भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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देवताया विग्रहादिमत्त्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४१५

मन्त्रार्थवादेतिहासपुराणलोकेभ्यो देवादीनां विग्रहवत्त्वाद्यवगमादयमदोष इति, नेत्युच्यते, नहि तावल्लोको नाम किञ्चित्स्वतन्त्रं प्रमाणमस्ति । प्रत्यक्षादिभ्य एव ह्यविचारितविशेषेभ्यः प्रमाणेभ्यः प्रसिद्धयन्नर्थो लोकात्प्रसिध्यतीत्युच्यते । न चात्र प्रत्यक्षादीनामन्यतमं प्रमाणमस्ति । इतिहासपुराणमपि पौरुषेयत्त्वात्प्रमाण-


भामती

प्रसादं प्रसन्नायाश्च फलदानं दर्शयति आहुतिभिरेव देवाम् हुतावः प्रीणाति तस्मै प्रीता इषमूर्जं च यच्छन्ति' इति । 'तृप्त एवैनमिन्द्रः प्रजया पशुभिस्तर्पयति' इति च । धर्मशास्त्रकारा अप्याहुः— ते तृप्तास्तर्पयन्त्येनं सर्वकामफलैः शुभैः । इति ।

पुराणवचांसि च भूयांसि देवताविग्रहादिपञ्चकप्रपञ्चमाचक्षते । लौकिका अपि देवताविग्रहादिपञ्चकं स्मरन्ति चोपचरन्ति च । तथाहि- यमं दण्डहस्तमालिखन्ति, वरुणं पाशहस्तम्, इन्द्रं वज्रहस्तम् । कथयन्ति च देवता हविर्भुज इति । तथेशनामिमामाहुः--देवग्रामो देवक्षेत्रमिति । तथास्याः प्रसादं च प्रसन्नायाश्च फलदानमाहुः-प्रसन्नोऽस्य पशुपतिः पुत्रोऽस्य जातः । प्रसन्नोऽस्य धनदो धनमनेन लब्धमिति । तदेतत् पूर्वपक्षी दूषयति ॐ नेत्युच्यते । न हि तावल्लोको नाम इति ॐ । न खलु प्रत्यक्षादिव्यतिरिक्तो लोको नाम प्रमाणान्तरमस्ति, किन्तु प्रत्यक्षादिमूला लोकप्रसिद्धिः सत्यतामश्नुते, तदभावे त्वन्धपरम्परावनमूलाभावाद्विप्लवते । न चात्र विग्रहादौ प्रत्यक्षादीनामन्यतममस्ति प्रमाणम् । न चेतिहासादिविमूलं भवितुमर्हति तस्यापि पौरुषेयत्वेन प्रत्यक्षाद्यपेक्षणात् । प्रत्यक्षादीनां चात्राभावादित्याह ॐ इतिहासपुराणमपि इति ॐ । ननूक्तं मन्त्रार्थवादेभ्यो विग्रहादिपञ्चकप्रसिद्धिरित्यत आह ॐ अर्थवादा


भामती-व्याख्या

स्वर्दृशं ( दिव्य दृष्टि-सम्पन्न ) हैं, हम आप की स्तुति करते हैं। यह मन्त्र भी देवताओं के ऐश्वर्य का प्रकाशक है। देवता अपने उपासक पर प्रसन्न हो वर-प्रदान करता है—"आहुतिभिरेव देवान् हुतादः प्रीणाति तस्मै प्रीता इषमूर्जं च यच्छन्ति" ( तै. सं. ५।४।४।१ ) अर्थात् देवतागण यजमान पर प्रसन्न होकर उसको अन्न और बल प्रदान करते हैं। इसी प्रकार "तृप्त एवैनमिन्द्रः प्रजया पशुभिस्तर्पयति"—यह मन्त्र भी तृप्ति आदि का अभिधायक है।

धर्मशास्त्रों में भी कहा है—"ते तृप्ताः तर्पयन्त्येनं सर्वकामफलैः शुभैः" । पुराणों में तो देवताओं के विग्रहादि-पञ्चक पर पुष्कल प्रकाश डाला गया है। [(१) विग्रह ( शरीर ), (२) हविर्भक्षण, (३) ऐश्वर्य, (४) प्रसन्नता और (५) फल-दातृत्व—ये देवता के विग्रहादिपञ्चक कहे जाते हैं ] । लौकिक-व्यवहार में भी देवताओं को विग्रहादि से युक्त ही माना जाता है, जैसे कि यमराज का चित्र लोग बनाते हैं—एक विकराल पुरुष आँखें फाड़े खड़ा है, उसके एक हाथ में सुदृढ़ मोटा दण्ड है। वरुण देवता के हाथ में पाश, इन्द्र के हाथ में वज्र दिखाया जाता है। लोग कहते भी हैं कि देवगण हवि का भक्षण करते हैं। देवता के प्रभुत्व का वर्णन करते हैं—'देवग्रामोऽयम्', 'देवक्षेत्रमिदम्'। इसी प्रकार देवता की प्रसन्नता और फल-दातृता का बखान भी किया जाता है—'प्रसन्नोऽस्य पशुपतिः', 'पुत्रोऽस्य जातः' । प्रसन्नोऽस्य धनदः, धनमनेन लब्धम्' ।

पूर्वपक्षी कथित पक्ष पर दोषाभिधान करता है—"नेत्युच्यते, न हि तावल्लोको नाम किञ्चित् स्वतन्त्रं प्रमाणमस्ति"। आशय यह है कि प्रत्यक्षादि प्रमाणों के आधार पर ही टिकी लोक-प्रसिद्धि यथार्थ मानी जाती है, स्वतन्त्र नहीं। जिस लोक-प्रसिद्धि में प्रत्यक्षादि का बल नहीं होता, वह एक अन्ध-परम्परामात्र रह जाती है, इतर प्रमाणों के द्वारा वह विप्लुत (बाधित) हो जाती है। देवता के विग्रहादि में प्रत्यक्षादि प्रमाण सम्भावित नहीं। इतिहासादि को भी देव-विग्रहादि का साधक नहीं मान सकते, क्योंकि इतिहासादि ग्रन्थ पुरुष-रचित होने के कारण प्रत्यक्षादि-सापेक्ष ही होते हैं और विग्रहादि में प्रत्यक्षादि का