भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 430, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ें४१२ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. ३ सू. ३१
भादित्या मरुतः साध्याश्च पञ्च देवगणाः क्रमेण तत्तदमृतमुपजीवन्तीत्युपदिश्य ‘स य
भामती
देवमध्विति देवानां मोदनान्मध्विव मधु । भ्रामरमधुसारूप्यान्माहात्म्य श्रुतिः । ‘तस्य मधुनो द्यौरेव तिरश्चीनवंशः । अन्तरिक्षं मध्वपूपः’ । आदित्यस्य हि मधुनोऽपूपः पटलमन्तरिक्षमाकाशं तत्रावस्थानात् । यानि च सोमाज्यपयःप्रभृतीत्यग्नो हूयन्ते तान्यादित्यरश्मिभिरग्निसंवलितैस्तप्तन्नपाकामृतीभावमापन्नान्यादित्यमण्डलम्ऋङ्मन्त्रमधुपैर्नीयन्ते । यथा हि भ्रमराः पुष्पेभ्य आहृत्य मकरन्दं स्वस्थानमानयन्त्येवमृङ्मन्त्रभ्रमराः प्रयोगसमवेतार्थस्मारणाविभक्तऋग्वेवविहितभ्यः कर्मकुसुमेभ्य आहृत्य तन्निष्पन्नमकरन्दमादित्यमण्डलं लोहिताभिरस्य प्राचीनरश्मिनाडीभिरानयन्ति, तदमृतं वसव उपजीवन्ति । तथास्यादित्यमधुनो दक्षिणाभिः रश्मिनाडीभिः शुक्लाभिर्यजुर्वेदविहितकर्मकुसुमेभ्य आहृत्याग्नो हुतं सोमादि पूर्ववदमृतभावमापन्नं यजुर्वेद मन्त्रभ्रमरा आदित्यमण्डलमानयन्ति, तदेतदमृतं रुद्रा उपजीवन्ति । तथास्यादित्यमधुनः प्रतीचीभी रश्मिनाडीभिः कृष्णाभिः सामवेदविहितकर्मकुसुमेभ्य आहृत्याग्नौ हुतं सोमादि पूर्ववदमृतभावमापन्नं साममन्त्रस्तोत्रभ्रमरा आदित्यमण्डलमानयन्ति, तदमृतमादित्या उपजीवन्ति । अथास्यादित्यमधुन उदीचीभिरतिकृष्णाभिः रश्मिनाडीभिरथर्ववेदविहितभ्यः कर्मकुसुमेभ्य आहृत्याग्नौ हुतं सोमादिपूर्ववदमृतभावमापन्नमथर्वाङ्गिरसमन्त्रभ्रमरा, तथाश्वमेधवाचःस्तोम-कर्मकुसुमादितिहासपुराणमन्त्रभ्रमरा आदित्यमण्डलमानयन्ति । अश्वमेधे वाचःस्तोमे च पारिप्लवं शंसन्तीति श्रवणादितिहासपुराणमन्त्राणामध्यक्षस्ति प्रयोगः । तदमृतं मरुत उपजीवन्ति । अथास्य या आदित्यमधुन ऊर्ध्वा रश्मिनाड्यो गोप्यास्ताभिरुपासनभ्रमराः प्रणवकुसुमादाहत्यादित्यमण्डल-
भामती-व्याख्या
का आशय यह है कि "असौ वादित्यो देवमधु"—इस वाक्य के द्वारा आदित्य को देवताओं का मधु इस लिए कहा गया है कि वह देवताओं के मोद का हेतु है, जैसा कि इस वाक्य का भाष्य करते हुए भाष्यकार ने कहा है—"देवानां मोदनान्मध्विव मधु असौ आदित्यः" (छां. पृ. १३२) । भ्रामर [ भ्रमर अर्थात् मधु-मक्खियों के बनाए गए शहद ] की समानता श्रुति ने दिखाई है—तस्य मधुनो द्यौरेव तिरश्चीनवंशः, अन्तरिक्षं मध्वपूपः" । अर्थात् जैसे किसी तिरछे बाँसादि के सहारे मधु-मक्खियाँ अपना शहद का छत्ता लगाती है, ऐसे स्वर्गरूप तिरछे बाँस में लगा हुआ यह अन्तरिक्ष (आकाश) मधु का अपूप (छत्ता) और उसमें अवस्थित आदित्य शहद है । जितने भी सोम-रस, आज्य (घृत) और दुग्धादि हवि द्रव्य अग्नि में आहुत होते हैं, वे अमृतरूप से परिणत होकर रश्मिरूपी मधुपों (मधु-सञ्चय करने वाली मक्खियों) के द्वारा आदित्य-मण्डल में पहुँचाए जाते हैं । जैसे शहद की मक्खियाँ फूलों से मकरन्द (पुष्प-रस) लाकर शहद के छत्ते में सञ्चित करती है, वैसे ही ऋचारूपी मक्खियाँ कर्मरूपी पुष्पों से कर्म-फलरूप अमृत लाकर आदित्य-मण्डल में सञ्चित करती हैं । मन्त्रों का लक्षण किया जाता है—"प्रयोगसमवेतार्थस्मारकाः मन्त्राः", अतः कर्म के प्रयोग (अनुष्ठान) में विनियुक्त आदित्यादि देवताओं का मन्त्र ही स्मरण दिलाते हैं, [ जैसा कि भाष्यकार ने कहा है—"मन्त्रस्य हि एतत् प्रयोजनं यत् स्मारयति क्रियां साधनं वा" (शाबर. पृ. १४१८) ] । आदित्य-मण्डल की (१) पूर्व दिशा में अवस्थित लाल रश्मियों के द्वारा सञ्चित अमृत का उपभोग वसुसंज्ञक देवगण, (२) दक्षिण दिशा की श्वेत किरणों के द्वारा आनीत यजुर्वेदीय कर्म-फलरूप अमृत का उपभोग रुद्रगण, (३) पश्चिम दिशा की कृष्ण किरणों के द्वारा आहृत सामवेदीय कर्मों के फलरूप अमृत का सेवन आदित्यगण एवं (४) उत्तर दिशा की अत्यन्त कृष्ण रश्मियों के द्वारा आनीत अथर्ववेदीय कर्म के फलरूप अमृत एवं इतिहास पुराणादिरूप रश्मियों के द्वारा आनीत अश्वमेध और वाचःस्तोमसंज्ञक कर्मों के फलरूप अमृत का आसेवन मरुद्गण करते हैं । अश्वमेध और वाचःस्तोम नाम के एकाह क्रतु में "पारिप्लवं