का—प्रत्येक ध्वनि एक पदतत्त्व की अभिव्यक्ति करती हुई उसे अनेक और सावयव-रूप में दर्शाती है, क्योंकि ध्वनियां स्वयं बाह्य और आभ्यन्तर प्रयत्न के भेद से भिन्न होती हैं। 'गङ्गा, औष्ण्यम्, वृक्षः' के समान विसदृश (विजातीय) पदों की व्यञ्जकीभूत ध्वनियों के सदृश होने पर भी ताल्वादि तुल्य स्थान एवं वाग्रूप समान करण से निष्पाद्य होती हैं। अत एव वे (ध्वनियां) अपने व्यञ्जनीय पदतत्त्व में परस्पर विसदृश अनेक पदों की सदृशताएँ आरोपित करती हैं, सादृश्यरूप उपाधि के भेद से भिन्न प्रतीत होती हैं। जैसे मणि, कृपाण, दर्पणादि उपाधियाँ नियत वर्ण, परिमाण और संस्थान विशेषवाले एक ही मुख को अनेक वर्ण, परिमाण और संस्थान के भेद से भिन्न-जैसा झलकाती हैं, वैसे ही कथित व्यञ्जकीभूत ध्वनियाँ एक ही पदतत्त्व को अनेक रूपों में अभिव्यञ्जित करती हैं। इस प्रकार अखण्ड स्फोट तत्त्व के वर्णरूप अवयव कल्पितमात्र हैं, उनके आधार पर ही स्फोट की प्रतीति वर्ण-दूषित होती है।

समाधान—तब क्या किसी बाधक प्रमाण के न होने पर भी अनुभूयमान वर्णों को मिथ्या कहने पर आप (स्फोटवादी) तुले हुए हैं ? पदाद्विगत एकत्व-प्रतीति को ही नानात्व की बाधिका मानने पर वर्णगत नानात्व की प्रतीति को एकत्व का बाधक क्यों नहीं मान लिया जाता ?

अथवा जैसे वन और सेना आदि की प्रतीतियों में औपाधिक और अनौपाधिकरूप से एकत्व और नानात्व का समन्वय देखा जाता है, वैसा ही वर्णों की प्रतीति में भी सम्भव है, क्योंकि 'एकं वनम्, एका सेना'—ये दोनों बुद्धियां क्रमशः गज, वाजी और पदाति (पैदल) के नानात्व एवं चम्पक, अशोक और किंशुकानि वृक्षों के भेद (नानात्व) का बाध करके उत्पन्न नहीं होती हैं। अपितु उनके नानात्व को अक्षुण्ण रखती हुई किसी एक उपाधि से अवच्छिन्न गजादि और चम्पकादि नाना पदार्थों में एकत्व का आपादन करती हैं। न तो

स्फोटवादनिरासः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४०३

वर्णा एव सामस्त्येनेकबुद्धिविषयतामापद्यमानाः पदं स्युस्ततो जारा राजा कपिः पिक इत्यादिषु पदविशेषप्रतिपत्तिर्न स्यात् । त एव हि वर्णा इतरत्र चेतरत्र च प्रत्यव-भासन्त इति) अत्र वदामः - सत्यपि समस्तवर्णप्रत्यवमर्शे यथा क्रमानुरोधिन्य एव पिपीलिकाः पंक्तिबुद्धिमारोहन्ति, एवं क्रमानुरोधिन एव वर्णाः पदबुद्धिमारोक्ष्यन्ति । तत्र वर्णानामविशेषेऽपि क्रमविशेषकृता पदविशेषप्रतिपत्तिर्न विरुध्यते । वृद्धव्यवहारे चेमे वर्णाः क्रमाद्यनुगृहीता गृहीतार्थविशेषसम्बन्धाः सन्तः स्वव्यवहारेऽप्येकैकवर्ण-ग्रहणानन्तरं समस्तप्रत्यवमर्शिन्यां बुद्धौ तादृशा एव प्रत्यवभासमानास्तं तमर्थमव्य-भिचारेण प्रत्याययिष्यन्तीति वर्णवादिनो लघीयसी कल्पना, स्फोटवादिनस्तु दृष्टहानि-

भामती

भावनानिचयलब्धजन्मनि निखिलवर्णावगाह्नि स्मृतिज्ञान एकस्मिन् भासमानानां वर्णानां तदेकविज्ञान-विषयतया वैकार्थधीहेतुतया वेकत्वमौपचारिकमवगन्तव्यम् । न चैकार्थधीहेतुत्वेनैकत्वमेकत्वेन चैकार्थधी-हेतुभाव इति परस्पराश्रयम् । नह्यर्थप्रत्ययात् पूर्वमेतावन्तो वर्णा एकस्मृतिसमारोहिणो न प्रथन्ते । न च तत्प्रथानान्तरं वृद्धस्यार्थाधीनोन्नीयते, तदुन्नयनाच्च तेषामेकार्थधियं प्रति कारकत्वमेकमवगम्यैकपदत्वाध्यव-सानमिति नान्योन्याश्रयम् । न चैकस्मृतिसमारोहिणां क्रमाक्रमविपरीतक्रमप्रयुक्तानामभेदो वर्णानामिति यथाकथञ्चित् प्रयुक्तेभ्य एतेभ्योऽर्थप्रत्ययप्रसङ्ग इति वाच्यम्, उक्तं हि—

यावन्तो यादृशा ये च पदार्थप्रतिपादने ।
वर्णाः प्रज्ञातसामर्थ्यास्ते तथैवावबोधकाः ॥ इति ।

ननु पङ्क्तिबुद्धावेकस्यामक्रमायामपि वास्तवो शालादीनामस्ति पङ्क्तिरिति तथैव प्रथा युक्ता,

भामती-व्याख्या

औपाधिक एकत्व स्वाभाविक नानात्व का विरोधी होता है और न माणवक में गौण अग्नित्व धर्म स्वाभाविक मनुष्यत्व का ही बाधक होता है। फलतः प्रत्येक वर्ण के अनुभव से जनित संस्कारों के द्वारा उत्पादित समस्तवर्णावगाहिनी एक ही स्मृति में भासमान नाना वर्णों में स्मृतिरूप एक ज्ञान की विषयता अथवा एकार्थज्ञान की हेतुता होने के कारण एकत्व का औपचारिक भान मानना चाहिए। वर्णों में एकार्थज्ञान-हेतुत्वेन एकत्व और एकत्व के द्वारा एकार्थज्ञान-हेतुत्व की कल्पना से अन्योऽन्याश्रयता की जो प्रसक्ति दी गई, वह उचित नहीं, क्योंकि एकार्थज्ञान-हेतुत्व के बिना ही वर्णों में स्मृतिरूप एकज्ञान की विषयता के द्वारा एकत्व का भान हो जाता है। नाना वर्णों का भान होने पर गृहीतसंगतिक वृद्ध पुरुषों के द्वारा अर्थावबोध उन्नीत नहीं होता - ऐसा नहीं, किन्तु होता है, अतः एकार्थज्ञान को वर्णों में एक कारणता का बोध करके एकपदत्व का अध्यवसान (निश्चय) होता है, अतः किसी प्रकार का अन्योऽन्याश्रय प्रसक्त नहीं होता।

शङ्का—वाक्य के घटकीभूत नाना वर्णों की एक स्मृति हो सकती है, किन्तु उनका क्रम एक ही रहे—यह आवश्यक नहीं, व्युत्क्रम भी हो सकता है, अतः व्युत्क्रम से स्मर्यमाण वर्णों के द्वारा भी अभिलषित अर्थावबोध होना चाहिए।

