भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदेवताया विग्रहादिमत्त्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४१३
एतद्देवामृतं वेद वसूनामेवैको भूत्वाऽग्निनैव मुखेनैतदेवामृतं दृष्ट्वा तृप्यति' इत्यादिना वस्वाद्युपजीव्यान्यमृतानि विजानतां वस्वादिमहिमप्राप्तिं दर्शयति। वस्वादयस्तु कान्यान्यन्त्वस्वादीनमृतोपजीविनो विजानीयुः ? कं वाऽन्यं वस्वादिमहिमानं प्रेप्स्युः ? तथा अग्निः पादो वायुः पाद आदित्यः पादो दिशः पादः' ( छा० ३।१८।२ ), 'वायुर्वाव संवर्गः' (छा० ४।३।१) 'आदित्यो ब्रह्मेत्यादेशः' ( छा० ३।१९।१ ) इत्यादिषु देवतात्मोपासनेषु न तेषामेव देवतात्मनामधिकारः संभवति । तथा 'इमावेव गोतमभरद्वाजौ चायमेव गोतमोऽयं भरद्वाजः ( बृ० २।२।४ ) इत्यादिष्वृषिसंबन्धेषूपासनेषु न तेषामेवर्षीणामधिकारः संभवति ॥ ३१ ॥
कुतश्च देवादीनामधिकारः ?
भामती
मानयन्ति, तदमृतमुपजीवन्ति साध्याः। ता एता आदित्यमध्यपाश्याः पञ्च रोहितादयो रश्मिनाड्य ऋगादिसम्बद्धाः क्रमेणोपविष्येति योजना। एतदेवामृतं दृष्ट्वोपलभ्य यथास्वं समस्तैः करणैर्यशस्तेज-इन्द्रियसाकल्यवीर्य्यान्नाद्यान्यमृतं तदुपलब्ध्यादित्ये तृप्यन्ति। तेन खल्वमृतेन देवानां वस्वादीनां मोदनं विवक्षवादित्यो मधुः। एतदुक्तं भवति—न केवलमुपास्योपासकभाव एकस्मिन् विरुध्यते, अपितु ज्ञातृज्ञेयभावश्च प्राप्यप्रापकभावश्चेति । ॐ तथाग्निः पादः इति ॐ । अधिदेवतं खल्वाकाशे ब्रह्मदृष्टिविधानार्थं मुक्तम्। आकाशस्य हि सर्वगतत्वं रूपविहीनत्वं च ब्रह्मणा सारूप्यं, तस्य चैतस्याकाशस्य ब्रह्मणश्चत्वारः पादा अग्न्यादयोऽग्निः पाद इत्यादिना दर्शिताः। यथा हि गोः पादा न गवा वियुज्यन्ते, एवमग्न्यादयोऽपि नाकाशेन सर्वगतेनेत्याकाशस्य पादास्तदेवमाकाशस्य चतुष्पदो ब्रह्मदृष्टिं विधाय स्वरूपेण वायुं संवर्गगुणकमुपास्यं विधातुं महीकरोति । ॐ वायुर्वाव संवर्गः ॐ तथा स्वरूपेणैवादित्यं ब्रह्मदृष्ट्योपास्यं विधातुं महीकरोति ॐ आदित्यो ब्रह्मेत्यादेशः ॐ उपदेशः। अतिरोहितार्थमन्यत् ॥ ३१ ॥
भामती-व्याख्या
शंसन्ति" का विधान किया गया है, अर्थात् जब तक उस कर्म का समय पूरा न हो, तब तक वेद, पुराण धर्मशास्त्र और इतिहासादि जो भी कण्ठस्थ हो निरन्तर पारिप्लव (अव्यवस्थित) रूप से बोलते रहना चाहिए। इस प्रकार कर्मानुष्ठान-काल में वेद-मन्त्रों के समान इतिहास और पुराणादि के वाक्य भी विनियुक्त हैं। आदित्यरूप मधु की गोप्य ऊर्ध्वगामी रश्मियों के द्वारा जो प्रणवरूपी फूलों से जो अमृत लाया जाता है, उसका साध्यगण उपभोग करते हैं। इस प्रकार आदित्य की पाँच प्रकार की ऋगादि-सम्बन्धित रश्मियों के द्वारा आनीत अमृत वसु आदि देवगणों को मुदित करता है, अतः अमृत के आधारभूत आदित्य गोलक को देव-मधु कहा जाना सर्वथा उचित है। कहने का अभिप्राय यह है कि केवल उपास्य-उपासकभाव ही एक तत्त्व में विरुद्ध नहीं होता, [अपितु ज्ञातृ-ज्ञेयभाव और प्राप्य-प्रापकभाव भी विरुद्ध होता है। अर्थात् आदित्य-मण्डल में वसु आदि देवताओं के द्वारा जो मधुरूपता का ध्यान किया जाता है, उसका फल बताया गया है—वसु आदि देवताओं के स्वरूप की प्राप्ति, किन्तु वसु आदि देवता ही उपासक और उपास्य एवं प्रापक और प्राप्य नहीं हो सकते]।
उसी प्रकार अग्नि, वायु, आदित्य और दिशा में आकाशरूप ब्रह्म के पादों की भावना का इस लिए ध्यान विहित है कि जैसे गो के पाद गौ से बाहर नहीं होते, वैसे ही अग्नि आदि पदार्थ भी आकाश से बाहर नहीं। वायु में संवर्गरूपता की और आदित्य में ब्रह्म की भावना का उपदेश किया गया है। यहाँ भी उन्हीं उपास्यभूत देवताओं को अधिकार क्योंकर होगा ? "इमावेव गोतमभरद्वाजौ अयमेव गोतमोऽयं भरद्वाजः" (बृह. उ. २।२।४) यहाँ पर दो कर्ण, दो नेत्र, दो नासिका और एक वाणी—इन सात इन्द्रियों में सप्त ऋषियों का