भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४१४ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. ३ सू. ३२
ज्योतिषि भावाच्च ॥ ३२ ॥
यदिदं ज्योतिर्मण्डलं द्युस्थानमहोरात्राभ्यां बम्भ्रमज्जगद्वभासयति, तस्मिन्नादित्यादयो देवतात्ववचनाः शब्दाः प्रयुज्यन्ते । लोकप्रसिद्धेर्वाक्यशेषप्रसिद्धेश्च । न च ज्योतिर्मण्डलस्य हृदयादिना विग्रहेण चेतनतयाऽर्थित्वादिना वा योगोऽवगन्तुं शक्यते, मृदादिवदचेतनत्वावगमात् । एतेनाग्न्यादयो व्याख्याताः । स्यादेतत्, —
भामती
यद्युच्येत नाविशेषेण सर्वेषां देवादीनां सर्वासु ब्रह्मविद्यास्वधिकारः किन्तु यथासम्भवमिति । तत्रेदमभ्युपतिष्ठते ज्योतिषि भावाच्च लौकिको ह्यादित्यादिशब्दप्रयोगप्रत्ययो ज्योतिर्मण्डलादिषु दृष्टो न चैतेषामस्ति चैतन्यं, नह्येतेषु देवदत्तादिवत्तदनुरूपा दृश्यन्ते चेष्टाः । ॐ स्यादेतन्मन्त्रार्थवादेतिहासपुराणलोकेभ्य इति ॐ । तत्र जगृभ्माते दक्षिणमिन्द्रहस्तमिति च, काशिरिन्द्र इदिति च । काशिर्मुष्टिः । तथा 'तुविग्रीवो वपोदरः सुबाहुरन्धसो मदे । इन्द्रो वृत्राणि जिघ्नते' इति विग्रहवत्त्वं देवताया मन्त्रार्थवादा अभिवदन्ति । तथा हविर्भोजनं देवताया दर्शयन्ति । अद्धीन्द्र पिब च प्रस्थितस्येत्यादयः । तथैशानम्—'इन्द्रो दिव इन्द्र ईशे पृथिव्या इन्द्रो अपामिन्द्र इत्पर्वतानाम् । इन्द्रो वृधाम् इन्द्र इन्मेधिराणामिन्द्रः क्षेमं योगे हव्य इन्द्रः' इति । तथा 'ईशानमस्य जगतः स्वर्दृशमीशानमिन्द्र तस्थुष' इति । तथा वरिवसितारं प्रति देवतायाः
भामती-व्याख्या
ध्यान विहित है। इस ऋषि-सम्बन्धी उपासना में उन्हीं ऋषियों को अधिकार कैसे हो सकेगा ? ॥ ३१ ॥
'सामान्यतः सभी देवताओं और सभी ऋषियों को सभी प्रकार की ब्रह्म-विद्याओं में अधिकार नहीं, किन्तु यथासम्भव उपास्य और उपासक का जहाँ भेद है, वहाँ ही अधिकार दिया जा सकता है—"ज्योतिषि भावाच्च"। अर्थात् प्रत्यक्षतः अनुभूयमान ज्योतिर्मण्डल को ही आदित्य नाम से अभिहित किया जाता है, 'आदित्य' शब्द से जनित प्रतीति भी उसी लौकिक ज्योतिर्मण्डल को ही विषय करती है किन्तु यह ज्योतिर्मण्डल चेतन नहीं जड़मात्र है। इसमें देवदत्तादि के समान किसी प्रकार की चेष्टा नहीं पाई जाती। यह किसी प्रकार का शारीरिक या मानसिक कर्म नहीं कर सकता।
शङ्का—मन्त्र, अर्थवाद, इतिहास, पुराण और लोक-प्रसिद्धि के द्वारा देवताओं में विग्रहवत्त्व और चैतन्यादि का प्रतिपादन किया गया है, जैसे कि "जगृभ्माते दक्षिणमिन्द्रहस्तम्" (ऋ. सं. १०।४७।१) अर्थात् हे इन्द्र ! हमने आपका दक्षिण हाथ पकड़ा है। "इमे चिदिन्द्र रोदसी अपारे यत् संगृभ्णा मघवन् काशिरित् ते।" (ऋ. सं. ३।३०।५) अर्थात् हे मघवन् ! तू यदि इन द्यु और पृथिवी को पकड़ता है, तब ये तेरी मुट्ठी में समा जाते हैं। "तुविग्रीवो वपोदरः सुबाहुरन्धसो मदे । इन्द्रो वृत्राणि जिघ्नते" (ऋ. सं. ८।१७।८) अर्थात् स्थूल ग्रीवा, मोटे पेट और विशाल बाहुवाले इन्द्र ने सोमरस से मद-मत्त होकर वृत्रासुर का वध कर डाला। ये मन्त्र देवताओं के विग्रह का प्रतिपादन करते हैं। हवि का भक्षण भी वे कहते हैं—'अद्धीन्द्र। पिव च प्रस्थितस्य" (ऋ. सं. १०।११६।७) अर्थात् हे इन्द्र ! प्रस्थित (यजमान के द्वारा प्रदत्त) सोमरस का पान करो। देवताओं का ऐश्वर्य भी प्रतिपादित है—"इन्द्रो दिव इन्द्र ईशे पृथिव्या इन्द्रो अपामिन्द्र इत् पर्वतानाम् । इन्द्रो वृधामिन्द्र इन्मेधिराणामिन्द्रः क्षेमे योगे हव्य इन्द्रः ॥" (ऋ. सं. १०।८९।१०)। अर्थात् इन्द्र स्वर्ग, पाताल, वृधा (स्थावर) मेधिर (जङ्गम) के योग-क्षेम में समर्थ है, अतः इन्द्र हवि-समर्पित करने के योग्य है। इसी "ईशानमस्य जगतः स्वर्दृशमीशानमिन्द्र तस्थुषः" (ऋ. सं. ७।३२।२२)। अर्थात् हे इन्द्र ! आप इस स्थावर और जङ्गम जगत् के शासक और