समाधान—उक्त शङ्का का समाधान करते हुए श्री कुमारिल भट्ट ने कहा है—

यावन्तो यादृशा ये च पदार्थप्रतिपादने ।
वर्णाः प्रज्ञातसामर्थ्याः ते तथैवावबोधकाः ॥ (श्लो. वा. पृ. ५२७)

अर्थात् संगति-ग्रहण-काल में जिस क्रम विशेष से युक्त वर्ण अर्थ प्रत्यायन में समर्थ माने जाते हैं, वे उसी क्रम से युक्त होकर अवबोधक माने जाते हैं, व्युत्क्रम से नहीं।

शङ्का—बहुत-से शाल वृक्षों की पंक्ति एक है। यद्यपि उक्त पंक्ति में स्वतः कोई क्रम

४०४ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. ३ सू. २८

दृष्टकल्पना च, वर्णाश्चेमे क्रमेण गृह्यमाणाः स्फोटं व्यञ्जयन्ति स स्फोटोऽर्थं व्यनक्तीति

भामती

न च तथेह वर्णानां नित्यानां विभूनां चास्ति वास्तवः क्रमः, प्रत्ययोपाधिस्तु भवेत्, स चैक इति कुतस्त्यः क्रम एषामिति चेत्, न; एकस्यामपि स्मृतौ वर्णरूपवत्क्रमवत्पूर्वानुभूततापरामर्शात् । तथाहि—जारा- राजेति पदयोः प्रत्ययन्त्योः स्मृतिधियोस्तत्त्वेऽपि वर्णानां क्रमभेदात्पदभेदः स्फुटतरं चकास्ति । तथा च नाक्रमविपरीतक्रमप्रयुक्तानामविशेषः स्मृतिबुद्धावेकस्यां वर्णानां क्रमप्रयुक्तानाम् । यथाहूः—

पदावधारणोपायान् बहूनिच्छन्ति सूरयः । क्रमन्यूनारिक्तत्त्वस्वरवाक्यस्मृतिश्रुतीः ॥ इति ।

शेषमतिरोहितार्थम् । दिङ्मात्रमत्र सूचितं, विस्तरस्तु तत्त्वविन्दाववगन्तव्य इति । अलं वा

भामती-व्याख्या

नहीं, तथापि उस पंक्ति के घटकीभूत शाल वृक्ष अनेक अनित्य और अविभु हैं, अतः उनमें क्रम अवश्य है, उनकी उसी क्रम से पंक्ति-बुद्धि में प्रथा ( भान ) भी उचित है। किन्तु वर्ण नित्य हैं, अतः उनका कालिक और विभु हैं, अतः उनका दैशिक क्रम सम्भव नहीं। उनका स्वाभाविक क्रम न होने पर भी प्रतीतिरूप उपाधि का क्रम माना जा सकता था, किन्तु स्मृति-रूप प्रतीति भी एक ही मानी जाती है, तब वर्णों में क्रम का भान क्योंकर होगा ?

समाधान—यद्यपि उनकी स्मृतिरूप प्रतीति एक है, तथापि अनुभूतियाँ नाना और क्रमिक हैं, अतः स्मरण ज्ञान में जैसे वर्णों के समान ही उनके क्रम की अनुभूतता परामृष्ट होती है, जैसे—'जारा' और 'राजा' इन दोनों पदों की स्मृतियाँ दो हैं, उनमें वर्णों का क्रम अवश्य स्मृतिजनकीभूत अनुभव के सम्पर्क से प्रतिभात होता है, अत एव उन दोनों पदों का भेद अत्यन्त स्फुटरूप में प्रस्फुरित होता है। उन दोनों पदों का भेद केवल क्रम-भेद पर ही आधृत है, वर्ण-भेद पर नहीं, क्योंकि वर्णों का कोई भेद नहीं। फलतः स्मृति एक होने पर भी अनुक्रम और विक्रम से उच्चरित वर्णोंवाले पदों में अविशेषता न रह कर विशेषता आ जाती है, जैसा कि श्री कुमारिल भट्ट कहते हैं—

पदावधारणोपायान् बहूनिच्छन्ति सूरयः । क्रमन्यूनातिरिक्तत्वस्वरवाक्यस्मृतिश्रुतीः ॥ ( श्लो. वा. पृ. ८६६ )

[ वर्णों का भेद न होने पर भी पदो का भेद क्योंकर होगा ? इस प्रश्न के उत्तर में कहा जाता है कि 'जारा', 'राजा'—इत्यादि पदों के भेद-बोधक बहुत-से उपाय होते हैं, जैसे—(१) अश्व-अश्वकर्णादि में क्रम का न्यूनाधिकभाव, (२) 'इन्द्रशत्रुः' इत्यादि स्थल पर बहुव्रीहि समास है ? अथवा षष्ठी-तत्पुरुष ? इस संशय का निर्णायक स्वर-भेद है, क्योंकि बहुव्रीहि और तत्पुरुषादि समासों के स्वर-भेद का प्रतिपादन व्याकरण में किया गया है। (३) 'पचते' इत्यादि पद सुबन्त ( चतुर्थ्यन्त ) हैं ? अथवा क्रिया-पद ? इस प्रश्न के उत्तर में वाक्य 'एकवाक्यतापन्न पदान्तर के प्रयोग ) को निर्णायक माना है, अर्थात् 'पचते दक्षिणां देहि'—ऐसे वाक्यों में 'पचते' पद चतुर्थ्यन्त और 'ओदनं पचते'—इत्यादि वाक्यों में क्रिया-पद है। (४) 'अश्वस्त्वं देवदत्त' इत्यादि स्थलों पर 'अश्वः' पद घोड़े का वाचक न होकर क्रिया-पद कैसे बना ? इस प्रश्न का उत्तर स्मृति ( व्याकरणरूप स्मृति प्रमाण ) से दिया जाता है कि 'टुओश्वि गतिवृद्ध्योः' धातु का लुङ् लकार में मध्यमैकवचनान्त प्रयोग है । (५) 'उद्भिदा यजेत'—इत्यादि स्थलों पर 'उद्भिदा यागेन' इस प्रकार सामानाधिकरण्य श्रुति के द्वारा 'उद्भिद्' पद में याग-वाचकता निर्णीत होती है ]। शेष भाष्य सुगम है। पूर्वोत्तर मीमांसा-सम्मत शब्दतत्त्व का यहाँ दिग्दर्शनमात्र किया गया है, इस विषय का विस्तार तत्त्वविन्दु

स्फोटवादनिरसः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४०५

गरीयसी कल्पना स्यात् । अथापि नाम प्रत्युच्चारणमन्येऽन्ये वर्णाः स्युः, तथापि प्रत्यभिज्ञालम्बनभावेन वर्णसामान्यानामवश्याभ्युपगन्तव्यत्वाद्या वर्णेष्वर्थप्रतिपादनप्रक्रिया रचिता सा सामान्येषु संचारयितव्या । ततश्च नित्येभ्यः शब्देभ्यो देवादिव्यक्तीनां प्रभव इत्यविरुद्धम् ॥ २८ ॥

