भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ४१६ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. ३ सू. ३२ |
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न्तरं मूलमाकाङ्क्षति। अर्थवादा अपि विधिनेकवाक्यत्वात्स्तुत्यर्थाः सन्तो न पार्थग्- र्थ्येन देवादीनां विग्रहादिसद्भावे कारणभावं प्रतिपद्यन्ते। मन्त्रा अपि श्रुत्यादिविनि- युक्ताः प्रयोगसमवायिनोऽभिधानार्था न कस्यचिदर्थस्य प्रमाणमित्याचक्षते। तस्माद्-
भामती
अपि इति ॐ । विध्युद्देशेनैकवाक्यतामापद्यमाना अर्थवादा विधिविषयप्राशस्त्यलक्षणापरा न स्वार्थे प्रमाणं भवितुमर्हन्ति । 'यत्परः शब्दः स शब्दार्थ' इति हि शाब्दन्यायविदः, प्रमाणान्तरेण तु यत्र स्वार्थोऽपि सम्पद्यते यथा वायोः क्षेपिष्ठत्वम् । तत्र प्रमाणान्तरवशात्सोऽभ्युपेयते न तु शब्दसामर्थ्यात् । यत्र तु न प्रमाणान्तरमस्ति यथा विग्रहादिपञ्चके सोऽर्थः शब्दादेवावगन्तव्यः । अतत्परश्च शब्दो न तदवगमयितुमलमिति तदवगमायास्य तत्रापि तात्पर्यमभ्युपेतव्यम् । न चैकं वाक्यमुभयपरं भवतीति, वाक्यं भिद्येत । न च सम्भवत्येकवाक्यत्वे वाक्यभेदो युज्यते । तस्मात्प्रमाणान्तरानधिगता विग्रहादिमत्ता-ऽन्यपराच्छब्दादवगन्तव्येति मनोरथमात्रमित्यर्थः । मन्त्राश्च व्रीह्यादिवच्छ्रुत्यादिविधिभिस्तत्र तत्र विनियुज्य- मानाः प्रमाणभावाननुप्रवेशिनः कथमुपयुज्यन्तां तेषु तेषु कर्मस्वेत्यपेक्षायां दृष्टे प्रकारे सम्भवति नादृष्ट-
भामती-व्याख्या
अभाव है, यही कहा जाता है—"इतिहासपुराणमपि पौरुषेयत्वात् प्रमाणान्तरं मूलमाकां-क्षति"। यह जो कहा गया कि मन्त्र और अर्थवाद वाक्यों के द्वारा विग्रहादि-पञ्चक अवगत होता है, उसका खण्डन किया जाता है—"अर्थवादा अपि विधिनेकवाक्यत्वात् स्तुत्यर्थाः"। महर्षि जैमिनि ने अर्थवादवाक्यों के स्वतन्त्र प्रामाण्य का निराकरण करते हुए कहा है—"विधिना त्वेकवाक्यत्वात् स्तुत्यर्थेन विधीनां स्युः" (जै. सू. १।२।७) अर्थात् विधि-वाक्य के साथ एकवाक्यतापन्न होकर अर्थवाद वाक्य विधेय की प्रशंसा और निषेध्य पदार्थ की निन्दामात्र में पर्यवसित होते हैं, स्वाभिधेय अर्थ में प्रमाण ही नहीं होते, क्योंकि सर्व-सम्मत न्याय है कि "यत्परः शब्दः, स शब्दार्थः"। अर्थात् जिस पदार्थ में जिस शब्द का तात्पर्य अवसित होता है, वह शब्द उसी अर्थ का अभिधान किया करता है, अन्य अर्थ का नहीं। यदि अन्य अर्थ किसी प्रमाणान्तर से समर्थित होता है, तब वह प्रमाणान्तर ही उस अर्थ में प्रमाण माना जाता है, अर्थवाद वाक्य नहीं, जैसे "वायुर्वे क्षेपिष्ठा देवता" (तै. सं. २।१।१) इस अर्थवाद वाक्य के द्वारा ध्वनित वायु का शीघ्रगामित्व प्रत्यक्ष प्रमाण से समर्थित है, अतः प्रत्यक्ष प्रमाण ही उस अर्थ में प्रमाण माना जाता है, अर्थवाद वाक्य नहीं। किन्तु अर्थवाद के द्वारा ध्वनित जिस विग्रहादि-पञ्चकरूप अर्थ में कोई प्रमाणान्तर भी नहीं, वह अर्थ केवल अर्थवाद-वाक्य से प्रमाणित हो सकता था। जब कि अर्थवाद वाक्य का उसमें तात्पर्य ही नहीं, तब वह, उससे प्रमाणित क्योंकर होगा। एक ही अर्थवाद वाक्य विधेयार्थ की प्रशंसा भी करे और विग्रहादि-पञ्चक का प्रतिपादन भी—ऐसा मानने पर वाक्य-भेद हो जाता है—"अर्थभेदाद् वाक्यभेदः" (शाबर. पृ. ७८६)। वाक्य-भेद एक ऐसा दोष है, जिसे यथासम्भव नहीं होने देना चाहिए—"सम्भवत्येकवाक्यत्वे वाक्यभेदश्च नेष्यते" (श्लो. वा. पृ. १३५)। फलतः देवता में विग्रहादिमत्ता अन्यार्थपरक अर्थवाद वाक्य से प्रमाणित होगी—यह मनोरथ मात्र है।
इसी प्रकार मन्त्र वाक्य भी विग्रहादि को प्रमाणित नहीं कर सकते, क्योंकि वे स्वयं श्रुति, लिङ्गादि प्रमाणों के द्वारा वैसे ही किसी अर्थ में विनियुक्त होते हैं, जैसे "व्रीहिभिर्य-जेत"—यहाँ तृतीया विभक्तिरूप श्रुति के द्वारा व्रीहि का याग में विनियोग होता है। वे किसी अर्थ में प्रमाण ही नहीं माने जाते। 'मन्त्राः कर्मसु कथं विनियुज्यन्ताम्'—इस प्रकार की कैमर्थ्याकांक्षा में दृष्ट प्रकार सम्भव होने पर अदृष्ट-कल्पना उचित नहीं होती। इस प्रकार तो