अत एव च नित्यत्वम् ॥ २९ ॥

स्वतन्त्रस्य कर्तुरस्मरणादिभिः स्थिते वेदस्य नित्यत्वे देवादिव्यक्तिप्रभवाभ्युपगमेन तस्य विरोधमाशङ्क्य 'अतः प्रभवात्' इति परिहृत्येदानों तदेव वेदनित्यत्वं स्थितं द्रढयति—अत एव च नित्यत्वमिति । अत एव नियताकृतेर्देवादेर्जगतो वेदशब्दप्रभवत्त्वाद्देशब्दे नित्यत्वमपि प्रत्येत्तव्यम् । तथा च मन्त्रवर्णः—'यज्ञेन वाचः पदवीयमायन्तामन्वविन्दन्नृषिषु प्रविष्टाम्' (ऋ० सं० १०।७१।३) इति स्थितामेव वाचमनुविन्नां दर्शयति । वेदव्यासश्चैवमेव स्मरति—'युगान्तेऽन्तर्हितान्वेदान्सेतिहासान्महर्षयः । लेभिरे तपसा पूर्वमनुज्ञाताः स्वयंभुवा' इति ॥ २९ ॥

भामती

नैयायिकैर्विवादेन, सन्त्वनित्या एव वर्णास्तथापि गत्वाद्यवच्छेदेनैव सङ्गतिग्रहोऽनादिश्च व्यवहारः सेत्स्यतीत्याह ॐ अथापि नाम इति ॐ ॥ २८ ॥

ननु प्राच्यामेव मीमांसायां वेदस्य नित्यत्वं सिद्धं तत् किं पुनः साध्यत इत्यत आह ॐ स्वतन्त्रस्य कर्तुरस्मरणादेव हि स्थिते वेदस्य नित्यत्वे इति ॐ । नह्यनित्याज्जगदुत्पत्तुमर्हति तस्याप्युत्पत्तिमत्त्वेन सापेक्षत्वात् । तस्मान्नित्यो वेदो जगदुत्पत्तिहेतुत्वाद् , ईश्वरवदिति सिद्धमेव नित्यत्वमनेन दृढीकृतम् । शेषमतिरोहितार्थम् ॥ २९ ॥

भामती-व्याख्या

के आरम्भ में ही किया गया है। नैयायिकों के साथ विवाद न करके यदि वर्णात्मक शब्द को अनित्य भी मान लिया जाय, तब भी कोई दोष नहीं, क्योंकि गकारादि वर्णों में प्रत्यभिज्ञायमान गत्वादि जातियों को सभी नित्य मानते हैं। उन्हीं जातियों में गोत्वादि की वाच्यता या वाचकतावच्छेदकता मान कर अनादि व्यवहार का निर्वाह किया जा सकता है—ऐसा भाष्यकार कह रहे हैं—"अथापि नाम प्रत्युच्चारणमन्येऽन्ये वर्णाः स्युः, तथापि या वर्णेष्वर्थप्रतिपादनप्रक्रिया रचिता, सा सामान्येषु सञ्चारयितव्या" ॥ २८ ॥

श्री शबरस्वामी ने कहा है—"यच्चैते पदसंघाताः पुरुषकृता दृश्यन्ते इति । परिहृतं तदस्मरणादिभिः" (शाबर. पृ. ९९) इस भाष्य को ध्यान में रख कर कहा गया है—'स्वतन्त्रस्य कर्तुरस्मरणादिति स्थिते वेदस्य नित्यत्वे' । अर्थात् पूर्व मीमांसा के वेदअपौरुषेयत्वाधिकरण में ही वेदों की नित्यता सिद्ध कर दी गई थी, इस उत्तर मीमांसा के देवताधिकरण में पूर्वपक्षी की ओर से वेद-नित्यत्व का विरोध उठाते हुए कहा गया कि जिन विग्रहधारी देवताओं को ज्ञान में अधिकार दिया जाता है, वे अनित्य हैं और उनकी उत्पत्ति वैदिक शब्दों से मानी गई है, कादाचित्क कार्य का कारण भी कादाचित्क या अनित्य ही होता है, अतः वेदों को नित्य मानना तर्क-संगत नहीं। इस विरोध का परिहार करते हुए सिद्धान्ती ने कहा—"अतः प्रभवात्" । अर्थात् जातिरूप नित्य शब्द से व्यक्तिरूप अनित्य देवताओं का प्रभव (जन्म) माना जाता है। अनित्य कार्य का कारण भी अनित्य होता है—ऐसा कोई नियम नहीं, क्योंकि अनित्य शब्द का कारण आकाश एवं अनित्य जगत् का कारण ईश्वर नित्य ही माना गया है। प्रत्युत यह नियम अवश्य है कि अनित्य कारण से जगत् की उत्पत्ति नहीं मानी जा सकती, अन्यथा उत्पादक-परम्परा-कल्पना-प्रयुक्त अनवस्था प्रसक्त होगी।

४०६ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. ३ सू. ३०

समाननामरूपत्वाच्चावृत्तावप्यविरोधो दर्शनात्स्मृतेश्च ॥ ३० ॥

अथापि स्यात्—यदि पश्वादिव्यक्तिवद्देवादिव्यक्तयोऽपि संतत्यैवोत्तपद्येरन्निरु- ध्येरंश्च ततोऽभिधानाभिधेयाभिधातृव्यवहाराविच्छेदात्संबन्धनित्यत्वेन विरोधः शब्दे परिह्रियेत। यदा तु खलु सकलं त्रैलोक्यं परित्यक्तनामरूपं निर्लेपं प्रलीयते, प्रभवति चाभिनवमिति श्रुतिस्मृतिवादा वदन्ति, तदा कथमविरोध इति ? तत्रेदमुभिधीयते— समाननामरूपत्वादिति। तदापि संसारस्यानादित्वं तावदभ्युपगन्तव्यम्। प्रतिपाद-

भामती

शङ्कापवोत्तरत्वात् सूत्रस्य शङ्कापदानि पठति ॐ अथापि स्याद् इति ॐ। अभिधानाभिधेयाविच्छेदे हि सम्बन्ध्नित्यत्वं भवेत्। एवमध्यापकाध्येतृपरम्पराविच्छेदे वेदस्य नित्यत्वं स्यात्। निरन्वयस्य तु तु जगतः प्रबिलयेऽत्यन्तासत्क्षापूर्वस्योत्पावेऽभिधानाभिधेयावत्यन्तमुच्छिन्नान्निविति किमाश्रयः सम्बन्धः स्यात् ? अध्यापकाध्येतृसन्तानविच्छेदे च किमाश्रयो वेदः स्यात् ? न च जीवास्तद्वासनावासिताः सन्तीति वाच्यम्, अन्तःकरणाद्युपाधिकल्पिता हि ते तद्विच्छेदे न स्थातुमर्हन्ति। न च ब्रह्मणिस्तद्वासना, तस्य विद्यात्मनः शुद्धस्वभावस्य तदयोगात्। ब्रह्मणश्च सृष्टाद्यवान्तःकरणादयस्तदवच्छिन्नाश्च जीवाः प्रादुर्भ- वन्तो न पूर्वकर्माविद्यावासनावन्तो भवितुमर्हन्ति, अपूर्वत्वात्। तस्माद्विरुद्धमिवं शब्दार्थसम्बन्धवेद- नित्यत्वं सृष्टिप्रलयाभ्युपगमेनेति। अभिधातृग्रहणेनाध्यापकाध्येतारावुक्तौ। शङ्कां निराकर्तुं सूत्रमवतार- यति ॐ तत्रेदमुभिधीयते समाननामरूपत्वाद् इति ॐ, यद्यपि महाप्रलयसमये नान्तःकरणादयः समुदाचर- द्वृत्तयः सन्ति, तथापि स्वकारणेऽनिर्व्वाच्यायामविद्यायां लीनाः सूक्ष्मेण शक्तिरूपेण कर्मविक्षेपकाविद्या- वासनाभिः सहावतिष्ठन्त एव। तथा च स्मृतिः—

भामती-व्याख्या

फलतः जगत्प्रभवत्वरूप हेतु के द्वारा केवल कथित विरोध का परिहार ही नहीं किया जाता, अपितु प्रसाधित वेद-नित्यत्व का दृढीकरण भी किया जाता है—“अत एव च नित्यत्वम्”। इससे यह अनुमान पर्यवसित होता है—“नित्यो वेदः, जगदुत्पत्तिहेतुत्वाद्, ईश्वरवत्” ।। २९।।

यह तीसवाँ सूत्र जिस शङ्का का समाधान है, वह शङ्का प्रस्तु। की जाती है—“अथापि स्यात्”। यदि वाचक और वाच्य—दोनों अविच्छिन्न हैं, तब उनका सम्बन्ध भी नित्य होगा। इसी प्रकार अध्यापक और अध्येताओं की परम्परा का अविच्छेद होने पर वेद में नित्यत्व रहेगा। यदि बौद्ध-सिद्धान्त के अनुसार जगत् का निरन्वय विनाश, अत्यन्त असत् जगत् का उत्पाद एवं वाचक और वाच्य दोनों का अत्यन्त उच्छेद माना जाता है, तब वाच्यवाचक- भावरूप सम्बन्ध का आधार क्या रहेगा ? अध्यापक और अध्येताओं की परम्परा का विच्छेद मानने पर वेद का आश्रय कौन रहेगा ? अध्ययनवासनाओं से युक्त जीवों की सत्ता भी नहीं मानी जा सकती, क्योंकि जीव तो अन्तःकरणरूप उपाधि से कल्पित होते हैं, अन्तःकरण का अभाव होने पर वे क्योंकर अवस्थित रह सकेंगे ? ब्रह्म में भी वे अध्ययन-संस्कार नहीं रह सकते, क्योंकि नित्य, शुद्ध, बुद्ध और असङ्ग ब्रह्म में उनके अवस्थान की सम्भावना ही नहीं। ब्रह्म से सृष्टि के आरम्भ में नूतन अन्तःकरणादि उपाधियाँ उत्पन्न होती है, उनसे अवच्छिन्न होकर उत्पन्न होते हुए जीव पूर्व कर्माजित वासनाओं से युक्त नहीं हो सकते, क्योंकि वे नूतन हैं, पूर्व जन्म में थे ही नहीं। फलतः शब्दार्थ-सम्बन्ध और वेद का नित्यत्व मानना सृष्टि-प्रलय की प्रक्रिया से अत्यन्त विरुद्ध ही है। भाष्य में 'अभिधातृ' शब्द के द्वारा अध्यापक और अध्येता—इन दोनों का ग्रहण किया गया है।

उक्त शङ्का का निराकरण करने के लिए अग्रिम सूत्र का अवतरण किया जाता है— “तत्रेदमुभिधीयते समाननामरूपत्वादिति”। यद्यपि महाप्रलय में अन्तःकरणादि सक्रिय नहीं

वेदानामन[ादित्वम् ]हिन्दीसहितभामतीसंवलितम्४०७

यिष्यति चाचार्यः संसारस्यानादित्वम्- 'उपपद्यते चाप्युपलभ्यते च' (ब्र० २।१।३६) इति। अनादौ च संसारे यथा स्वापप्रबोधयोः प्रलयप्रभवश्रवणेऽपि पूर्वप्रबोधवदुत्तर-प्रबोधेऽपि व्यवहारान्न कश्चिद्विरोधः एवं कल्पान्तरप्रभवप्रलययोरपीति द्रष्टव्यम्। स्वापप्रबोधयोश्च प्रलयप्रभवौ श्रूयेते - 'यदा सुप्तः स्वप्नं न कंचन पश्यत्यथास्मिन्प्राण एवैकधा भवति तदैनं वाक्सर्वैर्नामभिः सहाप्येति चक्षुः सर्वै रूपैः सहाप्येति श्रोत्रं सर्वैः शब्दैः सहाप्येति मनः सर्वैर्ध्यानैः सहाप्येति स यदा प्रतिबुध्यते यथाऽग्नेर्ज्वलतः सर्वा दिशो विस्फुलिङ्गा विप्रतिष्ठेरन्नेवमेवैतस्मादात्मनः सर्वे प्राणा यथायतनं

भामती

आसीदिदं तमोभूतमप्रज्ञातमलक्षणम्।
अप्रतर्क्यमविज्ञेयं प्रसुप्तमिव सर्वतः ॥ इति ।

ते चावधिं प्राप्य परमेश्वरेच्छाप्रचोदिताः, यथा कूर्मदेहलीनीनाम्यङ्गानि ततो निःसरन्ति, यथा वा वर्षापाये प्रावृमुद्भावनि मण्डूकशरीराणि तद्वासनावासिततया घनघनाघनासारावसेकसुहितानि पुनर्मण्डूकदेहभावमनुभवन्ति । तथा पूर्ववासनावशात्पूर्वसमाननामरूपाण्युपपद्यन्ते । एतदुक्तं भवति- यद्यपीश्वरात्प्रभवः संसारमण्डलस्य, तथापीश्वरः प्राणभृत्कर्माविद्यासहकारी तदनुरूपमेव सृजति । न च सर्गप्रलयप्रवाहस्यानादितामन्तरेणैतदुपपद्यते इति सर्गप्रलयाभ्युपगमेऽपि संसारानादिता न विरुध्यत इति । तदिदमुक्तम् ॐ उपपद्यते, चाप्युपलभ्यते च आगमत इति ॐ । स्यादेतत् - भवत्वनादिता संसारस्य, तथापि महाप्रलयान्तरिते कुतः स्मरणं वेदानामित्यत आह ॐ अनादौ च संसारे यथा स्वापप्रबोधयोः इति ॐ । यद्यपि प्राणमात्रावशेषतातन्निःशेषते सुषुप्तप्रलयावस्थयोर्विशेषः, तथापि कर्मविक्षेपसंस्कार-

भामती-व्याख्या

होते, तथापि अपने कारणीभूत अनादि और अनिर्वचनीय अविद्या में कर्म-प्रवर्तक भ्रान्तिज वासनाओं के साथ सूक्ष्मरूपेण अवस्थित रहते ही हैं, जैसा कि स्मृतिकारों ने कहा है—

आसीदिदं तमोभूतमप्रज्ञातमलक्षणम् ।
अप्रतर्क्यमविज्ञेयं प्रसुप्तमिव सर्वतः ॥ ( मनु. १।५ )

[ अर्थात् यह समस्त जगत् अपने मूल कारण तमोरूप अज्ञान में विलीन, अप्रज्ञात (अप्रत्यक्ष), अलक्षण (अनुन्मेय), तर्क की पहुँच से बाहर, शब्द के द्वारा भी अज्ञेय और प्रसुप्त (कार्याक्षम) के समान था ]। वे (प्रसुप्त जगत् के घटकीभूत अन्तःकरणादि पदार्थ) अपनी प्रसुप्तावस्था की अवधि (सीमा) पार कर परमेश्वर की इच्छा से अनुप्राणित हो सृष्टिकालीन नाम-रूप के समान नाम-रूप में वैसे ही प्रकट हो जाते हैं, जैसे कच्छुए के शरीर में सिमटे अङ्ग समय पाकर शरीर से बाहर निकल आते हैं, अथवा वर्षा के समाप्त होने पर मेढकों के सूखे एवं पृथिवी की दरारों में चिपके शरीर घनघोर वर्षा के समय सजीव से होकर टरटराने लगते हैं। आशय यह है कि यद्यपि इस संसार-मण्डल का प्रभव ईश्वर से होता है, तथा ईश्वर प्राणियों की अविद्या, कामना और वासनाओं की सहायता से संसार की प्रत्येक इकाई को वही नाम और रूप देता है, जो विगत कल्प में प्रचलित नाम-रूप के समान ही होता है। सृष्टि-प्रलय-प्रवाह की अनादिता के बिना यह सब कुछ सम्भव नहीं, अतः संसार की सृष्टि एवं प्रलय मान लेने पर भी अनादिता विरुद्ध नहीं, केवल इतना ही नहीं, "उपपद्यते चाप्युपलभ्यते चागमतः" मान लेते हैं—संसार की अनादिता, किन्तु महाप्रलय का मध्य में व्यवधान आ जाने पर पूर्वाधीत वेदों का स्मरण क्योंकर होगा ? इस प्रश्न का उत्तर है— "अनादौ च संसारे यथा स्वापप्रबोधयोः" । यद्यपि सुषुप्ति में केवल प्राण रहता है और प्रलय में वह भी नहीं, तथापि कर्म-विक्षेप संस्कारों से युक्त अविद्या का अवस्थान सुषुप्ति और प्रलय-

०८ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. ३ सू. ३०

विप्रतिष्ठन्ते प्राणेभ्यो देवा देवेभ्यो लोकाः (कौ० ३।३) इति। स्यादेतत् — स्वापे पुरुषान्तरव्यवहाराविच्छेदात्स्वयं च सुप्तप्रबुद्धस्य पूर्वप्रबोधव्यवहारानुसंधानसंभवादविरुद्धम्। महाप्रलये तु सर्वव्यवहारोच्छेदाज्जन्मान्तरव्यवहारवच्च कल्पान्तरव्यवहारस्यानुसंधातुमशक्यत्वाद्वैषम्यमिति। नैष दोषः, सत्यपि सर्वव्यवहारोच्छेदिनि महाप्रलये परमेश्वरानुग्रहादीश्वराणां हिरण्यगर्भादीनां कल्पान्तरव्यवहारानुसंधानोपपत्तेः। यद्यपि प्राकृताः प्राणिनो न जन्मान्तरव्यवहारमनुसंदधाना दृश्यन्त इति, तथापि न प्राकृतवदीश्वराणां भवितव्यम्। यथा हि प्राणित्वाविशेषेऽपि मनुष्यादिस्तम्बपर्यन्तेषु ज्ञानैश्वर्यादिप्रतिबन्धः परेण परेण भूयान्भवन्दृश्यते, तथा मनुष्यादि-

भामती

सहितलयलक्षणाविद्यावशेषतासाम्येन स्वापप्रलयावस्थयोर्भेद इति द्रष्टव्यम्। ननु नापर्यायेण सर्वेषां सुषुप्तावस्था, केषाञ्चित्सदा प्रबोधात्, तेभ्यश्च सुप्तोत्थितानां ग्रहणसम्भवात् प्रायणकालविप्रकर्षयोश्च वासनोच्छेदकारणयोरभावेन सत्यां वासनायां स्मरणोपपत्तेः शब्दार्थसम्बन्धवेदव्यवहारानुच्छेदो युज्यते। महाप्रलयस्त्वपर्यायेण प्राणभृन्मात्रवर्ती प्रायणकालविप्रकर्षौ च तत्र संस्कारमात्रोच्छेदहेतू स्तः, इति कुतः सुषुप्तवत्पूर्वप्रबोधव्यवहारवदुत्तरप्रबोधव्यवहार इति चोदयति ॐ स्यादेतत् स्वापः इति ॐ। परिहरति ॐ नैष दोषः। सत्यपि व्यवहारोच्छेदिनि इति ॐ। अयमभिसन्धिः—न तावत्प्रायणकालविप्रकर्षौ सर्वसंस्कारोच्छेदकौ, पूर्वाभ्यस्तस्मृत्यनुसन्धानाज्जातस्य हर्षभयशोकसम्प्रतिपत्तेः। मनुष्यजन्मवासनानां चानेकजात्यन्तरसहस्रव्यवहितानां पुनर्मनुष्यजातिसंवर्तकेन कर्मणाऽभिव्यक्त्यभावप्रसङ्गात्। तस्मान्निकृष्टधियामपि यत्र सत्यपि प्रायणकालविप्रकर्षौ पूर्ववासनानुवृत्तिः, तत्र कैव कथा परमेश्वरानुग्रहेण धर्मज्ञानवैराग्यैश्वर्यातिशयसम्पन्नानां हिरण्यगर्भप्रभृतीनां महाधियाम्। यथा वा आ च मनुष्येभ्य आ च कृमिभ्यो ज्ञानादीनामनुभूयते निकर्षः। एवमा मनुष्येभ्य एवा च भगवतो हिरण्यगर्भाज्ज्ञानादीनां

भामती-व्याख्या

दोनों में समानरूप से रहता है, इसी समानता को लेकर स्वाप और प्रलय का अभेद व्यवहृत हुआ है।

शङ्का—खण्ड प्रलय में एक ही समय सभी प्राणियों की सुषुप्ति अवस्था नहीं आती, किन्तु कुछ प्राणियों की सुषुप्ति में भी अन्य प्राणी जागते रहते हैं, उनसे ही सुप्तोत्थित प्राणी वेदों का ग्रहण कर सकते हैं, वासनाओं के नाशक काल का व्यवधान न होने के कारण संस्कार और स्मरण की परम्परा विच्छिन्न नहीं होती, शब्दार्थ-सम्बन्धरूप वेद-व्यवहार का अनुच्छेद रह जाता है किन्तु महाप्रलय में सभी प्राणियों का एक साथ प्रायण हो जाने के कारण संस्कार-मात्र का उच्छेद हो जाता है, अतः प्रलय से पूर्व जैसी स्वाप-प्रबोध की धारा थी, वैसी प्रलय के पश्चात् क्योंकर सम्भव होगी ? भाष्य के शब्दों में वही शङ्का है—"स्यादेतत् स्वापे पुरुषान्तरव्यवहारानुच्छेदात्"

समाधान—उक्त शङ्का का परिहार करते हुए भाष्यकार कहते हैं—"नैष दोषः"। सत्यपि सर्वव्यवहारोच्छेदिनि महाप्रलये परमेश्वरानुग्रहाद् हिरण्यगर्भादीनां कल्पान्तरव्यवहारानुसन्धानोपपत्तेः"। अभिप्राय यह है कि प्रायण (मृत्यु) और काल का व्यवधान—ये दोनों समस्त संस्कारों के उच्छेदक नहीं होते, अन्यथा योगसूत्रोक्त पुनः मनुष्यजाति-संवर्तक कर्मों के द्वारा संस्कारों की अभिव्यक्ति क्योंकर होगी ? जब कि निकृष्ट योनी के प्राणियों के मरण और प्रलय का व्यवधान रहने पर भी संस्कार अक्षुण्ण रहता है, तब ईश्वर के कृपापात्र धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्यरूप अतिशय से युक्त हिरण्यगर्भादि महान् आत्माओं की बात ही क्या ? अथवा जैसे मनुष्यों से लेकर कीट-पतङ्गादि निकृष्ट प्राणियों में ज्ञान का निकर्ष

देवताया विग्रहादिमत्त्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४०९

ष्वेव हिरण्यगर्भपर्यन्तेषु ज्ञानैश्वर्याद्यभिव्यक्तिरपि परेण परेण भूयसी भवतीत्येतच्छ्रु-
तिस्मृतिवादेष्वसकृदनुश्रूयमाणं न शक्यं नास्तीति वदितुम् । ततश्चातीतकल्पानुष्ठित-
प्रकृष्टज्ञानकर्मणामीश्वराणां हिरण्यगर्भादीनां वर्तमानकल्पादौ प्रादुर्भवतां परमेश्वरा-
नुगृहीतानां सुप्तप्रतिबुद्धवत्कल्पान्तरव्यवहारानुसंधानोपपत्तिः । तथा च श्रुतिः—
'यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै । तं ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं
मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये' ( श्वे० ६।१८ )
इति । स्मरन्ति च शौनकादयः 'मधुच्छन्दः-
प्रभृतिभिर्ऋषिभिर्दाशतय्यो दृष्टाः'
इति । प्रतिवेदं चैवमेव काण्डर्ष्यादयः स्मर्यन्ते ।
श्रुतिरप्यृषिज्ञानपूर्वकमेव मन्त्रेणानुष्ठानं दर्शयति—यो ह वा अविदितार्षेयच्छन्दोदैव-
तब्राह्मणेन मन्त्रेण याजयति वाध्यापयति वा स्थाणुं वर्च्छति गर्तं वा प्रतिपद्यते'
( सर्वानु० परि० )
इत्युपक्रम्य 'तस्मादेतानि मन्त्रे मन्त्रे विद्याद् इति । प्राणिनां च
सुखप्राप्तये धर्मो विधीयते। दुःखपरिहाराय चाधर्मः प्रतिषिध्यते । दृष्टानुभविकसुखदुः-


भामती

प्रकर्षोऽपि सम्भाव्यते । तथा च तदभिवदन्तो वेदस्मृतिवादाः प्रामाण्यमप्रत्यूहमश्नुवते । एवं चात्र भवतां हिरण्यगर्भादीनां परमेश्वरानुगृहीतानामुपपद्यते कल्पान्तरसम्बन्धिनिखिलव्यवहारानुसन्धानमिति । सुगममन्यत् ।

स्यादेतत्—अस्तु कल्पान्तरव्यवहारानुसन्धानं तेषामस्यां तु सृष्टावन्य एव वेदाः, अन्य एव चैषामर्थाः, अन्य एव वर्णाश्रमाः । धर्माच्चानर्थोऽर्थश्चाधर्मात् । अनर्थश्चेप्सितोऽर्थश्चानीप्सितोऽपूर्वत्वात् सर्गस्य । तस्मात्कृतमत्र कल्पान्तरव्यवहारानुसन्धानेन, अकिञ्चित्करत्वात् । तथा च पूर्वव्यवहारोच्छेदा-दुच्छिन्नार्थसम्बन्धश्च वेदश्चानित्यो प्रसज्येयातामित्यत आह ॐ प्राणिनां च सुखप्राप्तये इति ॐ । यथावस्तु-स्वभावसामर्थ्यं हि सर्गः प्रवर्तते, न तु स्वभावसामर्थ्यमन्यथयितुमर्हति । न हि जातु सुखं तत्त्वेन जिहा-स्यते, दुःखं चोपाधित्स्यते । न च जातु धर्माधर्मयोः सामर्थ्यविपर्ययो भवति, न हि मृत्पिण्डाद् पटः,


भामती-व्याख्या

(न्यूनत्व) देखा जाता है, वैसे ही मनुष्यों से लेकर भगवान् हिरण्यगर्भ तक उत्तरोत्तर ज्ञान का प्रकर्ष भी सम्भावित है, अतः श्रुति, स्मृति, इतिहास और पुराणों में असकृत् श्रूयमाण उत्तरोत्तर ज्ञानादि का प्रकर्ष मानकर वेद-सम्प्रदाय का प्रामाण्य व्यवस्थित किया जा सकता है ।

**शङ्का—**मान लेते हैं कि कल्पान्तराधीत वेद का स्मरण हिरण्यगर्भादि को होता है किन्तु इस वर्तमान सृष्टि में वेद और उनके अर्थ अन्य ही हैं, वर्णाश्रमादि भी भिन्न हैं, धर्म से पाप और अधर्म से पुण्य का प्रसव होता है। आज हिंसादि अनर्थभूत कर्म अभीष्ट और श्रौत-स्मार्त कर्मरूप उपादेय पदार्थ भी अनिष्ट और अनुपादेय माने जाते हैं। सृष्टि की विलक्षणता नितान्त प्रसिद्ध है। अतः कल्पान्तराधीत वेद का स्मरण यहाँ किस काम का ? इस प्रकार पूर्वप्रचलित व्यवहार का उच्छेद हो जाने से शब्दार्थ-सम्बन्ध एवं वेद—दोनों अनित्य क्यों न होंगे ?

**समाधान—**उक्त शङ्का का निराकरण करते हुए भाष्यकार कहते हैं कि "प्राणिनां सुखप्राप्तये धर्मो विधीयते, दुःखपरिहाराय चाधर्मः प्रतिषिध्यते"। आशय यह है कि वस्तुओं के स्वभाव और सामर्थ्य के अनुरूप ही सृष्टि प्रवृत्त होती है। वस्तु के स्वभाव और सामर्थ्य का अन्यथाकरण कभी नहीं किया जा सकता, क्योंकि सुख को सुखरूपेण त्याज्य और दुःख को दुःखरूपेण कभी उपादेय नहीं माना जा सकता। इसी प्रकार धर्म और अधर्म भी अपने स्वभाव और सामर्थ्य के विपरीत नहीं किए जा सकते। क्या कभी मृत्तिका-पिण्ड से पट और

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४१० ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ १ पा. ३ सू. ३०

खविषयौ च रागद्वेषौ भवतः, न विलक्षणविषयावित्यतो धर्माधर्मफलभूतोत्तरा सृष्टिनिष्पद्यमाना पूर्वसृष्टिसदृइयेव निष्पद्यते । स्मृतिश्च भवति - तेषां ये यानि कर्माणि प्राक्सृष्ट्यां प्रतिपेदिरे । तान्येव ते प्रपद्यन्ते सृज्यमानाः पुनः पुनः ॥ (म.भा. शां. १२।८५) हिंस्त्राऽहिंस्रे मृदुक्रूरे धर्माधर्मावृतानृते । तद्भाविताः प्रपद्यन्ते तस्मात्तत्तस्य रोचते ॥' (म.भा. शां. २५।७) इति ।

प्रलीयमानमपि चेदं जगच्छक्त्यवशेषमेव प्रलीयते । शक्तिमूलमेव च प्रभवति; इतरथाऽऽकस्मिकत्वप्रसङ्गात् । न चानेकाकाराः शक्तयः शक्याः कल्पयितुम् । ततश्च विच्छिद्य विच्छिद्याप्युद्भवतां भूर्यादलोकप्रवाहाणां, देवतिर्यङ्मनुष्यलक्षणानां च प्राणिनिकायप्रवाहाणां, वर्णाश्रमधर्मफलव्यवस्थानां चानादौ संसारे नियतत्वमिन्द्रि- यविषयसंबन्धनियतत्ववत्प्रत्येतव्यम् । न हीन्द्रियविषयसंबन्धादेर्व्यवहारस्य प्रतिसर्ग- मन्यथात्वं षष्ठेन्द्रियविषयकल्पं शक्यमुत्प्रेक्षितुम् । अतश्च सर्वकल्पानां तुल्यव्यवहार- त्वात्कल्पान्तरव्यवहारानुसंधानक्षमत्वाच्चेश्वराणां समाननामरूपा एव प्रतिसर्ग विशेषाः प्रादुर्भवन्ति । समाननामरूपत्वाच्चावृत्तावपि महासर्गमहाप्रलयलक्षणायां जगतोऽभ्युपगम्यमानायां न कश्चिच्छब्दप्रामाण्यादिविरोधः । समाननामरूपतां च श्रुतिस्मृती दर्शयतः - 'सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत् । दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो स्वः' (ऋ० सं० १०।१९०।३) इति । यथा पूर्वस्मिन्कल्पे सूर्याचन्द्रमः- प्रभृति जगत्क्लृप्तं तथास्मिन्नपि कल्पे परमेश्वरोऽकल्पयदित्यर्थः । तथा 'अग्निर्वा अकामयत । अन्नादो देवानां स्यामिति । स एतमग्नये कृत्तिकाभ्यः पुरोडाशमष्टाकपालं निरवपत्' (तै० ब्रा० ३।१।४।१) इति नक्षत्रेष्टिविधौ योऽग्निर्भिरवपद्यस्मै वाऽग्नय निरवपत्तयोः समाननामरूपतां दर्शयतीत्येवंजातीयका श्रुतिरिहोदाहर्तव्या ।

भामती घटश्च तन्तुभ्यो जायते । तथा सति वस्तुसामर्थ्य नियमाभावात् सर्वं सर्वस्माद्द्भवेदिति पिपासुरपि दहन- माहृत्य पिपासामुपशमयेत् , शीतातों वा तोयमाहृत्य शीतातिमिति । तेन सृष्टयन्तरेऽपि ब्रह्महत्यादिरन- र्थहेतुरेवार्थहेतुश्च यागादिरित्यानुपूर्व्यं सिद्धम् । एवं च य एव वेदा अस्मिन् कल्पे त एव कल्पान्तरे त एव चैषामर्थास्त एव च वर्णाश्रमाः । दृष्टसाधर्म्यसम्भवे तद्वैधर्म्यकल्पनमनुमानागमविरुद्धम् । आगमाश्चेह भूयांसो भाष्यकारेण दर्शिताः । श्रुतिस्मृतिपुराणाख्यास्तद्बाधकोपोऽन्यथा भवेत् ॥

भामती-व्याख्या तन्तुओं से घट उत्पन्न होता है ? यदि हो जाय, तब वस्तुओं के सामर्थ्य का कोई नियम नहीं रह जाता, फिर तो अग्नि से प्यास और हिम से ठिठुरन दूर होनी चाहिए। फलतः अन्य सृष्टियों के समान ही इस सृष्टि में भी ब्रह्महत्यादि कर्म अनर्थ के एवं अश्वमेधादि याग अर्थ के ही जनक होते हैं-यह सिद्ध हो जाता है। जो वेद कल्पान्तर में प्रचलित था, वही इस कल्प में भी है, वे ही उनके अर्थ और वे ही वर्णाश्रम हैं। दृष्ट पदार्थों की समानधर्मता जब अदृष्ट पदार्थों में बाधित नहीं, तब उनके वैधर्म्य की कल्पना अनुमान और आगमादि प्रमाणों से बाधित हो जाती है। आगमाश्च भूयांसो भाष्यकारेण दर्शिताः । श्रुतिस्मृतिपुराणाख्याः तद्बाधकापोऽन्यथा भवेत् ॥

देवताया विग्रहादिमत्त्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४११

स्मृतिरपि— ऋषीणां नामधेयानि याश्च वेदेषु दृष्टयः । शर्वर्यन्ते प्रसूतानां तान्येवैभ्यो ददात्यजः ॥ यथर्तुष्वृतुलिङ्गानि नानारूपाणि पर्याये । दृश्यन्ते तानि तान्येव तथा भावा युगादिषु ॥ यथाभिमानिनोऽतीतास्तुल्यास्ते सांप्रतैरपि । देवा देवैरतीतैर्हि रूपैर्नामभिरेव च ॥' (वायुपु. ९।५७-६५) इत्येवंजातीयका द्रष्टव्या ॥ ३० ॥

मध्वादिष्वसंभवादनधिकारं जैमिनिः ॥ ३१ ॥ इह देवादीनामपि ब्रह्मविद्यायामस्त्यधिकार इति यत्प्रतिज्ञातं तत्पर्यावर्त्यते । देवादीनामनधिकारं जैमिनिराचार्यो मन्यते । कस्मात् ? मध्वादिष्वसंभवात् । ब्रह्मविद्यायामधिकाराभ्युपगमे हि विद्यात्वाविशेषान्मध्वादिविद्यास्वप्यधिकारोऽभ्युपगम्येत । न चैवं संभवति । कथम् ? 'असौ वा आदित्यो देवमधु' ( छा० ३।१।१) इत्यत्र मनुष्या आदित्यं मध्वध्यासेनोपासीरन् । देवादिषु ह्युपासकेष्वभ्युपगम्यमानेष्वादित्यः कमन्यमादित्यमुपासीत ? पुनश्चादित्यव्यपाश्रयाणि पञ्च रोहितादीन्यमृतान्युपक्रम्य वसवो रुद्रा

भामती तस्मात् सुष्ठूक्तं ॐ समाननामरूपत्वाच्चावृत्तावपि अविरोध इति ॐ । 'अग्निर्वा अकामयत' इति भाविनीं वृत्तिमाश्रित्य यजमान एवाग्निरुच्यते । नह्यग्नेर्देवतान्तरमग्निरस्ति ॥ ३० ॥ ब्रह्मविद्यास्वधिकारं देवर्षीणां ब्रुवाणः प्रष्टव्यो जायते—किं सर्वासु ब्रह्मविद्यास्वविशेषेण सर्वेषां किम्वा कासुचिदेव केषाञ्चित् ? यद्यविशेषेण सर्वासु, ततो मध्वादिविद्यास्वसम्भवः । ॐ कथम् ? असौ वाऽऽदित्यो देवमध्वित्यत्र हि मनुष्या आदित्यं मध्वध्यासेनोपासीरन् ॐ । उपास्योपासकभावो हि भेदाधिष्ठानो न स्वात्मन्यादित्यस्य देवतायाः सम्भवति । न चादित्यान्तरमस्ति । प्राचामादित्यानामस्मिन् कल्पे क्षीणाधिकारत्वात् । ॐ पुनश्चादित्यव्यपाश्रयाणि पञ्च रोहितादीन्यमृतान्युपक्रम्य इति ॐ । अयमर्थः—असौ वा आदित्यो

भामती-व्याख्या यह जो कहा गया है कि "अग्निर्वा अकामयत ।" यहाँ अग्नि देवता के उस भावी जन्म को ध्यान में रख कर कहा गया है कि जब अग्नि देवता अपने भावी जन्म में अग्नि नाम का यजमान बनता है, तब वह उक्त कामना एवं कामना के अनुरूप कर्म करता है, जिसमें देवता उस यजमान से भिन्न होता हुआ भी अग्नि नामवाला ही होता है ॥ ३० ॥ जो वादी ब्रह्मविद्या में देवताओं और ऋषियों को अधिकार प्रदान कर रहा है, उससे यह पूछा जाना चाहिए कि क्या सभी प्रकार की ब्रह्म-विद्याओं में सभी को अधिकार है ? अथवा किसी ब्रह्म-विद्या में ही किसी को ही अधिकार है ? यदि सभी में सभी को अधिकार है, तब मध्वादि-विद्याओं में असम्भव हो जाता है, क्योंकि "असौ वा आदित्यो देवमधु" ( छां. ३।१।१) यहाँ मनुष्य तो आदित्य देवता की मधु-बुद्धि से उपासना कर सकता है, किन्तु स्वयं आदित्य देवता किस अन्य आदित्य की उपासना करेगा ? उपास्योपासकभाव सदैव उपास्य और उपासक के भेद की अपेक्षा करता है, अतः आदित्य देवता ही उपासक और वही उपास्य क्योंकर होगा ? उपास्यभूत आदित्य से भिन्न और कोई आदित्य देवता है ही नहीं। पूर्व कल्प के जो आदित्यादि देवता इस समय मनुष्यरूप में हैं, वे देवतारूपता का अधिकार खो बैठे हैं, वे देवता ही नहीं माने जा सकते। "पुनश्चादित्यव्यपाश्रयाणि पञ्च रोहितादीन्यमृतान्युपक्रम्य"—इत्यादि भाष्य ग्रन्थ

४१२ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. ३ सू. ३१

भादित्या मरुतः साध्याश्च पञ्च देवगणाः क्रमेण तत्तदमृतमुपजीवन्तीत्युपदिश्य ‘स य

भामती

देवमध्विति देवानां मोदनान्मध्विव मधु । भ्रामरमधुसारूप्यान्माहात्म्य श्रुतिः । ‘तस्य मधुनो द्यौरेव तिरश्चीनवंशः । अन्तरिक्षं मध्वपूपः’ । आदित्यस्य हि मधुनोऽपूपः पटलमन्तरिक्षमाकाशं तत्रावस्थानात् । यानि च सोमाज्यपयःप्रभृतीत्यग्नो हूयन्ते तान्यादित्यरश्मिभिरग्निसंवलितैस्तप्तन्नपाकामृतीभावमापन्नान्यादित्यमण्डलम्ऋङ्मन्त्रमधुपैर्नीयन्ते । यथा हि भ्रमराः पुष्पेभ्य आहृत्य मकरन्दं स्वस्थानमानयन्त्येवमृङ्मन्त्रभ्रमराः प्रयोगसमवेतार्थस्मारणाविभक्तऋग्वेवविहितभ्यः कर्मकुसुमेभ्य आहृत्य तन्निष्पन्नमकरन्दमादित्यमण्डलं लोहिताभिरस्य प्राचीनरश्मिनाडीभिरानयन्ति, तदमृतं वसव उपजीवन्ति । तथास्यादित्यमधुनो दक्षिणाभिः रश्मिनाडीभिः शुक्लाभिर्यजुर्वेदविहितकर्मकुसुमेभ्य आहृत्याग्नो हुतं सोमादि पूर्ववदमृतभावमापन्नं यजुर्वेद मन्त्रभ्रमरा आदित्यमण्डलमानयन्ति, तदेतदमृतं रुद्रा उपजीवन्ति । तथास्यादित्यमधुनः प्रतीचीभी रश्मिनाडीभिः कृष्णाभिः सामवेदविहितकर्मकुसुमेभ्य आहृत्याग्नौ हुतं सोमादि पूर्ववदमृतभावमापन्नं साममन्त्रस्तोत्रभ्रमरा आदित्यमण्डलमानयन्ति, तदमृतमादित्या उपजीवन्ति । अथास्यादित्यमधुन उदीचीभिरतिकृष्णाभिः रश्मिनाडीभिरथर्ववेदविहितभ्यः कर्मकुसुमेभ्य आहृत्याग्नौ हुतं सोमादिपूर्ववदमृतभावमापन्नमथर्वाङ्गिरसमन्त्रभ्रमरा, तथाश्वमेधवाचःस्तोम-कर्मकुसुमादितिहासपुराणमन्त्रभ्रमरा आदित्यमण्डलमानयन्ति । अश्वमेधे वाचःस्तोमे च पारिप्लवं शंसन्तीति श्रवणादितिहासपुराणमन्त्राणामध्यक्षस्ति प्रयोगः । तदमृतं मरुत उपजीवन्ति । अथास्य या आदित्यमधुन ऊर्ध्वा रश्मिनाड्यो गोप्यास्ताभिरुपासनभ्रमराः प्रणवकुसुमादाहत्यादित्यमण्डल-

भामती-व्याख्या

का आशय यह है कि "असौ वादित्यो देवमधु"—इस वाक्य के द्वारा आदित्य को देवताओं का मधु इस लिए कहा गया है कि वह देवताओं के मोद का हेतु है, जैसा कि इस वाक्य का भाष्य करते हुए भाष्यकार ने कहा है—"देवानां मोदनान्मध्विव मधु असौ आदित्यः" (छां. पृ. १३२) । भ्रामर [ भ्रमर अर्थात् मधु-मक्खियों के बनाए गए शहद ] की समानता श्रुति ने दिखाई है—तस्य मधुनो द्यौरेव तिरश्चीनवंशः, अन्तरिक्षं मध्वपूपः" । अर्थात् जैसे किसी तिरछे बाँसादि के सहारे मधु-मक्खियाँ अपना शहद का छत्ता लगाती है, ऐसे स्वर्गरूप तिरछे बाँस में लगा हुआ यह अन्तरिक्ष (आकाश) मधु का अपूप (छत्ता) और उसमें अवस्थित आदित्य शहद है । जितने भी सोम-रस, आज्य (घृत) और दुग्धादि हवि द्रव्य अग्नि में आहुत होते हैं, वे अमृतरूप से परिणत होकर रश्मिरूपी मधुपों (मधु-सञ्चय करने वाली मक्खियों) के द्वारा आदित्य-मण्डल में पहुँचाए जाते हैं । जैसे शहद की मक्खियाँ फूलों से मकरन्द (पुष्प-रस) लाकर शहद के छत्ते में सञ्चित करती है, वैसे ही ऋचारूपी मक्खियाँ कर्मरूपी पुष्पों से कर्म-फलरूप अमृत लाकर आदित्य-मण्डल में सञ्चित करती हैं । मन्त्रों का लक्षण किया जाता है—"प्रयोगसमवेतार्थस्मारकाः मन्त्राः", अतः कर्म के प्रयोग (अनुष्ठान) में विनियुक्त आदित्यादि देवताओं का मन्त्र ही स्मरण दिलाते हैं, [ जैसा कि भाष्यकार ने कहा है—"मन्त्रस्य हि एतत् प्रयोजनं यत् स्मारयति क्रियां साधनं वा" (शाबर. पृ. १४१८) ] । आदित्य-मण्डल की (१) पूर्व दिशा में अवस्थित लाल रश्मियों के द्वारा सञ्चित अमृत का उपभोग वसुसंज्ञक देवगण, (२) दक्षिण दिशा की श्वेत किरणों के द्वारा आनीत यजुर्वेदीय कर्म-फलरूप अमृत का उपभोग रुद्रगण, (३) पश्चिम दिशा की कृष्ण किरणों के द्वारा आहृत सामवेदीय कर्मों के फलरूप अमृत का सेवन आदित्यगण एवं (४) उत्तर दिशा की अत्यन्त कृष्ण रश्मियों के द्वारा आनीत अथर्ववेदीय कर्म के फलरूप अमृत एवं इतिहास पुराणादिरूप रश्मियों के द्वारा आनीत अश्वमेध और वाचःस्तोमसंज्ञक कर्मों के फलरूप अमृत का आसेवन मरुद्गण करते हैं । अश्वमेध और वाचःस्तोम नाम के एकाह क्रतु में "पारिप्लवं